Tuesday, March 10, 2026
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आचार्य अभिनव योगी का लेख – वन्दे मातरम् की 150 वर्षीय यात्रा

आचार्य अभिनव योगी ने 26 फ़रवरी 2026 की शाम लन्दन के नेहरू सेंटर में वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर कथा यूके द्वारा आयोजित एक समारोह में अपना यह आलेख पढ़ा। पुरवाई पत्रिका के पाठकों के लिये विशेष तौर से इसे उपलब्ध करवाया जा रहा है। 
प्रस्तावना
आदरणीय अध्यक्ष महोदय, मान्यवर अतिथिगण, और मेरे प्रिय भाइयों एवं बहनों,
आज हम यहाँ एक ऐसे गीत के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए हैं,
जिसने भारत की आत्मा को जगाया – “वन्दे मातरम्।” यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय चेतना की धड़कन है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के हर चरण में करोड़ों भारतीयों को साहस, बल और दिशा दी।
वन्दे मातरम् की जन्मकथा
वन्दे मातरम् की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य, लगभग 1875–76 के बीच महान बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की।
उस समय वे ब्रिटिश शासन के अधीन डिप्टी मैजिस्ट्रेट/डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के रूप में सेवा कर रहे थे और रोज़रोज़ भारतीय समाज पर होने वाले अपमान और अन्याय को नज़दीक से देख रहे थे।
कहा जाता है कि एक अवसर पर एक अंग्रेज अधिकारी ने भारतीयों को अपनी पारंपरिक वंदना से रोककर “गॉड सेव द क्वीन” कहलवाने की कोशिश की; इस तरह की घटनाओं ने बंकिमचंद्र के मन में यह संकल्प जगाया कि भारत के लिए एक स्वदेशी, आत्मसम्मान से भरी वंदना तैयार की जाए – “वन्दे मातरम्।”
इसी आंतरिक वेदना और आध्यात्मिक चिंतन के बीच, हुगली नदी के किनारे चिनसुरह (चुचुरा) में स्थित एक घर में, उन्होंने यह अमर गीत रचा।
बंकिमचंद्र का दृष्टिकोण और आध्यात्मिक प्रेरणा
बंकिमचंद्र केवल प्रशासक नहीं, बल्कि “साहित्यसम्राट” भी थे – गीता, उपनिषद, सांख्य और भक्तिकालीन परंपरा का गहन अध्ययन कर चुके, विशेष रूप से शक्तोपासना और माँआराधना की धारा से प्रभावित।
काली, दुर्गा और भारतभूमि – इन तीनों की अनुभूति उनके भीतर मिलकर एक ही “माँ” के रूप में प्रकट हुई: पीड़ित भी, पराक्रमी भी, करुणामयी भी।
काली माँ की मूर्ति के सामने ध्यान करते हुए, जहाँ माँ कपालमाल पहने हुए हैं, उन्हें लगा मानो भारतभूमि स्वयं शहीदों की खोपड़ियों की माला पहने खड़ी है – दासता और बलिदान दोनों की साक्षी बनकर।
यहीं से एक बिल्कुल अनोखी कल्पना जन्म लेती है – देशप्रेम को भक्ति बना देना; राष्ट्रसेवा को माँ की पूजा बना देना – और उसका साकार रूप बनता है “वन्दे मातरम्।”
आनन्दमठऔर गीत का स्थान
वन्दे मातरम् पहली बार बंकिमचंद्र की साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में 1875 के आसपास प्रकाशित हुआ, और फिर उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में शामिल हुआ जिसका पुस्तक रूप 1882 में आया।
आनन्दमठ की पृष्ठभूमि 18वीं सदी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के भीषण अकाल से जुड़ी है; इसमें साधुसन्यासी एक अन्यायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करते हैं और वन्दे मातरम् उनका आराधनागीत बन जाता है।
