कभी–कभी अतीत के झरोखे से कुछ कुछ ऐसी सामग्री हाथ लग जाती है जो अपने समय को समझने में उल्लेखनीय भूमिका निभाती है। ‘हंस’ के संपादक स्वर्गीय राजेन्द्र यादव ने मार्च 1993 में एक वरिष्ठ उपन्यासकार मृदुला गर्ग को संबोधित करते हुए एक संपादकीय लिखा था। मृदुला जी ने उस संपादकीय के जवाब में एक ऐसा पत्र लिखा जो किसी साहित्यिक धरोहर से कम नहीं है। हाल ही में मृदुला जी ने यह पत्र फ़ेसबुक पर साझा किया था। मैंने उनसे निजी रूप से फ़ोन पर बात की और इस पत्र को ‘पुरवाई’ के पाठकों के लाभ के लिये प्रकाशित करने की अनुमति मांगी जो उन्होंने सहर्ष प्रदान कर दी। हम यह पत्र मृदुला जी की अनुमति एवं ‘हंस’ के वर्तमान संपादक श्री संजय सहाय के सौजन्य से प्रकाशित कर रहे हैं – (तेजेन्द्र शर्मा – संपादक)
20 मार्च 1993
सेवा में,
सम्पादक – हंस
दिल्ली
प्रिय यादव जी,
हंस के मार्च (1993) अंक में, मुझे सम्बोधित करके आपने जो सम्पादकीय लिखा है, उसे पढ़ कर दुःख सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि आप ही के शब्दों में, आपकी टिप्पणी ”मिसप्लेस्ड यानी बंदर की बला तबेले के सिर” का आदर्श उदाहरण है। कभी न कही गई बातों की कल्पना करके या उनके “देव दुर्लभ” अर्थ निकाल कर, आपने अपनी वह भड़ास निकाली है, जो स्त्री विद्रोह ने आपके भीतर पैदा कर दी है।
चूंकि मैं करोड़ों बालिकाओं-औरतों की ज़िन्दगियों में घटित होने वाली घटना श्रृंखला (आभ्यंतिकरण और मालिकीकरण) के साथ, स्त्री को जोड़ कर देखती हूँ, इसीलिए कहती हूँ कि आज स्त्री जाति में भी दो वर्ग हैं, दलित और ग़ैर दलित। उसी तरह जैसे पुरुष जाति में दो वर्ग हैं, दलित और ग़ैर दलित। और चूकि मैं करोड़ों बालिकाओं ही नहीं, बालकों की ज़िन्दगियों में घटित होने वाले शोषण को भी स्त्री से जोड़ कर देखती हूँ, इसीलिए मैंने “जादू का कालीन” नाटक लिखा है और ”वह मैं ही थी” कहानी।
आप ग़ैर दलित मर्द हैं, इसलिए अच्छी तरह जानते हैं कि जब तक दलित अपने को कमतर मानने के अहसास से मुक्त नहीं होंगे, उनके भीतर क्रोध का लावा नहीं फूटेगा। वे अपनी सामाजिक स्थिति से विद्रोह नहीं करेंगे और उस आभ्यंतिकरण से छुटकारा नहीं पाएंगे, जिसके बने रहने पर ही आप अपने ग़ैर दलित मर्दाना अहम को पोस सकते हैं। उतनी ही अच्छी तरह आप यह भी जानते हैं कि जब तक स्त्री अपने को कमतर मान कर दलित होने की आत्म दया में डूबी रहेगी, वह विद्रोह नहीं करेगी। और यही आप चाहते हैं।
मुझ पर आपका गुस्सा इसीलिए है कि क्योंकि आप यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई स्त्री, पुरुष द्वारा निर्धारित कसौटियों के आभ्यंतिकरण से विद्रोह करे और आपकी नकली करुणा को ठुकरा दे।
अगर सारी स्त्रियों को दलित बतलाने से, चाहे वे जिस वर्ग से हों, आपका मर्दाना अहम तुष्ट होता है तो ज़रूर शौक़ फ़रमाइए। पर उनसे यह अपेक्षा मत कीजिए कि वे आपके इस मालिकाना निष्कर्ष का आभ्यंतिकरण करके, ”हाय अबला जीवन तेरी यही कहानी” की तर्ज पर आँसू बहाती, निष्क्रिय पड़ी रहेंगी।
आपकी माँ ने चाहे जो कहा हो, आज हर स्त्री अपने शरीर को भुनाने को तैयार नहीं है। बहुत सी ऐसी स्त्रियाँ हैं,जो नामदेव धसाल के ”क्रोध” को भीतर सुलगा कर, इस मानसिकता से विद्रोह कर रही हैं। उन्हें आप दलित कह कर, अपने पाँव तले नहीं खींच ला पाएंगे। आम बहस में निजी बात कहने की ज़रूरत नहीं होती पर चूकि आपने कुछ निहायत निजी कटाक्ष किये हैं, इसलिए मैं कानून और विधि के नियमों का पालन करते हुए, उस खिड़की का प्रयोग कर रही हूँ जो आपने खोली है।
