1 – अधूरा सा
मैंने कुछ लिखा
उस लिखे को फिर पढ़ा
उसके भाव को तौला
फिर लगा कुछ अधूरा है
फिर कुछ जोड़ तोड़
अर्थों को दिया मोड़
सिर से पैताने तक
कहीं नहीं था
शब्दों और भावों का मेल
ऊँघते शब्द
जम्हातें भाव
शायद कुछ अंदर ही अधूरा था
तो लिखा पूरा कैसे होता।
2 – रिश्ते
जब हम और तुम मिले थे
नहीं था अपेक्षाओं का रिश्ता
नहीं था मैं बड़ा
तुम छोटे का भाव
फिर अपेक्षाओं का
विनिमय शुरू हुआ
मेरे प्रति तुम्हारा उधार
तुम्हारे सिर पर मेरा उधार
हम गिनते गए अहसान
और भारी होता गया उधार
शिकवों की रेत इकठ्ठा होती गई
रिश्तों का पानी सूखता गया
इस किनारे तुम
उस किनारे हम
बैठें हैं अपने उधार के साथ
तलासते एक सोता रिश्ते का।
3 – शिक्षा की बात
एक स्कूल
बहुत सारे बच्चे
बहुत सारे शिक्षक
चीखते चिल्लाते
पढ़ते पढ़ाते
साहब का हुकुम बजाते
साहब भिन्नाते
अपने से बड़े साहब का
हुकुम बजाते
ये साहब मिमयाते
सबसे बड़े साहब के दरबार में
पूँछ हिलाते
ये भी करना
वो भी करना
सबसे डरना
सब के अंत में
शिक्षा की बात करना
वरना ……. ?

सुशील शर्मा
जन्म- २१ जून १९६४ को गाडवारा म.प्र. में।
शिक्षा- एम टेक (भूविज्ञान) एम.ए. (अँग्रेजी)
कार्यक्षेत्र- अध्यापन, सामजसेवा एवं पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय।
प्रकाशित कृतियाँ-
आलेख संग्रह- दरकती संवेदनाएँ, सरोकारों के आईने, विज्ञान अन्वेषिका, सुनो समय,हेलो जिंदगी,हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति,लोक साहित्य और पर्यावरण।
कविता संग्रह – गीत विप्लव, मन के मोती, छन्द का आनन्द, शब्द समंदर, शब्दनाद, स्वप्न झरे फूल से, गोविंद गीत, दोहा दिवाकर, कुमुदनी, मनवीणा और नन्ही बूँदें।
हाइकु एवं तांका संग्रह- अंतर्ध्वनि और अंतर्नाद
लघुकथा एवं कहानी संग्रह- माटी की महक, शक्कर के दाने
बाल साहित्य – बिलट्टा गुलट्टा
सम्मान एवं पुरस्कार
अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शिक्षक पुरस्कारों से सम्मानित।
सम्प्रति- प्राचार्य,शासकीय हाई स्कूल सहावन (म प्र)।

आदरणीय सुशील जी!
आपकी तीनों कविताएँ पढ़ीं।
1-अधूरा सा
अपनी रचना को लिखने के बाद ठहराव के साथ जब बार-बार पढ़ा जाये।तभी वह मुकम्मल हो पाती है।अधूरापन का लगना लेखन के प्रति सजकता का प्रतीक है। दरअसल मन अगर अशांत हो या मन में कुछ खालीपन हो तो संतुष्टि का अहसास नहीं होता।
2 – रिश्ते
आपकी यह कविता यह बताती है की अपेक्षाएँ रिश्तों में किस तरह दूरियों का कारण बनती हैं। अपेक्षाएं नहीं करना चाहिये और कुछ करने के बाद एहसान भी नहीं जताना चाहिये। रिश्तों को बनाए रखने के लिए यह सावधानी जरूरी है।
3 – शिक्षा की बात
यह कविता और इसकी समस्या बहुत अपनी सी लगी।
हम तो खैर प्राइवेट स्कूल में रहे लेकिन हम जानते हैं कि सरकारी स्कूलों में इस तरह की समस्याएँ कितनी जटिल हैं। वहांँ सब कुछ सरल है किंतु बच्चों को पढ़ाना ही कठिन है। दुनिया भर के कामों के बीच उद्देश्य पीछे ही छूट जाता है।
तीनों ही कविताओं में जीवन का सच है। पहली कविता में थोड़ी निराशा सी महसूस हुई। अंतर्मन का खालीपन कविता में भी महसूस हुआ।
दूसरी कविता में भी जीवन की निराशा नजर आई।
तीसरी कविता में कर्तव्य के प्रति मजबूरियाँ महसूस हुईं।
सच्ची कविताओं के लिए बधाइयाँ आपको।