समकालीन हिंदी कथा साहित्य के लेखक ‘राकेश शंकर भारती‘ जी का जन्म 4 फरवरी 1986 में बिहार के सहरसा जिले के बैजनाथ पुर गांव में हुआ था।इनके पिता का नाम प्रेमशंकर यादव और माता का नाम उर्मिला देवी है। प्रारंभिक शिक्षा बैजनाथ पुर गांव के माध्यमिक विद्यालय और मनोहर उच्च विद्यालय से इन्होंने प्राप्त की । ‘राकेश शंकर भारती‘ जी अपनी रचनाओं में समाज के अनछुए पहलुओं को उठाने का प्रयास करते हैं। ‘राकेश शंकर भारती’ की रचनाओं में सामाजिक स्थिति को दिखाया गया है। इनकी रचनाएं ‘इस जिंदगी के उस पार’, ‘नीली आंखें’, ‘किरचें’ इत्यादि जीवन के यथार्थ को दर्शाती हैं।
‘हड्डी’ कहानी डायमंड पॉकेट बुक्स में सन् 2022 में प्रकाशित हुई है। ‘हड्डी’ कहानी में राकेश शंकर जी ने सामाजिक कुप्रथा से ग्रसित लोगों की मानसिकता को दिखाने का प्रयास किया है। गर्भ से लिंग-परीक्षण के बाद बालिका शिशु को मार देना ‘कन्या भूण‘ हत्या कहलाता है। महिलाये अपने ससुराल और पति के दबाव में आकर गर्भ में पल रही नन्ही जान को मार देती है ।यह सामाजिक कुप्रथा सदियों से चली आ रही है ।कई महिलाएं ऐसी भी होती है की जन्म लेने के बाद भी बच्ची को मारने में अपने परिवार का साथ देती है। वर्तमान में भी यह सामाजिक कुप्रथा अपना विशालरूप धारण कर चुकी है। ‘हड्डी’ कहानी में इन्हीं मानसिकताओं के तरफ ध्यान केंद्रित किया गया है।
‘हड्डी’ कहानी का आरंभ धीरन यादव से होता है ।धीरन यादव और सुजाता देवी के बीच कहानी घूमती नजर आती है। कहानी के आरंभ में ही दहेज प्रथा को दिखाया गया है। धीरन को दहेज में एक भैंस मिली थी ,जो नाथ तोड़कर मुखिया के खेत की तरफ जाती दिखाई देती है। इससे पहले भी धीरन को इस भैंस के कारण जुर्माना भरना पड़ चुका था। धीरन गुस्से में भैंस के पीछे पीछे जाता है और उसके टांगों को तोड़ने की बात करता है। धीरन और सुजाता की पांच बेटियां रहती है और धीरन को इस बात की बहुत चिंता रहती है कि इनकी शादी कैसे होगी?
धीरन अपने किस्मत को कोसता हुआ कहता है कि:- “एक तरफ यह भूरी भैंस परेशान कर रही है, तो दूसरी तरफ ऊपर वाले भी क्या मेरे साथ अच्छा कर रहे हैं। बियाह के दस बरस भी नहीं हुए हैं कि पांच बेटियों का बाप बन गया हूं। मुझसे बड़ा अभागा इस दुनिया में कौन हो सकता है? हे प्रभु आप मुझ पर दया कीजिये और अब मेरे घर में बेटियों को भेजना बंद कर दीजिये। हद पार होगई है।“1 हमारा देश पुरुष प्रधान है। यहां पुरुषो को ही सबसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सभी परिवार की यही इच्छा होती है कि हमारे घर में पुत्र का ही जन्म हों ,पुत्री का नहीं । इन्हीमानसिकताओ के कारण न जाने कितने मासूमो की जान चली जाती है। धीरन यादव भी अपने आप को सबसे बड़ा अभागा समझता है।
धीरन के ससुराल से जो भैंस आई थी, वो मुखिया के खेत में चली जाती है, और उसके फसल को खराब कर देती है । धीरन गुस्से में भैंस को लाठी से मार देता है ।घर आते ही सुजाता भैंस को देखती हैं तो उसको बहुत दुख होता है। क्योंकि भैस उसके पापा और दादाजी जी की निशानी थी। उसे वो बेचने भी नहीं देती थी। पुत्र न होने के कारण सुजाता को तरह-तरह के ताने सुनाने पड़ते थे।धीरन सुजाता को पुत्र न होने के कारण कहता है कि:-“मेरा नसीब तो उसी दिन फूट गया था, जिस दिन तुमसे मेरी शादी हुई थी। इतने सालों में तुम पांच लड़कियों की मां बन गई हो। आज इन लड़कियों के बदले में पांच लड़के होते तो कितना अच्छा होता है ।“2
