मेरी पूरी स्कूली शिक्षा काशीपुर नैनीताल में हुई थी। जहां पिताजी डिग्री कालेज में प्राध्यापक (हिन्दी विभागाध्यक्ष) थे। बाबा से बचपन में ही देशभक्ति का पहला पाठ सीखा और अनेक देशभक्तों की कथायें कंठस्थ करती, कब शिशु कविताएं सुनती-सुनाती अपनी अनगढ़ कविताएं भी सुनाने लगी, तुकबंदियों के रुप में, पता नहीं चला।
उस समय घर पर धर्मयुग हिंदुस्तान कादंबिनी दिनमान आदि पत्रिकाएं आती थीं। उनमें छपी कविताएं पढ़कर मैंने भी एक सपना देखा कि, क्या कभी मेरी कविता भी इसमें छपेगी? पता नहीं यह विचार मन में कैसे आया? एक छोटी सी बच्ची खेल खिलौनों से खेलने वाली सामान्य बालिका,की बचकाना सोच, लेकिन पिताजी ने कहा “हां क्यों नहीं, लिखो”। यह बात कहकर वो तो भूल गये पर मेरा सपना चलता रहा। मैंने पिताजी के मित्र चाचाजी को कविता दिखाई, उन्होंने उसे धर्मयुग के बाल कोना में भेज दिया,और लगभग दस वर्ष की उम्र में अपनी पहली बाल रचना ‘हम भारत के बच्चे हैं, अपने प्रण के सच्चे हैं’ ऐसी ही कुछ पंक्तियां थीं पूरी कविता याद नहीं अब। धर्मयुग में प्रकाशित देख कर भाव-विभोर बाबा की मंद स्मिति वाली छवि आज भी याद है। वह समय बहुत ही प्रेरक और उत्साह बढ़ाने वाला था मेरे लिए। जब छोटी ही थी तब बांग्लादेश की आज़ादी के बाद उसे मान्यता देने न देने पर एक वादविवाद प्रतियोगिता थी पिताजी के कालेज में। अंतर्विदयालय स्तर पर। बाबा ने कहा कि मैं भी बोलूं। पिताजी असमंजस में थे, पर मेरी तैयारी शुरु हुई। बाबा के लिखे लेख को रटकर बोलने की और मैंने जब मंच से बोलना शुरु किया तो बोलती चली गई। मुझे तो किसी का डर नहीं था। सामने बाबा खड़े थे। उनको ही देखकर एक सांस में अपनी बात कह दी और प्रथम आयी। दूसरे विद्यालय से आयी प्रतिभागियों से मैं उम्र में बहुत छोटी थी। पिताजी ने निर्णयक के तौर पर मुझे नंबर नहीं दिये थे बल्कि यह जिम्मदारी किसी और ने निभाई थी। मैं प्रतियोगिता की हक़दार तो नहीं थी पर छात्र यूनियन और निर्णायक मंडल की ओर से व्यक्तिगत रुप से मुझे पुरस्कार मिला। वो दिन मुझे आज भी याद आता है तो रोमांच हो आता है। लेकिन मेरे बाल-मन को पहला आघात तब लगा जब बाबा अचानक हृदयाघात से हमें छोड़कर चले गये। अनेक रातें सहमी हुई गुजरीं, फिर दिल से निकली पहली कविता बाबा के लिए लिखी थी, जिसे पढकर सभी भावुक हो गए थे। बेहद भावुक और संवेदनशील मन पाया था मैंने। मेरी बहुत प्रिय अध्यापिका के अकस्मात वैधव्य की चादर ओढ़ लेने और हमारी बोर्ड परीक्षाओं में आकर हमें शृंगार पढ़ाने, अपने दुःख को भूल हमें हंसाने की कोशिश ने भी मर्म को स्पर्श किया था और उससे उपजी संवेदना ने भी एक कविता रची थी।
