तेजेन्द्र शर्मा के संपादकीय ‘पैसे निकालने की जादुई मशीन’ ने तकनीक और समय के बदलते स्वभाव पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया। उसी प्रभाव से उपजा यह संस्मरणात्मक आलेख केवल एटीएम मशीन की कहानी नहीं कहता, बल्कि उस दौर की स्मृतियों को भी जीवित कर देता है जब पैसे निकालना एक साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि धैर्य और संघर्ष की एक लंबी यात्रा हुआ करती थी।
तकनीक का इतिहास केवल मशीनों का इतिहास नहीं होता; वह मनुष्य के अनुभवों, संघर्षों और बदलती जीवन-शैली का भी इतिहास होता है। आज जब हम किसी एटीएम मशीन के सामने खड़े होकर कुछ ही क्षणों में पैसे निकाल लेते हैं, तब यह सुविधा इतनी सहज लगती है कि उसके पीछे छिपी लंबी यात्रा का स्मरण ही नहीं होता, लेकिन सच यह है कि यह सुविधा भी मनुष्य की उन्हीं असुविधाओं और संघर्षों की देन है, जिनसे जूझते हुए उसने अपने जीवन को थोड़ा-थोड़ा सरल बनाने के उपाय खोजे हैं।
डॉ. तेजेन्द्र शर्मा का संपादकीय ‘पैसे निकालने की जादुई मशीन’ पढ़ते हुए मन अनायास ही अतीत के उन दिनों को याद करने लगता है जब बैंक से पैसे निकालना अपने-आप में एक धैर्यपूर्ण और थकाऊ प्रक्रिया हुआ करती थी। बैंक की लंबी कतारें, मोटे-मोटे लेजर रजिस्टर और टोकन लेकर घंटों प्रतीक्षा करने के बाद अंततः कैशियर की खिड़की तक पहुँचना उस समय का सामान्य दृश्य था। आज मशीन से निकलते हुए ‘कड़क नोट’ सचमुच किसी जादू से कम नहीं लगते; किंतु इस जादू के पीछे समय और अनुभवों की एक लंबी यात्रा छिपी हुई है।
एटीएम की कल्पना भी किसी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि एक साधारण मानवीय असुविधा से जन्मी थी। लंदन में रहने वाले जॉन शेफर्ड बैरन अक्सर बैंक से पैसे निकालने जाते थे, किंतु वहाँ लगी लंबी कतारों से परेशान हो जाते थे। कई बार उनकी बारी आने से पहले ही बैंक बंद हो जाता और वे खाली हाथ लौट आते। एक दिन यही असुविधा उनके मन में एक प्रश्न बनकर ठहर गई कि क्या ऐसा कोई तरीका नहीं हो सकता जिससे बिना बैंक गए अथवा बिना कर्मचारियों के सहारे पैसे निकाले जा सकें?
कहा जाता है कि कई बड़े विचार साधारण क्षणों में जन्म लेते हैं। जॉन शेफर्ड बैरन को भी इस तरह का विचार नहाते समय आया। उन्होंने सोचा कि जब सिक्का डालने पर मशीन से चॉकलेट निकल सकती है, तो क्यों न ऐसी मशीन बनाई जाए जिसमें पहचान का कोई माध्यम डालने पर पैसे निकल आएँ। सेना में काम करने के कारण उन्हें पहचान-संख्या के उपयोग का अनुभव था, इसलिए उन्होंने छह अंकों का पिन रखने का विचार किया; किंतु उनकी पत्नी ने सहज ही कहा कि छह अंकों का नंबर याद रखना कठिन है। इस छोटी-सी घरेलू बातचीत ने तकनीक के इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन कर दिया और पिन को चार अंकों का बना दिया गया, एक ऐसा नियम जो आज दुनिया भर में प्रचलित है।
