पर्वत की कुछ उम्र चुरा कर
और जंगल के पतझड़ कुछ-कुछ
अनमना पन धरती का सब
मानव की नादानी कुछ-कुछ
पानी, पानी-पानी हो कर
भाग रहा सागर में धरने
सावन ने यूँ बरस-बरस कर
हैं बस यह सब जादू करने…..
बर्बरता की जूठन ले कर
सपनों की कुछ टूटन ले कर
ले कर आँसू का खारा पन
दुख से बोझिल-बोझिल से मन
सागर के विस्तृत हृदय में
बड़े यत्न से जा कर भरने
सावन ने यूँ बरस-बरस कर
हैं बस यह सब जादू करने…..
झूम के मेघा बरसें ऐसे
नृत्य-मग्न गौरा शिव जैसे
मेघों में बिजली बन चमके
डमरू के अनहद की धमकें
शिव शक्ति की मुस्कानों से
जीवन में जीवन रस भरने
सावन ने यूँ बरस-बरस कर
हैं बस यह सब जादू करने….
हरी-हरी झालर सी लताएं
फूलों संग झूमे इठलाए
सींच वनस्पतियों का तन मन
हर्ष रहा पानी का यौवन
बूँद-बूँद गूंथ कर वरमाला
पानी चला धरा को वर’ने
सावन ने यूँ बरस…