मेरे सपने बहुत छोटे-छोटे थे। घर के साहित्यिक वातावरण से प्रभावित होकर कम उम्र से ही कवितायें लिखने लगी थी और महादेवी वर्मा बनना चाहती थी। खूब पढ़ना ओर पिता की तरह ही कालेज में पढ़ाना भी चाहती थी। पूरे परिवार के प्रोत्साहन ने मेरे सपनों को ऊँची उड़ान दी और नए पंख पाकर मैं अपने सपनों-कल्पनाओं की दुनिया में उन्मुक्त विचरण करने लगी थी।किताबें पढ़ने का जुनून इतना बढ़ गया था कि कोर्स की किताबों में कहानियाँ उपन्यास छिपा कर पढ़ती थी। उन किताबों में लिखी कहानियां, कविताएं भले ही पूरी समझ में न आतीं, लेकिन मुझे पढना ही था। अब तो सबका मौन समर्थन भी मिलने लगा था। अब मैं बड़े ही मनोयोग से पिताजी की डायरी में छुपाकर कवितायें लिखती। प्राध्यापक एवं स्वयम् साहित्यकार पिता[डॉ मणीन्द्र नाथ पाण्डेय] ने उत्साहवर्धन किया और फिर कविता के बीज पुष्पित पल्लवित होने लगे। स्कूल के समारोहों से लेकर सार्वजानिक मंचों से काव्य-पाठ कर और पुरस्कृत होते हुए मेरा उत्साह बढ़ता गया। मेरी सहेलियां अध्यापिकाएं सभी महादेवी वर्मा कह कर बुलातीं और मैं ख़ुद को महादेवी ही समझती। आज यह सोच कर भी हंसी आती है; पर वह तो बचपन का उत्साह था। जब भी गर्मी या जाड़ों की छुट्टियां होतीं तो हम लोग बनारस चले जाते थे।
बीते हुए समय में बचपन की प्यारी सुधियां,
फिर याद आ रही हैं, गरमी की छुट्टियां ।
ऊंचे पहाड़ों को हम छोड़कर चले थे,
अपने गृहनगर में बसाने अपनी दुनिया।
फिर याद आ रही हैं,गरमी की छुट्टियां ।
यहां आकर ही मैंने जाना कि ठेठ बनारसीपन क्या होता है? बनारस के पर्व, त्योहार, अनोखी परम्परायें और जीवन के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद से परे रह कर पूरी जीवंतता के साथ जीने की कला उत्सव मनाने की कला, हर बनारसी की अनमोल पूंजी होती है। एक आम लड़की की तरह मुझे भी सावन में भींगना झूला झूलना बहुत पसंद था। भले ही भींग जाने पर घर पर डांट पड़े, पर हमारे खेल नहीं रुकते थे। मेरे बचपन का सावन, बरसता-महकता मोतियों सी बूंदों का शृंगार करता… आज भी मुझे यादों के उसी समय में ले जाता है। जब गर्मी की भीषण तपन के बाद बारिश की बूंदें बहुत भली लगती थीं। लेकिन इस भीगे मौसम में सूखे कपड़ों को भीगने से बचाने की चिंता बच्चों के बीमार पड़ जाने की चिंता, महंगी सब्जियों, परिवार द्वारा बार-बार गर्म चाय व पकौड़ों की फ़रमाइशों की आपाधापी में घर-अंगना दौड़ती हुई मैं आज भी अपने बचपन के सावन को नहीं भूल पाती हूँ। न भीगकर बीमार पड़ने की चिंता न गरजते बादलों का डर।
दोपहर में जब घर के सभी विश्राम कर रहे होते, मैं चुपचाप छत पर बरसते बादलों में भीगते हुए गोल-गोल चक्कर लगाती और कजरी के अनगढ़ गीत गाती- “आइल सावन के महिनवाँ, बुंदियाँ रिमझिम बरसे ना।” इस पुनीत कार्य में मेरी सहेलियां भी शामिल रहती थीं। गीत के बोलों का अर्थ भले ही समझ में न आता हो, लेकिन भीगने का आनंद तो सौगुना होता था। फिर जी भर नहाने के बाद सभी सहेलियां मिलकर चंदा करतीं और सड़क के कोने में गर्म पकौड़ियाँ और आलूचाप तलती रन्नो की माई की दुकान हमारा अड्डा होती थी। जिन्हें ख़रीद कर बरामदे में बैठ उनका अनोखा तीखा स्वाद मुंह में घुलता रहता था। जब किसी ने देख लिया तो जोरदार डांट खाने के बाद भी हम अपनी मुस्कराहट छिपाकर वहां से भाग खड़े होते थे और पड़ोसी के घर से अमरुद तोड़कर माँ से उनकी चटनी बनाने का मीठा आग्रह, माँ की सारी शिकायतें भुला देता।
