1 अक्टूबर 1919 की भोर में, उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की गीली गीली ज़मीन और संकरे रास्तों के बीच, एक छोटी सी जिंदगानी ने अपनी आँखें खोली। ये वही जन्म-जगह थी जहाँ एक दिन मजरूह सुल्तानपुरी नाम का सूरज उगने वाला था — शायरी और अदब की उस दुनिया में, जहाँ शब्दों से दिलों को जीता जाता है।
उनका असली नाम असरारुल हसन ख़ान था। उनका ताल्लुक एक ऐसे मुस्लिम राजपूत परिवार से था जिसे ‘ख़ानजादा’ कहा जाता था — वे लोग जो पहले राजपूत हुआ करते थे और बाद में इस्लाम में दाख़िल हुए। इनकी वंश परंपरा में जमींदारी और जागीरदारी शुमार थी। एक संभ्रांत खानदान से आने वाले असरारुल हसन के लिए अदब की राह उतनी आसान नहीं थी जितनी लगती है, क्योंकि उनके पिता पुलिस महकमे में कार्यरत थे, और आधुनिक अंग्रेज़ी शिक्षा के सख़्त विरोधी थे।
पिता की ये कट्टरता इसलिए भी थी कि वे चाहते थे कि बेटा कोई प्रतिष्ठित और परंपरागत पेशा अपनाए — कोई ऐसा रास्ता जिसमें समाजिक इज्ज़त, आर्थिक स्थिरता और शुद्धता हो। लिहाज़ा, मजरूह को मदरसे भेजा गया, जहाँ उन्होंने ‘दार्स-ए-निज़ामी’ के पाठ्यक्रम के तहत अरबी और फारसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। सात साल की तालीम ने उन्हें इस्लामी साहित्य, धर्मशास्त्र और भाषाई परिपक्वता से सुसज्जित कर दिया। बाद के दिनों में जब वे शायरी की दुनिया में उतरे, तो उनकी कलम में अरबी और फारसी की गूँज गूंजती रही।
अरबी-फारसी की शिक्षा के बाद मजरूह ने लखनऊ के तकमील-उत-तिब कॉलेज से यूनानी चिकित्सा (हिकमत) की पढ़ाई की। और यहीं से शुरू हुआ उनके जीवन का दूसरा अध्याय — हकीम मजरूह सुल्तानपुरी का। वैद्य (हकीम) बनकर वे पेशेवर दुनिया में उतरे, जहाँ रोज़ का काम रोगियों की नब्ज़ टटोलना, औषधियों की पहचान करना और यूनानी ग्रंथों से इलाज निकालना था। यह पेशा उन्हें समाज में इज्ज़त देता था, लेकिन उनके भीतर कुछ और ही उबल रहा था — एक बेचैन आत्मा जो काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ों से दुनिया रचने को बेताब थी।
हकीमी करते हुए भी उनके भीतर का शायर चुप नहीं था। उनकी कल्पना, उनकी भाषा, उनके भीतर जमा तालीम — सब उन्हें शायरी की ओर खींच रहे थे। वे अक्सर अपने नुस्खों के बीच में शेर बुनते रहते, और जब समय मिलता, तो मुशायरों में शरीक हो जाते। वहाँ जब वे अपनी नज़्में और ग़ज़लें पढ़ते, तो श्रोता स्तब्ध रह जाते। एक हकीम की ज़ुबान से ऐसे जज़्बाती और तरल शब्दों का निकलना, लोगों के लिए हैरत का सबब बन जाता।
उनकी यह दोहरी ज़िंदगी — दिन में वैद्य, रात में शायर — बहुत दिनों तक एक साथ नहीं चल सकी। जल्द ही, शायरी का सुर उनकी रगों में इतनी तेज़ी से दौड़ने लगा कि हकीमी का पेशा उन्हें बंधन सा लगने लगा। तभी एक दिन, एक ऐसा मोड़ आया, जिसने मजरूह के भविष्य की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
वो मोड़ था: जिगर मुरादाबादी से उनकी भेंट।
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सुल्तानपुर की गलियों से निकलकर जब मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने दिल के भीतर गूंजते हुए शब्दों को काग़ज़ पर उतारना शुरू किया, तब उन्हें शायद खुद भी यह अंदाज़ा नहीं था कि वे एक दिन उस शहर की ओर बढ़ने वाले हैं, जो न सिर्फ़ सपनों का ताजमहल है, बल्कि जहां शेर भी सुर में ढल जाते हैं। लेकिन इससे पहले कि वे मुंबई की रंगीन, तेज़ रफ्तार और छलछलाती दुनिया में प्रवेश करें, उन्हें एक व्यक्ति से मिलना था—जिसे आज भी उर्दू शायरी का मसीहा कहा जाता है। नाम था: जिगर मुरादाबादी।