देश में बढ़ रहे दहेज प्रथा के कारण कोई भी व्यक्ति बेटी को जन्म देने से डरता है। उसको मार दिया जाता है ,दुनिया में आने से पहले ही ।आज भी समाज में लोगों का मानना है कि बेटियां बोझ होती है ।’मुंशी प्रेमचंद’ जी द्वारा रचित कहानी नैराश्य में भी कहानीकार में स्त्रियों की स्थिति को दिखाने का प्रयास किया है,किस प्रकार कहानी की नायिका निरुपमा की तीन बेटियां होती है , जिससे नाराज होकर उनके पति घमंडी लाल त्रिपाठी निरुपमा से बात तक नहीं करते मुंशी प्रेमचंद जी ने लिखा है:- “बाज आदमी अपनी स्त्री से इसलिए नाराज रहते हैं कि उसके सिर्फ लड़कियां ही क्यों होती है, लड़के क्यों नहीं होते ।जानते हैं कि इनमें स्त्री का दोष नहीं है, या है तो उतना ही जितना पुरुष का, फिर भी जब देखिए स्त्री से रूठे रहते हैं ,उसे अभागिन कहते हैं और सदैव उसका दिल दुखाया करते हैं।“3
‘हड्डी’ कहानी में लिंगगत भेदभाव भी देखने को मिलता है। सुजाता अपने नसीब को कोसती हुई सोचती है कि आज अगर एक भी बेटा पैदा हुआ होता तो मुझे ये सब नहीं सुनना पड़ता और छठी माता , सूर्यदेव से प्रार्थना करती है कि उसे एक बेटा हो जाये । ‘सुशीला टाकभौरे’ जी अपनी आत्मकथा शिकंजे का दर्द में लिखती हैं:- “समाज में बेटियों की अपेक्षा बेटो को अधिक सम्मान और महत्व दिया जाता है। जिन लड़कियों के भाई नहीं रहते थे, परिवार के लोग और रिश्तेदार उन्हें बुरा कहते थे ।वह बहुत दुखी हो जाती थी। जिस मां को बेटा नहीं होता वह तो मानो अपने आपको दुनिया की सबसे दुखी, अभागी, स्त्री मानती । बेटों को महत्व दिया जाता था। बेटे के लिए व्रत रखे जाते ,पूजा की जाती ,मन्नत मांगी जाती। चाहे जितनी बेटियां हो जाये, बेटा होना ही चाहिए । बेटा होने पर उनके मातृत्व को महत्व मिलता था। सामाजिक –धार्मिक धारणा थी-” बेटा नहीं होगा तो मरने पर मुंह में पानी कौन डालेगा? मरने पर अग्नि कौन देगा ?बेटा नहीं होगा तो मुक्ति कैसे मिलेगी।“4
‘सुशीला टाकभौरे’ जी ने भी अपनी आत्मकथा शिकंजे का दर्द में लिंगगत भेदभाव को दिखाने का प्रयास किया है। ‘हड्डी’ कहानी में सुजाता छठवीं बार गर्भवती होती और बड़ी खुशी से धीरन को बताती है कि छठी माता ने मेरी विनती स्वीकार कर ली है। इस बार तो बेटा ही होगा ।धीरन भी बहुत खुश होता है। देखते-देखते सुजाता अगस्त के महीने में शिशु को जन्म देने वाली होती है ,चारों तरफ अंधेरी रात, काला बादल गरजता हुआ ,गांव में सन्नाटे ही सन्नाटे थे, उसी समय सुजाता नवजात शिशु को जन्म देती है।
धीरन अपनी मां से पूछता है:-“मां तेरा पोता देखने में कैसा है? किस पर गया है? बाबूजी या मुझपर ?”5 अपनी मां की ओर से कोई प्रतिक्रिया ना मिलने पर वो फिर से पूछता है कि :-“माता जी चुप क्यों हो, क्या हुआ? मेरा बेटा सही सलामत है कि नहीं।“6 मां ने भड़कते हुए जवाब दिया कि :-“किस बात की खुशी, बेटा? इस कुलक्षिणी चुड़ैल औरत से किस पुत्र की आशा करते हो ।इसकी कोख में बेटा कहां से आयेगा? जिस रात को इस औरत से तूने सात फेरे लिए थे ,उस रात को तेरा नसीब फूट गया था, चौपट हो गया था।“7