आज भी बारिश होती है, मेघों का रिमझिम, मन को भाता तो है, बस उस भूले बिसरे तीखे-चटपटे स्वाद की कल्पना ही कर सकती हूँ। मेरा बचपन सावन के झूलों पर झूलता हुआ आज भी गा उठता है- ‘कच्चे नीम की निंबोली बाबा लेते आना जी,–मेरी दूर है सहेली बाबा लेते आना जी।’
आज जब बरसते मेघों के बीच, हरियाली तीज की चहल-पहल, साज है,श्रृंगार है, लेकिन बचपन का वो सावन आज भी भुलाये नहीं भूलता। जैसे आसमान से खुशियों के रंग बरस रहे हों।
बात जब रंगों की हो तो रंग भरी एकादशी बुढ़वा मंगल, धुलेंडी और मसाने की होली, “खेलैं मसाने नें होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी”, तथा कबीरा सररर जैसे गीत भला कैसे भुलाए जा सकते हैं? बनारस के कण-कण में विराजे शिव-शिवा की होरी हर मन गुनगुनाता है।
नहीं भूलती वो बचपन की होली-
उम्र के इस पड़ाव पर न जाने क्यों वो बचपन की होली बहुत याद आती है, न गीले होने का डर न बंदरों सी शक्ल लिए यहां-वहां घूमते किसी के चिढ़ाने का डर,बस, “होली है भाई होली है” गाते-दोहराते सुबह से दोपहर तक, सहेलियों के साथ मस्ती कर लौटते, तो सब एक साथ बैठकर मां के बनाए उबटन से रंग छुड़ाने की कवायद करते। हालांकि मैं रंगों से खेलना और होली में बेवज़ह किसी को परेशान करने की पक्षधर कभी नहीं रही, बस सखियों के पीछे-पीछे लगी रहती थी। उस समय मेरे बचपन का एक-एक पल जैसे सपनों के झूले में झूलता रहता था। बनारसी परंपरा के अनुसार हम तीनों भाई-बहिन लखनवी कुर्ता पायजामा पहन कर, पारंपरिक नारियल-छुहारे की माला पहनकर, हाथों में गुलाल लेकर घर-घर जाते और रात गए तक खूब खा पीकर लौटते। फिर बिस्तर पर पड़ते ही थकान से नींद आ जाती। वो हमारे बचपन के उन्मुक्त, निश्चिंत दिन हमारे बच्चों को नसीब नहीं हुए। बेटियां तो अपनी सहेलियों के साथ मुहल्ले में घूम-फिर होली मना लेतीं, पर मेरा बेटा होली खेलने का शौकीन बिल्कुल नहीं था, दोस्तों के साथ होली के दिन केवल खाने-पीने निकलता, फिर घर में पढ़ाई-कोचिंग अपने शीर्ष लक्ष्य को पाने की जीतोड़ मेहनत के लिए, ख़ुद को समर्पित कर दिया था उन्होंने। आज लंबे समय के बाद जब बच्चे अपनी बनाई खूबसूरत दुनिया में खुश हैं, मेहनत करते हैं और उसका आनंद लेते हैं।
लेकिन कोरोना काल में घर से ही काम करने की सुविधा ने शायद उन्हें माता-पिता के साथ कुछ क़ीमती समय बिताने का अवसर दिया। सालों बाद हमारे परिवार ने सबका जन्मदिन, त्योहार एक साथ मनाया। होली में इस बार भी बेटा साथ है। लेकिन घर से बाहर न जाने, सुरक्षित रहने की विवशता है। ऐसे समय में हमारे बचपन की होली, बच्चों की होली, सारी यादें फिर घेरने लगती हैं मन को। हमारे बाद की पीढ़ी ने त्योहारों का असली सौंदर्य देखा ही नहीं। अब तीसरी पीढ़ी में हमारा नन्हा राजकुमार ‘स्वस्तिक’ बेपरवाह, मस्त हो होली में पिचकारी और रंगों की फरमाइशें करता है, गुझिया बनाने खाने की ज़िद करता है तो, मुझे अपना बचपन याद आ रहा है बहुत।
मेरी मां-
बचपन का सबसे यादगार सफ़र, स्नेहिल अनुभूतियों से जुड़ा है; जिसकी सूत्रधार रही है मां। मां के बिना तो जीवन की कल्पना ही नहीं। वो पहली अभिव्यक्ति जो एक बच्चे के मुख से मुखरित होती है वह है माँ। माँ मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं। सुख-दुःख, हर्ष-विषाद के पलों में एक मार्ग दर्शक, गुरु की भूमिका निभाती थीं।:मेरे आंसुओं मेरी पीड़ा को अपने आंचल में समेट लेतीं। एक किशोरी से जिम्मेदार गृहिणी, साहित्यानुरागी बनाने तक के सफ़र में पल-पल मेरा साथ निभाती थीं। मां बहुत गुणी और कलाप्रिय थीं। कपड़े सिलने और रंग-बिरंगे स्वेटर बुनना, नयी-नयी खाने की वस्तुएं बनाना, सुंदर कलाकृति को अनोखा रूप देकर घर सजाना, उनको प्रिय था। मुझमें भी उनके कुछ कलात्मक संस्कार अनायास आ गये थे। वे किताबें भी पढ़ती थीं और उनकी कहानियाँ हमें सुनाती थीं। मां और हमारे लिए घर में आने वाली पत्रिकायें सरिता, गृहशोभा, नंदन, चंपक, चंदामामा भी जहां पढ़तीं, वहीं पिताजी की छोटी सी लायब्रेरी से मानस का हंस, गोदान, गबन, झूठा-सच, वयं रक्षाम:, झांसी की रानी, प्रेमचंद साहित्य, शिवानी, रेणु को खूब पढ़ा था मैंने।
शिवानी मेरी प्रिय कथाकार थीं। उनकी कैंजा, चौदह फेरे ने बहुत गहरा असर डाला मुझ पर। जब पिताजी से कुछ पूछती तो वे चौंक जाते कि मैंने कहां और कैसे पढ़ लिया? स्कूल की परीक्षाओं में हिदी में बहुत अच्छे नंबर मिलते। मेरी कक्षाओं में भी मेरी अनगढ़ कविताएं अपनी जगह बनाने लगीं। अच्छी छात्रा होने में यह काव्य लेखन का गुण मेरी विशेषता बन गया था। स्कूल के मंच पर हम दोनों बहिने होड़ लगाकर एक के बाद एक कविताएं सुनाती जातीं तो, सभी खुश होकर तालियां बजाते(बचपन के वो सुनहरे दिन अब कहां?)
“तुम्हारे हाथ जो बुनते-उलझते ऊन के धागे
न उलझी ज़िन्दगी की डोर, सपनों से भरी आंखें
तुम्हरे मौन में डूबे नयन मां याद आते हैं।
शहर में अजनबी हूं मां,तुम्हारी याद आती है।”
नैनीताल में मैंने जीवन के महत्वपूर्ण दिनों को जिया था। बचपन जो बहुत कुछ सिखाता है, समझाता है, आने वाले समय की नींव रखता है, वह सुनहला बबचपन, एक शिक्षक की तरह हमें सिखा रहा था और मैं एक अनुशासित छात्र की तरह उसक हर पाठ को आत्मसात करती जा रही थी।
जब मां थीं, तब उनसे अपनी बातें मनवाने की ज़िद और मनपसंद खाने की फरमाइशें थीं। पिताजी की डांट से बचा लेने का एकमात्र आधार मां ही थीं। तब उनका मोल उतना नहीं जान पाई थी; पर आज जब वो नहीं हैं, तब लगता है कि मैंने क्या खो दिया? एक अनमोल खज़ाना जिसकी पूर्ति संभव नहीं होगी। अगर वो होतीं तो ऐसा कहतीं, मैं अपना दुःख साझा करती, अपनी बात मनवाती लेकिन अब? सब कुछ शून्य में है और कोई पता भी नहीं कि, उन्हे ढूंढ सकूं। पर मां आज भी बहुत याद आती हैं। उनकी बातें, उनकी यादें आज भी अपने आंचल में समेटे चल रही हूं जीवन यात्रा पर।
मेरी सहेलियां-
