Monday, February 23, 2026
होमलेखतरुण कुमार द्वारा 'द फ़्यूनरल सर्विस' कहानी की समीक्षा : मृत्यु का...

तरुण कुमार द्वारा ‘द फ़्यूनरल सर्विस’ कहानी की समीक्षा : मृत्यु का सांस्कृतिक विमर्श

कबीर कहते हैं कि –
कबीर मरनां तहं भला, जहां आपनां न कोइ।
आमिख भखै जनावरा, नाउं न लेवै कोइ॥
परंतु यह भी कहा जाता है कि इनसान के जीवन भर के कर्मोद्यम का सार उसकी अंतिम यात्रा है। उसका जनाजा कितने धूमधाम से निकला है, यही उसकी जीवनभर की कमाई है। यूरोपीय देशों में फ्यूनरल सविर्स का व्यवसाय शायद इसी विचार की पुष्टि करता है। पुरवाई के 8 फरवरी 2026 को प्रकाशित अंक में अंजु रंजन की कहानी द फ्यूनरल सर्विस इस विषय को बड़े मार्मिक ढंग से रेखांकित करती है। 
अंजु रंजन भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी हैं और एडिनबरा में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें यूके और प्रवासी भारतीयों के जीवन और उनके संघर्षों को जानने और समझने का अवसर मिला। उनकी यह कहानी इसी पृष्ठभूमि में लिखी गई है। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने मृत्यु और अंतिम संस्कार को केंद्र में रखकर ब्रिटिश समाज और प्रवासी भारतीयों के सामाजिक और सांस्कृतिक द्वंद्व का चित्रण किया है। 
कहानी की नायिका स्वाति अपने बुज़ुर्ग पति के साथ यूके (ब्रिटेन) में रहती है।  पति की गंभीर बीमारी और आसन्न मृत्यु की आहट स्वाति को भीतर से रिक्त करती है। वह शारीरिक रूप से साथ होते हुए भी मानसिक रूप से अकेली पड़ जाती है। स्वाति अकेलापन और सांस्कृतिक पहचान के टकराव से गुज़रती है—एक तरफ़ पश्चिमी फ़्यूनरल सर्विस (अंतिम संस्कार) की व्यावसायिक दुनिया, और दूसरी तरफ़ उसकी भारतीय भावनाएँ, यादें और पारिवारिक रिश्ते। कहानी में लेखिका ने स्वाति के मन की उलझनों को खूबसूरती से उकेरा है। उसकी हर मन:स्थिति जैसे पति की गंभीर बीमारी और उससे मुक्ति की कामना, भारतीय और ब्रिटिश जीवन मूल्यों में सांस्कृतिक टकराव, फ़्यूनरल सर्विस के व्यावसायिक रूप को लेकर उसकी अपनी सोच, उसका सामाजिक और मानसिक संघर्ष और अतीत की यादें —इन सबको संवेदनशील ढंग से पाठकों के सामने रखा गया है।
स्वाति पति के जीवित रहते हुए ही शोक की प्रक्रिया से गुजर रही है। वह हर क्षण को अंतिम समझकर जीती है। यह स्थिति उसे भावनात्मक रूप से थका देती है—वह रोती कम है, भीतर से टूटती अधिक है। 
कहानी में ब्रिटेन की औपचारिक, व्यवस्थित “फ़्यूनरल सर्विस” व्यवस्था और उसके भीतर की भारतीय संस्कारपरक चेतना के बीच गहरा टकराव है। यह द्वंद्व उसे आत्मसंवाद की स्थिति में ले जाता है, जहाँ वह अपने भारतीय मूल्यों और वर्तमान सामाजिक परिवेश के बीच संतुलन खोजती है। भारतीय समाज में मृत्यु एक सामुदायिक अनुभव है—रिश्तेदार, संस्कार, कर्मकांड और सामूहिक शोक। इसके विपरीत पश्चिमी समाज में यह अधिक व्यक्तिगत और औपचारिक प्रक्रिया बन जाती है। वह कहती है, “यह यूरोपीय और अमरीकी देशों की ख़ासियत है कि अपने अंतिम संस्कार के लिए खुद ही इंतजाम करके मरो ताकि बच्चे और रिश्तेदार काले चमचमाते सूट में स्मार्ट लगें और उन्हें बाप-मां के मृत शरीर को न छूना पड़े। बस वे एक गेट टुगेदर करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें।”
