व्यथित उदास नदी
अपना अतीत याद करती है
पहाड़ों की प्यारी गोद से
जन्म लेकर
कैसे लहराती, इतराती
इठलाती ,कल कल करती
कांच सा पारदर्शी जल लिए
सफर पर निकली थी .
रास्ते की जड़ी बूटियां को
चूमती ,स्पर्श करती
अपने जल को औषधीय
रूप देकर
अमृत बनाकर
पतित पावनी बनकर
अनवरत बढ़ती गई
बढ़ती गई
सबका कल्याण करती गई.
फिर मानव का
लालच बढ़ा ,स्वार्थी हुआ
जहरीले रसायनों से
गंदगी के ढेरों से
जली अधजली लाशों से
जब चाहा
मेरे सीने को भर दिया .
मेरे पवित्र जल को
विषैला कर दिया
मैं रोती रही
कराहती रही
पर उसे तरस नहीं आया.
संतों, ऋषि मुनियों ने
की हमारी पूजा अर्चना
हमें दिया देवी का दर्जा
पर आज का मानव
निकला कितना कृतघ्न
हमारे अस्तित्व को
कूड़े के ढेर में
तब्दील कर दिया.
वर्षों से
मानव का अत्याचार
मनमानी झेल
अब थक गई हूं
मेरी कितनी ही बहनों ने
तंग आकर
आत्महत्या कर ली
पानी की जगह
रेत की नदियां बन गईं.
पता नहीं कब
उसे अपनी भूल का
ज्यादतियों का एहसास होगा
और मुझे फिर से
पहले सा सम्मान
प्राप्त होगा !
नरेंद्र कौर छाबड़ा