जीवन का हर पल परिवर्तित होता रूप अपनी कैद में संजोता है यादें-कुछ भावुक पल ,बचपन के साथी-सहेलियां और छोटे-छोटे हाथों से आकाश थाम लेने का मजबूत हौसला। लगता ही नहीं था कि ”हरा समुन्दर गोपी चन्दर-बोल मेरी मछली कितना पानी?” कब-कहाँ खो जायेगी समुन्दर की सोन मछरिया। इंद्रधनुषी रंगों में ढले बचपन के सपने बिखर जायेंगे नीले नभ में, हम ढूंढते रह जायेंगे उन्हें, जो हमारे साथ-साथ मीलों दूर तक चले। अक्षरों में खोजते रहे कल्पनाओं के सुनहले आकाश को, अनजानी दुनिया में पलते-बढ़ते, नन्हे सपनों की बुनियाद को; और फिर हमने एक नई दुनिया बसा ली। घर-आंगन, खुशियों की छाँह भी सजा ली, पर यादों में क़ैद, मेरी सहेलियां आज भी याद आती हैं। वो खोया बचपन, वो किशोर उमंगें -धीरे धीरे युवा होते मन की सपनीली-भावभरी कहानियां, मेरी गुड़िया की शादी में बहाये सच्चे आंसू। मन तो तब भी नहीं जानता था मिलने-बिछुड़ने की बातें… पर हमें बिछुड़ना ही था। क्योंकि बेटियां हैं हम। एक दिन अपनी दुनिया में हमें वापस जाना ही होता है। मायके की देहरी भी बस इन्तजार करती है। फिर सब कुछ बदल जाता है, हमारे नाम भी,पहचान भी, कैसे ढूँढू, ममता, कल्पना, साधना, रागिनी, दुर्गेश कहाँ होंगी और उन स्मृतियों में संजोये पल-छिन इस पड़ाव पर बहुत याद आते हैं। वो पल फिर नहीं मिले…
अब तो इंटरनेट है, फ़ेसबुक है, लेकिन मुझे नहीं पता कि वे इसका हिस्सा हैं या नहीं, कहाँ हैं? नहीं जानती, पर हर प्रेम-दिवस पर अपनी सहेलियों को याद करती रही हूँ। ये यादें बहुत कीमती हैं जो तस्वीरों के रूप में मेरी स्मृति मंजूषा में सुरक्षित हैं।
अपनी बात कहूं तो मन के दरवाजों पर मेरे सपनो की पहली दस्तक थीं मेरी कवितायें। न जाने कहाँ कहाँ किन, अनजानी गलियों से गुज़र कर जीवन की यात्रा तय करती रहीं, मेरे साथ-साथ उम्र के पड़ावों को पार करतीं, संघर्षों के शैल-शिखरों को विजय करतीं, वे पलती रहीं मेरे अंतर्मन की गहराइयों में, पर लक्ष्य को नहीं भूलीं। बड़े ही मनोयोग से पिताजी की डायरी में छुपाकर कवितायें लिखती, प्राध्यापक एवं स्वयं साहित्यकार पिता ने उत्साहवर्धन किया और फिर कविता के बीज पुष्पित-पल्लवित होने लगे।
स्कूल के समारोहों से लेकर सार्वजानिक मंचों से काव्य-पाठ कर और पुरस्कृत होते हुए मेरा उत्साह बढ़ता गया।
भरत मिलाप का मेला-
मेरी बचपन की स्मृतियों में बसा मोहक बिंब-चित्र; जब हम सब मेला देखने जाते और वनवास से अयोध्या लौटने के बाद राम व लक्ष्मण भरत, शत्रुघ्न का मिलाप तथा काशी नरेश का हाथी पर बैठकर दोनों हाथ जोड़े प्रणाम करना, हर हर महादेव के नारे से आकाश गूंजना… सब याद आ रहा है। बनारस में रामलीला की बहुत सुंदर परंपरा है। रामजन्म से लेकर राम-दरबार की लीला चेतगंज, रामनगर, लंका आदि स्थानों पर होती है और अपार भीड़ अर्जित करती है। इन सभी लीलाओं के बीच बहुत प्रसिद्ध है, नाटी इमली चौक पर भरत मिलाप की लीला और मेला। मैंने बचपन में बाबा के कंधों पर बैठकर तथा बाद के वर्षों में किसी परिचित की छत से इस लीला को कई बार देखा है। चारों भाइयों के रथ को उठाये काशी के समृद्ध व संभ्रांत व्यवसायी, बुद्धिजीवी व धनिक वर्ग के लोग आगे आगे चलते हैं और उनके पीछे हर हर महादेव तथा सियावर रामचंद्र की जय, से आकाश गूंजता रहता है। एक ऊंचे मंच पर चारों भाई गले मिलते हैं। उसके बाद विशाल हाथी के सजे हौदे पर बैठकर काशी नरेश तत्कालीन नरेश डा. विभूति नारायण सिंह जी आते थे, दोनों हाथ जोड़े, भारी पुष्प वर्षा के बीच उतर कर चारों भाइयों को सोने की एक-एक गिन्नी दान कर प्रणाम करते थे। हम सभी बच्चे उचक-उचक कर देखने की असफल कोशिश में कभी कामयाब होते कभी नहीं। हमारा मुख्य आकर्षण वहां लगा मेला ही होता था। रेवड़ी, चिवड़ा, नान खटाई, पेठे की दुकानें और सड़क किनारे सजी सैकड़ों