यह कोई साधारण मुलाकात नहीं थी। यह एक जलते हुए चिराग़ का दूसरे चिराग़ से रौशनी मांगना नहीं, बल्कि दो शोले का मिलना था, जो आगे चलकर आग बन गया। मजरूह ने लखनऊ के एक मुशायरे में अपनी नज़्म पढ़ी—कविता नहीं, जज़्बात की बौछार, तजुर्बों की रुलाई, और ज़मीर की चिल्लाहट। श्रोताओं के बीच बैठे जिगर मुरादाबादी की आंखों में चमक दौड़ गई। वे उठे, मंच तक पहुंचे, और मजरूह से कहा, “तुम मेरे साथ चलो।” यह वह पल था जब हकीम असरारुल हसन, मजरूह सुल्तानपुरी में पूरी तरह तब्दील हो गया।
जिगर मुरादाबादी का साथ मजरूह के लिए केवल शायरी की शिक्षा नहीं था, बल्कि यह एक आंदोलन में प्रवेश था। यह आंदोलन था—तरक्की पसंद तहरीक का। मजरूह अब ग़ज़लों में केवल इश्क़ की महक नहीं बिखेरते थे, बल्कि समाज की बदबू, सियासत की साज़िश, और मेहनतकशों के दर्द को अल्फ़ाज़ देते थे। वे अब एक कवि नहीं, बल्कि एक आंदोलन के सिपाही बन चुके थे। उनकी कलम इंक़लाब की आवाज़ बन गई थी।
फिर आया वह दौर जब मजरूह ने हकीमी की किताबें बंद कर दीं और शेर-ओ-सुखन की महफिलों में अपने लहजे से श्रोताओं को दीवाना बनाने लगे। दिल्ली, लखनऊ और इलाहाबाद के मुशायरों में जब वे मंच पर आते, तो भीड़ की सांसें थम जातीं। “मजरूह आ रहे हैं…” यह एक घोषणा होती थी, जैसे कोई इमाम मस्जिद में दाख़िल हो रहा हो, जैसे कोई सरदार मैदान में उतर रहा हो।
लेकिन दिल की गहराई में कहीं न कहीं एक कसक अब भी थी—अपना शहर छोड़कर दूसरे शहरों की ठंडी गर्मी में जीना। एक दिन, एक मुशायरे में भाग लेने मजरूह बंबई पहुंचे। वह कोई आम शाम नहीं थी। शेर पढ़ते ही ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे वक़्त भी सुन रहा हो। तालियाँ बजीं, लेकिन उनमें सिर्फ़ प्रशंसा नहीं थी—उसमें एक निमंत्रण था, एक बुलावा।
इस मुशायरे में मशहूर फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार और संगीतकार नौशाद भी मौजूद थे। उन्होंने मजरूह को रोका और कहा—“आपकी शायरी फिल्मी गीतों को साहित्यिक बना सकती है। क्या आप हमारी फिल्म ‘शाहजहाँ’ के लिए गीत लिखेंगे?” मजरूह चौंके। वे अब भी फिल्म को हल्का साहित्य मानते थे। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन जिगर मुरादाबादी से जब यह बात कही गई, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कहा, “अगर इश्क़ को परवान चढ़ाना है, तो इज़हार ज़रूरी है। और फिल्में, इज़हार का सबसे बड़ा मंच हैं।”
जिगर के कहने पर मजरूह ने अंततः हामी भर दी। और फिर जो लिखा, उसने फिल्मी गीतों की दुनिया ही बदल दी। उनका पहला गीत—“जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे…”—के.एल. सहगल की आवाज़ में अमर हो गया। यह गीत न केवल मजरूह की दस्तक था, बल्कि साहित्य का उस दुनिया में प्रवेश था, जिसे अब तक केवल मनोरंजन समझा जाता था।
इसके बाद तो जैसे क़िस्मत ने उनके लिए रास्ते खोल दिए। नौशाद ने उन्हें अपनी धुन सुनाई और मजरूह ने लिखा। यह गीत नौशाद को इतना पसंद आया कि उन्होंने कहा, “अब तुम मेरी अगली फिल्म के स्थायी गीतकार हो।”
मजरूह की लेखनी अब परवाज़ पर थी। एक के बाद एक फिल्में, एक के बाद एक नग़मे, और हर नग़मे में एक आत्मा। उन्होंने गीतों को ज़ुबान दी, और ज़ुबान को ज़मीर। वे प्रेम की मिठास भी लिखते थे और विद्रोह की तल्ख़ी भी। उनके गीतों में मासूम मोहब्बत थी, वहीं इंसानी पैग़ाम भी।