धीरन की मां एक स्त्री होते हुए भी सुजाता को ताने देती है कि उसकी कोख से कभी भी पुत्र पैदा नहीं हो सकता, उसे कुलक्षिणी ,चुड़ैल तक कह देती है। इतना सुनने के बाद धीरन को सुजाता पर अत्यधिक क्रोध आता है, वह सारी परंपराओं को तोड़कर सुजाता के पास चला जाता है। सुजाता उस समय अपनी नवजात शिशु को गोद में लेकर बैठी रहती है । धीरन क्रोध में सुजाता से कहता है:- “सुजाता, सुन लो। छठी बेटी के भार को मैं किसी भी तरह से बर्दाश्त नहीं कर सकूंगा। मैं कोई सेठ नहीं की सारी बेटियों की शादी कर सकूं ।तुम फैसला कर लो कि तुझे क्या चाहिए। इस घर में रहना है कि नहीं। अगर इस घर में मेरे साथ रहना है तो इस बच्ची को नष्ट करना पड़ेगा।“8
सुजाता को इस सामाजिक कुप्रथा के आगे हार मानना पड़ता है ।सुजाता की आंखों से आंसू की बरसात होने लगती है ,और ना चाहते हुए भी उसे धीरन की बात को मानना पड़ता है ।सुजाता के सामने ही धीरन रजाई से नवजात शिशु की नाक और मुंह को दस मिनट तक दबाकर उस मासूम बच्ची की जान ले लेता है। इस प्रकार लेखक का मानना है कि इस मासूम बच्ची को मार के हमारी भारतीय संस्कृति और अधिक महान हो जाती है। धीरन लाल चादर में नन्ही सी जान को लपेटकर,रस्सी लेकर नहर की ओर चला जाता है। नहर में चारों तरफ पानी ही पानी था, मानो पूरा कोशी इलाका डूब गयी हो । नहर के पास आकर एक ईट में रस्सी से नवजात बच्ची की लाश बांध देता है और उसको नहर में फेंक देता है। मासूम बच्ची की लाश उस ईट के बोझ के साथ पानी में समा जाती है। सदियों से चली आ रही हमारी सामाजिक कुप्रथा और महान होती जाती है।
अंत में आते-आते छः साल गुजर जाने के बाद भी सुजाता और धीरन को पुत्र की प्राप्ती नहीं हो पाती है ।सुजाता अपने दुख को किसी से बता भी नहीं पाती और मन ही मन अपनी छः साल पहले जिस बच्ची को मार दिया जाता है उसके बारे में सोचती है:-“अगर उस रात बच्ची को नहर में नहीं फेंका जाता तो क्या होता? अगर वह बच्ची अभी इस दुनिया में रहती तो क्या होता ।अभी छः साल की हो गयी होती। अभी इतराकर –तुतलाकर बात करती ।मैं कोई काम करती तो वह भी आगे पीछे करती।“9 सुजाता को अपनी बच्ची की किस्मत को सोचकर बुरा लगता है कि मेरी ही मुन्नी सबसे बदनसीब थी , कि उसे पैदा होने के कुछ मिनटो में ही मार दिया गया।
‘हड्डी: कहानी के अंत में धीरन को भी यह एहसास हो जाता है कि पुत्र के लिए अपनी प्यारी बच्ची को मारकर उसने गलत किया। धीरन सोचता है की सबसे छोटी बेटी अपने पिता से सबसे ज्यादा प्रेम करती है,और उसके लिए भोजन लेकर आती है ।वह सोचता है कि :-“काश ! वह फिर से मेरी जिंदगी में वापस आ जाती । काश !सिर्फ एक बार के लिए।“10 गर्मी का दिन था ,धीरन के दोनों बैलों को प्यास लगती है ,उन्हें वह खोल देता है। दोनों बैल नहर में पानी पीने लगते हैं। धीरन उनके पीछे-पीछे भागता है तभी उसके पैर से ईट टकराती है, और उसके पैर में फंस जाती है। धीरन उस ईट से बंधी रस्सी को नहर के किनारे लेकर आता है। जब वह किनारे आकर अपने पांव से उस रस्सी को खींचता है, तो रस्सी के साथ ईट से बंधी रीढ़ की छोटी मासूम हड्डी भी बाहर आ जाती है।देखकर तो ऐसा लगता है धीरन को कि यह हड्डी किसी शिशु की है। फिर उसे याद आता है कि यह तो उसकी बच्ची की हड्डी है जो एक किलोमीटर का सफर तय करके उसके पांव को चूमने आयी थी। इस प्रकार कहानीकार ने अपनी इस कहानी काअंत बहुत ही दुखांत रूप से किया है। उस मासूम बच्ची की क्या गलती थी कि उसके आंख खुलते ही उसे हमेशा के लिए बंद करा दिया गया।
