Wednesday, February 11, 2026
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प्रो. पुनीत बिसारिया का लेख – भारतीय साहित्य का उद्गम स्थल है बुन्देलखण्ड

उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में विस्तीर्ण बुन्देलखण्ड भूभाग भारत राष्ट्र का हृदय स्थल है। प्राचीन काल में चेदि और दशार्ण नामों से अभिहित यह भूखण्ड साहित्यिक समृद्धि के लिए चिरकाल से विख्यात रहा है और आधुनिक काल में वीरता की परम्परा ने इसमें मणिकांचन संयोग उपस्थित कर दिया है।
वीरांगना लक्ष्मीबाई के अपरिमित शौर्य की विरासत को सहेजने वाले बुन्देलखण्ड प्रान्त में साहित्यिक समृद्धि की सुदीर्घ परम्परा रही है। महर्षि वेद व्यास, आदिकवि महर्षि वाल्मीकि, भवभूति, विष्णुदास, ईसुरी, आचार्य केशवदास, गोस्वामी तुलसीदास, पद्माकर, खुमान कवि, ठाकुर, बोधा, नवल सिंह, पजनेस, प्रतापसाहि, छत्रसाल, गंगाधर व्यास, लाल कवि, गंग कवि, अक्षर अनन्य, राय प्रवीण, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, मुंशी अजमेरी, माधवराव सप्रे, वृन्दावनलाल वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा, अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’, केदारनाथ अग्रवाल प्रभृति रचनाकारों ने यहाँ आँखे खोलीं और अपने साहित्य की मधुर सुवास से जन-जन के अंतस्तल को झंकृत कर दिया। इस पावन धरा को अपनी रचना भूमि बनाने वाले मनीषियों में जनकवि जगनिक, भूषण, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचन्द, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी अग्रगण्य रहे हैं। इसकी सीमाओं के विषय में पन्ना नरेश छत्रसाल के समय से यह उक्ति प्रचलित हो गयी थी-
‘इत जमुना उत नर्मदा, इत चम्बल उत टौंस।
छत्रसाल  सों  लरन  की, रही    काहू  हौंस।।
उपर्युक्त सीमाएँ छत्रसाल के शासन काल की रही है, जिन पर अधिक मतभेद नहीं है किन्तु कहा जाता है कि पश्चिमी सीमा के विषय में कुछ अन्य मत भी हैं। कनिंघम ने पश्चिमी बुन्देलखण्ड की सीमा बेतवा तक और दीवान मजबूत सिंह ने मालवा में काली सिन्ध तक माना है। इस प्रकार पूर्व में टौंस नदी और सोन या रीवाँ है, पश्चिम में बेतवा, सिन्ध, चम्बल नदी, विन्ध्याचल पर्वतश्रेणी तथा मालवा, ग्वालियर और भोपाल आते हैं, उत्तर में यमुना-गंगा नदियाँ तथा इटावा, कानपुर, फतेहपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर एवं बनारस आते हैं एवं दक्षिण में नर्मदा नदी और मालवा हैं। वर्तमान समय में प्रचलित बुन्देलखण्ड की सीमा उत्तर-प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में विभक्त  है। वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड की सीमा में उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत झाँसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, बाँदा, हमीरपुर, चित्रकूट तथा बाँदा जिले आते हैं, जबकि मध्य प्रदेश के अन्तर्गत सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, नर्मदापुरम अथवा होशंगाबाद, विदिशा, टीकमगढ़, ओरछा, नरसिंहपुर, सिवनी, दतिया, दमोह आदि को अधिकतम रखा जा सकता है। 
बुन्देलखण्ड का काव्य परिदृश्य चिरकाल से समृद्धि से परिपूर्ण रहा है। बुन्देलखण्ड के काव्य ने हिन्दी साहित्य जगत को ऐसे काव्य मनीषी दिए हैं, जिन पर कोई भी अंचल गर्व का अनुभव कर सकता है। यदि अतीत के पन्नों की ओर नज़र दौड़ाएँ तो पाते हैं कि वैदिक एवं संस्कृत काल से ही इस अंचल में काव्यात्मक संस्कारों का प्रस्फुरण होने लगा था। वस्तुतः भारतीय काव्य परम्परा के प्रारम्भिकतम सृजन का स्फुरण यहीं हुआ। बुन्देलखण्ड अंचल ऋषियों की तपोभूमि रही है, जिस कारण यहाँ वैदिक काल से ही साहित्य की कोंपलें फूटने लगी थीं। देव गुरु बृहस्पति, विश्वामित्र, नारद, दधीचि, कपिल, वशिष्ठ, अगस्त्य, वामदेव, नारद, सनकादि, क्रौंच, श्रृंगी, सुतीक्ष्ण, पाराशर, उद्दालक (वाजश्रवा), लोमश, कर्दम, चन्द्रादित्य, चंद्रात्रेय, आसंग, अत्रि एवं अनुसुइया, कालप्प, वैद्य शिरोमणि आत्रेय एवं च्यवन, गुरु द्रोणाचार्य जैसे ऋषियों की क्रीड़ा भूमि एवं वैष्णव, शैव, जैन तथा बौद्ध सम्प्रदायों के केन्द्र के रूप में विख्यात यह पावन धरा महर्षि वाल्मीकि, कृष्ण द्वैपायन व्यास, भवभूति, गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य केशवदास, ईसुरी आदि की जन्म-कर्मभूमि रही है। वैदिक काल की अनेक ऋषिकाओं ने इस अंचल में जन्म लेकर अथवा इसे कर्मभूमि बनाकर ऋचाएँ लिखीं। ऋषि अगस्त्य और उनकी पत्नी लोपामुद्रा ने यहाँ निवास किया। ऋषि अंगिरा तथा विश्वकारा की सुपुत्री शरूवती ने पति के पुरुषत्व खो बैठने पर घोर तप से उन्हें पुनः पुरुषत्व की प्राप्ति करवाई और अनेक वैदिक ऋचाओं को अनुभूत किया। रोमशा, शश्वती जैसी विदुषी ऋषिकाओं ने यहीं जन्म लेकर वेदों की अनेक ऋचाएं अनुभूत कीं। मान्यता है कि ऋषि दधीचि ने यहीं तपस्या की और उनकी अस्थियों से निर्मित वज्र से इंद्र ने वृत्रासुर का संहार किया। उनकी तपोभूमि उनके इस अपरिमित त्याग के कारण ही रत्नगर्भा हुई, जिसे आज पन्ना के नाम से जाना जाता है। आदि कवि वाल्मीकि ने यहीं चित्रकूट में (वर्तमान लालापुर की पहाड़ी) रहकर ‘रामायण’ का सृजन किया। सम्भवतः गर्भिणी सीता ने गृहत्याग के पश्चात यहीं कालपी में वाल्मीकि के आश्रम में निवास किया था। महर्षि वेद व्यास ने यहीं जन्म लेकर महाभारत का प्रणयन किया, जो तत्समय ‘जय’, ‘जयसंहिता’ अथवा ‘भारत’ महाकाव्य के नाम से जाना गया। भगवान श्रीकृष्ण के ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के कर्मयोग को भी इसी महाकाव्य में शब्दरूप मिला। महर्षि पाराशर की जन्मभूमि भी यही स्थली रही है|
इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि वन-अरण्य से आवेष्टित यह भूमि अपने प्रारम्भिक समय में ‘तपोभूमि’ थी, जो झाँसी की रानी वीरांगना  लक्ष्मीबाई तथा अनेक वीरों यथा-वीरवर लाला हरदौल, वीरवर आल्हा-ऊदल, बुन्देलखण्ड के शेर पन्ना नरेश अजेय महाराजा छ़त्रसाल, राजा गण्ड, मदनपाल, परमाल, वीरसिंह जू देव, चम्पतराय, खेतसिंह खंगार, झलकारी बाई, और सुन्दर-मुन्दर आदि तथा नन्द वंश का समूल नाश कर देने वाले कूटनीतिज्ञ विष्णुगुप्त चाणक्य के कूटनीतिक शौर्य से ‘वीरभूमि’ में परिवर्तित हो गयी 
आपत्ति काल में इस धरती ने सर्वदा सभी को अपने अंचल की छाँव दी। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जब तक इस अंचल में थे, तब तक सुरक्षित रहे और जैसे ही उन्होंने इस स्थल का त्याग किया, वैसे ही उन्हें पत्नी हरण का दुर्योग सहना पड़ा। यह सोचकर ही सम्भवतः रहीम ने इस अंचल के विषय में लिखा था- 
‘‘चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।
जा पर बिपदा परत है, सो आवत यहि देस।।’’
बुन्देलखण्ड के इस विस्तृत भूभाग में पश्चिमी हिन्दी की बुन्देली बोली व्यवहृत की जाती है। बुन्देली काव्य की परम्परा पर यदि हम दृष्टि डालें तो पाते हैं कि विक्रम संवत् की ग्यारहवीं शताब्दी से अद्यावधि मौखिक एवं लिखित परम्परा में बुन्देली काव्यधारा अप्रतिहत प्रवाहमान रही है। यदि हिन्दी काव्य में इस अंचल के योगदान पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि सन 1140 ईस्वी के आसपास से ही इस अंचल में साहित्यिक गतिविधियों का सूत्रपात होने लगता है।मौखिक परम्परा का सर्वाधिक लोक स्वीकृत एवं विख्यात महाकाव्य महोबा नरेश महाराज परमर्दिदेव अथवा परमाल के आश्रित जगनिक द्वारा रचित ‘आल्हखण्ड’ अथवा ‘परमालरासो’ ‘ है, जिसे बुन्देली भूभाग ही नहीं, वरन् अन्य स्थलों पर भी जनता ने अपने गले का हार बनाया है। वस्तुतः आल्हखण्ड बुन्देली काव्य परम्परा का सर्वोत्कृष्ट शिखर है। देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर यह सम्पूर्ण विश्व को अपने वीरत्व भाव का भान करा रहा है। इसका एक उदाहरण दर्शनीय है-