मिट्टी के खिलौनों की छोटी-छोटी दुकानें होती थीं। हम दोनों बहिनें एक बड़ा झोला भरकर खिलौने खरीदतीं और विजयी मुद्रा में घर लौटती थीं। चूल्हा चक्की, बबुआ, ग्वालिन, शेर, कृष्ण जी की मिट्टी की मूर्तियां, तीर-धनुष पता नहीं और क्या-क्या। लेकिन कुछ दिनों तक वही हमारी दुनिया होती थी।
बचपन में इतनी उलझनें कहाँ थीं? हर राष्ट्रीय त्योहार पर उतनी ही खुशी होती थी जितनी होली या दीवाली पर, लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते गये उनके पीछे छिपे मतभेद सामने आते गये। जिन महपुरुषों की हम जीवनियां पढ़ा करते थे, उनका सम्मान करते, बदलते समय के साथ वे भावनायें आहत होती गयीं। आज भी गांधी-जयंती पर बापू को नमन करते समय अपार श्रद्धा होती है पर दूसरों को उनकी आलोचना करते देखती सुनती हूं तो मन व्यथित हो जाता है और आज की घृणित राजनीति से, उन सिरफिरे लोगों से घृणा होती है। मेरे मन में, मेरे सृजन में और मेरी कल्पना में, देश-दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र है और बापू हमारे पूज्य राष्ट्र पिता। मैं अपनी भावनायें, अपनी देशभक्ति और अपनी अभिव्यक्ति वैसी ही पवित्र और अक्षुण्ण रखना चाहती हूँ जैसी बचपन में थीं। मत देश को बांटें, अपनी भावी पीढ़ी को निर्दोष पलने-बढ़ने दें। उन्हें विरोधाभासों की सीख न दें, बस प्यार से जियें और जीने दें।
बचपन हमेशा एक मीठी सी याद लेकर आता है विशेष रूप से कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान की बात चलते ही अपना बचपन बहुत याद आता है। हमारे शहर लौहनगरी जमशेदपुर में गंगा नहीं हैं। लेकिन शहरवासियों ने फिर भी गंगा-स्नान कर ही लिया। सुबह-सुबह मेरे पड़ोसी, स्थानीय खरकई और स्वर्णरेखा में जाकर स्नान कर आये। मन जहाँ रमे,वहीं गंगा है। मन चंगा तो कठौती में गंगा। मैंने भी बाल्टी में गंगोत्री और बनारस से लाये गंगा जल की कुछ बूंदें डाल कर स्नान कर लिया। इस कोरोना काल में जहां महीनों से घर में कैद ज़िन्दगी सारे पर्व त्यौहार अकेले ही मनाती रही है; वहीं कार्तिक पूर्णिमा के दिन, अपनी बालकनी से मुंह अंधेरे पड़ोसियों को गंगा स्नान के लिए जाते देखना बहुत अच्छा लगा। चेहरे पर मास्क और आंखों में झांकती उनकी खुशी, अद्भुत रोमांच सृजित कर रही थी। कोरोना चाय “यानि काढ़ा की चुस्कियां लेते हुए इस मेले जैसे दृश्य को देखना बहुत भला लग रहा था। परंतु बनारस की बेटी हूं, गंगा जल और स्नान के महत्व को जानती हूं। गंगा की पवित्रता, और मन की निर्मलता, जीवन-यात्रा को एक अनूठी गति देती है, शांत स्निग्ध लहरों सा जीवन क्रम।