कहानी इस अंतर को उजागर करते हुए दिखाती है कि प्रवासी व्यक्ति मृत्यु जैसे निजी क्षण में भी सांस्कृतिक असमंजस से गुजरता है। इस प्रकार कहानी मृत्यु को केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विमर्श का माध्यम बना देती है। इस विमर्श में लेखिका यूरोपीय फ्यूनरल सर्विस को बेहतर मानती हैं। वह कहती हैं, “भारत में फ्यूनरल सर्विस देनेवाले को क्या कहते हैं-डोम। कितना घृणित काम माना जाता है जबकि जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण संस्कार मृत्यु में उसका योगदान अतुलनीय है। काश, भारत में भी ऐसी फ्यूनरल सर्विस होती।”
स्वाति का दुख उग्र नहीं है; वह चीखती नहीं, बल्कि चुप रहती है। यही मौन उसकी मनोवैज्ञानिक गहराई को प्रकट करता है। उसकी संवेदनाएँ धीमे-धीमे पाठक तक पहुँचती हैं—एक शांत, पर तीव्र वेदना के रूप में। लेखिका ने स्वाति के मनोवैज्ञानिक संघर्ष को गहराई से पेश किया है। यह केवल एक कहानी नहीं बल्कि नायिका के जीवन की आंतरिक यात्रा भी बन जाती है जिसमें वह जीवन के अलग-अलग पड़ावों को याद करती है। उसे याद आती है कि किस प्रकार बाबू की मृत्यु के बाद मां सफेद साड़ी नहीं पहनना चाह रही थी औऱ मामी ने खुद ही सफेद साड़ी मां को लपेट दी थी। वह सोचती है कि “क्या सफेद रंग सचमुच शांति देता है?” उसे सफेद रंग कभी पसंद नहीं था। और इसलिए वह तय करती है कि अपने पति के फ्यूनरल पर वह खुद काले गाउन पहनकर जाएगी। 
कहानी की भाषा सरल और बोलचाल की है। इसमें कई स्थानों पर भोजपुरी के शब्दों जैसे अँचिनही, बकाठ. सरियाती, कोरिया, अंट-शंट, कनिया, ममतालु, कोंच, नाइन आदि का प्रयोग कहानी को स्थानीयता प्रदान करता है। इन शब्दों के जरिए पाठक को स्वाति की मनोस्थिति का सीधा अनुभव मिलता है। फ़्यूनरल सर्विस” तथा अनेक स्थानों पर अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग हुआ है। भाषा में यह द्वैत कहानी की थीम को और सशक्त तथा विश्वसनीय बनाता है। भाषा की सादगी और वातावरण की सूक्ष्मता कहानी को गंभीर, चिंतनशील और पाठक के मन में देर तक ठहरने वाली बना देती है।
लेखिका ने मन और माहौल दोनों का संतुलित चित्रण किया है—रात के दो बजे का सन्नाटा, चिड़ियों की आवाज (हालांकि झींगुर की आवाज को सायं सायं करते बताया गया है जो अटपटा लगता है), स्वाति का आत्मसंकट और उसके चारों ओर का शांत-उदास वातावरण, कहानी को एक धीमी और गंभीर लय देता है। कहानी का बड़ा हिस्सा स्वाति के आत्मसंवाद और विचारों के माध्यम से आगे बढ़ता है। घटनाएँ कम हैं, भाव अधिक। यह शैली पाठक को नायिका के मन में प्रवेश करने का अवसर देती है। कहानी का सबसे सशक्त पक्ष स्वाति के अंतर्मन का सूक्ष्म चित्रण है। लेखिका ने शोक, अकेलेपन और सांस्कृतिक द्वंद्व को अत्यधिक नाटकीय बनाए बिना प्रस्तुत किया है। यह संयम कथा को विश्वसनीय बनाता है।
कहानी मुख्यतः आत्मसंवाद और भावनात्मक विश्लेषण पर आधारित है। घटनाओं का बाह्य विस्तार कम है, जिससे कुछ पाठकों को कथा की गति धीमी या स्थिर प्रतीत हो सकती है। पूरा कथानक लगभग स्वाति की दृष्टि से चलता है। अन्य पात्रों की मनोस्थिति या संवाद अपेक्षाकृत कम उभरते हैं। इससे कथा में बहुस्तरीयता थोड़ी सीमित हो जाती है और दृष्टिकोण एकांगी हो जाता है। 
कहानी का अंत भी शांत और संयमित है। कुछ पाठकों को यह अधूरा और कम प्रभावशाली लग सकता है, यद्यपि यह लेखिका की शैलीगत पसंद भी हो सकती है।
इस प्रकार “द फ़्यूनरल सर्विस” एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और भावनात्मक रूप से गहन कहानी है। यह सिर्फ़ मृत्यु का सांस्कृतिक विमर्श ही नहीं पेश करती है बल्कि जीवन, अकेलापन, पारिवारिक यादें, सांस्कृतिक पहचान और अंतर्मन के सवालों का प्रतिबिंब भी है।


RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest