Monday, February 23, 2026
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रेखा श्रीवास्तव का लेख – वर्चुअल ऑटिज्म !

ऑटिज्म तो बच्चे में जन्मजात होता है और कुछ जन्म के बाद बच्चों में आता है, लेकिन एक सामान्य व्यक्ति से कुछ न कुछ अलग होते है। 
          ऐसे लक्षण वाले बच्चे पहले भी होते थे लेकिन ये जो कि आज की नयी पीढ़ी की जीवन शैली की देन है। आज के परिवेश में 99 % माता-पिता दोनों ही कामकाजी होते हैं और परिवार को वे अपने तरीके से मैनेज करते हैं। इसके बाद भी उनको कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसमें उनकी मजबूरी भी होती है। लेकिन उनको इस वर्चुअल ऑटिज्म की सम्पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है।          
वर्चुअल ऑटिज़्म के कारण –
     संयुक्त परिवार का ह्रास – आज संयुक्त परिवार का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है। आज पति-पत्नी और बच्चा इसका नाम ही परिवार रह गया है। कामकाजी माता-पिता बच्चे को उतना समय नहीं दे पाते हैं, जितना कि बच्चे को जरूरत होती है क्योंकि अधिकतर कपल कॉर्पोरेट जगत का अंश है और उसमें उनका समय एकदम निश्चित दिनचर्या में बँधा रहता है। 
    बच्चे की जीवनचर्या – 
             माँ छह महीने प्रसवोपरांत अवकाश पर रहती है, वह उसको देख सकती है लेकिन तब भी वह ये बात दिमाग में रखती है कि बच्चा बहुत अधिक उसका आदी न हो जाए, नहीं तो वह उसके बाद जॉब कैसे कर पाएगी? वह शुरू से ही एक नैनी की व्यवस्था कर लेती है ताकि उसे अपने कामों के लिए समय मिल सके। बच्चा जब तक अबोध रहता है उसका काम चल जाता है लेकिन जैसे ही बच्चा पहचानना शुरू कर देता है तो वह प्रतिक्रिया चाहता भी है और देता भी है। 
बच्चे और गैजेट्स – 
            जानबूझ कर नहीं लेकिन हम ही रोते हुए बच्चे को चुप कराने लिए मोबाइल पर राइम लगा देते हैं और बच्चा उसको सुक्कर चुप भी हो जाता है। पहले भी माँ सुलाने के लिए लोरी सुनाया करती थी लेकिन अब राइम लगा दी जाती हैं। धीरे धीरे वह मोबाइल और टीवी पहचानने लगता है। टीवी तो बैडरूम में रहता है। माँ-बाप अपने मनोरंजन के लिए चला लेते हैं और उस अबोध की नजरें टीवी में लगी होती हैं। इतना ही नहीं बल्कि बच्चों की नैनी भी खुद अपने आराम के लिए बच्चों को मोबाइल दे देती है। 
               जब बच्चा बचपन से ही टीवी या मोबाइल में लगा रहेगा तो वह वास्तविक जीवन से कटने लगता है और उसको किसी की उपस्थिति की जरूरत भी नहीं होती है और वह अपना एक अलग ही संसार बना लेता है। टीवी कार्टून के चरित्र उन्हें सजीव लगते हैं और वे उन्हें अपना साथी समझ लेते हैं। । 
वर्चुअल ऑटिज़्म के लक्षण – 
  1. टीवी और मोबाइल की स्क्रीन बच्चों को आकर्षित करती है और वह उससे एक सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। धीरे धीरे वह दूसरों से आँखें मिलाना, बोलना, साथ खेलना या किसी भी तरह से जुड़ना छोड़ देता 
 
         2 . स्क्रीन टाइम अधिक होने पर बच्चे के मष्तिष्क में जो देखने का केंद्र होता है, वह अधिक सक्रिय हो जाता है और उसकी वाक् एवं श्रवण शक्ति केंद्रों का प्रयोग कम होने से वे निष्क्रिय तो नहीं होते हैं लेकिन चूंकि उनका प्रयोग बहुत कम होता है तो उसकी ये इन्द्रियां प्रभावित होती है और उसकी गति मंद हो जाती है। स्क्रीन से उसकी भाषा और संवेदनाएं भी मंद पड़ जाती है। वह स्क्रीन की तो सुनेगा लेकिन आप कुछ कहेंगे तो वह सुनेगा ही नहीं। 
         