मेरा विवाह एक निहायत दकियानूसी,निम्न मध्य वर्गीय परिवार में हुआ था। पति ने बाद में तरक्की भले कर ली हो पर आज तक उस पूरे परिवार में से (पति को छोड़कर) किसी ने मेरी एक कहानी तक नहीं पढ़ी। इतना वे ज़रूर जानते हैं कि मैं लिखती हूँ और काफ़ी कुछ आपत्तिजनक भी। फिर भी मैं ”मालिकों की इच्छा, स्वार्थ और सम्मान के विरुद्ध” अपना करियर, मित्र, बन्धु, स्नेही-प्रेमी, आना-जाना, विचारधारा, जीवन शैली चुन पाई तो सिर्फ इसलिए कि मैंने आत्म-दया का उत्सव नहीं मनाया। बाहरी मर्द मालिकों ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया फिर भी ”चित्तकोबरा” पर मचाया गया बावेला, मुझे घर से सड़क पर नहीं ला सका और न मेरे परिवार को मुझसे तोड़ सका।
पर आप निराश न हों। आपकी हमदर्द-हमराज़ बीसियों औरतों को मैं जानती हूँ,जो हर तरह से स्वतंत्र-सम्पन्न होने के बावजूद, ख़ुद को दलित बतलाती हैं और बाक़ायदा रोती-कलपती-झींकती हैं। पर दलित वर्ग की स्त्री के लिए तनिक सा सोच-विचार तक करने को तैयार नहीं हैं। आत्म दैन्य का उत्सव आत्म रति की तरह होता है। परवर्ट सुख से भरपूर। ख़ासकर तब जब आप जैसे दम्भी ”मर्दाना” पुरुष पीठ ठोंक कर करुणा की बौछार कर रहे हों। मेरी जैसी औरतें दलित होंगी भी तो, उनके भीतर क्रोध फूटेगा, मर्दाना दया की भूख नहीं। जो औरतें मालिकिकरण से पीड़ित हैं, वे अपने लिए कराह कर रह जाती हैं, दूसरी औरत की मदद के लिए आगे नहीं बढ़ पातीं।
अभी पिछले दिनों एक कॉलेज में जाना हुआ। सम्पन्न-शिक्षित लड़कियों ने पूछा, हम भला स्त्री की स्थिति में सुधार लाने के लिए क्या कर सकती हैं, हम तो ख़ुद दलित हैं। मैंने कहा,चलो और कुछ नहीं तो इतना ही कर लो कि हर लड़की अपने से कम भाग्यशाली लड़की को पढ़ा दे। उनका जवाब था-हमें अपनी समस्याओं से फुर्सत नहीं है, हम किसी और को, मदद के लिए कहाँ ढूँढती फिरें। मैं जानती हूँ कि इस आत्म केन्द्रित आत्म दैन्य को पालने वाली स्त्रियाँ आपकी बात की पुष्टि करती हैं, यानी बेचारी स्त्री अपने को बेचारा मानती है, मानती रहेगी और आपको नकली करुणा के आँसू बहाने का मौक़ा देती रहेगी।
यादव जी, आपकी तरह ये लड़कियाँ भी दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में रहती हैं। अपने सिवाय किसी और को देख नहीं पातीं। और न असहमति बर्दाश्त कर पाती हैं। पर चूँकि मैं कस्बों से होती हुई, समाज के थोपे पुरुषोचित निर्देश और अनुग्रह,दोनों से संघर्ष करके यहाँ पहुँची हूँ, इसलिए मुझे स्त्रियों में अनेक वर्ग दिखलाई देते हैं… दलित और ग़ैर-दलित, दोनों। आपका मर्दाना अहम् हमें दलित मान कर पोषित होता है तो मान लीजिए। मेरे विरोध करने से क्या होता है? मालिक तो आप हैं न? जो फ़तवा आप जारी करेंगे वही मान्य होगा। ऐसी औरतें आपको बेशुमार मिल जाएंगी, जो आपके मालिकाना अहम् को सहलाएगी, पालेंगी, पोसेंगी। पर मेरे दोस्त, कुछ थोड़ी सी स्त्रियाँ ऐसी भी मिलेंगी, जो आपसे असहमत होंगी, आपके फ़तवे के ख़िलाफ़ विद्रोह करेंगी।
विरोध का पहला क़दम है,यह बोध कि वे दलित (कमतर) नहीं हैं। दूसरा क़दम है, अपने कमतर न होने का सार्वजनिक ऐलान। तीसरा क़दम है, करोड़ों शापित बालिकाओं-औरतों के साथ करोड़ों शोषित बालकों को स्त्री से जोड़ कर देखना, जिससे दलितों के प्रति नकली करुणा नहीं,असली संवेदना पैदा हो सके।
