हमारे समाज में जो नीतियाँ और कानून गढ़े जाते हैं, क्या उन पर समय–समय पर पुनर्विचार नहीं होना चाहिए? क्या अपने ही बनाए ढाँचों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक परंपरा का अभिन्न अंग नहीं है? उदाहरण के लिए, जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) कोई नया नियम या दिशा–निर्देश (इक्विटी बिल 2026) जारी करता है और वह भी ऐसा वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर करता है, तो पूरा अकादमिक जगत क्यूँ सिहर जाता है? कुछ लोगों को यह एक सही कदम होता है, तो अन्य को इसमें अनावश्यक दुरुपयोग का गहरा भय सताता है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा आंदोलन हुआ हो या कानून बना हो, जिस पर दुरुपयोग की आशंका का ठप्पा न लगा हो। साथ में यह भी सच है कि नियमों के दुरुपयोग से यदि नियमों को स्थगित कर दिया जाए, तो इस दुनिया में कोई भी नियम कभी भी लाया नहीं जा सकेगा। जहाँ दुरुपयोग की संभावना दिखे, वहाँ सुधार की गुंजाइश बनानी चाहिए; लेकिन केवल इस आधार पर किसी कानून को स्थगित कर देना या उसे बनने ही न देना, बौद्धिक और नैतिक दोनों ही स्तर पर एक गंभीर भूल का प्रतीक है। कानून इसलिए नहीं स्थगित किए जाते हैं कि उनका दुरुपयोग हो सकता है; बल्कि उन्हें और मज़बूत बनाया जाता है ताकि दुरुपयोग की गुंजाइश न्यूनतम से न्यूनतम रह जाए। कानून का मूल उद्देश्य सुविधा बनाए रखना नहीं, बल्कि अन्याय को रोकना है। जहाँ यह कमज़ोर पड़ती दिखे, वहाँ उसे और सख़्त किया जाना चाहिए, न कि पूरी व्यवस्था को त्याग दिया जाना।
यूजीसी इक्विटी बिल 2026 से जुड़े नियम सीधे तौर पर विद्यार्थियों और शिक्षकों—दोनों को प्रभावित करते हैं। सवाल यह उठता है: क्या ये नियम शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोई खाई पैदा कर रहे हैं, या वे व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और पारदर्शी बना रहे हैं? स्वाभाविक रूप से, एक समूह इन्हें आवश्यक और समयोचित बताएगा, जबकि दूसरा समूह उतनी ही तीव्रता से दावा करेगा कि इससे दुरुपयोग बढ़ेगा। लेकिन दुरुपयोग की आशंका के नाम पर नियमों को पूरी तरह खारिज कर देना कोई समाधान नहीं है। इसके विपरीत, जब दुरुपयोग की संभावना अधिक लगे, तब नियमों को और अधिक स्पष्ट, सख़्त तथा जवाबदेह बनाना चाहिए। समस्या नियमों की निर्मिति में नहीं, बल्कि उनकी अस्पष्टता और क्रियान्वयन की ढील में छिपी है। यही ढील हर व्यवस्था को खोखला बनाती है, और यही ढील धीरे–धीरे ध्रुवीकरण को जन्म देती है। क्योंकि एक पक्ष नियमों के पक्ष में खड़ा हो जाता है, जबकि दूसरा पक्ष उनके विरुद्ध—और दोनों के बीच संवाद की जगह आरोप–प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो अंततः समाज को और अधिक विभाजित करता है।
अब ज़मीनी हक़ीक़त पर नज़र डालें, खासकर अकादमिक जगत् की। जब हम किसी विश्वविद्यालय/कॉलेज में पढ़ाते या पढ़ते हैं, तो क्या किसी विद्यार्थी के लिए यह मायने रखना चाहिए कि उसका शिक्षक किस जाति का है? यदि कोई विद्यार्थी शिक्षक की जाति देखकर यह तय करता है कि वह ठीक से पढ़ा पाएगा या नहीं, तो यह उसके भीतर छिपी जाति–चेतना और पूर्वाग्रह का स्पष्ट प्रमाण है। शिक्षा का मूल प्रश्न शिक्षक की जाति से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, संवेदनशीलता