27 जून 1967 को लंदन के एनफ़ील्ड क्षेत्र में बार्कलेज बैंक में पहली एटीएम मशीन स्थापित की गई। ब्रिटिश कॉमेडियन रेग वार्ने इस मशीन से पैसे निकालने वाले पहले व्यक्ति बने और उन्होंने उससे दस पाउंड निकाले। उस समय मशीन से एक बार में अधिकतम दस पाउंड ही निकाले जा सकते थे। मशीन में कार्ड का प्रयोग भी नहीं होता था; विशेष प्रकार के चेक लगाए जाते थे, जिन पर रेडियो-एक्टिव पदार्थ लगा होता था जिसे मशीन पढ़ सकती थी। धीरे-धीरे तकनीक विकसित हुई, कार्ड आए, नेटवर्क बने और एटीएम मशीनें आधुनिक बैंकिंग का अभिन्न अंग बन गईं।
इतिहास के इन प्रसंगों को पढ़ते हुए मन केवल तकनीक के विकास की कथा ही नहीं देखता, बल्कि अनायास ही अपने जीवन के अनुभवों की ओर भी लौटने लगता है। कई बार किसी लेख के माध्यम से बीते समय की धूल अचानक झरने लगती है और स्मृतियों की परतें धीरे-धीरे खुलने लगती हैं। सच तो यह है कि स्मृतियाँ कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं; वे समय की तहों में चुपचाप सोई रहती हैं और किसी शब्द, किसी प्रसंग या किसी दृश्य के स्पर्श से अचानक फिर से जाग उठती हैं।
कुछ लोगों के लिए एटीएम केवल एक मशीन है, पर अनेक लोगों के लिए यह उन दिनों की याद भी है जब पैसे निकालना सचमुच एक संघर्ष हुआ करता था। आज की सहज बैंकिंग व्यवस्था को देखते हुए भी स्मृतियों के भीतर वह पुराना समय कहीं न कहीं जीवित रहता है। तकनीक ने भले ही हमारे काम को सरल कर दिया हो, पर बीते दिनों के वे अनुभव मन के किसी कोने में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।
डॉ. तेजेन्द्र शर्मा जी का संपादकीय पढ़ते हुए वही पुरानी स्मृतियाँ जैसे फिर से आँखों के सामने जीवित हो उठीं। मन स्मृतियों के उन गलियारों में डोलने लगा, जहाँ बैंक की लंबी कतारें, लेजर-कीपर का भारी-भरकम रजिस्टर और टोकन मिलने का वह अंतहीन इंतज़ार; जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था। सच कहूँ तो इस तरह के कठिन अनुभवों और यंत्रणाओं के दौर से मैं स्वयं भी कई बार गुज़रा हूँ और आज भी अपने भीतर उन अनुभवों और दुखद यादों की एक पूरी विरासत समेटे हुए हूँ।
मुझे आज भी याद है— जेठ की तपती दुपहरी, चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों के बीच, अपने गाँव से नौ किलोमीटर दूर मरदह बाज़ार स्थित एकमात्र यूनियन बैंक के एटीएम से निराश होकर मुझे बीस किलोमीटर दूर मऊ शहर की ओर रुख करना पड़ता था। शहर पहुँचकर भी राहत कहाँ थी! वहाँ भी एटीएम एक-दूसरे से काफ़ी दूरी पर स्थित थे और लगभग हर जगह वही अनिश्चितता मुँह बाए खड़ी मिलती थी।
गाँव से पैंसठ-सत्तर किलोमीटर दूर (आना-जाना मिलाकर), इस पूरी मशक्कत में मेरी एकमात्र संगी थी— पिताजी की सन् ’66 वाली वह पुरानी ‘बुढ़िया’ साइकिल, जिसे उन्होंने अपने गाँव के ही एक व्यक्ति से मात्र सौ रुपये में सेकंड हैंड खरीदा था। वह चौबीस इंच के ऊँचे फ्रेम वाली साइकिल थी, जिसे पिताजी ने अपनी सुविधा के लिए हैंडल और फ्रेम के बीच लगी पाइप के सहारे डेढ़-दो इंच और ऊँचा करवा दिया था। उस पर बैठते समय मेरे पैर पावदान तक भी मुश्किल से पहुँचते थे; ज़मीन को छूने की तो कल्पना भी बेमानी थी।