छोड़िए। यह बतलाइए, हिन्दुस्तानी मर्द हमेशा माँ की आड़ ले कर वार क्यों करता है? ज़रा आंचल से बाहर निकल कर देखिए, आपकी माँ ने चाहे जो कहा हो, हैरी कुक्सन और राजेन्द्र यादव जी, पर आज ऐसी भी कुछ माँएं हैं जो अपने बच्चों को ”मर्द” बनने की घुट्टी नहीं पिला रहीं। उम्मीद की जा सकती है कि ये बच्चे, बड़े हो कर, हर औरत को कमतर(दलित) मानने से बाज़ आ जाएंगे और शोषित औरतों को पूरे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देख पाएंगे।
एक छोटी सी जिज्ञासा। इन्दिरा गान्धी ने बहुतों को नहीं बख्शा,सो तो मालूम है पर उसे किसने नहीं बख्शा? जहाँ तक स्कैण्डल का सवाल है, वे तो हज़ूर आपके भी काफ़ी फैलाये जाते हैं जबकि आप न दलित हैं न स्त्री। इससे मेरा मतलब यह कदापि नहीं है कि चूँकि इन्दिरा गान्धी दलित नहीं थीं इसलिए कोई औरत दलित नहीं है। गोष्ठी में मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था। सिर्फ दलितों की तरह स्त्रियों में भी कई श्रेणियों के पैदा होने की बात कही थी। आपने जो अर्थ निकाला, वह आपके पूर्वग्रह के चलते था, और शायद इसलिए भी कि कोई दलित (स्त्री) आपसे असहमत होने का, यानी आपके मालिकिकरण को नकारने का, दुस्साहस कैसे कर सकती है।
सस्नेह
मृदुला गर्ग
ई 118, मस्जिद मोठ,जी के 3,
नई दिल्ली 110048
दिनांक 20 मार्च 1993 ( उन दिनों मेरा यही पता था। )
अब पता है
ई 421 (भूतल) ग्रेटर कैलाश –2
नई दिल्ली 110048
(यह पत्र देखने लायक है। 1993 में ही जो लिख दिया था, वह कठगुलाब उपन्यास में भावना और विचार के साथ कथ्य का हिस्सा बना है। – मृदुला गर्ग)
अतीत के झरोखे से (विशेष)
इस लेख को पढ़ते हुए मृदुला जी के मन में(जो पढ़ते हुए हमने महसूस किया )
परकाया प्रवेश की तरह)उनका क्रोध,आक्रोश, अपमान की तपन और इन सब से जुड़े हुए जितने भी अनुभाव, विभाव संचारी भाव रहे होंगे वह सब के सब महसूस हुए। पत्र को पढ़कर जवाब के कारण को जानने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई।
अच्छा लगा कि किसी महिला में इतनी मुखरता और निडरता के साथ असत्य या गलत के विरुद्ध पुरुष को जवाब देने का , खरा-खरा बोलने का, अपने अपमान के विरोध में आवाज उठाने का साहस है। इस के लिये आपको सर झुका कर 100 बार प्रणाम।
इस पत्र को पढ़कर महसूस हुआ कि यह लड़ाई वास्तव में मृदुला जी की अकेली की नहीं लगी। बल्कि उन सब की है जो अपने को कमतर नहीं समझतीँ। और गलत के विरुद्ध आवाज उठाने की ताकत रखती हैं।
किसी भी संपादक को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वह ईश्वर है और किसी भी के भी साथ किसी भी तरह का व्यवहार कर सकता है।
मृदुल जी ने सच को घिस-घिस के कहा; दौड़ा दौड़ा के मारने की तरह।
सच को कहने का साहस वही कर सकता है जिसका अंतर्मन कलुषित न हो मन की पवित्रता ही सत्य कहने का साहस कर पाती है।
कई बार कई संपादकों के बारे में इसी तरह से पढ़ने में आया है तो दुख होता है।
हम इस पत्र के एक-एक शब्द के साथ सहमत हैं। कल्पना की जा सकती है कि इस लेखन के सत्य के पीछे का कारण कितना कड़वा,कठोर और दूषित रहा होगा।
एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक होकर भी अगर यह पता न हो कि अगर हम एक अँगुली दूसरे की तरफ उठाते हैं तो तीन अँगुलियाँ कहती हैं कि “पहले स्वयं को देखो।” तो फिर उसके लिए क्या ही कहा जाए!