और ईमानदारी से तय होना चाहिए। ठीक इसी तरह, क्या किसी शिक्षक के लिए यह महत्त्वपूर्ण होना चाहिए कि सामने बैठा विद्यार्थी किस जाति का है? शिक्षा–तंत्र का आदर्श यही होना चाहिए कि कक्षा के भीतर जाति अदृश्य हो जाए—न शिक्षक को विद्यार्थी की जाति से सरोकार हो, न विद्यार्थी को शिक्षक की जाति से। शिक्षा का संबंध योग्यता, परिश्रम और मानवीय गरिमा पर आधारित होना चाहिए, न कि पहचान के कठोर खांचों और ढांचों पर। क्योंकि जिस दिन कक्षा के भीतर पहचान योग्यता से ऊपर उठने लगती है, उस दिन शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है, और समाज में समानता का सपना बहुत दूर तलक छिटक जाता है।
यहीं से आरक्षण और संवैधानिक व्यवस्था का जटिल सवाल शुरू होता है। कई लोग आरोप लगाते हैं कि संविधान ने जाति को “फिक्स/सख़्त/रिजिड” कर दिया, जिससे जातिवाद मज़बूत हुआ। शायद कुछ हद तक यह बात सही भी है मगर यह आधा सच है। वास्तविकता यह है कि उत्तर वैदिक काल में वर्ण–व्यवस्था कर्म पर आधारित थी—एक ही परिवार में अलग–अलग कर्म करने वाले लोग हो सकते थे; व्यवस्था तरल और गतिशील थी। समस्या तब उत्पन्न हुई जब वर्ण जन्म से तय होने लगा, और सामाजिक गतिशीलता जड़ता में बदल गई, और जिसको हुए भी आज हज़ारों साल बीत चुके हैं। संविधान ने जाति का आविष्कार नहीं किया; बल्कि उसने जन्म–आधारित सामाजिक विषमता में पिसते समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए आवश्यक औजार प्रदान किए। मंशा यही रही थी कि सदियों से पीछे धकेले गए लोग बराबरी तक पहुँच सकें। यह मंशा न केवल सही थी, बल्कि नैतिक रूप से अनिवार्य भी थी, क्योंकि ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किए बिना वर्तमान न्याय की कोई भी बात खोखली साबित होती है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जो व्यवस्था कई हज़ारों साल पहले (उत्तर वैदिक काल में) सही थी जिसमें एक ही परिवार में कई वर्ण के लोग हो सकते थे, वह अपने वास्तविक स्वरूप से पृथक होने की बाद यदि आज और मज़बूती के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है, तो आज की पीढ़ी अपने आप को किसी भी रूप में आधुनिक कहने का अधिकार खो देती है।
इन अमुक वर्गों को मुख्य धारा में लाने के लिए यथोचित आरक्षण की व्यवस्था की गई है, जिसका सकारात्मक परिणाम आज हर और दिखायी भी देता है। वास्तव में आरक्षण के साथ समस्या तब जन्म लेती है जब सहायता का यह औजार पहचान का स्थायी टैग बन जाता है। मदद मिलनी चाहिए—जाति के आधार पर भी, क्योंकि उत्पीड़न तो जाति के आधार पर ही हुआ है—लेकिन मदद का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि पहचान हमेशा के लिए जड़ हो जाए। एक ही समुदाय पीढ़ी–दर–पीढ़ी सशक्त होते हुए भी आरक्षण का लाभ लेता रहे, यह तो दिक़्क़त करता हुआ प्रतीत होता है; मगर दूसरी ओर, कोई समुदाय सशक्त होने के बाद भी सामाजिक अपमान और भेदभाव झेलता रहता, यह बात सदा डिस्कोर्स के बाहर रहती है। इस संदर्भ में हम न तो उस व्यक्ति या समुदाय की बात करते हैं जो आरक्षण की व्यवस्था का लाभ उठाकर सशक्त तो हुआ मगर जो जाति आधारित भेदभाव से नहीं बच सका और न ही उस ढाँचे की बात करते हैं जिसके तहत आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति अनारक्षित के मार्क्स लाकर भी अपनी ही श्रेणी में गिने जाने के लिए अभिशप्त हो जाता है और जिसे आरक्षण का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए उसे उस लाभ से वंचित कर देता है। समाधान सहायता को हटाना नहीं है; बल्कि सहायता का ढांचा गतिशील बनाना है—जो बराबरी तक पहुँच चुके हैं, उनके लिए रास्ता बदलें; और जो अभी भी पीछे हैं, उनके लिए समर्थन को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाएं। लक्ष्य जाति को स्थायी रूप से फिक्स/रिजिड करना नहीं, बल्कि सहायता के माध्यम से समुदायों को उस जाति–आधारित हाशिए से बाहर निकालना होना चाहिए। लेकिन यदि सामाजिक चेतना में जाति का दंश बरकरार रहता है, तो संवैधानिक बराबरी भी अधूरी ही मानी जाएगी और लाभांशी को लाभ पहुंचाकर भी भेदभाव वाली सामाजिक संरचना को कभी भी बदला नहीं जा सकेगा।
यहीं एक और सामान्य तर्क सामने आता है: “जिन्हें आरक्षण मिल चुका है, वही बार–बार लाभ उठाते रहते हैं; जिन्हें वास्तव में ज़रूरत है, उन्हें नहीं मिलता।” इस तर्क में एक गहरी चूक है, जिस पर अक्सर चर्चा नहीं होती है। जो व्यक्ति या परिवार आरक्षण के सहारे सशक्त हुआ है, वह आर्थिक या शैक्षणिक रूप से मज़बूत हो सकता है, लेकिन सामाजिक स्तर पर जाति के अपमान, तिरस्कार और भेदभाव से मुक्त नहीं होता। उसकी जाति ‘फिक्स‘ बनी रहती है, और उसी के नाम पर वह निरंतर दंश भी झेलता रहता है। इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करके “बार–बार फायदा उठाने” का आरोप लगाना बौद्धिक बेईमानी है। यदि कोई व्यक्ति सशक्त होने के बाद भी जाति के आधार पर अपमानित होता है, तो यह दर्शाता है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की भी है। इस पीड़ा को अनदेखा करना सामाजिक न्याय की अवधारणा को कमज़ोर करता है।
इस संदर्भ में यह भी याद रखना ज़रूरी है कि आरक्षण का दायरा आज भी मुख्यतः सरकारी नौकरियों और सरकारी संस्थानों तक सीमित है, जो कुल रोज़गार का लगभग दो से तीन प्रतिशत ही बनता है। विडंबना यह है कि इस सीमित दायरे में भी आरक्षण का ईमानदार और पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो पाता—कहीं चयन प्रक्रियाओं में पूर्वाग्रह दिखाई देता है, कहीं ‘एनएफ़एस’ (Not Found Suitable) जैसे बहानों से पद खाली छोड़ दिए जाते हैं, और बैकलॉग वर्षों तक बना रहता है। यदि सामाजिक न्याय वास्तव में लक्ष्य होता, तो निजी क्षेत्र—जहाँ 96–97 प्रतिशत रोज़गार के अवसर हैं—में भी आरक्षण को पूरी शक्ति और स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ लागू किया जाता, और साथ ही सरकारी तंत्र में भी उसे निष्प्रभावी करने की प्रवृत्तियों पर सख़्ती से रोक लगाई जाती। इतना ही नहीं, आरक्षण से सशक्त होने वाले व्यक्ति को केवल ‘इस जाति का’ मानकर उसी पहचान में स्थिर कर देने के बजाय, नीतिगत स्तर पर उसे जाति-परिचय से बाहर निकलने के अवसर और प्रोत्साहन दिए जाते, ताकि सशक्तिकरण पहचान की कैद न बन जाए। व्यापक प्रतिनिधित्व और वास्तविक अवसर मिलने पर धीरे-धीरे जाति की कठोर सीमाएँ शिथिल पड़तीं, सामाजिक वर्गीकरण का विसर्जन संभव होता, और तब समाज स्वाभाविक रूप से जाति-आधारित नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक वंचना पर आधारित न्याय-प्रणाली की ओर बढ़ पाता। यही वह रास्ता होता जहाँ सामाजिक न्याय पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर आर्थिक न्याय की दिशा में रूपांतरित हो सकता था।
इस संदर्भ में आरक्षण की एक और बुनियादी संवैधानिक व्यवस्था को भी लोग अक्सर सुविधानुसार भूल जाते हैं। ‘अनारक्षित‘ (यूआर) श्रेणी किसी एक वर्ग के लिए आरक्षित नहीं है; वह मेरिट की खुली प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र है, जिसमें कोई भी—एससी, एसटी, ओबीसी इत्यादि—यदि योग्यता के आधार पर आगे निकलता है, तो उसे वहीं से चुना जा सकता है। आज भी आईएएस, पीसीएस और अन्य प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ अनुसूचित जाति–जनजाति के विद्यार्थी यूआर श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसे विद्यार्थियों को भी केवल “एससी–एसटी” कहकर उनकी योग्यता को खारिज कर दिया जाता है, मानो उनकी मेरिट स्वतः अमान्य हो। यदि यूआर की श्रेणी को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो आरक्षित वर्ग का योग्य विद्यार्थी यूआर में चयनित होने पर स्वत: आरक्षित सीट को छोड़ देता है, और वह सीट उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध हो जाती है जिसे वास्तविक सामाजिक–शैक्षणिक ज़रूरत है। लेकिन जब योग्य आरक्षित विद्यार्थी को जबरन “अपनी कैटेगरी” में धकेला जाता है, तो आरक्षित श्रेणी की सीट अपेक्षाकृत सशक्त व्यक्ति ले लेता है, और जिसे वास्तविक ज़रूरत है, वह उससे वंचित रह जाता है।
यहाँ एक और गहरी विडंबना भी दिखाई देती है, जिसे अक्सर जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है। एक ओर आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को अनारक्षित वर्ग के कुछ लोगों द्वारा यह कहकर अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है कि वे ‘कोटे से आए हैं’, उनमें ‘मेरिट’ नहीं है, और वे केवल आरक्षण के सहारे आगे बढ़े हैं। दूसरी ओर वही लोग यह तर्क भी देते दिखाई देते हैं कि आरक्षण का लाभ अब उन लोगों को मिल रहा है जो पहले से सशक्त हो चुके हैं, जिन्हें इसकी वास्तविक आवश्यकता नहीं है, और असली हक़दार तो वे हैं जिनके पास न संसाधन हैं, न सामाजिक पूँजी, न आर्थिक सुरक्षा। यह विरोधाभास दरअसल एक ही समय में दो विपरीत बातें कहने की सुविधा देता है—ज़रूरतमंद को सैद्धांतिक सहानुभूति और आरक्षण पाने वाले को व्यावहारिक अपमान। परिणाम यह होता है कि आरक्षण से आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अपनी उपलब्धि के बावजूद लगातार अपनी ‘वैधता’ साबित करता रहता है, जबकि व्यवस्था की खामियों पर प्रश्न उठाने के बजाय व्यक्ति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस तरह सामाजिक न्याय की नीति धीरे–धीरे व्यक्तियों के अपमान का औज़ार बन जाती है, और संरचनात्मक असमानताओं पर सार्थक विमर्श हाशिये पर चला जाता है। यानी समस्या आरक्षण की नहीं, उसके ईमानदार क्रियान्वयन की है।