उपन्यास के माध्यम से यह गीत बंगाल के पढ़ेलिखे समाज से निकलकर दूरदराज़ के पाठकों तक पहुँचा; यहीं से यह केवल साहित्य नहीं, एक भावनात्मक राष्ट्रवादी प्रतीक बनता चला गया।
भाषा, संरचना और भावदुनिया
मूल वन्दे मातरम् छह स्त्रोतों का एक गीत है, जो उच्च संस्कृतनिष्ठ बांग्लासंस्कृत मिश्रित भाषा में लिखा गया है।
पहले दो स्त्रोतों में मातृभूमि की सुंदरता, समृद्धि और करुणा का चित्र है – “सुजलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलाम् मातरम्” – नदियाँ, खेत, वृक्ष, चाँदनी रातें, और मधुर बोलती, वरदान देने वाली माँ।
आगे के स्त्रोतों में यही माँ दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में प्रकट होती हैं – दस भुजाओं वाली दुर्गा, कमल पर विराजी लक्ष्मी, विद्याप्रदायिनी वाणी – अर्थात् माँ केवल भूमि नहीं, देवता भी है; केवल कोमलता नहीं, शौर्य भी है।
यही सम्मिश्रण – भक्ति और देशभक्ति का, प्रकृति और देवीसत्ता का – “भारत माता” की उस कल्पना का मूल बन गया जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम के चित्रों, झंडों और नारों में दिखाई देती है।
पृष्ठ से जनमानस तक: टैगोर और कांग्रेस
अब प्रश्न उठता है – यह गीत बंगाली उपन्यास के पन्नों से निकलकर पूरे भारत की आवाज़ कैसे बना? इसका उत्तर है – रवीन्द्रनाथ टैगोर।
1896 में कलकत्ता (बीदन स्क्वायर) में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में, टैगोर ने स्वयं वन्दे मातरम् को धुन में बाँधकर गाया; यह पहली बार था जब यह गीत अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर गूँजा।
इसके बाद 1901 के कलकत्ता अधिवेशन में दक्षिणारंजन सेन ने पियानो की संगति के साथ इसे गाया, और 1905 के बनारस अधिवेशन में सरला देवी चौधुरानी ने इसे स्वर दिया।
उसी वर्ष बंगभंग के विरोध में चले स्वदेशी आंदोलन में यह गीत रैलियों, सभाओं, जुलूसों और प्रतिज्ञासमारोहों की प्राणवाणी बन गया; लाला लाजपत राय ने ‘वन्दे मातरम्’ नाम से पत्रिका निकाली और अनगिनत क्रांतिकारियों ने इसी नारे के साथ जेलों और फाँसीघर तक की यात्रा की।
अंग्रेज सरकार की प्रतिक्रिया और क्रांतिकारी रूप
स्वाभाविक था कि ब्रिटिश सरकार इस गीत को साधारण भजन नहीं, बग़ावत का बिगुल मानने लगी।
कई स्थानों पर “वन्दे मातरम्” बोलना, लिखना या गीत गाना प्रतिबंधित कर दिया गया; जुलूस तोड़े गए, लोग गिरफ़्तार हुए – और इस तरह यह गीत स्वयं एक असहयोगआंदोलन बन गया।
श्री अरविन्द घोष ने 1909 में अपनी पत्रिका ‘कर्मयोगिन’ में वन्दे मातरम् का अंग्रेज़ी अनुवाद छापा और इसे “बंगाल का राष्ट्रीय गान” कहा; साथ ही उन्होंने ‘बंदे मातरम्’ नाम से एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक भी निकाला।
ब्रिटिश रिकॉर्ड बताते हैं कि क्रांतिकारी कार्यवाहियों में गिरफ़्तार युवकों के मुँह पर अक्सर आख़िरी शब्द होते थे – “वन्दे मातरम्।”
1937: केवल दो स्त्रोतों को अपनाने का निर्णय
इतिहास का एक जटिल प्रश्न यहाँ से शुरू होता है – क्या यह गीत पूरे भारत के लिए समान रूप से स्वीकार्य प्रतीक बन सकता है?
