ऑक्सफ़ोर्ड जाना मुझे हमेशा उत्साहित करता है। इस बार लगातार दो विदेश यात्राओं से लौटने के तुरंत बाद ही जाना था — शरीर बोझिल था, ऑफ़िस का बहुत काम भी सिर पर था, लेकिन फिर भी थकन की तह के नीचे दबा जोश भरपूर हिलोरें मार रहा था। ऑक्सफ़ोर्ड का यह आयोजन विशेष था — प्रख्यात ऐतिहासिक कॉलेज क्राइस्ट चर्च के पारंपरिक गेस्ट डिनर में बेटी के अतिथि के रूप में सम्मिलित होना। बेटी इस कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा है। उसके अध्ययन के विषय राजनीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र हैं। इस अतिथि भोज में औपचारिक परिधान पहनने की परंपरा है। मैंने साड़ी पहनने का निर्णय लिया तो बेटी का मन भी साड़ी पहनने का हो गया।
अपने और बेटी के लिए छोटे सूटकेस में साड़ियाँ रखीं, पीठ पर लैपटॉप टाँगा और निकल पड़ी फिंचली सेंट्रल स्टेशन की ओर। हल्की बारिश जैकेट पर थम रही थी — छाते की ज़रूरत नहीं लगी और छाता साथ था भी नहीं। वॉरन स्ट्रीट पर नॉर्दन लाइन बदलकर विक्टोरिया लाइन पकड़ी। विक्टोरिया स्टेशन पहुँची। विक्टोरिया स्टेशन से कुछ मिनट की दूरी पर ग्रॉसवेनोर गार्डन पर बस-स्टॉप 10 ए है। यहाँ से ऑक्सफ़ोर्ड ट्यूब चलती है—एक बेहद आरामदायक बस, जिसमें अंदर बाथरूम की सुविधा भी होती है। टिकट ऐप से खरीदे जा सकते हैं या बस के अंदर बस-चालक से। मैंने ऐप से रिटर्न टिकट ले लिया था। सफ़र लगभग दो घंटे का था। आँखें मूँदकर बैठी रही — नींद नहीं लगी लेकिन शरीर को अच्छा आराम मिल गया।
बस ने सीधे कॉलेज के सामने वाले स्टॉप पर उतारा। ऑक्सफ़ोर्ड विश्व-प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी टाउन है। यहाँ हर मोड़ पर इतिहास धड़कता है और भव्यता गुनगुनाती है। यहाँ का हर व्यक्ति या तो पर्यटक है या विद्यार्थी। इस अद्भुत शहर में क़दम रखते ही भीतर एक स्फूर्ति की लहर उठती है, मानो आपकी ऊर्जा तुरंत शहर की लय से तालमेल बिठा लेने को तत्पर हो। पुरानी इमारतों, जिज्ञासा जगाती गलियों और बहती नदियों के साथ यह शहर आपको अपने ही प्रवाह में खींच लेता है। आकर्षक कैफ़े और जीवंत पब्स के रौनक भरे माहौल में घुल जाना बिल्कुल सहज हो जाता है।
बेटी को आने में थोड़ा समय था और मुझे जॉर्ज एंड डेनवर कैफ़े में बेगल खाने का मन। एक कॉफ़ी और बेगल लिया। ऑक्सफ़ोर्ड आकर इस कैफ़े में कम से कम एक बार कॉफ़ी पीना एक नियम-सा बन गया है। कारण —एक तो यह क्राइस्ट चर्च कॉलेज के एकदम सामने है, दूसरा यहाँ की ओट-मिल्क कॉफ़ी और स्मॉल लावा केक दिमाग़ की चुस्ती के लिए आज़माए हुए कारगर नुस्ख़े हैं।
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय लगभग 45 शैक्षणिक संस्थानों से मिलकर बना है। प्रत्येक संस्थान अपनी प्रशासनिक संरचना, परंपराओं और शैक्षणिक वातावरण के साथ स्वतंत्र इकाई की तरह कार्य करता है, जबकि सभी मिलकर ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की व्यापक शैक्षणिक प्रणाली का हिस्सा बनते हैं। क्राइस्ट चर्च कॉलेज ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक कॉलेजों में से एक है। इसकी स्थापना सन् 1546 में किंग हेनरी अष्टम ने की, हालांकि इसकी नींव सन् 1525 में कार्डिनल थॉमस वोल्सी ने रखी थी। किन्हीं कारणों से निर्माण अधूरा रह गया था, और लगभग दो दशक बाद हेनरी अष्टम ने इसे पूरा कर कॉलेज को क्राइस्ट चर्च नाम दिया। सन् 2025 में कॉलेज ने अपनी 500वीं जयंती मनायी।