 ‘‘खट-खट-खट-खट तेगा बाजै, बोले छपक-छपक तलवार।
चलै जुनब्बी    गुजराती, ऊना  चलै बिलायत क्यार।
तेगा चटकैं बर्दवान के,  कटि-कटि  गिरैं सुघरुआ ज्वान।
पैदल के  संग पैदी  अभिरे,    असवारन ते असवार।
हौदा के  संग  हौदा  मिलिगै, ऊपर  पेश  कब्ज की मार। 
कटि-कटि शीश गिरै धरनी  में, उठि-उठि रूण्ड करैं तलवारि।
आठ कोस  के तहँ गिरदा  में,  अंधाधुंध  चलै   तलवार।’’
जहाँ तक लिखित काव्य धारा का प्रश्न है तो यह प्रायः विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी से प्राप्त होने लगती है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आल्हखण्ड के पश्चात मौखिक काव्य परम्परा प्रायः क्षीण हो गयी और ईसुरी के आगमन से पूर्व तक कोई बड़ा नाम लोककण्ठ में सदा-सर्वदा के लिये स्थान बना पाने में प्रायः असफल रहा। परिणामस्वरूप लिखित काव्य की परम्परा ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। बुन्देली काव्य की धारा रीति काल में आकर शिखर पर जा पहुँचती है और 16वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक रीतिकालीन काव्य बुन्देलखण्ड के कवियों का कंचन स्पर्श पाकर मणिकंचन संयोग उपस्थित करता है। जनकवि जगनिक के बाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम विष्णुदास का आता है, जिनके ‘रामायण कथा’, ‘महाभारत कथा’, ‘स्वर्गारोहण कथा’, ‘रुक्मिणी मंगल’ तथा ‘सनेह लीला’ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं। विष्णुदास को हिन्दी का पहला रामकथा काव्य एवं कृष्णकथा काव्य का प्रणेता माना जाता है। वे सन 1450 ई. के आसपास काव्य सृजन कर रहे थे, जो वल्लभाचार्य से पहले का समय है।
हिन्दी साहित्यकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं, किन्तु अनेक साक्ष्यों एवं गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ‘श्रीरामचरितमानस सटीक’ से उनकी जन्मभूमि राजापुर, बाँदा प्रमाणित होती है, जो वर्तमान बुन्देलखण्ड परिक्षेत्र में आती है। कविवर गोस्वामी तुलसीदास ने भी चित्रकूट को अनेक स्थलों पर श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है।  ‘श्रीरामचरितमानस’ उनकी ख्याति का उच्चतम आधार है, जो उनके प्रयाण के लगभग 400 वर्षों के बाद आज भी जन-जन का कण्ठहार बना हुआ है। उनके काव्य में दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला, कवित्त, बरवै, छप्पय, तोमर, नाराच आदि विपुलता से प्रयुक्त हुए हैं। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी एक व्यक्ति, एक परिवार, एक समाज, एक राजा, प्रजा और विभिन्न रिश्तों के उच्चतम रूप की छवि को राम के माध्यम से उकेरते हैं तथा एक ‘रामराज्य’ का स्वरूप गढ़ते हैं जो ‘गरीबनिवाज’ हो, जहाँ कोई ‘अबुध’ और ‘लक्षणहीन’ न हो और सब नर ‘परस्पर प्रीती’ से रहते हों। उनका रामराज्य ऐसा श्रेष्ठतम समाज है कि उसके गुणों का बखान शेषनाग जी और सरस्वती जी भी नहीं कर सकतीं। दरअसल तुलसीदास जी के समय में मुग़लों विशेषकर अकबर और जहाँगीर का शासन था, जिनकी सनातन धर्म के प्रति वैमनस्य की भावना स्वतः स्पष्ट थी। इसीलिए मानस के उत्तरकाण्ड में उन्होंने उनकी निंदा करते हुए लिखा-
‘‘नृप पाप परायन धर्म नहीं, करि दण्ड बिडंव प्रजा नित हीं।’’
अब ऐसे में राम का आदर्श ही समाज को प्रबोधन और प्रेरणा प्रदान कर सकता था। ऐसे में उन्हें ‘राजसत्ता’ के समक्ष एक ‘लोकमान्य सत्ता’ का आदर्श प्रस्तुत करना था, जो रामकथा से ही पूर्ण हो सकता था।
कन्हरदास सन 1530 ई. के आसपास काव्य सृजन कर रहे थे। वे ओरछा नरेश महाराज मधुकर शाह के आश्रित थे। ओरछा में श्री रामराजा सरकार की प्रतिष्ठापना के पावन अवसर पर महाराज मधुकर शाह ने उन्हें भदरेह ग्राम की 311 बीघा जमीन देते हुए ‘स्वामी’ के पद से विभूषित किया था। आचार्य केशवदास ने उन्हें सम्मानपूर्व स्मरण करते हुए लिखा है- ‘‘करिकै अपने प्रेमप्रकास, पहिराए द्विज कन्हरदास।’’ उनके पदों में श्रीराम की स्तुति तथा अपने आश्रयदाता महाराज मधुकरशाह एवं महारानी गणेश कुँवर की प्रशंसा मिलती है। प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी भक्ति दास्य भाव की है, जिसका एक उदाहरण निम्नलिखित है-
मन नहिं लागत प्रभु की ओर।
काम-क्रोध लोभादिमोद-मद, कठिन करै बरजोर।
मैं बहु विनय करत ही  हारौ, मानत नाहिं निहोर।
कन्हर प्रभु के  सरन भए तै,  भागि जाँय सब चोर।
ओरछा नरेश महाराज मधुकरशाह स्वयं भी अच्छे कवि थे। उन्होंने अपने गुरुदेव हरिराम व्यास को वृन्दावन से ओरछा आकर रहने हेतु निवेदन करते हुए एक काव्यमय पत्र लिखा था,उनके ज्येष्ठ पुत्र रामशाह भी भक्त कवि थे, जिनकी भक्ति रस से परिपूर्ण एक कविता दृष्ट्रव्य है-
‘‘प्रभु तुम अपनो कर मोहि जानौ।
रामशाह मधुकर कौ बेटा ता नाते मोय मानौ।
माना जाता है कि महाकवि बलभद्र मिश्र ओरछा निवासी पण्डित काशीनाथ मिश्र के सुपुत्र तथा आचार्य केशवदास के अग्रज थे। इनका जन्म ओरछा में हुआ था। आपने अपनी रचनाओं में नायिका भेद, नख-शिख वर्णन तथा विविध अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया है। नायिका के सौन्दर्य का एक चित्रण निम्नवत है-
पाटल नयन को कनद कैसे दल दोउ,
बलभद्र बासर अनींदी लखी बाल में।
सोभा के सरोवर में बाडव की आभा कैंधों,
देव धुनी भारती मिली है पुण्य काल में।
ओरछा नरेश महाराज इन्द्रजीत का शासन काल सन 1648 से 1662 ई. है। वे ‘धीरज नरेन्द्र’ उपनाम से काव्य सर्जना करते थे। आचार्य केशवदास इनके ही राज्याश्रित थे। इनके दरबार में ही रायप्रवीण अपनी कला का प्रदर्शन करती थी। जब मुग़ल सम्राट अकबर ने रायप्रवीण को अपने दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया तो वे विचलित हो गए थे क्योंकि रायप्रवीण से इनका प्रेम सम्बन्ध था। कविता के माध्यम से अपनी प्रेमिका रायप्रवीण की कमनीयता का चित्रण करते हुए उन्होंने लिखा था-
वह हेरनि अरु वह हँसनि, वह मधुरी मुसक्यानि।
वह खैंचनि भरसान की, हिय महँ खटकत आनि।।
रामकथा के तीन सर्वश्रेष्ठ गायक हुए हैं, ये हैं- महर्षि वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास और केशवदास। यह सुखद संयोग है कि तीनों की जन्मस्थली बुन्देलखण्ड रही है, किन्तु रेखांकित करने योग्य तथ्य यह है कि भारतीय और विश्व मनीषा ने महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास के कृतित्व को तो पर्याप्त सम्मान एवं यश दिया, किन्तु आचार्य केशवदास को इससे वंचित रखा, जो अत्यंत खेद की बात है। दुर्भाग्यवश उनका आचार्य रूप उनके कवि रूप पर भारी पड़ा और उनके कवित्व की शक्ति साहित्य संसार में उपेक्षा का शिकार हो गयी। यद्यपि यह भी सत्य है कि प्रारम्भ से ही विद्वानों ने आचार्य केशवदास को सूर और तुलसी के बाद हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकार किया है और यह लोक प्रचलित उक्ति इस बात का पुष्ट प्रमाण है-
‘सूर-सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास, बाकी कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकास।।’ किन्तु केशव की विद्वता और उनके आचार्यत्व के कारण उन्हें क्लिष्ट, कठिन काव्य का प्रेत, हृदयहीन कवि आदि अभिधान देकर साहित्य जगत से बहिष्कृत रखने की दुरभिसंधि उनके इस धरा से जाने के बाद से ही शुरू हो गयी थीं और उनके विरोधियों ने यह प्रचारित करना प्रारम्भ कर दिया- ‘कवि कौ देन न चहै बिदाई, पूछिए केसव की कविताई।’ इस प्रचलित उक्ति के यथातथ्य होने में मुझे भारी सन्देह है क्योंकि केशव जैसा कवि, जो स्वयं राजाओं के दरबार में रहा हो तथा अपने आश्रितों का कृपापात्र रहा हो, क्या उसकी कविता समझे बगैर उसके आश्रयदाता नरेश उसे सम्मान एवं धन-धान्य देते रहे होंगे; वह भी एक नहीं अनेक राजागण। जोधपुर नरेश महाराज चन्द्रसेन, ओरछा नरेश महाराज इन्द्रजीत सिंह, ओरछा नरेश महाराज वीरसिंह जूदेव तथा उनके बड़े भाई रामशाह, मेवाड़ नरेश राणा अमरसिंह जैसे केशव के आश्रयदाता नरेशों ने उनकी कविताओं को समझे बिना उन्हें इतना मान-सम्मान तो नहीं दिया होगा। सम्भवतः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भ्रमवश लिख बैठे-‘‘केशव को कवि हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता नहीं थी, जो एक कवि में होनी चाहिए।’’ अब उनके इस वक्तव्य से भला कैसे सहमत हुआ जा सकता है! बिना कवि हृदय पाए कोई कवि कैसे कई राजाओं का स्नेहभाजन हो सकता है। रसिकप्रिया का प्रणेता रसहीन कैसे? रसिकप्रिया में राधा के षोडश शृंगार वर्णन में वे लिखते हैं-
‘‘प्रथम सकल सुचि मंजन अमल बास,
जावक सुदेस केस-पास को सुधारिबो।
अंग राग भूषन बिबिध मुख-बास-राग,
कज्जल-कलित लोल लोचन निहारिबो।
उपर्युक्त पंक्तियों में शृंगार रस की छटा स्पष्ट है। यदि विनोदप्रियता रस सृजन की शर्त है तो प्रस्तुत है उनकी बहुप्रचलित-बहुसन्दर्भित पंक्तियाँ, जिनमें बाल सफेद हो जाने पर नवयुवतियों द्वारा उन्हें बाबा कहकर सम्बोधित करने पर व्यथित होकर उन्हें कहना पड़ा-
‘‘केशव केसन असि करी, जस अरिहू न कराय।
चन्द्र वदनि मृग लोचनी, बाबा कहि-कहि जांय।।’’
मूल गुसाईं चरित में वर्णित है कि जब केशवदास गोस्वामी तुलसीदास से मिलने हेतु गए तो तुलसीदास ने ‘प्राकृत कवि को आने दो’ कहकर उनका अपमान किया। इससे रुष्ट होकर वे वापस लौट गए और रामचन्द्रिका के प्रणयन के बाद तुलसीदास जी से मिले। इससे स्पष्ट है कि उनमें कितनी प्रचुर कवित्व शक्ति रही होगी। केशवदास को एक समर्थ आलोचक नहीं मिला, जो उनके कविकर्म की प्रवृत्तियों को सतत उद्घाटित करते हुए उन्हें उनके बहुप्रतीक्षित स्थान पर प्रतिष्ठित करता। दूसरी समस्या चिरप्राचीन काल से उनके सम्बन्ध में चले आ रहे क्लिष्टता भय और आचार्य शुक्ल द्वारा उन पर प्रश्नचिह्न लगाना था। यद्यपि छिटपुट तौर पर उन्हें स्थापित करने के प्रयत्न अवश्य हुए, जो सम्भवतः यथेष्ट नहीं थे।
राय प्रवीण बुन्देलखण्ड की सुविख्यात नर्त्तकी तथा काव्य-संगीत कला एवं छन्दशास्त्र में प्रवीण थीं। ये आचार्य केशवदास की कृपापात्र शिष्या तथा महाराज इन्द्रजीत की प्रिया एवं उनके दरबार की नृत्यांगना थीं। आचार्य केशवदास ने ‘कविप्रिया’ ग्रंथ का प्रणयन राय प्रवीण को काव्य कला का ज्ञान देने के उद्देश्य से किया था। रायप्रवीण ने ‘नायिका भूषण’ तथा ‘प्रवीण विनोद’ की रचना की । इन ग्रंथों में उन्होंने अपने गुरू की भाँति ही नायिका भेद तथा आलंकारिकता का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। रायप्रवीण की काव्य प्रतिभा, नृत्य कौशल एवं संगीत ज्ञान की चर्चा जब मुग़ल सम्राट तक पहुँची तो उसने रायप्रवीण को अपने दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया किन्तु अकबर ओरछा नरेश महाराज इन्द्रजीत के रायप्रवीण को भेजने से आनाकानी करने पर क्रुद्ध होकर उसने उन पर एक करोड़ का जुर्माना लगा दिया। तब आचार्य केशवदास रायप्रवीण को लेकर अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल के पास पहुँचे। बीरबल के कहने पर अकबर ने जुर्माना माफ कर दिया, लेकिन राय प्रवीण को दरबार में उपस्थित किए जाने को कहा। कहा जाता है कि अकबर ने रायप्रवीण से जो प्रश्न किए, जिनका उत्तर रायप्रवीण ने कविताओं में ही दिया। माना जाता है कि जब अकबर उन पर आसक्त हुआ तो उन्होंने इन पंक्तियों से न सिर्फ अपनी लाज बचाई, अपितु अकबर को भी पानी-पानी कर दिया-
‘‘बिनती राय प्रबीन की, सुनिए साह सुजान।
जूठी पातर भखत है, बारी, बायस, स्वान।’’