इसलिए बचपन भी बहुत याद आया आज, जब मुंह अँधेरे, ललाइन चाची और सुकदेव की मौसी के साथ, हम बच्चे भी पैदल चलकर पंच गंगा घाट जाते थे। ठण्ड में दोनों हाथ बगलों में छिपाए,चाची के गीत में स्वर मिलाने की असफल कोशिश करते, सच्चे भक्त बने घाट पर पहुँच ही जाते थे। वहाँ पंडा जी से तिलक करवाते और लौटते समय कचौड़ी-जलेबी का नाश्ता भी करते थे। कचौड़ी-जलेबी आज भी मुझे बहुत प्रिय है और वो स्वाद मेरी कविताओं में घुलता है तो मन को बहुत संतुष्ट मिलती है।
“बनारस की गलियों में जाकर तो देखो
कितनी मधुर रसभरी है जलेबी
कोंहडे की सब्जी, उडद की कचौड़ी
परतदार रबड़ी की सखी है जलेबी।
अनोखी, अनूठी, मधुर भावना सी
मधु से भरी एक गजल है जलेबी
गरम दूध केसरिया संग मुंह में घुलती
है सुबहे बनारस का गंगाजल है जलेबी।”
बाद में वो सिलसिला भी छूट गया। शादी के बाद गंगा से नाता भी टूट गया। वहाँ जाकर भी कभी समय नहीं मिला कि गंगा किनारे जा सकूँ। लेकिन गंगा तो माँ है न! अलग थोड़े हो सकती है हमसे? ट्रेन की खिड़कियों से झांकते हुए गंगा की लहरों में खोई माँ को तलाशती हूँ। एक असफल कोशिश में उनका चेहरा भी कई बार नज़र आया है। तब मेरा अश्रुपूर्ण मौन नमन भी मेरी माँ और गंगा माँ के प्रति मन की गहराइयों में कहीं गुम। अब तो अस्सी घाट के समीप ही लंका में मेरा मायका हो गया है। वहां आते-जाते समय भी नगवां, अस्सी, लंका, चौक, ज्ञानवापी, मैदागिन कई बार जाना हुआ पर घाट नहीं जा पाई। टी वी में देव दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा में नहाते भक्तों को देख कर कल्पनाएँ ज़रुर जगती हैं, काश मैं भी होती वहाँ। पर बेटियां मजबूर होती हैं, मायके की देहरी जैसे दुइज का चाँद। अबकी बनारस गई तो गंगा नहाने ज़रूर आउंगी, गंगा माँ वादा रहा ।
यादें कहाँ से कहाँ लेजाती हैं और मेरी कलम उन पलों को संजो लेती कविता में, हमेशा की तरह।
“याद करें बचपन के दिन,यादें अकुलाये तुम बिन,
उतरे चंदा मामा, दूध कि कटोरी में,
मचली निंदिया रानी, अम्मा की लोरी में,
बतियाँ बनाने के दिन,याद करें बचपन के दिन,
सूनी दोपहरी में,आम के बगीचों में,
टूटे खंडहरों में,ताल में-तलैयों में
छुपने-छुपाने के दिन, याद करें बचपन के दिन,
छोटे-छोटे सपनों में खिलता था वो बचपन आसमान छूने को मचल-मचल जाये मन।
ऊंची उड़ानों के दिन,याद करें बचपन के दिन,
टूटे खिलौनों पर आँखें क्यों भर आईं?
डाली से बिछुड़े ज्यों बहना से भाई
सावन की राखी के दिन।
याद करें बचपन के दिन,
यादें रुलाएं तुम बिन। याद करें बचपन के दिन।”
वो सब कुछ जो मन चाहता है पर हम कर नहीं पाए, सचमुच एक बार मन चाहता है फिर संकटमोचन के मगदल खाने, मानस मंदिर में चित्रकूट के घाट पर हनुमान जी की राम नाम की गुहार सुनने, ज्ञानवापी की गलियों की भीड़ में भगवन शिव, माँ अन्नपूर्णा के दर्शनार्थ फिर दशाश्वमेध की गंगा-आरती, लंका, चौक की चाट खाकर नाटी इमली की सैर पर चलें। वहीं चौकाघाट, कॉटन मिल के पास मेरी बुआ जी का घर हैं थोड़ी दूर जैतपुरा में। अपने बिताए बचपन को जीना चाहती हूं। अपनी प्रिय सहेलियों दुर्गेश और साधना से मिलना चाहती हूं। एक बार फिर हरिश्चंद्र स्कूल और अग्रसेन महाविद्यालय की कक्षाओं में लौट जाना चाहती हूं। छोटी बहिन सुधा के साथ शर्त लगाकर कविताओं की प्रतियोगिता करना चाहती हूं, पर कहां? कब? कैसे?