नब्बे के दशक का वह दौर, जब फ़्रेम के ‘धुर्रे’ (धूरी) पर पैर रखकर दौड़ते हुए चढ़ना और उतरते समय साइकिल को एक तरफ़ झुकाकर किसी तरह ज़मीन तक पाँव पहुँचाने की कला में महारत हासिल करना किसी युद्ध जीतने जैसा कौशल था। उस साइकिल की जर्जर अवस्था का स्मरण आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। टायर-ट्यूब की हालत ऐसी थी कि पीछे का घिसा हुआ टायर और ट्यूब (जिसमें चार-पाँच पंक्चर थे) निकालकर आगे लगा दिया गया था, जबकि पिछले पहिए में मिस्त्री के यहाँ से लाया गया रिक्शे का पुराना टायर-ट्यूब लगा था। चेन-कवर, सीट-कवर और घंटी का तो नामोनिशान तक न था।
पैडल की जगह एक तरफ़ लकड़ी का गुटका लगा था और दूसरी तरफ़ वह भी नहीं, मात्र घिसकर चिकना और धारदार हो चुका चमचमाता लोहा था। उस लोहे पर से कभी ऊँचाई पर ज़ोर लगाते समय, तो कभी धूल-मिट्टी और पसीने की फिसलन के कारण पैर न जाने कितनी बार फिसला। परिणामस्वरूप कभी अंगूठे का नाखून चोट खाकर निकल गया, जिसने महीनों तक असह्य पीड़ा दी, तो कभी ‘नरहर’ फूटा। उन चोटों के गहरे निशान आज भी मेरे शरीर पर उस संघर्ष की गवाही दे रहे हैं। उस समय ये चोटें केवल पीड़ा देती थीं, पर आज लगता है कि वही छोटी-छोटी चोटें जीवन के बड़े धैर्य का पहला सबक थीं।
पहिए में हचक के साथ-साथ ‘डायल’ भी रहता था। रिम इतनी पुरानी थी कि जंग लगकर जगह-जगह से झर रही थी। चार-पाँच तीलियाँ टूटी हुई थीं, जिन्हें आड़ा-तिरछा लपेटकर किसी तरह पहिए को थामे रखा गया था। टायर पहले से ही कई बार बर्स्ट (बोलचाल की भाषा में ‘भ्रष्ट’) हो चुका था, इसलिए उसके भीतर पुराने टायर का तार निकालकर और उसे छील-छाल कर ‘गिटिस’ लगाई गई थी, जिसके कारण चलाते समय हर चक्कर पर पहिया बुरी तरह उछलता था और शरीर को झटके लगते थे।
ब्रेक शू घिस चुके थे, जिससे पीछे का ब्रेक बेअसर था और आगे का ब्रेक या तो टूटा रहता था या उसे मारने पर, पीछे का ब्रेक न होने की स्थिति में, साइकिल पलट जाया करती थी। गाँव की सड़कें भी नाममात्र की थीं— ऊबड़-खाबड़ और कंकड़ों से भरीं, जो कागज़ों पर तो दुरुस्त थीं, पर हक़ीक़त में वे केवल शारीरिक यंत्रणा और साइकिल की लंबी सीट के दबाव से जाँघों में लगने वाली ‘कचट’ का कारण बनती थीं।
पुरानी साइकिल के लिए ‘बुढ़िया’ शब्द के प्रयोग को पाठकगण अन्यथा नहीं लेंगे; क्योंकि यहाँ तो आँधी भी बुढ़िया होती है। मेरे नाना 1916 में आई आँधी की तबाही को याद करते हुए उसके लिए अक्सर ‘बुढ़िया आँधी’ शब्द का प्रयोग करते थे। मेरे गाँव के शंकर जी को आज भी लोग बुढ़वा शंकर जी कहते हैं। ‘नयका’ विश्वनाथ जी (बीएचयू परिसर) और ‘पुरनका’ विश्वनाथ जी (वाराणसी) तो प्रसिद्ध हैं ही। वृद्धेश्वर महादेव, बूढ़े महादेव आदि की गिनती ही नहीं। यहाँ तो रात में जब कोई छोटा बच्चा बिना खाना खाए सोता है तो उसकी माँ बच्चे को खिलाने की गरज से कहती है— “बेटा खा लो, नहीं तो रात में बुढ़िया पेट टोयेगी।” अलग बात है कि आज तक किसी बच्चे का पेट किसी बुढ़िया ने टोया नहीं। बुढ़िया माई, बुढ़िया दादी, बुढ़िया काकी, बूढ़ी अइया (आजी, यानी परदादी); बूढ़ा (मेरे जिले के पश्चिमी हिस्से में सासू माँ के लिए उनकी बहुओं द्वारा प्रयुक्त शब्द); मेरे बहू के मायके (अम्बेडकर नगर) में ससुर के लिए सामान्य रूप से बिना किसी झिझक के ‘बूढ़ऊ’ शब्द का प्रयोग; ऐसे में अतिशय जर्जर एवं पुरानी साइकिल के लिए ‘बुढ़िया साइकिल’ शब्द का प्रयोग मेरे द्वारा केवल उसके लाक्षणिक अर्थ को स्पष्ट करने के लिए किया गया है।
ऐसी पारिवारिक परिस्थितियों में जब कोई दूसरा विकल्प न था, तब भूख-प्यास से बेहाल लंबी कतारों के बाद जब मैं एटीएम तक पहुँचता, तो अक्सर मशीन खराब मिलती, कैश ख़त्म हो जाता या बिजली गुल हो जाती। बार-बार विफल होकर जब मैं घर लौटता, तो तकनीकी खामियों को न समझ पाने के कारण पिताजी की डाँट और कभी-कभी ‘मार’ मेरी नियति बन जाती थी। हम आज की ‘जेन-जी’ पीढ़ी की तरह नहीं थे, जो पिता की डाँट को गिनें या उसे दिल पर लें; हमारे लिए तो वह अनुशासन का एक अभिन्न हिस्सा था, जिसे हम बस सह लिया करते थे। मुझे विश्वास है कि मेरी और आपकी पीढ़ी के अनगिनत लोग इस तरह के मर्मभेदी संघर्षों से निश्चित ही दो-चार हुए होंगे।
आज जब उन दिनों को याद करता हूँ और एटीएम मशीन के सामने खड़े होकर कुछ ही क्षणों में पैसे निकलते देखता हूँ, तो समय के इस परिवर्तन पर सहज ही आश्चर्य होता है। कभी जो काम पूरे दिन की थकान, अनिश्चितता और धैर्य की परीक्षा से भरा होता था, वही आज कुछ मिनटों में पूरा हो जाता है, लेकिन यह सुविधा जितनी सहज दिखाई देती है, उसके पीछे उतने ही कठिन अनुभवों की परतें छिपी हुई हैं। दरअसल तकनीक का असली अर्थ भी यही है कि वह मनुष्य के संघर्षों को थोड़ा कम कर दे और कहना अनुचित नहीं होगा कि एटीएम मशीन भी उसी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
स्मृतियों की दुनिया में वह जर्जर साइकिल, धूल से भरी सड़कें, लंबी कतारें और बार-बार की निराशाएँ आज भी उसी तरह जीवित हैं। शायद इसलिए कि वे केवल कठिनाइयाँ नहीं थीं, बल्कि जीवन की पहली पाठशाला भी थीं। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह टूटी-फूटी साइकिल केवल एक साधन नहीं थी; बल्कि हमारे समय, हमारे संघर्ष और हमारी पीढ़ी की सहनशीलता की साक्षी भी थी। शायद इसी कारण बीते समय की वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं रह जातीं; वे धीरे-धीरे हमारे जीवन की जीवित स्मृतियों में बदल जाती हैं।
शायद यही कारण है कि जब भी किसी एटीएम मशीन से आसानी से पैसे निकलते देखता हूँ, तो मन में अनायास ही उस ‘बुढ़िया’ साइकिल की चरमराती आवाज़ गूँजने लगती है, मानो वह अब भी कहीं दूर उसी कच्ची सड़क पर मेरी प्रतीक्षा कर रही हो।
संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी, विक्रम सम्वत्- 2083
(चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि, दिन– शुक्रवार)