बालकृष्ण मिश्र महाकवि बलभद्र मिश्र के पुत्र तथा आचार्य केशवदास के भतीजे थे। काव्य सृजन उन्हें दाय में प्राप्त हुआ था। आपने ‘रसचन्द्रिका’ ग्रंथ की रचना की थी। आपका रचना काल सन 1615 ई. के आसपास था। शिवसिंह सरोज तथा मिश्र बन्धु ने इन्हें मिश्र महाकवि बलभद्र मिश्र का पुत्र तथा आचार्य केशवदास का भतीजा तो माना है किन्तु इनका नाम बालकृष्ण त्रिपाठी लिखा है, जो सम्यक नहीं प्रतीत होता। ओरछा में जन्मे ‘प्रताप हजारा’ के रचयिता खेमराज ने इस ग्रंथ के माध्यम से राजा रुद्रप्रताप के नौ पुत्रों का वर्णन किया है। इस ग्रंथ में उनकी शृंगारवृत्ति भी देखी जा सकती है|
ओरछा नरेश महाराज मधुकरशाह के राजगुरू पण्डित हरिराम शुक्ल ‘व्यास’ जी श्रेष्ठ कवि थे। इनका जन्म ओरछा में हुआ था। मिश्र व्यास जी पहले गौड़ सम्प्रदाय में दीक्षित थे किन्तु कालान्तर में हित हरिवंश के शिष्य होकर राधावल्लभी सम्प्रदाय में दीक्षित हो गए थे। नाभादास ने भक्तमाल में उनके ग्रंथ ‘रास रसिक’ को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना है। रास पंचाध्यायी मूलतः भागवत पुराण के दशम स्कंध के उन्तीसवें से लेकर तैंतीसवें अध्याय तक के पाँच अध्यायों को कहते हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन है। सूरदास, नन्ददास और रहीम की भांति आपने भी ‘रासपंचाध्यायी’ का आधार लिया है किन्तु उनकी रासपंचाध्यायी की साखियों में अपेक्षाकृत मौलिकता है तथा अंधानुकरण की प्रवृत्ति न होकर उनके समाज सुधारक एवं उपदेशक रूप के भी दर्शन होते हैं। 
श्री मित्रमिश्र ओरछेश राजा वीरसिंह जूदेव के आश्रित थे। उन्होंने काव्य तथा काव्येतर विधाओं में समान रूप से लेखनी चलाई। आनंदकंद चम्पू काव्य उनकी साहित्यिक मेधा का सुफल है।परमेश बंदीजन केशवदास के समकालीन थे। आपका श्रृंगार वर्णन अत्यंत उत्कृष्ट है।
महाकवि हरिसेवक मिश्र जी ओरछा नरेश महाराज उदैत सिंह के दरबार में रहकर कविता करते थे। ‘कामरूप’ महाकाव्य में इन्होंने राजकुमार कामरूप तथा उनके छह मित्रों की सिंहल द्वीप यात्रा का वर्णन किया है तथा ऋतु, रस चित्रण, वन, नगर, जीव-जन्तु, स्वयंवर आदि का रोचक चित्रांकन किया है। 
पण्डित श्रीकृष्ण कवि का जन्म ओरछा में लगभग 1760 ई. में हुआ था। ये भी ओरछा नरेश महाराज उदोत सिंह के आश्रित थे। इन्होंने यूँ तो ‘धर्मसंवाद’ तथा ‘विदुर प्रजागर’ ग्रंथ लिखे हैं परन्तु इनकी कीर्ति का मुख्य आधार कविवर बिहारी की ‘बिहारी सतसई’ की टीका है। बिहारी के एक प्रसिद्ध दोहे का उनके द्वारा सवैया में किया गया रूपांतर दर्शनीय है-
‘‘सीस मुकुट करि काछनी, कर मुरली उर माल।
यह बानिक मो मन सदा, बसौ बिहारीलाल। (दोहा-बिहारीलाल) 
छवि सों कवि सीस किरीट, बन्यौं रुचिमाल हिए वनमाल लसै।
कर कंजहि मंजुर ली मुरली, कछनी कटि चारु प्रभा बरसै। 
कवि कृष्ण कहैं लखि सुन्दर मूरति यों अभिलाष हिये सरसै।
वह नंदकिशोर बिहारी सदा यहि बानिक मोहिय मांझ बसै।’’ (सवैया- श्रीकृष्ण कवि)
दूलहराय कवि का जन्म ओरछा में लगभग सन 1710 ई. में हुआ था। आपने श्रीमद्भगवद्गीता का पद्यानुवाद किया है, जिसका एक अंश निम्नलिखित है-
‘‘मैं ही बलिवंतु मैं ही बलनुकौ अंत मैं ही, कामना को मद मैं ही सर्व मद धारौ हौं।
मैं राजस कौ रूप मैं ही तामस तामस सरूप मैं ही, सात्विक अनूप मैं ही गुनिन अधारौ हौं।
हीरालाल प्रधान सम्भवतः जनमानस के कवि थे और उन्हें कहीं राज्याश्रय प्राप्त नहीं था। आपने ‘श्री नासिकेत की कथा’ तथा ‘सत्यमंजरी’ काव्य ग्रंथ लिखे हैं, जो क्रमशः नासिकेतोपाख्यान तथा चार सत्यव्रती राजाओं की कथाओं पर आधारित हैं
पन्ना नरेश महाराज छत्रसाल काव्यगुणग्राहक थे। वीरता एवं ओज की साकार विभूति, राष्ट्रीयता के आग्रही कवि शिरोमणि भूषण उनके दरबार में थे। भूषण की काव्य प्रतिभा आश्रयदाता की झूठी प्रशंसा पर आधारित नहीं थी, वरन उसमें राष्ट्र के कल्याण हेतु सक्षम-समर्थ पौरुष बल से युक्त व्यक्तित्व को अपनाने का भाव था, इसीलिए उन्होंने लिखा था-
‘‘राजत अखण्ड तेज छाजत सुजस बड़ो,
गजत गयंद दिग्गंजन हिय साल को।
जहिके प्रताप से मलीन आफताब होत,
ताप तजि दुजन करत बहु ख्याल को।
साज-सजि गज तुरी पैदर कतार दीन्हीं,
‘भूषन’ भनत ऐसी दीन प्रतिपाल को।
श्रीराव राजा एक मन में न ल्याऊँ मैं, 