मुस्लिम लीग सहित कुछ मुस्लिम नेताओं को आपत्ति थी कि आनन्दमठ की पृष्ठभूमि और बाद के स्त्रोतों में देवीपूजा और “अन्य” के पराभव का भाव है, जो उन्हें अपने लिए प्रतिनिधि प्रतीक नहीं लगता था।
इसी पृष्ठभूमि में 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने – जिसमें मौलाना आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, आचार्य कृपलानी और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे नेता शामिल थे – विस्तृत विचारविमर्श के बाद एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।
निर्णय यह था कि केवल पहले दो स्त्रोत, जो मातृभूमि की सुंदरता और कृपा का वर्णन करते हैं और जिनमें कोई विशिष्ट धार्मिक संदर्भ नहीं, उन्हें ही “राष्ट्रीय गीत” के रूप में आधिकारिक रूप से गाया जाएगा; शेष स्त्रोतों को सार्वजनिक, सर्वधर्मसमभाव मंचों से हटा दिया जाएगा।
संविधान सभा और 1950 की ऐतिहासिक घोषणा
स्वतंत्रता के बाद जब संविधान सभा राष्ट्रीय प्रतीकों पर विचार कर रही थी, तब भी कई सदस्यों ने भावुकता के साथ कहा कि जिसने हमें आज़ादी के युद्ध में पुकारा, वही हमारा राष्ट्रगान होना चाहिए।
दूसरी ओर रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित “जन गण मन” को अधिक सर्वसमावेशी और बहुधार्मिक भारत की आत्मा के अनुकूल माना गया।
24 जनवरी 1950 को, संविधान लागू होने से दो दिन पहले, सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वह संतुलित घोषणा की जिसे आज हम सब जानते हैं: “जन गण मन” भारत का राष्ट्रीय गान होगा, और “वन्दे मातरम्”, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे समान आदर और सम्मान के साथ “राष्ट्रीय गीत” का दर्जा दिया जाएगा।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि “राष्ट्रीय गीत” शब्द संविधान के पाठ में नहीं आता, परंतु इस प्रस्ताव और राष्ट्रव्यापी परंपरा ने वन्दे मातरम् को उसी रूप में स्थापित कर दिया।
समकालीन बहस और हमारी जिम्मेदारी
आज, जब हम उसके 150 वर्ष मना रहे हैं, संसद से लेकर मीडिया और सोशल स्पेस तक, एक प्रश्न फिर उठ रहा है – वन्दे मातरम् का अर्थ आज के भारत के लिए क्या है?
किसी भी महान प्रतीक की तरह यह भी दो छवियाँ साथ लेकर चलता है – एक तरफ़ असीम त्याग और संघर्ष की स्मृति, दूसरी तरफ़ उन ऐतिहासिक बहसों की छाया जो हमारे बहुधर्मी समाज ने झेली हैं।
मेरे लिए – और शायद यहाँ बैठे बहुतों के लिए – “माँ” का प्रतीक किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है; वह इस मिट्टी की खुशबू है, हमारी नदियों का जल है, हमारे किसानों का पसीना है, हमारी भाषाओं, कलाओं और संबंधों की कोमलता है।
जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं, तो हम किसी दूसरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई सेवाभावना, निर्भयता और करुणा को जगा सकते हैं – यही इस गीत का आधुनिक अर्थ हो सकता है।
समापन
आइए, 150 वर्ष बाद इस गीत को फिर से सुनते हुए हम केवल अतीत की स्मृति में न डूबें, बल्कि अपने आप से एक प्रश्न पूछें – क्या मैं सचमुच इस माँ की सेवा कर रहा हूँ, जिसके लिए करोड़ों ने “वन्दे मातरम्” कहतेकहते प्राण न्योछावर कर दिए?
यदि हमारा उत्तर “हाँ” की दिशा में बढ़ रहा है, तो यही इस गीत की सच्ची श्रद्धांजलि होगी – लंदन के नेहरू सेंटर से लेकर भारत की हर गलीकूचों तक।
धन्यवाद। वन्दे मातरम्।
 
आचार्य अभिनव योगी, लन्दन
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