Monday, March 9, 2026
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डॉ. मोहसिन ख़ान की कविता – आदमी का आदमी के हाथों मारे जाना

युद्धों ने दिया है
झुलसता नंगा बचपन,
बदसूरती जो छिपाए न छिपे,
हर तरफ़ आग ही आग
और बदबूदार धुँआ,
बेतहाशा भूख, प्यास और
झुलसाती धूप, जमा देने वाली ठंड
अंतहीन पीड़ा,
अपनों के मारे जाने की,
बेघर होकर शरणार्थी बनने की,
दवाओं, पानी और
रोटी के टुकड़ों की भीख।
युद्धों ने दिया है
कोख में मारे जाने वाला घना अंधेरा,
भटकन भरे दिन और
भयानक रातें
स्कूलों के मलबे में दबी हुई किताबें,
लाशों के बीच
अपने मालिक को सूंघता हुआ कुत्ता,
उजड़े हुए घर
हर तरफ़ गर्दज़ाद मंज़र।
युद्धों ने दिया है
उजड़े हुए शहर का सूनापन,
हर तरफ़ रेंगती हुई मनहूसियत
बिजलियों के टूटे खंबे
कुएं, तालाब और नदियों का
काला, ज़हरीला पानी
थरथराती हवा की बेचारगी
आवारा हुए ज़ख़्मी जानवर।
युद्धों ने दिया है
सपनों का टूट जाना
इच्छाओं की हत्या
अधूरी अंधेरे भरी ज़िंदगी
ख़ुशबुओं का मर जाना
तितलियों का चट्टान हो जाना
रंगों का बेरंग हो जाना।
युद्धों ने दिया है
काम पर से घर न पहुंच पाना
चाभी जेब में हो और
घर का ढह जाना
पालतू परिंदे की
बिना मालिक के मौत हो जाना।
युद्धों ने दिया है
आदमी का आदमी के हाथों मारे जाना।
डॉ. मोहसिन ख़ान
मुंबई
मोबाइल – +91 98606 57970
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