मुंबई अब सिर्फ़ एक शहर नहीं था, वह मजरूह की तक़दीर का दरवाज़ा बन चुकी थी। लेकिन इस दरवाज़े के उस पार भी संघर्ष था, सवाल थे, और सत्ता से टकराने का साहस भी। आगे चलकर यही साहस उन्हें जेल तक ले गया, जब उन्होंने सरकार विरोधी नज़्म पढ़ी और माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया। लेकिन वह एक और अध्याय है—उस पर फिर कभी।
यहाँ इतना जान लेना ही काफ़ी है कि मजरूह अब वह नाम बन चुका था जो शायरी में विद्रोह की तासीर भरता था और गीतों में मोहब्बत की रूह। वह एक वैद्य था, जिसने इलाज के लिए नब्ज़ नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को चुना था। वह एक शायर था, जिसने शब्दों से मुल्क को आईना दिखाया और संगीत को आत्मा दी। वह मजरूह था—सुल्तानपुर का, लेकिन अब पूरे हिंदुस्तान का।
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मुंबई की गलियों में मजरूह सुल्तानपुरी अब केवल एक नाम नहीं, एक दस्तख़त बन चुके थे। जिस गीत ने उन्हें सिनेमा की दुनिया में पहचान दिलाई थी—”जब दिल ही टूट गया…”—उसकी गूंज स्टूडियो से निकलकर महफिलों तक पहुंच चुकी थी। लेकिन मजरूह का गीतकार होना ही उनका पूरा परिचय नहीं था। वे अब भी भीतर से वही शायर थे जिसने समाज की बेड़ियों को महसूस किया था, और जिसकी कलम सियासत के झूठ को बेनकाब करने से नहीं हिचकती थी।
1949 का साल। भारत आज़ाद हो चुका था लेकिन समाज के कई हिस्से अब भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थे—भूख, बेरोज़गारी, भेदभाव, और सत्ता की असंवेदनशीलता। मजरूह ने एक नज़्म लिखी, पढ़ी और फिर वही हुआ जिसका डर था। यह नज़्म न केवल वर्ग-संघर्ष की आवाज़ थी, बल्कि सत्ता की नींव पर भी सवाल थी। इसे ‘राष्ट्रविरोधी’ घोषित कर दिया गया। मोरारजी देसाई, जो उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री थे, उन्होंने आदेश दिया—मजरूह को गिरफ्तार किया जाए।
उन्हें ऑर्थर रोड जेल भेज दिया गया। जेल—जहाँ लोहे की सलाखें थीं, दीवारें थीं, लेकिन कल्पना की उड़ानों को कोई रोक न सका। सरकार ने प्रस्ताव रखा: “माफ़ीनामा लिखिए, रिहा कर देंगे।” मजरूह ने कहा, “कलम ने जो कहा है, मैं उसके पीछे हूँ। माफ़ी मांगना मेरे ज़मीर की मौत होगी।”
दो साल। पूरे दो साल उन्होंने सलाखों के पीछे बिताए। जहाँ ज़मीन ठंडी थी और दीवारें गूँगी। लेकिन मजरूह की कलम गूंगी नहीं हुई। वह और धारदार हो गई। उसी जेल में उन्होंने गीत लिखा—”इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल…”। यह गीत बाद में राज कपूर की फिल्म ‘धरम करम’ में इस्तेमाल हुआ और अमर हो गया। यह केवल एक गीत नहीं था, बल्कि उन दो वर्षों की तपस्या का फल था, जब एक शायर ने सत्ता के आगे झुकने से इनकार कर दिया था।
राज कपूर जैसे मित्रों ने मदद की पेशकश की। मजरूह ने साफ़ कह दिया—”मैं मदद के लिए गीत नहीं लिखता। अगर कुछ लिखूंगा, तो मेरी आत्मा की आवाज़ होगी।” राज कपूर ने इसे समझा और बिना शर्त उन्हें अपनी फिल्म के लिए लिखने का न्योता दिया। यह दोस्ती का ऐसा रिश्ता था जो बिना दया, बिना एहसान, केवल सम्मान पर आधारित था।
मजरूह के कारावास का यह अध्याय सिर्फ़ एक विरोध नहीं था, यह भारतीय साहित्य में एक मिसाल बन गया। आज़ादी के बाद बहुत कम लेखक ऐसे थे जिन्होंने विचारों की आज़ादी की इतनी भारी क़ीमत चुकाई। और मजरूह ने यह कीमत गर्व के साथ अदा की।