         3 . बच्चे की एक अलग दुनिया बन जाती है, वह होते हैं स्क्रीन पर मिलने वाले कार्टून के चरित्र। अगर माता-पिता उसके बात करने की कोशिश भी करते हैं तो वह उपेक्षा करने लगता है। माता – पिता सोचते है कि शायद ये देर से बोलना शुरू करेगा, बड़े लोग भी समझा देते हैं कि कोई बच्चा देर से ही बोलता है। इस मानसिक स्थिति से कोई आम इंसान वाकिफ नहीं होता है।
  1. वर्चुअल ऑटिज्म में बच्चे गुस्सैल, चिड़चिड़े और एकांतप्रिय हो जाते हैं और उसमें कोई दखल दे तो वे उसको सहन नहीं करते हैं बल्कि चीखने-चिल्लाने लगते हैं। यदि आप मोबाइल छीन लें या फिर टीवी बंद कर दें तो वे बगावत पर उतारू हो जाते हैं। उनकी प्रतिक्रिया इतनी आक्रामक होती है कि वे माता-पिता को मारने भी लगते हैं। आप उनकी वांछित चीज दे दीजिये वे शांत होकर उसी में मगन हो जाएंगे।
  2. वह सिर्फ माता पिता से ही नहीं बल्कि साथ के बच्चों से मिलना जुलना और खेलना नहीं चाहता है। ये सबसे बड़ी खतरे की घंटी है। बच्चा इस स्क्रीन और मोबाइल के सहारे एकांत में रहना पसंद करने लगता है।
       सतर्कता : इससे बच्चों को बचाने के लिए कुछ तो माता-पिता को सतर्क रहना होगा क्योंकि बच्चे बहुत तेजी से इसके शिकार हो रहे हैं। इसके लिए बच्चे के आरम्भ के विकास के जो चरण होते हैं, उनके प्रति सतर्क रहिये। ताकि उसको इससे बचाया जा सके। 
          आज के समय में अगर यह कहा जाय कि माँ को अपनी जॉब छोड़ कर बच्चे का पालन करना चाहिए तो जॉब किसी की मजबूरी हो सकती है लेकिन इस दिशा में सतर्क रहना होगा। अभिभावक को उसके सामान्य विकास को देखते रहना होगा। 
  1.  सबसे पहली सावधानी ये रखनी होगी कि बच्चे के प्रथम दो वर्ष बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। इस आयु में बच्चे के विकास के चरणों की जानकारी रखनी होगी कि बच्चे की किस उम्र में कौन से गतिविधि आरम्भ हो जानी चाहिये। उसमें अगर देरी हो रही हो तो सतर्क हो जाएँ और इस बारे में डॉक्टर से सलाह जरुर लेना चाहिए।
       2 . बच्चों को अन्य चीजों में भी रूचि लेने के लिए उन्हें उनसे परिचित कराना चाहिए। रंग , क्ले या फिर खिलौने , ब्लॉक्स आदि में रूचि बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही बच्चों को आउटडोर गेम्स के साथ बाहर ले जाना चाहिए। घूमने का भी अवसर देना आवश्यक होता है। इससे उसकी मोबाइल और टीवी से दूर रहने की आदत बनी रहेगी। 
  1. कभी कभी ऐसा होता है कि बच्चा स्वाभाविक रूप से देर से बोलता है, लेकिन इस बात को एक आवश्यक गुण नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि यही लक्षण बच्चे में ऑटिज़्म के भी होते हैं। किसी की बात पर प्रतिक्रिया न देना। बुलाने पर अनसुना कर देना या फिर किसी एक ही प्रकार की क्रिया में व्यस्त रहना। बच्चे में अगर कुछ भी असामान्य लक्षण दिखाई देते हैं तो डॉक्टर से सलाह लेने में कोई भी हर्ज नहीं है।  
  2. इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि बच्चे का स्क्रीन टाइम एकदम से बंद न करें क्योंकि एकदम से बंद करने से वह आक्रामक और हिंसक भी हो सकता है। इसके लिए बहुत धीरे से उसको विश्वास में लेकर उसका टाइम टेबल बना देना चाहिए कि उसके हर काम का क्रम क्या हो ? बीच में कुछ समय के लिए टीवी भी देखने दीजिए ताकि पूर्णतया छुड़ाने के पीछे वह आपको अपना रिमोट न समझने लगे।
        बताती चलूँ की वर्चुअल ऑटिज़्म और ऑटिज़्म में बहुत बारीक सा अंतर होता है। इस लिए बच्चे पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। 
   रेखा श्रीवास्तव
71 पीडब्ल्यू डी हाउसिंग सोसाइटी 
सहकार नगर रावतपुर गाँव 
कानपुर – 208019 
9936421567


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