आज यूजीसी से जुड़े आंदोलनों ने जिस तरह ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। एक समूह दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं है; एससी–एसटी के नाम पर गाली–गलौज होती है, तो जवाब में ‘ब्राह्मण‘ जैसे संबोधनों को गाली बना दिया जाता है। यह भाषा केवल विष घोलती है; इससे न न्याय बढ़ता है, न संवाद। सवाल है: क्या हमें ऐसे संवैधानिक संशोधनों और कानूनी प्रावधानों पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए, जिनसे दो काम एक साथ हों—हाशिए पर पड़े समुदायों को आरक्षित सहयोग मिलता रहे, और वे उस “जाति–पीड़ा” से बाहर निकलने का रास्ता भी पाते रहें? अर्थात, मदद हो, लेकिन पहचान का बोझ स्थायी न बने; संरक्षण हो, लेकिन पीड़ित स्थिति हमेशा की न बने।
यहीं यह प्रश्न भी उठता है: क्या हमने जाति–विहीन समाज बनाने की दिशा में कोई वैकल्पिक और ठोस सामाजिक पहलें वास्तव में कीं? काश, हमने बाबा साहब आंबेडकर के सुझावों के अनुरूप अंतरजातीय विवाहों को केवल स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से प्रोत्साहित और संरक्षित किया होता—संवैधानिक सुरक्षा के साथ, चाहे वह प्रेम–विवाह हो या व्यवस्थित। भारत में ‘इंटर‘ की शुरुआत धर्म से पहले जाति से होनी चाहिए थी, क्योंकि हमारी मूल समस्या जाति है। यदि तीन–चार पीढ़ियों में परिवारों का व्यापक अंतर्मिश्रण होता, तो कोई व्यक्ति खुद को ब्राह्मण, जाटव या बनिया कहकर स्वयं को स्थायी पहचान दे ही नहीं सकता था—पहचान का यह कठोर खांचा/ढांचा अपने आप ढीला पड़ जाता। उसे स्वाभाविक तौर पर उस बिंदु पर आना पड़ता जहाँ वो कह पाता कि या तो वह कुछ नहीं है या फिर मनुष्य है। समाज यदि वास्तव में अंतर्मिश्रण की ओर बढ़ता, तो जाति–आधारित पहचान की प्रासंगिकता धीरे–धीरे समाप्त हो जाती, और आरक्षण की जाति–आधारित आवश्यकता भी क्रमशः आज बदल जाती। इस क्रम में यह भी पूछना आवश्यक जान पड़ता है कि : क्या हमने जाति–सूचक सरनेमों और संबोधनों को हटाने, या कम से कम शैक्षणिक और सार्वजनिक संस्थानों में उनके प्रयोग को हतोत्साहित करने पर कभी गंभीर विचार किया? क्या ऐसी नीतियां बनाई गईं कि व्यक्ति की पहचान उसके काम और योग्यता से बने, न कि नाम से झलकती जाति से? जब तक रोज़मर्रा के व्यवहार में जाति की पहचान बनी रहती है, तब तक जाति–विहीन समाज की बात केवल एक आदर्श वाक्य है, जो जाति आधारित सामाजिक कटुता को केवल और केवल आगे ही बढ़ाती है। जब तक हमारे समाज में जाति-आधारित विशेषाधिकार की धारणा बनी रहेगी—जब तक यह मान्यता ज़िंदा रहेगी कि कोई जाति ‘महान’ है और कोई ‘हीन’—तब तक क्या हम सचमुच जाति-विहीन समाज की कल्पना भी कर सकते हैं? जिस समाज की सोच ही ऊँच-नीच के खाँचों में बंटी हो, वहाँ समानता केवल नारे में रह जाती है, व्यवहार में नहीं उतर पाती। जाति का प्रश्न केवल पहचान का नहीं, सत्ता और अवसरों के असमान वितरण का प्रश्न है। जब तक कुछ समूहों को जन्म से श्रेष्ठ और कुछ को जन्म से कमतर मानने की मानसिकता बनी रहती है, तब तक हर सुधार अधूरा रहेगा—चाहे वह आरक्षण की नीति हो, शिक्षा के अवसर हों या आर्थिक सशक्तिकरण की योजनाएँ। जाति-विहीन समाज का सपना तब ही सार्थक हो सकता है, जब जाति को विशेषाधिकार और अपमान—दोनों के स्रोत के रूप में देखने की सोच टूटे, और व्यक्ति को उसकी जन्मगत पहचान नहीं, बल्कि उसके मनुष्य होने के आधार पर सम्मान और अवसर मिलें।