निष्कर्ष
निष्कर्ष के तौर पर हमें इस कहानी से यह सीख मिलती है कि समाज में आज भी लिंगगत भेदभाव को महत्व दिया जा रहा है। वर्तमान युग में भी कन्या भ्रूण हत्या एक ज्वलंत सामाजिक अपराध एवं समस्या के रूप में प्रत्येक समाज के सामने चुनौती के रूप में खड़ी नजर आ रही है। समाज में आज भी इस तरह की मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा और ना जानें कितने मासूमों की जान चली जा रही है।
राकेश शंकर भारती भी अपनी कहानी ‘हड्डी’ में सामाजिक कुप्रथा से ग्रसित लोगों की मानसिकताओ पर प्रहार करते दिखाई देते हैं। ‘हड्डी’ कहानी में राकेश जी ने पुरुष प्रधान समाज को भी दिखाने का प्रयास किया है ।किस प्रकार कहानी में सुजाता अपने परिवार और पति के दबाव में आकर अपने कलेजे के टुकड़े को मारने के लिए तैयार हो जाती है। सुजाता के माध्यम से उन बेबस स्त्रियों को मार्ग दिखलाने का प्रयास किया गया है ,जो अपने पति के दबाव में आकर हर गलत कदम में उनके साथ रहती है।
जैसा कि हम जानते हैं कि समाज के दो अभिन्न अंग नर और नारी है। इन दोनों के बगैर समाज अपूर्ण है क्योंकि स्त्री और पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू है ।अगर बेटियां ही ना रही तो सृष्टि की रचना कैसे हो सकती है। अंत में कहानी के नायक धीरन को एहसास भी होता है कि उसने गलत किया, पर क्रोध में मनुष्य जो भी फैसला लेता है वह हमेशा गलत ही होता है ।उसे सुधार नहीं जा सकता।
संदर्भ ग्रंथ सूची
१) शंकर राकेश, तुझे भूल ना जाऊं, डायमंड पॉकेट बुक्स: 2022, पृष्ठ संख्या- 93
२) वही, पृष्ठ संख्या -94
३) http://premchand.co.in/story/nairashya
४) टाकभौरे सुशीला, शिकंजे का दर्द, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली प्रथम -संस्करण: 2011, पृष्ठ संख्या-38
५) भारती शंकर राकेश, तुझे भूल ना जाऊं, डायमंड पॉकेट बुक्स :2022, पृष्ठ संख्या-96
६) वही, पृष्ठ संख्या -96
७) वही, पृष्ठ संख्या- 97
८) वही, पृष्ठ संख्या -97
९) वही, पृष्ठ संख्या -97
१०) वही, पृष्ठ संख्या -98
बहुत अच्छा। पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
धन्यवाद सर ।
“आपका यह आलेख विषय की गूढ़ता को गहराई से उद्घाटित करता है। आपने जिस प्रकार समीक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाया है, वह विद्वत्तापूर्ण एवं अनुकरणीय है। आपकी भाषा-शैली ओजस्विता एवं प्रवाहमयता से परिपूर्ण है, जो पाठकों को विषय-वस्तु की व्यापकता एवं सूक्ष्मता को आत्मसात करने में सक्षम बनाती है। आपकी तर्कसंगत विवेचना तथा संदर्भों का समावेश आलेख को और भी प्रामाणिकता प्रदान करता है। निश्चित ही यह अध्ययनक्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। आपके भावी अनुसंधानों के लिए शुभकामनाएँ।”
गुड़िया कुमारी जी!
