मित्रो आज हम पुरवाई में कथा यूके की एक बहुत पुरानी मित्र सरोज बिहारी जी का परिचय एक कवि के रूप में करवा रहे हैं। सरोज जी के पति कैप्टन बिहारी लंदन में एअर इंडिया के क्षेत्रीय निदेशक हुआ करते थे। चिज़िक, लंदन में उनके घर में कथा यूके द्वारा कहानी गोष्ठियों का आयोजन किया जाता था और सरोज जी उन गोष्ठियों की मेज़बानी किया करती थीं। आज उनकी कविताएं पुरवाई के पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हुए एक अनूठा अहसास हो रहा है – (संपादक)
1. किताब
कई दिनों से
उसके सिरहाने एक किताब रखी थी
अनछुई
उदास किताब सोचती रही
न जाने कब ये मुझे पढ़ेगा ?
क्या ये, कभी मुझ पर कुछ लिखेगा ?
फिर एक दिन
सर्द हवा के झोंके से
खुल गयी किताब
और वो रोज़ पढ़ने लगा
कुछ इबारतें भी पन्नों पर लिखने लगा
कई दशक बीत गए
किताब अब
अलमारी के एक कोने में पड़ी है
पन्ने पीले
शब्द धुंधले
सीलन की गंध भी है
कल… जब
सफाई करते हुए
नज़र उस किताब पर पड़ी
वो बोला –
अरे अब इसका क्या काम
कल इसे रद्दी में
बेच आऊंगा।
2. वक्त रुका नहीं चलता रहा
बड़ी बेबाकी से वक्त गुजरता रहा
दिल हो उदास या खुद से नाराज़
वक्त रुका नहीं चलता रहा
उस लम्हे ने दिल पे हलके से
दस्तक तो दी थी
अनजाने फूलों और कलियों ने
खिलने की आहट तो दी थी
मैं चुन रहा था उन लफ्ज़ों को
सरोज जो बंद आँखों के सपनों को साकार करें
खुली जो आंख तो
वो लम्हा भी आंसू बना
और बह गया
ना जाने वो मेरी हार थी या
या मेरे मुखौटे की जीत
खो आया था जहां कुछ अपना
ठिठके से खड़े हैं उस मोड़ पर
कुछ ठहाके ,कुछ गीत .
पर वक्त रुका नहीं चलता रहा
मैं साथ चलने की कोशिश में
दौड़ता, कभी गिरता रहा
पाए कई मुकाम कुछ खो गए
पर अफ़सोस कि वक्त हरदम
मुझसे आगे ही चलता रहा
छकाया है वक्त ने हमेशा ही मुझे
कहना था कुछ…
सुनना बहुत कुछ…
खो गए शब्द, हो गए ख्वाब पानी
घिर के बादलों ने जब बरसने कि ठानी
सांसें हुईं आनी-जानी…
वक्त कब रुका?
वो तो चलता रहा…
3. मंदिर
याद है?
गली के मोड़ पे वो मंदिर
जहां हम पहुँचते थे
लंबी सी उस सड़क पर चलते -चलते
पेड़ों से छनती रोशनी को पीते -पीते
ऊंचे पहाड़ों को छूकर
आती ठंडी हवाओं को
ओढ़े-ओढ़े
तुम मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ
शायद, पहाड़ों के बीच
चमकते सूरज की
किरणें गिनते थे
या सोचते थे
की कुछ देर में ये चमकता सूरज
नीले सुनहरे बादलों में घिर,
रूप बदल
क्षितिज के उस पार
खो जाएगा…
और मैं,
तुम्हारी सलामती की दुआएं मांगती
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती थी
हर सुख -दुख की तरह
हमारी पूजा भी साझी थी
जो तुम मंदिर तक ना पहुंचाते
तो पूजा कैसे होती…?
4. डाकिया
अक्सर याद आता है
वो डाकिया
जो किसी मसीहा की तरह
ख़तों में खुशियाँ,
कभी गम बांटता था
बेचैन दिलों को रहम बांटता था…
ख़तों में बहते
वो अनकहे शब्दों के झरने
गालों पे खिलते
गुलाब
तितली बना मन
उड़ा बादलों में
रंग और रस सारे
बरसते थे पल में
हँसाते, रुलाते
रिझाते से
अनमोल ख़्वाब
खो गया जाने कहाँ
वो समर्पण वो लगाव?
5. श्याम घन
बरसो रे, हे श्याम घन
सरसे मन उपवन
सांवरी सांझ
सांवरे मेघ
भीगे मेरा सांवरा तन
भीगे, बह जाये
ह्रदय की कालिमा
मन का क्लेश
राग और द्वेष
रिक्त हो तृष्णा
मन हो जाये श्वेत परों सा
और गाता जाये
कृष्णा ,कृष्णा। …….
6. दूर पहाड़ों पर
दूर पहाड़ों पर
सुस्ता रहा है सूरज
भीगे बादलों से ढका
यूं झरते हैं
आतुर से नन्हे झरने
जैसे हों
पहाड़ों के हृदय का आवेग
लिए जा रहे हैं संदेस
छूकर धरा को
करेंगे अभिषेक
दूर पहाड़ों पर
घुमावदार पगडंडियों पर
छूता है कोई
पत्तों की तरह
चलता है साथ -साथ
हवाओं की तरह
मुड़कर देखती हूँ
दूर से हँसता है
कोई फूलों की तरह
घुलती है हवाओं में इक खुशबू
तुम्हारी ही तरह…
7. नींव का पत्थर
नींव का एक पत्थर हूँ मैं
मुश्किलों की बारिशें
और तूफ़ान
चाहे चीर जाएं
स्थिर तो रहना पड़ेगा
दर्द तो सहना पड़ेगा
आंसुओं और श्रम
में है लिपटा
प्रेम और विश्वास का ये परिणय
प्यार के फूलों का सौरभ
हृदय का विश्वास गौरव
फूलों और कलियों से सजा ……
ये मेरा घरौंदा
जब तलक दीपक में ज्योति
सीप में जैसे हो मोती
इसको संजोना पड़ेगा।
Mrs. Saroj Behari,
20, Katherine Court,
Buffalo, Grove, IL USA.
Phone +1 847 903 1315

https://www.thepurvai.com/poems-of-saroj-bihari/
आदरणीय सरोज जी!
आपको पहली बार पढ़ने का मौका लगा। लेकिन पढ़कर अच्छा लगा।
1- *पुस्तक*
इस कविता को पढ़कर समझ में नहीं आ रहा कि क्या लिखा जाए! एक वक्त था कि पुस्तकों के प्रति सभी के दिलों में दीवानगी सी रहती थी। खाना-पीना छूट जाता था। भूख लगती ही नहीं थी अगर किताब हाथ में है ।शुरू करने के बाद जब तक खत्म ना हो जाए तब तक कुछ अच्छा नहीं लगता था।
कई-कई बार पढ़ लेने के बाद भी कुछ पुस्तकें आज भी ऐसी हैं कि फटने की कगार पर हैं, लेकिन उसको संजो कर रखा हुआ है। रद्दी में देने का तो मन ही नहीं होता।
आपकी कविता को पढ़कर याद आया। काफी पहले एक संपादकीय पढ़ा था इस विषय पर जिसमें कचरा फेंकने वाले ने एक लाइब्रेरी बना ली थी उन किताबों से और उसका लाभ भी लोगों ने उठाया।
ठीक से पूरा याद नहीं है एक लंबा समय हो गया।
पर हर चीज का एक अंत है और अपनी अपनी सोच भी। कुछ चीजें अपने हाथ में होती है और कुछ वक्त के।
पर सच में किताबें बहुत प्रिय होती हैं। बस कदर करने वाला चाहिये। इंसानों की तरह प्रेम होता है इनसे।
अंतिम तीन पंक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं।ऐसा लगा जैसे पुस्तक खुलने के बाद कुछ नजर में आया,अपनी रुचि या जरूरत के अनुरूप लगा जो पन्नों पर पाठकीय वैचारिकी लिखवा भी गया।
एक अंतराल के बाद वह मकसद,वक्त या स्थिति खत्म हो गयी।और किताब की उपयोगिता खत्म हो गई।
यह बात गहरा अर्थ रखती है।
आजकल रिश्तों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही हो रही है।
एक लंबी अवधि के बाद पुस्तक पर कोई कविता पढ़ी। बहुत अच्छा लगा।
2- *वक्त रुका नहीं चलता ही रहा*
यह कविता काफी मार्मिक है। वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता। वह अनवरत है, घड़ी की टिक-टिक की तरह, जिसका काँटा कभी लौटता नहीं है पीछे। निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है। घड़ी का बंद होना समय का ठहरना नहीं होता, जीवन का ठहरना होता है।
यह कविता दुख और पीड़ा की कविता लगी।
वक्त की बहुत सारी खूबियाँ हैं।
निरंतरता तो है। पर यह भी कि वह कभी एक सा नहीं रहता, किसी के लिए भी; पर हम उससे अपेक्षाएँ कुछ ज्यादा रखते हैं। और जब पूरी नहीं होतीं तो तकलीफ बढ़ जाती है। अच्छा है कि दर्द कविता बन कर भावों के बहाव में निकल जाता है। दर्द का वजन कुछ हल्का हो जाता है।
इस कविता ने जीवन में आई स्थितियों के उतार-चढ़ाव को बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त किया।
3- *मंदिर*
यह कविता सहयात्री के साथ की मधुर स्मृतियों सी प्रतीत हुई।
4-डाकिया
डाकिए से तो हमारा भी बहुत प्रेम रहा और इस कविता में आपके समस्त भावों के साथ हमारी भी उपस्थिति हम दर्ज करते हैं।
सारे काम छोड़कर डाकिए के समय पर बेचैनी और उत्सुकता से इंतजार करते हुए बाहर खड़े हो जाना। इस कविता को पढ़ते हुए याद आ गया वह डाकिया भी।
खतों में सिर्फ शब्द नहीं होते थे, भाव हुआ करते थे जैसा कि आपने कविता में भी लिखा है सुख-दुख, खुशी -गम,रहम-राहत, हंसना- रुलाना! आपने सच कहा मोबाइल से सारे एहसास खो गए!
5- *बरसो रे हे श्याम घन*
यहाँ कविता कृष्ण के भक्ति-पद की तरह लगी
जिसमें कवि-मन सारे द्वेष भावों रिक्त होकर सिर्फ कृष्ण में लिप्त हो जाना चाहता है
6- *दूर पहाड़ों पर*
ऋतुएँ मानवीय भावनाओं को उद्वेलित करती हैं।
प्रिय साथ हो तो संयोग,साथ न हो तो वियोग। सूरज, पहाड़, धरती, झरने,बादल, मेघ!
समस्त प्राकृतिक उपादान भावनाओं को प्रभावित करते हैं।
स्मृतियों की स्थिति में इनका प्रभाव और अधिक गहराई से पड़ता है।
यह कविता महसूस करने की कविता है,शिद्दत से महसूस हुई।
7-नींव का पत्थर
अच्छी कविता है यह।
जीवन में स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक संकल्प शक्ति,और आत्मशक्ति का बल ही नींव को स्थायित्व दे पाता है।
नींव शब्द अपने आप में ही बहुत महत्वपूर्ण है और बहुत गहरा अर्थ रखता है।
नींव में दबा हुआ चाहे पत्थर हो या ईंट हो; उसका बलिदान किसी को दिखाई नहीं देता लेकिन भवन की मजबूती, उसकी अस्ति-नास्ति इस नींव पर ही टिकी रहती है।
स्त्री भी परिवार के संदर्भ में नींव की तरह होती।
स्त्री के लिए संघर्ष की हर स्थिति में भी प्रेम और विश्वास तथा प्यार के सुगन्धित फूलों से पल्लवित परिवार की सुरक्षा और दायित्व महत्वपूर्ण हैं।
आपकी सारी कविताएँ वियोग के धरातल पर स्मृतियों की छाया सी लगीं। जीवन में प्रेम नए-नए आयामों की स्थापना करता है।
मन द्रवित हुआ।
इन कविताओं के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।
नीलिमा जी . आपका बहुत-बहुत धन्यबाद, मेरी कविताओं को पढ़ने और हर कविता का मर्म पकड़ने के लिये.
सभी कविताओं में कुछ पाना, कुछ खोना, मन का
उद्वेलित होना ही छुपा है. और यही प्रेरणा बन गया…
भावनाएं कागज़ पर उतारने का .
बहुत धन्यावाद.
तहेदिल से आपका शुक्रिया दीदी।
प्रिय सरोज जी सच कहैं तो आपकी कविताएं आपके विशिष्ट व्यक्तित्व की बानगी लगती हैं
प्रथम कविता *किताब* मानो एक जीवित स्त्री जो घर में बरसों से रहती रही हो मगर उसे किसी ने पढ़ने की कोशिश नहीं कि ,उसमें क्या लिखा है, वह कैसी है ,क्या कहती है, यहां तक की प्रिय ने भी नहीं, अचानक किसी दिन कोई आकर्षण पन्ना खुला तो नजर पड़ी, छुआ, पड़ा, कुछ टटोला, सहलाया ,कुछ पृष्ठ जल्दी में पढ़े भी तो, कुछ समझ में आए ,और नहीं भी ,वह स्त्री, वह किताब घर में यूंही बरसों बरस बने रहे निर्विकार से एक दिन प्रिय की नजर पड़ी किताब पर तो कहने लगा यह तो बेहद पुरानी हो गई है अब इसका क्या काम करने से बेच आऊंगा
स्त्री ने भी सोचा जब युवा रही तब नहीं पढ़ पाया तो अब झज्जर अवस्था में क्या ही पदेगा, क्या समझेगा, बहुत ही संवेदनशील कविता, किताब के रूप में स्त्री का बिंब मेरे दिमाग में उभरने लगा
साधुवाद
वक्त रुक नहीं चलता रहा, वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता ,उस सरोज के लिए भी नहीं, जो अभी बंद था ,खिला नहीं था, जिसमें हजार सपने थे, उसे खीलना था, फूलों ने कलियों ने उसे जगाया भी, उस सरोज ने आंखें भी खोली, मगर वह शबनम मोती ना बनकर अश्क बन गए, यानी वह खूबसूरत लम्हा भी दुख में बदल गया, वक्त फिर भी नहीं रुका, सुखों को पकड़ने की कोशिश की भी, गिरा भी संभाला भी ,मगर किस्मत ने साथ नहीं दिया ,वक्त फिर आगे बढ़ गया, एक ऐसी हार जो लगातार साथ चलती रही, वक्त बढ़ता रहा।वक्त कहां रुकता है किसी के लिए
शानदार कविता
मंदिर कविता,
जीवनसाथी याने सुख दुख दोनों का साथी ,भागीदारी
डाकिया,, आहा क्या खूबसूरत बीती याद,
हमने भी बाट हैरी ,प्रियतम की चिट्ठियों की ,अब आने वाली पीढ़ी वो आनंद नहीं उठा पाएगी
सिर्फ किताबों पर किस्से की तरह रह गया डाकिया
दूर पहाड़ों पर
जैसे दूर हो जीवन से कोई, पगडंडी का मुड़ना,पत्तों की सरसराहट, फूलों का खिलना,
याद दिलाती प्रियतम की
साधुवाद आदरणीया आप बात अच्छा लिखती हैं आपकी कविताओं में बिंब अनेक हैं
सदा स्वस्थ रहें ,लिखती रहें।
साहित्य जीवन हे ,जिंदगी की ऊर्जा है।