उनकी इस बेबाकी ने उन्हें जनता के और भी करीब ला दिया। अब वे सिर्फ़ शायर या गीतकार नहीं रहे—वे आवाज़ बन गए, उम्मीद बन गए। उनके शेर अब महज़ ग़ज़लों का हिस्सा नहीं थे, बल्कि आंदोलन का नारा बन चुके थे।
“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग आते गए और कारवां बनता गया।”
यह शेर उन्होंने सिर्फ़ शायरी के लिए नहीं लिखा था। यह उनके जीवन का सार था। वे अकेले चले थे, लेकिन लाखों दिलों में जगह बना ली थी। उनका कारवां अब हिंदुस्तान की गली-गली में गूंज रहा था।
कारावास ने मजरूह को तोड़ने की बजाय और मजबूत कर दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि सच्चा साहित्य वो है जो समय की कसौटी पर खरा उतरे। उन्होंने यह भी दिखा दिया कि फिल्मी गीतों में भी वह ताक़त होती है जो सत्ता से टकरा सकती है, जो चेतना जगा सकती है।
यह अध्याय एक उदाहरण है—कि कैसे एक शायर अपने शब्दों से सलाखों को पिघला सकता है, और कैसे एक गीत समय के सीने पर लिखी हुई सच्चाई बन सकता है।
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कारावास की दीवारों से निकलकर जब मजरूह सुल्तानपुरी दोबारा मुंबई लौटे, तो वे पहले से कहीं अधिक परिपक्व, धारदार और जनमानस से जुड़े हुए बन चुके थे। अब वे न सिर्फ़ गीतकार थे, बल्कि एक विचारधारा बन चुके थे। जेल की सलाखों ने उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की थी, मगर वे लौह-शब्द बनकर लौटे थे। उनकी लेखनी में अब केवल प्रेम नहीं, प्रतिरोध भी था; केवल मोहब्बत नहीं, मुहिम भी थी।
1950 के दशक का हिंदी सिनेमा एक संक्रमणकाल से गुजर रहा था—जहाँ क्लासिकल धुनें नई लहरों से मिल रही थीं, और गीत केवल सुरों की सजावट नहीं रहे, बल्कि सामाजिक विमर्श का औज़ार बनने लगे थे। इस दौर में मजरूह ने वो किया जो शायद ही किसी गीतकार ने किया हो—उन्होंने कविता को नाचते हुए सुरों में बदल दिया, और सुरों को सामाजिक चेतना से जोड़ दिया।
फिल्म ‘फुटपाथ’ (1953) का गीत “शहर में चाँद निकला” एक ऐसा ही उदाहरण था। यहाँ चाँद महज़ रूमानी प्रतीक नहीं था, बल्कि शहर की आशाओं और आम आदमी के संघर्ष का प्रतिनिधि बन गया था। वहीं ‘आरपार’ (1954) के गीतों ने मजरूह को एक बार फिर मुख्यधारा में स्थापित किया। उनका अंदाज़ नया था, भाषा आम आदमी की थी, मगर प्रभाव अद्वितीय था।
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1960–70 के दशक के दशक में जब दुनिया की राजनीति करवटें बदल रही थी, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अपने चरम पर था। यह समय था जब भाषणों से ज्यादा असर शेरों और नज़्मों का होता था। ऐसे ही एक मुशायरे में, जो कनाडा में आयोजित हुआ था, दुनिया भर से आए नामचीन शायरों की महफ़िल सजी। एक ओर थे पाकिस्तान के मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़, और दूसरी ओर हिंदुस्तान के गौरव – मजरूह सुल्तानपुरी। यह वही दौर था जब शब्दों का असर गोलियों से भी अधिक होता था।
फैज़ अहमद फैज़ ने मंच से जब अपनी बात कही, तो उसमें भारत की वर्तमान स्थिति पर कुछ तीखे तंज थे। वह शायराना अंदाज़ में था, पर उसकी धार राजनीतिक थी। समूचा सभागार शांति से सुन रहा था, लेकिन एक भारतीय शायर की आत्मा में खलबली मच चुकी थी। वह थे – मजरूह सुल्तानपुरी। उन्होंने माइक थामा, न कोई शोर, न कोई गुस्सा, बस संयम के साथ अपनी बात कहनी शुरू की:
“अभी जिस भारत के हालात पर फैज़ साहब रोशनी डाल रहे थे, मैं वहीं का हूं। मैं अपने भारत के बारे में फक़्र के साथ कहता हूं कि यह चश्मा जो मेरी आंख पर है, भारत का बना हुआ है। मेरे जिस्म पर मबलूस शेरवानी, कुर्ता और पायजामा का कपड़ा भारत में ही बना है। मेरा कलम, मेरा मोजा और जूता भारत का ही बना हुआ है।”
सन्नाटा छा गया। लेकिन मजरूह रुके नहीं। उन्होंने आगे कहा:
“फैज़ साहब के पाकिस्तान का आलम यह है कि उनकी पैंट-शर्ट का कपड़ा जर्मन का बना है तो चश्मा इंग्लैंड का। कलम अमेरिकी है तो जूता जापान का है। अगर ये सारे देश अपनी-अपनी चीज़ें वापस ले लें तो फैज़ साहब की क्या हालत होगी, आप हज़रात महसूस कर सकते हैं।”
इस कटाक्ष में व्यंग्य था, हास्य था, और गहरी देशभक्ति भी। यह सिर्फ़ एक जवाब नहीं था, यह उस आत्मसम्मान की परिभाषा थी जो मजरूह जैसे शायर के लहू में बहता था। उस शाम न तो राजनीति जीती, न ही राष्ट्रवाद की कोई गूँज मंच से उतर कर नारे बनी। उस रात सिर्फ़ शायरी जीती – और उसकी अस्मिता।
इस किस्से के बाद मजरूह की पहचान सिर्फ़ एक गीतकार या कवि तक सीमित नहीं रही। वे राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक बन गए। उनके भीतर की आवाज़ अब महज़ कलात्मक नहीं रही, उसमें देश की आत्मा की गूंज थी। वे जब लिखते तो लगता जैसे कोई सदी बोल रही हो।
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उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा साहित्यकार न सीमाओं में बंधता है, न सत्ता के सम्मानों में। वह तो केवल सत्य, सौंदर्य और स्वाभिमान की तलाश करता है। मजरूह ने यह तलाश कभी छोड़ी नहीं।
जहाँ एक ओर उन्होंने मोहब्बत के नगमे लिखे – “रहे न रहे हम महका करेंगे,” वहीं दूसरी ओर ऐसे गीत भी लिखे जो ज़िंदगी की विडंबनाओं को उजागर करते थे – “देख लिया मैंने, किस्मत का तमाशा देख लिया।”
उनका शब्दों पर अधिकार, मंच की गरिमा, और देश के प्रति समर्पण उन्हें शायरों की भीड़ से अलग करता था। वे उस परंपरा के वाहक थे जो केवल प्रेम नहीं, आत्मसम्मान का भी इज़हार करती है। उन्होंने कभी भी अपने विचारों से समझौता नहीं किया। न सत्ता से, न भीड़ से, न किसी सीमारेखा से।
और शायद यही कारण है कि मजरूह सुल्तानपुरी सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक मुकम्मल व्यक्तित्व थे। वो जहां भी खड़े होते, अपने देश की मिट्टी की महक साथ ले जाते। और जब वे बोलते, तो सिर्फ़ शेर नहीं गूंजते थे—बल्कि एक पूरी तहज़ीब बोलती थी।
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मजरूह सुल्तानपुरी ने जब शायरी की शुरुआत की थी, तब वे इश्क़ और हुस्न के काफ़िये में डूबे हुए एक परंपरागत शायर के रूप में देखे गए। मगर जैसे-जैसे उनका जीवन समाज से, जनमानस से और देश की राजनीति से जुड़ता गया, उनकी लेखनी भी एक नई दिशा की ओर बढ़ चली। उनके गीत अब केवल गुनगुनाने भर के लिए नहीं रह गए थे, बल्कि वे समाज के दर्पण बन चुके थे। उनमें कराह भी थी, करुणा भी, संघर्ष भी और संकल्प भी।
यह वही समय था जब प्रगतिशील लेखक आंदोलन अपने यौवन पर था और मजरूह सुल्तानपुरी इस आंदोलन के उन प्रतिनिधि कवियों में से एक बन चुके थे जो अपनी नज़्मों से क्रांति की मशाल जलाते थे। उन्होंने गीतों और ग़ज़लों को एक ऐसा स्वर दिया जिसमें आम आदमी की बेचैनी, किसान की भूख, मज़दूर की थकावट और औरत की चुप्पी तक सब दर्ज हो गई।
रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई गीत न केवल भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर बना, बल्कि यह मजरूह की मानवीय सोच, उनके धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण और सामाजिक समरसता के प्रति प्रतिबद्धता का घोष भी बन गया। यह गीत सिनेमा हॉल में नहीं, दिलों में गूंजा। स्कूलों, सभाओं, आंदोलनों में इसे भावनात्मक उद्घोषणा की तरह दोहराया जाने लगा।
यह वह मजरूह थे जो अब समाज के भीतर झाँकते थे। जो यह जानते थे कि परदे पर चल रही फिल्म से कहीं बड़ी पटकथा ज़माने ने आम आदमी के लिए लिख रखी है। उनकी लेखनी अब कमाई के लिए नहीं, चेतावनी के लिए थी। वे सामाजिक दृष्टा बन गए थे।
यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि उन्होंने अपने गीतों में महिला पात्रों को केवल प्रेमिका नहीं, एक सोच, एक साहस और एक संघर्ष के रूप में उकेरा। उनके गीत ‘प्यार किया तो डरना क्या’ (मुगल-ए-आज़म) एक औरत की आज़ादी की घोषणा थी। यह गीत जितना रोमांटिक था, उतना ही विद्रोही भी। यह अनारकली की ज़ुबान नहीं, भारत की हर स्त्री की जुबान बन गया।
मजरूह के गीतों में भाषा सरल थी, मगर उसमें जो दृष्टि थी, वह असाधारण थी। उनका साहित्य केवल ‘कविता’ नहीं था, वह एक चेतावनी थी, एक संवाद था और एक आंदोलन भी।
“रुक जाना नहीं तू कहीं हार के…” (इम्तिहान) जैसे गीतों ने लाखों युवाओं को जीने का हौसला दिया। यह गीत परीक्षा की कहानी नहीं, ज़िंदगी की लड़ाई का मार्गदर्शन बन गया। यह वो वक्त था जब देश में बेरोज़गारी, असमानता और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था, और मजरूह का यह गीत एक मशाल बन गया, जो अंधेरों में रोशनी देता था।
उनकी लेखनी की गहराई और व्यापकता का यह आलम था कि वे हर वर्ग के लिए लिखते थे। वे ज़मींदार की नज़रों से भी समाज को देखते थे और खेत में हल चला रहे किसान की भी आंख से। वे कहकशाँ के सितारे भी थे और चौपाल की बात भी। उन्होंने वह भाषा गढ़ी जो अभिजनों को भी भाए और आमजन को भी अपना लगे।
उनके गीतों में रूमानी अनुभव जितने प्रखर थे, सामाजिक यथार्थ उतना ही
यह गीत मानसिक अवसाद और अस्तित्व के संकट पर एक गहराई से की गई टिप्पणी थी। इससे पहले हिंदी फिल्मों में भावनात्मक वेदना को इतनी नज़ाकत और ईमानदारी से व्यक्त नहीं किया गया था।
मजरूह का यह सामाजिक सरोकार ही था, जिसने उन्हें सिर्फ़ गीतकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक अध्येता बना दिया। वे फिल्मों के पर्दे पर चलती कहानियों से आगे जाकर, समाज की असल कहानी लिखते थे। और यही कारण है कि उनके गीतों को आज भी गाया जाता है, समझा जाता है, और महसूस किया जाता है।
उनकी हर पंक्ति जैसे कहती थी: “मैं कलम उठाता हूं, ज़ुबान नहीं, मैं आग लिखता हूं, धुआं नहीं।”
मजरूह सुल्तानपुरी ने अपनी लेखनी से समाज को सजग किया, उसे उसकी असलियत से रूबरू कराया और उम्मीद का गीत भी दिया। वे गीतकार थे, मगर सिर्फ़ दिलों को बहलाने वाले नहीं; वे शायर थे, मगर सिर्फ़ गुलों और बुलबुलों की बातें करने वाले नहीं। वे ज़माने के सबसे ज़रूरी गवाह थे—और शायद सबसे ज़रूरी आवाज़ भी।
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1964 में आई फिल्म ‘दोस्ती’ का गीत—“चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…”—न केवल सुपरहिट हुआ बल्कि इसके लिए उन्हें फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। यह मजरूह के लिए केवल एक ट्रॉफी नहीं थी, यह उस सम्मान की पुष्टि थी जिसकी वह वर्षों से हक़दार थे। यह गीत दोस्ती, समर्पण और उम्मीद का प्रतीक बन गया। लोगों की आँखों में आँसू लाने वाला यह गीत, दरअसल एक ऐसे कवि की आत्मा की आवाज़ थी जिसने खुद भी अकेलेपन, संघर्ष और बेबसी को बहुत करीब से जिया था।
मजरूह सुल्तानपुरी ने लगभग चार दशकों में 300 से अधिक फिल्मों के लिए करीब 4000 गीत लिखे। लेकिन यह केवल संख्या नहीं, वह स्पंदन था जो हर पीढ़ी के दिलों में गूंजता रहा। उन्होंने प्रेम में “लग जा गले…” जैसी गहराई दी, तो विद्रोह में “रुक जाना नहीं तू कहीं हार के…” जैसी प्रेरणा। वे जब रोमांटिक होते तो गुलाब महकता था, और जब चेतावनी देते तो आंधी उठती थी।
उनका रिश्ता संगीतकारों से भी विशेष रहा। नौशाद, शंकर-जयकिशन, सी. रामचंद्र, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गजों के साथ उनकी जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ऐसे गीत दिए जो आज भी अमर हैं। उनकी यह विशेषता रही कि वे हर संगीतकार की धुन में अपने शब्दों को ऐसे ढालते थे कि वह धुन उनकी ही प्रतीत होती थी। उनका हर गीत अलग, हर धुन में नया रंग—मगर पहचान एक ही: मजरूह।
मजरूह ने यह भी सिद्ध कर दिया कि फिल्मी गीत भी साहित्यिक गरिमा से भरपूर हो सकते हैं। उन्होंने गीतों को उच्च साहित्य का दर्जा दिलाया। वे उन विरले गीतकारों में से थे जिनकी ग़ज़लें और नज़्में, फिल्मी गीतों की तरह, अदब की महफिलों में भी उतनी ही इज्ज़त से सुनी जाती थीं।
वे शायर थे, जो मंचों पर “मज़दूरों के गीत” गाते थे, और फिर उन्हीं हाथों से “पिया तू अब तो आजा” जैसा चुलबुला गीत भी लिखते थे। यह विरोधाभास नहीं था, यह उनके भीतर के बहुआयामी कलाकार की मिसाल थी। वे जानते थे कि शब्दों की ताकत कहाँ और कैसे इस्तेमाल करनी है।
सिनेमा, जो कभी उन्हें साहित्य से गिरा हुआ माध्यम लगता था, अब उनकी शायरी का सबसे सशक्त मंच बन चुका था। मजरूह ने इस माध्यम को अपना बना लिया—न केवल उसे अपनाया, बल्कि उसे ऊँचाई दी। और इसीलिए 1993 में जब उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया, तो यह केवल एक गीतकार का नहीं, बल्कि एक युग की स्वीकार्यता थी। यह पुरस्कार पाने वाले वे पहले गीतकार बने, और इस प्रकार उन्होंने इतिहास रच दिया।
लेकिन मजरूह की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह थी कि वे आम आदमी के ज़बान बन गए थे। उनके गीत हर दिल की धड़कन थे—प्यार में डूबे प्रेमी के, खेत में पसीना बहाते किसान के, और बेकारी से जूझते नौजवान के भी। मजरूह ने नज़्मों से मोहब्बत सिखाई, ग़ज़लों से सवाल करना सिखाया, और गीतों से ज़िंदगी को समझाया।
उनकी कलम न तो झुकी, न थकी, न बिकी। उन्होंने एक बार कहा था:
“मैंने हर दौर में इश्क़ की बात की, कभी गीत में, कभी ग़ज़ल में, कभी इंकलाब की नज़्म में।”
और सचमुच, मजरूह वही थे—एक इश्क़ के शायर, जो ज़माने से भी मोहब्बत करते थे।
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मजरूह सुल्तानपुरी का जीवन एक ऐसा सफ़र रहा जिसमें शब्दों ने न केवल संगीत की रचना की, बल्कि समय की भी। हर दशक के साथ उनकी लेखनी में नए रंग, नए अर्थ और नए उद्देश्य शामिल होते गए। लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में, जब अधिकांश कलाकार या तो स्वयं को दोहराने लगते हैं या विलुप्त हो जाते हैं, मजरूह की कलम और भी अधिक जीवंत, प्रयोगशील और गहराई से भरी हुई नज़र आती है।
1980 और 90 के दशक का हिंदी सिनेमा, जिसमें व्यावसायिकता हावी हो चुकी थी, वहाँ भी मजरूह ने अपनी सादगी, गहराई और नैतिक दृष्टिकोण को बनाए रखा। उन्होंने सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख़ खान की फिल्मों के लिए भी गीत लिखे—लेकिन वो गीत भी वही थे जिनमें साहित्यिक गरिमा, भावनात्मक ईमानदारी और शुद्ध कविता की आत्मा जीवित रही।
फिल्म ‘कभी हां कभी ना’ (1994) का गीत: “ए काश के हम …”
यह मजरूह के अंतिम काल के गीतों में से था, और इसकी कोमलता, इसकी उदासी और इसकी सच्चाई – सब कुछ उस शायर की उम्रदराज़ी और अनुभव की झलक थी। यह वही मजरूह थे जो सिनेमा की नई लहर को अपनाते भी थे, और अपनी परंपरा को भी निभाते थे। उन्होंने न कभी फैशन के आगे झुकना सीखा, न कभी ‘ट्रेंड’ के नाम पर अपनी शायरी से समझौता किया।
उनकी यही सच्चाई उन्हें अंत तक प्रासंगिक बनाए रही। वे न केवल अपने गीतों के ज़रिये बोलते रहे, बल्कि वे मुशायरों में भी सक्रिय रूप से शामिल होते रहे।
उनके अंतिम वर्षों में जब शरीर धीरे-धीरे थकने लगा, तब भी उनकी आत्मा थकी नहीं। 1993 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया—यह पुरस्कार पाने वाले वे पहले गीतकार थे। उस शाम जब उन्होंने यह पुरस्कार ग्रहण किया, तो उन्होंने केवल धन्यवाद नहीं कहा; उन्होंने एक कविता सुनाई थी, जो उनकी आत्मा का आईना थी:
“मैं गीत लिखता हूं, वो गीत जो लोरी बन के माँ की छाती पर बिखरते हैं, वो गीत जो मज़दूर के हथौड़े से स्वर लेते हैं, वो गीत जो आँसू से भीगे होते हैं, और फिर भी चूमते हैं जीवन को।”
मजरूह को सम्मान मिला, लेकिन उन्होंने कभी अपने आपको महान घोषित नहीं किया। वे आजीवन सीखते रहे, लिखते रहे, जीते रहे। वे उन विरले कलाकारों में से थे जिनकी लोकप्रियता और गंभीरता दोनों एक साथ बढ़ती रही।
24 मई, 2000 को जब उनका निधन हुआ, तो हिंदी सिनेमा ने केवल एक गीतकार नहीं खोया—उसने अपनी आत्मा का एक हिस्सा खो दिया। मगर यह भी सच है कि मजरूह सुल्तानपुरी को भुलाया नहीं जा सकता। उनका लिखा हर गीत, हर शेर, हर नज़्म आज भी ज़िंदा है—स्टूडियो की रिकॉर्डिंग में नहीं, महफिलों की ताली में नहीं, बल्कि उन लोगों के दिलों में जिनकी जिंदगी कभी उनके गीतों से रंगीन, रोशन या मजबूत हुई हो।
राहत इंदौरी ने एक बार कहा था: “मजरूह सुल्तानपुरी तरक्की पसंद, खूबसूरत नज्मों में माहिर थे। उन्होंने शब्दों को ग़ज़ल में पिरोकर आज़ादी और बराबरी का पैग़ाम दिया।”
और यह सच है—मजरूह केवल लिखते नहीं थे, वे रचते थे। वे शब्दों में सांसें भरते थे। उनकी कविताएं केवल कागज़ पर नहीं थीं, वे आत्मा की सतह पर अंकित होती थीं। वे गायक नहीं थे, मगर उनकी आवाज़ हर गायक की ज़ुबान से होती हुई सीधे दिल तक पहुँचती थी।
और यही मजरूह की सबसे बड़ी जीत थी—कि वे रहते हुए भी अमर थे, और अब जब वे नहीं हैं, तो भी वे हर उस दिल में ज़िंदा हैं जो सच्चाई, मोहब्बत और इंसानियत को समझता है।
मजरूह सुल्तानपुरी के फिल्मी अवदान पर आपका लेख बेहद महत्वपूर्ण है और उनकी शायरी की विविध पक्षों को खूबसूरती से उजागर करता है। शानदार लेख के लिए आप बधाई की पात्र हैं।
प्रमिला जी, बहुत सुंदर लेख के लिए धन्यवाद। यद्यपि आप ने लेख में कुछ गीतों के बारे लिखा है परंतु अपने उस रचना के बारे में कुछ नहीं लिखा जिसके उन्हें देशद्रोही की सजा भुगतनी पड़ी। यदि संभव हो तो बताईए।