राकेश शंकर भारती जी की कहानी “हड्डी ” पर आपकी लिखी समीक्षा पढ़ी।
पढ़कर पता चला कि वास्तव में यह कहानी सामाजिक कुरीतियों का दस्तावेज ही है।
बेहद मार्मिक व सिहरन पैदा कर देने वाली समीक्षा की है *हड्डी* कहानी की आपने और वह कहानी है भी ऐसी ही।
आज जब विज्ञान इतना एडवांस हो गया है कि पता चल गया है कि पुत्र और पुत्री के लिये स्त्री तो किसी तरह जिम्मेदार नहीं ,उसके बाद भी उसे ही उत्तरदाई ठहराकर प्रताड़ित करना,डायन कहना सरासर अन्याय है।और छठवीं संतान जब लड़की हो उसे मारने का जघन्य अपराध करना…….।
जब सास ताने दे और डायन कहे तो फिर हमसे कहे बिना रहा नहीं जाता कि औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन औरतें ही होती हैं।
क्षणिक क्रोध के आवेश में लिये गये निर्णय पश्चाताप के चलते सुधार की गुंजाइश भी नहीं छोड़ते। वह कहावत है न कि,”अब पछताए होता क्या जब चिड़िया चुग गईं खेत।”
जब पिता खुद बच्ची को मार के और लाश को रस्सी से बाँध के नहर में फेंक देता है और एक दिन ऐसी स्थिति बनती है कि वही रस्सी उसके पैर में फँसती है और जब वह उसे खींचता है तो पता चलता है कि उससे एक छोटी बच्ची का पिंजर बँधा है फिर उसे अपनी बच्ची की याद आ जाती है कि उसने भी अपनी बच्ची को इसी नहर में फेंका था और वही पैर पर पड़कर उससे अपना अपराध पूछ रही हो।
कहानीकार ने यहाँ पैर पड़ने की बात लिखी है पर हमें सही यही लगा कि वह अपना अपराध ही पूछ रही है जिसका उसे दंड मिला। कोई भी बच्चा अपनी इच्छा से जन्म नहीं लेता।
कहानी में एक चीज थोड़ी अविश्वसनीय सी लगी कि 6साल बाद वह पिंजर टकराया! नहर का पानी बंद करने पर जब वह सूख जाती है तो क्या 6साल तक वह पिंजर बहा न भी हो तो भी किसी को दिखाई नहीं दिया होगा?
इस सोच को ,इस कुप्रथा को बदलना जरुरी है।
एक महत्वपूर्ण कहानी का आपने चयन किया है। इस कहानी के लिये कहानीकार को भी धन्यवाद देना बनता है।
आपने इस कुप्रथा को लेकर जो संदर्भित उद्धरण दिये वो भ्रूणहत्या या इस तरह की कुरीतियों के होने की पुष्टि करती हैं।
आपको समीक्षात्मक लेख के लिये बधाई।
प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।