यहाँ यह भी समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आरक्षण का आदर्श लक्ष्य अंततः आवश्यकता–आधारित होना चाहिए—जिसे सचमुच मदद की ज़रूरत है, उसे ही आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए; उसका धर्म या जाति निर्णायक न हो। लेकिन यह आदर्श तभी संभव है जब जाति/धर्म–आधारित भेदभाव सामाजिक जीवन से लगभग समाप्त हो जाए। आज तो ऐसा नहीं है। वर्तमान समय की विसंगतियाँ बड़ी भिन्न हैं। आज ‘यूआर‘ कहे जाने वाले वर्ग में भी गरीब हैं, और एससी–एसटी–ओबीसी में भी सम्पन्न लोग—यह सत्य है; परंतु फ़र्क अनुपात का अवश्य है। और यह अनुपात समय के साथ बदलता है। जो सामाजिक–आर्थिक स्थिति आज है, वही स्थिति न तो 50-60 या 100 साल पूर्व थी, और न ही भविष्य में होगी। इसलिए आरक्षण की नीतियों को स्थिर नहीं, गतिशील रखना चाहिए—समय, आंकड़ों और ज़मीनी हक़ीक़त के अनुसार उनमें संशोधन होते रहने चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब तक जाति–आधारित भेदभाव जीवित है, तब तक जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने की दिशा में आंदोलन किए जाने चाहिए। पहले भेदभाव के सामाजिक ढांचे को तोड़ें, फिर मापदंड बदलने की आवश्यकता के अनुसार आगे बढ़ें, इतना ही ज़रूरी क़दम है।
अंत में, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के संदर्भ में समाज की भाव–स्थिति पर भी विचार करना ज़रूरी जान पड़ता है। कितने लोग आज भी उन्हें केवल ‘दलित‘ या ‘शूद्र‘ कहकर सीमित कर देते हैं—मानो एक विश्व–स्तरीय विद्वान, संविधान–निर्माता और आधुनिक भारत के विधाता की पहचान उनकी जाति से तय होनी चाहिए। कुछ लोग तर्क देते हैं कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में वैसी भागीदारी नहीं की जैसी अन्य नेताओं ने, इसलिए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन यह दृष्टि इस सच्चाई को अनदेखा करती है कि बाबासाहेब का आंदोलन राजनीतिक स्वतंत्रता से आगे का था—सामाजिक स्वतंत्रता का आंदोलन। राजनीतिक स्वतंत्रता हमें 78 वर्ष पहले मिल चुकी; लेकिन जिन मुद्दों पर वे लड़ रहे थे—जाति–आधारित अपमान, बहिष्कार, संरचनात्मक असमानता—वे आज भी उतने ही ज्वलंत हैं, बल्कि कई मायनों में अधिक प्रासंगिक। आज जब सार्वजनिक मंचों से (यहां तक कि शंकराचार्यों के स्तर तक से) मनुस्मृति की ऐसी व्याख्याएं बेधड़क दी जाती हैं जिनका निष्कर्ष “जिसका जो काम है, वह वही करे” होता है, और यह सब संवैधानिक व्यवस्था के भीतर बिना प्रभावी प्रतिरोध के चलता रहता है, तब बाबासाहेब की चेतावनी और प्रासंगिक हो जाती है: जब तक सामाजिक समरसता और न्याय वास्तविक अर्थों में स्थापित नहीं होते, तब तक कोई भी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी—वह कुछ वर्गों की स्वतंत्रता होगी, जबकि शेष समाज सदियों की सामाजिक गुलामी का बोझ उठाता रहेगा।
अगर डॉ. भीमराव अंबेडकर के समूचे कृतित्व का ईमानदारी से आकलन किया जाए, तो यह कहना कठिन नहीं होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य सभी नायकों को एक तरफ़ रखकर डॉ. अंबेडकर को अलग खड़ा करना पड़ेगा। जिन लोगों की लड़ाई 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के साथ पूरी हो गई, उनकी भूमिका अपनी जगह ऐतिहासिक है; लेकिन देश आज कैसे चलेगा, नागरिकों के अधिकार क्या होंगे, सत्ता किस सीमा में बंधी रहेगी, और सामाजिक न्याय का आधार क्या होगा—इसका ठोस ढांचा 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने दिया, जिसके प्रमुख निर्माता डॉ. अंबेडकर थे। यदि