पत्र को पढ़कर पाठक यह समझ पा रहा है की इतना कठोर सच बोलने के पीछे मुख्य कारण क्या रहा होगा!
पत्र महिला सशक्तिकरण का उदाहरण तो है, किन्तु साथ में यह भी इंगित करता है कि महिलाओं को कम न समझा जाए। और इस भ्रम में ना रहे कोई संपादक कि संपादक के पास लेखकीय ताकत है तो बदनामी के डर से कोई महिला उनका विरोध करने का साहस नहीं कर सकती।
एक पल विश्वास करना भी थोड़ा कठिन होता है पर अगर मृदुला जी का पत्र सत्य है, तो राजेंद्र यादव जी का कृत्य भी सत्य ही होगा।
यहाँ कार्य कारण सिद्धांत मुखरता से नजर आता है।
आदरणीय मृदुला जी! आपके लिखने को, आपके सत्य कहन को और आपकी प्रखर सोच को सादर प्रणाम
एक पल पत्र पढ़ते हुए ऐसा लगा “जैसे देव की वैसी पूजा।”
कोई भी किसी को सुधार नहीं सकता, जब तक सामने वाले के मन में स्वयं इच्छा जाग्रत न हो सुधरने की।
कॉलेज वाली बात पर आश्चर्य हुआ! कॉलेज तक पहुँचने के बाद भी अगर किसी लड़की में अपने लिये जाग्रति का कोई भाव नहीं आया तो इससे बड़ा अफसोस और क्या हो सकता है।
शरीर में चाहे जितनी भी ताकत हो लेकिन इंसान अगर मन से कमजोर है तो वह कमजोर ही कहलाएगा। वह जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा।
कभी हमने लेखक श्रीराम शर्मा का एक संस्मरण पढ़ा था- “स्मृति” , उसका एक सूत्र वाक्य याद आ रहा है-
“दृढ़ संकल्प से दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं।”
दृढ़ संकल्प का यह विशेष गुण सभी के लिए हौसले की ताकत की तरह है।
आपको पढ़ते हुए आपको जितना जाना और समझा, आपके इसी दृढ़ संकल्प और दृढ़ता ने आपको इस मुकाम तक पहुँचाया है!
आपका यह पत्र राजेंद्र यादव जी के लिये आईना दिखाने की तरह है।
कुछ पुरुष ऐसे ही होते हैं जिनमें एक चेहरे में अनेक चेहरे होते हैं।हम तो इस कल्पना में हैं कि इस पत्र को पढ़ने के बाद उनके ऊपर क्या असर हुआ होगा और उनकी क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
आज भी देखने में आता है,पुरुष चाहे घर के अंदर के हों या घर के बाहर के अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए बड़बोलेपन का दबाव रखते हैं। यहाँ हमारा यह संबोधन सबसे नहीं, अधिकतम से है।
पता नहीं क्यों इंसान का क्रोध बदले की भावना से ही तुष्ट होता है।
पत्र की एक बात हमें मार्के की लगी। स्त्रियों के भी दो वर्ग हैं एक दलित और दूसरा गैर दलित,और पुरुषों के भी दो वर्ग हैं एक दलित और दूसरा गैर दलित।
यह याद रखने योग्य है-
विरोध का पहला कदम है-
1-यह बोध कि वे दलित (कमतर) नहीं है।
2- दूसरा कदम है अपने कमतर न होने का सार्वजनिक ऐलान।
3-तीसरा कदम है करोड़ों शापित बालिकाओं ,औरतों के साथ करोड़ों शोषित बालकों को स्त्री से जोड़कर देखना जिससे दलितों के प्रति नकली करुणा नही असली संवेदना पैदा हो सके।
पत्र में आक्रोश महसूस हुआ। लेखन की गंभीरता महसूस हुई।
बहुत सही लिखा। पत्र ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ की तरह लगा।
यह पत्र बहुत अधिक विचारणीय है और प्रेरक भी।
मृदुला जी! आपकी लेखनी को और आपके साहस को सादर प्रणाम