Monday, February 23, 2026
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रेखा भाटिया की कविताएँ

1 – बदली हुई मैं
पहली छुवन का एहसास
समय ही लगा था कितना
चंचल पवन बन मन, बहने लगा था
बारिशें हो गई थीं नई-नई सी,
बढ़ गई थी ठंडक धूप में
वह वक्त था ,जब ढल रही थी शाम
रात और शाम के बीच के पलों में
नदी के उस पार ढलता सूरज
भर रहा था उड़ान एहसासों में
फूलों वाले चाय के कप का हैंडल
मेरी उँगलियों के बीच फँसा था
एक मादक अनुभूति ने आ घेरा था
चाय कप से ढुलकने ही वाली थी
थाम लिया था तुमने मेरी उँगलियों को
दरक गया था दिलों के बीच में कसा हुआ
झीना-सा हिचक का पर्दा
नज़रें मिलते ही आँखें-आँखों में डूब गई थीं
मेरे ललाट पर अंकित किया था तुमने
एक मधुर चुंबन गर्माहट भरा
चाय की गर्माहट और खुशबू
भर गई थी चुंबन में
जाने क्यों लगा था
इंतज़ार था मुझे इसी पल का
अपनी शर्म को विदा होते देख
मैं खुद भी शरमा गई थी
आलिंगन में जकड़ कर तुमने पुकारा था
ध्वनि कानों में पड़ी ,प्रतिध्वनि बन लौटी
अधिकार और अपनेपन का स्वर सुना था मैंने
मैं मैं कहाँ रह गई थी तब
हो चुकी थी तुम्हारी प्रियतम
नई पहचान मिली हो जैसे मुझे उस लम्हे में
बसंत की बेला का वह अद्भुत क्षण
बदल गई थी ज़िंदगी एक लम्हे में
नया जन्म मेरा तुम्हारे प्रेम से
बदली-बदली मैं नई-नवेली
बसंत-सी हो चली थी !

2 – तूफ़ान

आओ ! बताती हूँ एक बात मन की
शायद , आपका मन भी वही कहना चाहता हो
बदल गया है मौसम !
आप सोच रहे होंगे
मौसमों का बदलना
कोई नई बात तो नहीं ?
देखिये !
कोई लाग-लपेट कर नहीं कहूँगी

माना हर मौसम सुहाना होता है
मौसम और ऋतुओं में बदलाव
कदाचित आवश्यक होता है

लेकिन सुनिए ,
पता है , आपके सुनने से पहले
बहुत उदास था मन !
जीवन से जीवंत रस खो से गए थे
जब संघर्ष कम हो जाएँ
जीवन की निरंतरता में नीरसता
ज़िम्मेदारियाँ ,समारोह, उत्सव
जीवन के आचरण में समाहित हो
यही सुर-ताल पर नचाते हैं –
वहाँ ख़ुशियाँ भी अमूल्य कहाँ रहती हैं ?
लेकिन मुझे डर है ,
एक ढर्रे पर चलते जीवन में
मानों ,अचानक कोई रूकावट आ गई है
कहीं यही डर आपका भी तो नहीं ?
इन दिनों समाचार सुन कर , पढ़ कर
संशय युक्त परिस्थितियों में
मानों ,भरोसा उठा गया है प्रणाली से !
किसे अपना देश कहें ?
घर छूटा, छूटी अपनी मातृभूमि भारत
नए द्वार खुले अवसरों के , रास्ता सुगम न था
खुद के अस्तित्व को समेटकर पूरी तरह
नए देश को घर मान लिया !
बदलते मौसमों-सी बदलती सरकारें
सहमति हो या न हो , औपचारिकता ही सही
जीवन की गाड़ी चलती रही
लेकिन अब की बार –
जैसे एक तूफ़ान गुज़र रहा है ज़िंदगियों से
यह मौसमी तूफ़ान नहीं है शायद !
मन रहता है खिंचा-खिंचा सबका
मेरा भी , आपका भी –
मेरे पास आगे सुनाने के लिए
कोई शब्द नहीं है
मेरे भाव तो आप समझ ही गए होंगे !

रेखा भाटिया, अमेरिका में शार्लिट शहर, नॉर्थ कैरोलिना में रहती हैं । पेशे से एक शिक्षक हैं । प्रवासी हिंदी साहित्यकार, कत्थक नर्तकी और आर्ट-क्राफ्ट कलाकार हैं ।  इनकी रचनाएँ विभिन्न अंतराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपती हैं। शिवना प्रकाशन से इनके दो काव्य संग्रह “सरहदों के पार दरख़्तों के साये में“ ”मन की नदी से भीगे शब्द” तथा सहलेखन में पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । हिंदी की सेवा में यह अमेरिका में बारह वर्षों से बच्चों के लिए हिंदी अध्यापन का कार्य कर रही हैं। भारतीय संस्कृति , सभ्यता के प्रचार-प्रसार में पच्चीस वर्षों से कार्य कर रही हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। कई सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इनका बढ़चढ़ कर योगदान रहता है।
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