स्वतंत्रता के श्रेय को प्रतीकात्मक रूप से सौ प्रतिशत में बाँटना हो, तो पचास प्रतिशत श्रेय उस संघर्ष को दिया जा सकता है जिसने 1947 में औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति दिलाई, और शेष पचास प्रतिशत अकेले डॉ. अंबेडकर को देना पड़ेगा—क्योंकि उनकी लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं थी, बल्कि समाज के भीतर व्याप्त असमानता, अपमान और वंचना के विरुद्ध थी, और वह संघर्ष आज भी जीवित यथार्थ के रूप में हमारे सामने मौजूद है।
यहीं से लिंग–भेदभाव की तुलना भी प्रासंगिक हो जाती है। कभी हमारे समाज में स्त्री–भ्रूण हत्या इतनी व्यापक थी कि लिंग अनुपात बुरी तरह बिगड़ गया। इसके पीछे सामाजिक कारण थे—पितृसत्ता, दहेज, पुत्र–प्राथमिकता। क्या केवल नैतिक अपीलों से बदलाव आया? नहीं। सख़्त कानून आए, जैसे पीएनडीटी एक्ट, जिसमें कड़े प्रावधान लागू हुए। आज हर अस्पताल और डॉक्टर को लिखित रूप से घोषित करना पड़ता है कि भ्रूण का लिंग बताना अपराध है; जरा–सी संभावना पर जेल और लाइसेंस रद्द होने का खतरा है। क्या इससे समाज बदला? हाँ, निर्णायक रूप से—पूरी तरह नहीं, लेकिन पर्याप्त। कानून की सख़्ती ने व्यवहार बदला, फिर संवेदनशीलता आई। तो सवाल ये है कि जाति के मामले में ऐसी सख़्ती क्यों नहीं? क्या संभव नहीं कि किसी भी रूप में—पूछकर, इशारों में, फॉर्म में, बातचीत में—किसी शिक्षक या विद्यार्थी की जाति जानने या बताने को दंडनीय अपराध बना दिया जाए? क्या नियम नहीं हो सकता कि शैक्षणिक परिसरों में जाति का कोई संकेत मिलते ही कड़ी सजा हो—इतनी कड़ी कि कोई जाति–सूचक व्यवहार की कल्पना तक न करे? यदि लिंग–भेदभाव में सख़्त कानून व्यवहार बदल सकते हैं, तो जाति में क्यों नहीं? मदद का ढांचा अलग रहे—नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर; लेकिन रोज़मर्रा में जाति को कानूनी रूप से अदृश्य कर दें, और लोग शिक्षण संस्थानों में बिना जातीय विशेषणों या पहचानों के मुक्त विचरण कर सकें।
ऐसे नियमों से संभवतः इन दोनों लक्ष्यों को एक साथ साधा जा सकता है। एक ओर संवैधानिक ढांचे में हाशिए पर पड़े समुदायों को प्राइवेट और पब्लिक दोनों सेक्टर्स में आरक्षित सहयोग मिलता रहे—शिक्षा, रोज़गार और प्रतिनिधित्व में—ताकि वे मुख्यधारा में आएं; दूसरी ओर सामाजिक व्यवहार में जाति की पहचान को कानूनी रूप से मिटाने के कठोर क़दम उठाएं। जैसे ही कोई समुदाय सशक्त होकर मुख्यधारा में आए, सहायता का स्वरूप बदले—ताकि वह स्थायी निर्भरता न बने। और जैसे ही कोई जाति–सूचक अपमान करे, व्यवस्था इतनी सख़्त हो कि अपराध दोहराने की हिम्मत न हो। समाधान स्थगन में नहीं, संवाद और सुधार में है। यूजीसी के नियम हों या संवैधानिक प्रावधान—उन्हें रोकना/स्थगित करना आसान है, लेकिन समाज बदलना कठिन। समाज कानूनों से ही बदला है—धीरे–धीरे, टकरावों के बीच, गलतियों को सुधारते हुए। हमें सख़्त, स्पष्ट और मानवीय नियम चाहिए; लक्षित, गतिशील और न्यायपूर्ण सहायता चाहिए; और ऐसा वातावरण चाहिए जहाँ कक्षा में जाति अदृश्य हो, लेकिन व्यवस्था में अन्याय दिखे ताकि उसे सुधारा जा सके। यही संतुलन भारत को आगे ले जा सकता है—न जाति को स्थायी पहचान बनाकर, न जाति–पीड़ा को अनदेखा करके।
© प्रोफ़ेसर प्रवीण कुमार अंशुमान
(दिल्ली विश्वविद्यालय)