सिवा कौ सराहौं, के सराहौं छत्रसाल को।’’
पन्ना नरेश छत्रसाल स्वयं भी कवि थे। उनकी कविता का एक उदाहरण दृष्ट्रव्य है, जिसमें वे श्रीकृष्ण से अभ्यर्थना करते हुए स्वयं का भी परिचय दे देते हैं-
‘‘तुम घनश्याम हम जाचक मयूर मत, तुम शुचि स्वाति हम चातक तुम्हारे हैं।
चारु चन्द्र प्यारे तुम लोचन चकोर मोर, तुम जग तारे हम छतारे उचारे हैं।
‘छत्रसाल’ मीत मित्रजा के तुम ब्रजराज, हमहँ कलिंदजा के कूल पै पुकारे हैं।
तुम गिरिधारी हम कृष्ण व्रतधारी, तुम दनुज प्रहारे, हम यवनप्रहारे हैं। 
लाल कवि महाराज छत्रसाल के आश्रित थे। इनका पूरा नाम गोरेलाल पुरोहित था। इन्होंने महाराज छत्रसाल के जीवन पर आधारित ‘छत्रप्रकाश’ ग्रंथ लिखा है। इनके अन्य ग्रंथों में ‘विष्णु विलास’ तथा ‘राज-विनोद’ के नाम लिए जाते हैं। उनकी कवित्व शक्ति का एक उदाहरण दृष्ट्रव्य है-
‘‘बड़भाग सुहाग भरी पिय सों, लहि फागुन में राग न गायो करै।
कवि ‘लाल’ गुलाल की धूँधर में, चख चंचल चारु चलायो करै।
उझकै झिझकै झहराय झुकै, सखि मण्डल को मन भायो करै।
छतियाँ पर रंग परे तेतिया, रति रंग ते रंग सवायो करै।’’
बख्तबली महाचार्य ने चम्पतराय के युद्धों का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है तो उनके पुत्र भानुभ ने महाराज छत्रसाल की प्रशस्ति करते हुए उनके शौर्य के चित्र अंकित किए हैं। सागर के सुवेश कायस्थ ने ‘हितोपदेश’ तथा ‘मित्रमिलाप’ काव्य गंथों का प्रणयन किया। दतिया के रोहुँड़ा ग्राम के हरिकेश की ‘जगतसिंह दिग्विजय’ में बुन्देलखण्ड का इतिहास मिलता है।  चरखारी के प्रतापसाहि रतनेस वंदीजन के पुत्र माने जाते हैं। इनके शृंगार निरूपण तथा बिम्ब अंकन की मौलिकता के कारण इन्हें दूसरा पद्माकर कहा जाता है। कृष्णकवि, गोपकवि, रसनिधि तथा उनके दरबारी कवि रूपनारायण मिश्र, दतिया के खण्डनकायस्थ, कवीन्द्र ज्ञानी जू, गुमान मिश्र, बोधा, दामोदर, देव, ठाकुर, पन्ना के पजनेस, गदाधर भट्ट, ललितपुर के सरदार कवि, पन्ना के भगवंत कवि, छतरपुर के गंगाधर व्यास, चरखारी के ख्यालीराम, रूपसाहि, मंचित, महाराज उदैत सिंह, दतिया के जागीरदार, कालपी के श्रीपति, पद्माकर के पिता मोहन भट्ट इत्यादि का भी प्रदेय स्तुत्य है। 
पद्माकर अपनी फागों तथा नैसर्गिक सौन्दर्य के प्रभावशाली चित्रण के लिए विख्यात हैं। उन्होंने बुन्देली समाज को शृंगार की चाशनी में डुबोकर ऐसा परोसा कि जनमानस उनकी लेखनी के समक्ष नतमस्तक हो गया। ‘जगतविनोद’, पद्माभरण’, ‘प्रबोध पचासा’ तथा ‘गंगालहरी’ इनकी कृतियाँ मानी जाती हैं। इनके फाग का एक उदाहरण देखिए-
‘‘फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविन्दै लै गयी भीतर गोरी।
भाय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।
छीन पितम्बर कंमरतें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कह्यौ मुसक्याइ, लला! फिर खेलन आइयो होरी।
रीतिमुक्त कवि बोधा रीतिकाल के विख्यात कवि थे। ये तुलसी की जन्मस्थली माने जाने वाले राजापुर के निवासी थे। इनका मूल नाम बुद्धिसेन था। ये सुभान नामक वेश्या पर आसक्त थे। इनके दो ग्रंथ ‘इश्कनामा’ तथा ‘विरहवारीश’ ज्ञात हैं। विरहवारीश ग्रंथ इसी के वियोग में इन्होंने लिखा था। इनकी एक कविता निम्नांकित है-
‘‘अति छीन मृनाल के तारहुते, तेहि ऊपर पाँव दैआवनो है।
सुई बेहते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है।
कवि ‘बोधा’ अनी घनी जेजहुते, चढ़ि तापे न चित्त डरावनो है।
यह प्रेम को पंथ कराल महा, तरवारि की धार पैधावनो है।’’
इस दौर में गोविन्द स्वामी, तानसेन,मनसाराम सिद्ध, सुन्दरदास, शिवलाल  मिश्र, प्रभृति कवियों ने राम तथा कृष्ण भक्ति की ऐसी काव्यधारा की सृष्टि की कि समस्त हिन्दी भूभाग इसमें रससिक्त हो उठा।
सत्रहवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक की शती राष्ट्रीयता की उद्दाम भावना को समर्पित रही है, किन्तु फिर भी इस दौरान भक्ति की एक समांतर धारा भी बह रही थी, जिसके अन्तर्गत सगुण भक्ति में महामति प्राणनाथ, निर्गुण भक्ति में अक्षर अनन्य, प्रेममार्गी काव्य परम्परा में हरिसेवक मिश्र, श्रृंगार काव्य में पृथ्वी सिंह रसनिधि, कृष्ण भक्ति की वात्सल्य युक्त काव्य धारा में बख्शी हंसराज सृजन कर रहे थे। इस युग में कृष्ण कवि, खण्डन कायस्थ, कारे कवि, गुमान मिश्र, बोधा आदि भी काव्य कर्म मे निरत थे।
अठारहवीं शताब्दी से 1950 विक्रमी तक का 150 वर्ष का समय श्रृंगारकाल का माना जाना चाहिये। इस काल के सर्वोकृष्ट कवि पद्माकर थे, जिन्होंने राजदरबार के जीवन और रहन-सहन के साथ-साथ लोक जीवन के रंग भी अपनी कविताओं में उकेरे हैं। इसी काल में खुमान कवि, ठाकुर, रूपसाहि, दामोदर देव, पजनेस, नवल सिंह कायस्थ, ईसुरी प्रभृति कवियों ने श्रृंगार के विविध पक्षों का निरूपण किया है।
बुन्देली के कवियों में ईश्वरी प्रसाद उर्फ ‘ईसुरी’ अग्रगण्य हैं। उनकी फागों ने देश काल की सीमा का अतिक्रमण करते हुए अपनी पहचान बनायी है। उनकी फाग का एक उदाहरण देखिए-
‘‘हम पै बैरिन बरसा आयी, हमें बचा लेव माई।
चड़के अटा घटा न देखें, पटा देव अँगड़ाई।
बारादरी दौरियन में हो, पवन न जावें पायी।
जे द्रुम कटा छटा फुलबगिया, हटा देव हरियाई।
पियजस गाव सुनाऔ‘ईसुर’, जो जिय चाव भलाई।’’
बुन्देली के अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों में अक्षर अनन्य, मदनमोहन द्विवेदी‘मदनेश’, ख्यालीराम, गंगाधर व्यास, नाथूराम माहौर, भगवान दास माहौर, रामचरण हयारण ‘मित्र’, हरि प्रसाद ‘हरि’, गौरीशंकर द्विवेदी ‘शंकर’, भैयालाल व्यास ‘विंध्य कोकिल’, डॉ. किशोरीलाल गुप्त, महाकवि अवधेश, डॉ. मोहनलाल गुप्त ‘चातक’, गौरीशंकर उपाध्याय ‘सरल’, लक्ष्मीनारायण वत्स, चोखेलाल वर्मा ‘निर्मल’, सुन्दरलाल द्विवेदी ‘मधुकर’, शील चतुर्वेदी, प्रो. ओमशंकर अत्रि, मदन मानव, अशोक बुन्देली, ओमप्रकाश हयारण ‘दर्द’, ओमप्रकाश सक्सेना ‘प्रकाश’, कन्हैयालाल ‘कलश’ आदि उल्लेखनीय हैं। 
उपर्युक्त विवेचन से सुस्पष्ट है कि बुन्देली की काव्य धारा की धरा से ऐसे नर रत्न प्रसवित हुए हैं, जिनकी रचनाओं ने संपूर्ण मानवता को स्पंदित किया है| दुर्भाग्य की बात यह रही है कि हिन्दी साहित्य में बुन्देलखण्ड अञ्चल के भक्ति काल से रीति काल तक के समस्त साहित्य को बुन्देली के स्थान पर ब्रज काव्य कहकर यहाँ की सम्पूर्ण साहित्यिक विरासत को शून्य करने का कार्य अभी तक हुआ है, जिससे बुन्देली के अमर कवि रत्न ब्रज के फुटकर काव्य खाते में जाकर अपनी पहचान खो चुके हैं, जो अत्यंत चिंताजनक और दुखद है|

प्रो पुनीत बिसारिया
आचार्य एवं पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी
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5 टिप्पणी

  1. बहुत बहुत बधाई सर इस आलेख के लिए। सचमुच बुंदेलखंड की धरती वीर प्रसू तो.है ही साहित्य और संस्कृति का केंद्र भी हैं।मैं बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी की छात्रा रही हूं।हमीरपुर में छह वर्ष रहने का सौभाग्य भी निला है।बहुत से.साहित्यकारों और कवियों को पढने और सुनने का अवसर भीमिला।उस समय फूलन देवी सक्रिय थी और वातावरण में भय व्याप्त रहता था,फिर भी साहित्य की धारा कभी मंद महीं हुई। भूषण,केवल पद्माकर तुलसी से लेकर मंजुल मयंक, रामस्वरूप खरे आदि रचनाकार जाने और सुने गये। वीरगाथातमक गीत नृत्य आदि की समृद्ध परंपरा रही है।बहुत ही अच्छा लगा यह आलेख पढकर। हार्दिक बधाई सर,शुभ कामनाए।

  2. विस्तृत विवरण तो नहीं, इसे संपूर्ण विवरण कहूंगा।
    आपने शेष कुछ भी नहीं छोड़ा है एक ज्ञानवर्धक और स्मरणीय लेख के लिए आपका बहुत बहुत साधुवाद।

  3. अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी आलेख। विस्तृत जानकारी पढ़कर अच्छा लगा। साधुवाद

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