कॉलेज का ट्यूडर डाइनिंग हॉल, जिसे प्रायः ग्रेट हॉल कहा जाता है, ऑक्सफ़ोर्ड के सबसे भव्य और ऐतिहासिक भोजन कक्षों में से एक है। 16वीं शताब्दी में निर्मित यह हॉल अपनी विशालता, लकड़ी की नक़्क़ाशीदार महराबनुमा छत, रंगीन काँच की खिड़कियों और ऐतिहासिक चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। लगभग 300 अतिथियों की क्षमता वाला यह हॉल हैरी पॉटर फ़िल्मों के भोजन कक्ष की प्रेरणा बना। फलस्वरूप इस हॉल ने हॉगवर्टस ग्रेट हॉल के रूप में भी प्रसिद्धि पायी।
क्राइस्ट चर्च का अतिथि भोज ऑक्सफ़ोर्ड की शैक्षणिक और सांस्कृतिक परंपरा का अत्यंत प्रतिष्ठित अंग है। यह प्रत्येक टर्म की शुरुआत और अंत में आयोजित होता है। छात्रों को बैलेट प्रणाली से टिकट मिलते हैं और वे अपने किसी प्रियजन को आमंत्रित कर सकते हैं। भोजन कॉलेज की मध्यकालीन रसोई में तैयार किया जाता है जो सन् 1525 से निरंतर सक्रिय है। यहाँ का मुख्य भोजन मांसाहारी है लेकिन यहाँ शाकाहारी तथा अन्य विशेष आहारों जैसे ग्लूटेन फ़्री, नट-फ़्री, वीगन आदि का भी पूरा ध्यान रखा जाता है।
कैफ़े से बाहर निकलने पर मैंने बेटी को कॉलेज के प्रवेश-द्वार पर खड़ा पाया। उसके डॉर्म के कमरे में जाकर हमने गपशप की और मैं जो उपहार उसके लिए लायी थी, उसे दिए। मेरे दिए हुए कान के बुँदे उसकी साड़ी के रंग के नहीं थे लेकिन उसने पहन लिए, नए जो थे। तैयार होकर हम ग्रेट हॉल की ओर निकले — बारिश अब भी हो रही थी, इस बार छाता साथ था।
हॉल की प्रवेश-लॉबी, जिसे ऐंटे हॉल कहा जाता है, भीतर की भव्यता का पहला संकेत देती है। एक कोने पर लोग अपने कोट्स और छाते स्टैन्ड पर टाँग रहे थे। इसी हॉल से ग्रेट हॉल तक जाती सीढ़ियाँ मानो आगंतुकों को क़दम-दर-क़दम इतिहास और गरिमा की ओर ले जाती हैं। ऐंटे हॉल में पेय की व्यवस्था थी, दो तरह के पेय पेश किये जा रहे थे। मैंने ककड़ी के स्वाद वाला पेय लिया, बहुत भाया। लोग उत्साहित थे — पेय के ग्लास हाथों में लिए बातचीत में रमे हुए।
मैंने ध्यान दिया कि साड़ी हम दोनों ने ही पहनी थी, पर एक सज्जन स्कॉटलैंड की पारंपरिक किल्ट में थे और एक मुस्लिम महिला हिजाब में। बेटी के कुछ मित्रों ने आकर स्नेहपूर्वक बातें कीं और एक सुंदर साँझ व भोज के लिए शुभकामनाएँ दीं। छात्राएँ सजी-धजी, ईवनिंग गाउन्स में थीं, और कुछ छात्रों का चलना-फिरना व अभिवादन करने का ढंग पुरानी अंग्रेज़ी फ़िल्मों की याद दिला रहा था। एक छात्र से हाथ मिलाया तो उसके लेदर के दस्ताने का स्पर्श इतना सुरुचिपूर्ण लगा कि अगली बार मुझे भी फ़ैन्सी ग्लव्स के साथ पारंपरिक अंग्रेज़ी परिधान पहनने का मन हो गया ! तस्वीरें लेने का सिलसिला भी शुरू हो गया था। हमने भी कुछ तस्वीरें लीं। फिर एक कोने में लगे मॉनिटर में अपनी मेज़ और कुर्सी क्रमांक देखकर हॉल में प्रविष्ट हुए।


सुंदर और रोचक वर्णन।इस भव्य भोज के ब्यौरे के साथ साथ फिल्म्स और इतिहास का बताया जाना एक आनंदपूर्ण स्थिति को बयां करता है।
सारगर्भित रिपोर्ताज हेतु बधाई हो।
सारगर्भित, रोचक एवं सजीव चित्रण करते रिपोर्ताज के लिए बहुत-बहुत बधाई।