सबसे मिलना चाहती हूँ मैं भी। रात के नौ बजे फूफाजी के साथ ”कौन बनेगा करोड़पति’ देखना चाहती हूँ। पिताजी के साथ बैठकर दूरदर्शन पर आ रहे कवि सम्मलेन का हिस्सा बनना चाहती हूँ। बच्चों के साथ शाम को छत पर नए पड़ोसियों के बारे में जानना चाहती हूँ। लेकिन न जाने कितनी विवशताएँ हैं जो पीछा ही नहीं छोड़तीं। समय के अंतराल में सब कुछ पीछे छूटता गया। कुछ बिछड़ गए हमेशा के लिए। कुछ दूर जा बसे। अब न पिताजी रहे न बुआ जी और न मेरी प्यारी छोटी बहिन। वर्षों बीत गए अपनों का संग साथ छूटता गया। वहाँ जाकर अकेलेपन की पीड़ा से जूझना बड़ा कठिन होता है। लेकिन मेरे मन में बसा बनारस आज भी जिंदा है। वहीं खड़ा है, समय के उस छूट गए मोड़ पर। मैं खड़ी हूं उस पल के इन्तजार में जब वह मेरी ऊंगली पकड़ मेरे अंतर्मन की दुनिया में ले जाएगा। इंतजार अब भी है…
पद्मा जी
आपका संस्मरण पढ़ कर मन बहुत भावुक हो गया। यह तो सच है कि बचपन का समय भुलाये नहीं भूलता। बनारस में हमारे गुरु जी का आश्रम है -श्री श्री 1008 लक्ष्मण चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज! (कान पकड़ना होता है गुरु का नाम लेते हुए।) वे पी एचडी थे और गोल्ड मेडलिस्ट। अब तो वे नहीं हैं। दिली ख्वाहिश है कि एक बार बनारस जरूर जाएँ।
पढ़ने की लत हमें भी रही बचपन से ही। स्कूल पत्रिका के लिये लिखा भी। उस समय कहानी, कविताएँ और एकांकी भी लिखीवह भी मिडिल क्लास में। पर शादी के बाद सब छूट गया। सच कहें तो लिखने में उतनी रुचि थी नहीं। पर पढ़ने का भारी जुनून था। जितनी पत्रिकाओं के आपने नाम लिखे उस समय यह सभी लगभग सभी के घरों में आया करती थीं ।
हमारे भी पिताजी फ्रीडम फाइटर रहे और ससुर जी भी। देश भक्ति तो नस-नस में भरी हुई थी उस समय सभी लोगों में और अपने परिवार का प्रभाव अपने पर तो है ही अब भी। सभी के प्रति प्रेम और अपनापन उस समय बहुत गाढ़ा हुआ करता था।
वैसे आपके संस्मरण में साथ-साथ हम भी बनारस घूम रहे हैं। आप गंगावासी हम नर्मदा वासी।
बेहद भावुक कर देने वाले संस्मरण के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई पद्मा जी।
पुरवाई का आभार।
सस्नेह सादर प्रणाम दीदी।बहुत अच्छा-सा की मेरी स्मृतियों कै सफर पर आप भी मेरे साथ साथ चलीं।मेरी भावनाओ को महसूस किया।हृदय से आभार दीदी।बचपन सचमुच जीवन का अनमोल खजाना ही है।आभार।
पद्मा मिश्रा जी का संस्मरण भाग- 2 ‘बचपन के दिन याद करें’ में लेखिका ने अपने बचपन को हर रंग से निहाल किया है। पारिवारिक वातावरण, साहित्यिक वातावरण, तीज-त्योहारों से लेकर बचपन की सखी-सहेलियों के साथ बरसात में भीगने वाले सारे दृश्य पाठक के सामने साकार हो उठते हैं। साहित्यकार बनने की शुरुआत बचपन से हो चुकी थी। हो भी क्यों न, साहित्यिक पत्रिकाओं बचपन की सहेली बन जाएं तो वे अपने में ढाल ही लेती हैं। बाल्यावस्था में लिखी कविता अगर पत्रिका में प्रकाशित हो जाए तो उसकी खुशी ही अलग होती है। आपने इस खुशी को महसूस किया है।
इस संस्मरण में ऐसा प्रवाह है कि पाठक उसी के साथ बहता चला जाता है। हर बीते हुए पल को अपने शब्दों में ऐसा पिरोया है कि कहीं कुछ छूट नहीं पाया है और न किसी तरह का अनावश्यक प्रलाप आने पाया है। जब रचना डूबकर लिखी जाती है तो फिर लेखक/ लेखिका को प्रयास नहीं करना पड़ता है। दिमाग और कलम एक साथ यूं ही चलते चले जाते हैं।
बाबा की नगरी काशी का चित्रण इतना सुन्दर बन गया है कि पढ़ते समय उसका हर दृश्य आंखों के सामने आ जा रहा था। वहां का खाना पीना, काशी नरेश का राम दरबार में चारों भाइयों को उपहार में सोने की गिन्नियां भेंट करना आदि आकर्षित करते हैं। काशी के लिए इस संस्मरण में और भी बहुत सारा है जिसे पढ़कर ही आनंद लिया जा सकता है।
संस्मरण को समेटते समय अंत बहुत मार्मिक हो गया है। कुछ देर तक पाठक सोचता रह जाता है।
बढ़िया संस्मरण लिखा आपने पद्मा जी। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई