1 – इंसानों की ज़रा-सी पैरोकारी
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मुझे लगता था हमेशा कि
इंसानों से परे की दुनिया में
अब भी संवेदनाओं का करम है,
इंसानों की दुनिया में तो
इंसानियत की नाम में दम है।
कितना बड़ा झूठ है ये भी
परीकथाओं की ही तरह
कितना बड़ा छल था ये भी
चांद से परे की बस्तियों और
गाथाओं की तरह,
कभी देखा है एक गली के कुत्ते को
जो दूसरी गली में दाख़िल होते ही
हो जाता है बेगाना
उसी की प्रजाति के कुत्ते चाहते हैं उसे
निवाला बन चबा जाना
अपनी गली में खड़े कुत्ते का भी
दम होता है तब तक अधूरा
जब तक वहीं के कुत्तों का हुजूम
न कर दे उसका ये अरमान पूरा
पहली गली का कुत्ता दूसरी गली में
मारा जाता है अक़्सर कुत्ते की ही मौत,
प्रजाति उसी की होती है
पर होती है हत्यारी, नहीं होती सहारा।
अपनी मुंडेर पर कबूतरों को दाना डालते भी
देखती हूं मैं हमेशा,
कुछेक कबूतर चाहते हैं सारे दाने खा जाना
उड़ाते हैं दूसरे कबूतरों को मारकर चोंच
फड़फड़ाते हैं पंख ज़ोर से उन पर
नहीं देना चाहते एक दाने में भी हिस्सा,
अगर कोई कबूतर होता है बीमार-सा या बच्चा
उसे तंग करने और सताने में ये भी
नहीं खाते तरस ज़रा सा।
सुना है शेर होता है जंगल का राजा
पर उसे दिक्कत रहती है दूसरे शेरों से
अकेला राजा रहना ही लगता है उसे अच्छा।
सुना है मोरनियां हों या दूसरी मादाएं,
नहीं सह पाती दूसरी मादाओं की मौजूदगी,
लील जाती हैं अपने हिस्से का बंटवारा।
जब देखती हूं, सुनती हूं
पंछी में, जानवरों में ममता-भरी कहानियां,
जनने, पलने, खेलने, चलने तक सारे बच्चे
पाते हैं अपनी मांओं की ही छाया,
तब उलझ जाती हूं कि क्या मर्द ही नहीं,
सारे नरों का बस इतना ही होता है काम
कि मां बनाकर निकल लें दूजे रस्ते,
ज़िम्मेदारियों में न देना पड़े कोई योगदान,
ये सारी की सारी मादाएं-मांएं,
सार्थकता के नाम पर सिर्फ़ इतना ही अस्तित्व पाती हैं
कि अच्छी मां बन जाएं
और भुला दें अपनी उड़ानें, अपनी छलांग।
मैं तो कुछ ही जानवरों और परिंदों को देख-समझ पाई हूं
और इतने से ही इतना चकराई हूं
कि लगता है पैरोकारी करूं अपनी इंसानी दुनिया की
उन सभी के सामने,
जो कहते हैं अब इंसानों से परे
सिर्फ़ जानवरों में बसता है इंसानियत का जहान।
वक़्त के साथ मान लिया न हम सभी ने
कि झूठी होती हैं सारी परीकथाएं,
नहीं होता चांद पर किसी जन्नत जैसी ख़ुशियों का जहान
तो मान लेना चाहिए ये भी
कि ये पूरी दुनिया ही है स्वार्थ से सनी,
एक की मौजूदगी से पड़ जाती है दूसरों को कमी,
जहां भी भूख है, प्यास है, ज़रूरतें हैं सांस की,
वहां एक का होना हमेशा है दूसरे के सीने में गड़ी फांस सी।
जैसे कभी दिख जाते हैं कुछ अच्छे इंसान,
सब अच्छे नहीं होते, सब बुरे भी नहीं,
वैसे ही परिंदों या जानवरों की मासूमियत पर
बलिहारी जाने से पहले जान-परख लेना
किस में कितना जज़्बा है त्याग का
या भरा है उनमें भी गले तक स्वार्थ का ज़हर,
शायद तब इंसानी दुनिया में इंसानों के बीच रहना
नहीं लगेगा इतना बड़ा कहर।
नहीं होते सारे जानवर हमेशा अच्छे,
इतने भी बुरे नहीं होते सारे इंसान।
2 – क्रांति सुविधानुसार
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ग्राउंड फ्लोर पर रहते हुए लगता था
नीचे दिक्कतों की भरमार है,
सारा ट्रैफिक, शोर-गुल, भीड़
हर वक़्त सर पर सवार है।
नीचे ही गटर है तो बू भी आ जाती है,
कभी नाली भर जाए तो
कीचड़ में ज़मीन खो जाती है,
कभी खेलते हैं सामने के पार्क में शोर करते बच्चे,
तो नींद हराम हो जाती है।
तब सोचती थी कि ऊपर की मंज़िलों पर
सुख ज़्यादा होते होंगे,
ऊपर से लगता होगा सुंदर हर नज़ारा
लोग कितने आराम से सोते होंगे,
अब मेरे पास बहुत ऊंची मंज़िल पर
एक बहुत ही साफ़-सुथरा मकान है,
आसमान से मिलाती हूं नज़रें
देख सकती हूं दूर तक जहान सारा,
लेकिन दिक्कतों की लिस्ट यहां भी जारी है,
कभी मच्छर, कभी कीड़े तो कभी छिपकलियां सुक़ून पर भारी हैं
इतनी ऊंची मंज़िल पर भी नहीं छूटा चूहों से पीछा
उनकी मौजूदगी मेरे आराम में सेंध लगा जाती है
ज़मीन पर रहने में दिक्कत
ऊंचाई की अपनी परेशानी है,
दुनिया है या दिक्कतों की दुकान
हर तरफ़ सर-दर्द, मारा-मारी है,
चांद की तरफ़ भागना छलावे से भर देता है
जब वहां परियों की बस्तियां नहीं,
गड्ढों से पाला पड़ता है।
हम इंसान हर परेशानी में निजात पाकर
सुकून से सो जाना चाहते हैं,
पर पता नहीं जूझते हैं कब्र में कीड़ों से ख़ामोश मजबूरी में
या जलते हुए चिता पर बेबस-मौन बिलबिलाते हैं।
पूरी दुनिया को ज़रूरत है सुकून की, शांति की,
पर यही नहीं हैं कहीं भी
क्योंकि दुनिया सुविधानुसार ही चुनती है राह क्रांति की।
3 – मेरे लिए ऐसे हैं राम
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सीता को छोड़कर तो
राम अयोध्या भी नहीं आए थे,
सिंहासन छोड़ने पर नहीं,
राम ने सिया-वियोग में आंसू बहाए थे,
पुत्र पिता भाई और राजा,
हर रूप में आदर्श निभाए थे,
लेकिन जो निज के कांटे थे,
वो सिया-संग ही बांटे थे
जो जान भी सके, सह भी सके
फिर भी कुछ भी कहने से बचे,
जो पास रहे या दूर रहे,
पर अंतर्मन की साथी,
अंतर्द्वंद्व भी सहे,
जब सारी उंगलियां हों उठी हुई,
जब सारी भृकृटियां हों तनी हुई,
तब भी ताप जो मन का सहे,
कर्तव्य मार्ग पर कुछ न कहे,
ऐसी थी राम-प्रिया,
ऐसी थी सिया,
उसी संगिनी के संग राम
मर्यादापुरुषोत्तम कहलाए थे,
जब धरा जगत में मनुज-तन,
तब भगवान भी भगवान
नहीं रह पाए थे,
जीवन की मर्यादा से जुड़े
सारे कर्तव्य निभाए थे,
पर जीवन बीता कर्तव्य नहीं,
यही लीला राम भी रच पाए थे,
सब देकर भी जब रिक्त हुए,
वही ख़ालीपन मन में भर पाए थे,
सबसे आदर्श बने रघुवर
पर सीता की सतत परीक्षा कहां रोक पाए थे,
चाहे जनक-दुलारी कुछ न कहे,
पर कुछ कठघरे थे राम के लिए भी बने,
मानव-जीवन है इतना विशाल
रह जाता है अनुत्तरित कोई सवाल,
जब दुनिया में रहना होता है,
दुनिया का बनना पड़ता है,
ये बात तो राम तक भूले नहीं,
हम ही याद नहीं रख पाए थे,
जब घर में सजता राम दरबार,
तब पाता विश्वास आधार,
जिस मन में बसता राम नाम,
वहां नफ़रत द्वेष का कैसा काम,
तुम राम को मानते हो तो
राम की भी मानो,
कौन हैं राम क्या हैं राम,
जानो समझो मानो अपना लो
चाहे शबरी हो या केवट हो
मेरे राम का सबमें साझा है,
जो शत्रु को भी पूज सके
नहीं अहंकार कोई बाधा है,
मूरत में नहीं, मंदिर में नहीं
जो हर कण में बसना जानता है
वही हो सकता है मेरा राम
उसी राम को मेरा मन मानता है।
4 – दो मिनट का मौन विकास के नाम
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जब भी कभी मैं जानती हूं
किसी ऐसे शख़्स के बारे में
जिसने मीलों तक फैली बंजर ज़मीन को
हरा-भरा बनाया
और सैकड़ों एकड़ में कोई जंगल उगाया
तो मुझे बहुत तेज़ हंसी आने लगती है,
उगा लो, उगा लो, जंगल बसा लो,
किसी बंजर ज़मीन को
हरा-भरा भी बना लो
और इसी हरियाली में
अपने जीवन का उद्देश्य भी जुटा लो,
फिर अचानक ही निकलेगा काग़ज़ी नक़्शे पर
कोई विकास मार्ग और
खा जाएगा तुम्हारे उगाए जंगल और वो सपना भी
जिसमें तुम देना चाहते हो इस दुनिया को
एक हरा-भरा सांस लेता जहान।
पेड़ों के साथ-साथ मिट जाएगा जंगल भी
और उसमें रहने वाले तमाम परिंदों और जानवरों का वजूद भी,
जिन्होंने घेर लिया है इंसानी ज़िंदगियों का स्थान
और मैं हंसती जाऊंगी बेतहाशा।
जब भी कभी मैं जानती हूं उन कोशिशों के बारे में
कि वो बहाना चाहते हैं नदियों को पूरी पारदर्शिता के साथ
निकाल देना चाहते हैं उनमें से हर कूड़ा-करकट
और करना चाहते हैं अगली पीढ़ी को
प्यास से बचाने का इंतज़ाम
तो मुझे बहुत तेज़ हंसी आती है,
करो करो सफ़ाई, चलाओ चलाओ कोई अभियान,
पर शायद नहीं है उस तरफ़ किसी का ध्यान
जहां एक मल-मूत्र से भरा नाला भी
तेज़ी से चला आ रहा है इसी तरफ़
क्योंकि प्यास से ज़्यादा ज़रूरी है
शहरी बस्तियों के मल-मूत्र का निपटान
प्यास तो सॉफ्ट ड्रिंक से भी बुझाई जा सकती है
और पानी को ग़ैर-ज़रूरी बना सकती है,
फिर क्यों चाहिए नदियां, क्यों चाहिए झरने,
क्यों चाहिए पानी के लिए संभावित विश्वयुद्धों का समाधान।
मैं जब-जब पाती हूं कि
किसी औरत को देवी या पूजनीया कहा जा रहा है
उनके विकास और उद्धार का प्रयास किया जा रहा है
तो मुझे बहुत तेज़ हंसी आती है
और रुक ही नहीं पाती है,
करो करो प्रयास, करो करो उद्धार,
क्योंकि इस ठप्पे के साथ ही मिल जाएगा लाइसेंस
श्रद्धा के नाम पर तिरस्कृत-अपमानित करने का, रौंदने का,
देवी या पूजनीया बनते ही ख़त्म हो जाते हैं सारे अधिकार
और तकलीफ़ सहकर भी चुप रहती,
सिर्फ़ त्याग करती छवि का ही सब करते हैं ध्यान।
सम्मान देने वाले ही अपमान करने वालों की क़तार के
होते हैं अगुआ,
उन्हें होते हैं सौ ख़ून माफ़
पर पूजनीया के हिस्से में नहीं आता है कोई रहम
त्याग की देवी से तो सब मांगते ही हैं
कौन करता है उसके हक़ में दुआ।
पर मैं उस वक़्त बहुत गंभीर हो जाती हूं,
जब कोई कहता है कि
इस पर संजीदगी से सोचने की ज़रूरत है,
यहां इंसानी सरोकार बचाने हैं,
नए आदर्श ज़माने को सिखाने हैं,
क्योंकि मैं नहीं सूंघ पाती उस बू को
जिनमें होगी अंजानी साज़िशों की इंतिहा
तब सचमुच महसूस होती है बेबसी
अपनी दुनिया को बस मिटते देखते रहने की
जिसके साथ मिट जाने वाला है अपना क़िस्सा
और एक कायर, नपुंसक, बेबस मौन ही होता है हमारा हिस्सा।
हम हर हत्या और संहार पर मौन धरने के ही आदी हैं
तो चलो अपनी बेबसी को भी मौन में ही छिपाएं
दो मिनट का मौन धरकर तमाम इंसानी विकास के नाम
अपनी बेबसी को भी श्रद्धांजलि दे आएं।

