नामवरवादी यह क्यों भूल जाते हैं कि नामवर सिंह से पहले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ नगेन्द्र, डॉ रामविलास शर्मा, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ देवराज, रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे चूड़ान्त पंडितों की एक लम्बी परम्परा मौजूद है। और उनके उत्तरवर्ती मैनेजर पाण्डेय, विजय कुमार, जयप्रकाश , डॉ अजय तिवारी , ओम निश्चल, अष्टभुजा शुक्ल, अरविन्दाक्षन, प्रभाकर श्रोत्रिय, रमेशचन्द्र शाह, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजेन्द्र यादव, भवदेव पाण्डेय, परमानन्द श्रीवास्तव, पंकज चतुर्वेदी, पंकज पराशर, प्रियदर्शन, विजय बहादुर सिंह, सुधीश पचौरी, रोहिणी अग्रवाल जैसे तेजस्वी आलोचक नामवर सिंह से आगे की भाषा लिख रहे हैं। एक बार ‘हिन्दुस्तान’ में कमलेश्वर और नामवर सिंह आमने-सामने आ गए थे। कमलेश्वर ने कहा कि आज आलोचना का प्राइमरी पैमाना भी नहीं है तो नामवर सिंह ने कहा कि खूब अच्छी आलोचना लिखी जा रही है। कुमार अम्बुज और अनामिका भी अच्छा गद्य लिखते हैं। स्वयं डॉ विवेकी राय एक उत्कृष्ट कथालोचक थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल, अभय दुबे, अपूर्वानंद, शम्भुनाथ, बजरंग बिहारी तिवारी और नित्यानंद तिवारी के भी नाम लिए जा सकते हैं। डॉ बच्चन सिंह, विजयमोहन सिंह, डॉ वेदप्रकाश अमिताभ, पी एन सिंह, कृष्णमोहन, प्रफुल्ल कोलख्यान, सकलदेव शर्मा, शंभु गुप्त, रेवती रमण आदि अनेक आलोचक हिन्दी आलोचना को समृद्ध करते रहे हैं।
अभी डॉ शम्भुनाथ ने कहा कि नामवर सिंह के अलावा बाकियों की स्थिति दाएँ गाल में पान की गिलौरी जैसी है। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन बाकियों में आप भी हैं? यह सही है कि आज अधिकांश आलोचक चर्वित-चर्वण कर रहे हैं, अपने आलोचना के मान-मूल्यों पर टिके रहने की नैतिक दृढ़ता नामवर जैसी नहीं है। किन्तु वाचिक परम्परा के आचार्य नामवर सिंह अपने को पुनर्विन्यस्त करते हुए बार-बार वक्तव्य बदलते रहते थे। एक बार डॉ पी एन सिंह के आमंत्रण पर वे गाजीपुर “आलोचना और संस्कृति” विषय पर बोलने के लिए आए थे। मुझे उनका वह भाषण औसत ही लगा था। शायद पंडित विद्यानिवास मिश्र होते तो तेजस्वी भाषण होता। संस्कृति का उनका संज्ञान तलस्पर्शी था; या फिर कुबेरनाथ राय होते! आजकल शम्भुनाथ जी धर्म और भारतीयता के विशेषज्ञ हो गए हैं। नामवर सिंह ने छायावाद पर अच्छा काम किया है और “कविता के नए प्रतिमान” उनकी विलक्षण पुस्तक है। किन्तु नवगीत की उपेक्षा के लिए भी वे काफ़ी हद तक जिम्मेदार हैं। वैसे बाद में नेशनल टी वी पर, मदन कश्यप से बातचीत में उन्होंने नवगीत को मान्यता दे दी थी।
कविता के नए प्रतिमानों की खोज में वाद-विवाद की प्रक्रिया में पुराने मानदण्डों को निरस्त करने के लिए वे अज्ञेय आदि को अपना हथियार बनाते हैं और फिर बाद में उन्हें भी खंडित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपनी मुख्य प्रतिज्ञा के विरुद्ध उनके सबसे मजबूत नहीं, सबसे कमजोर किले पर प्रहार करते हैं। इसे हम चाहें तो नामवर सिंह को समय के सहचर के रूप में भी देख सकते हैं और यह जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि के ख़िलाफ़ एक विद्रोह भी है। कई बार उनके उदाहरण बहुत लचर भी होते हैं। नामवर सिंह से हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु उन्होंने जो तर्क-प्रणाली और अन्तर्दृष्टि दी है, उसके लिए हिन्दी जगत उनका कृतज्ञ है। कृतज्ञ तो मैं भी हूँ कि उन्होंने ‘आलोचना’ में मुझे छापा था, किन्तु हमारे वैचारिक सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक ही रहे।
‘समीक्षा’ के संपादक डॉ गोपाल राय ने तो अपनी पत्रिका का बाकायदा संपादकीय ही लिखा था —- “नामवर सिंह के नाम एक खुला पत्र।” किन्तु आलोचना को दोयम दर्जे से उठाकर सृजनात्मक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय नामवर सिंह को ही है। उन्होंने आलोचना को व्यक्तित्वान्तर प्रदान किया और दशकों तक हिन्दी जगत के अनुशास्ता बने रहे। किन्तु कविता-सृजन से अपने लेखन की शुरुआत करने वाले नामवर सिंह प्राच्य और पाश्चात्य काव्य-शास्त्र के मर्मज्ञ हो जाने के बाद भी कोई एक भी उल्लेखनीय कविता नहीं लिख सके। यद्यपि उन्होंने कविता लिखना छोड़ दिया था। किन्तु आज बात-बात पर पाश्चात्य सृजनशीलता और वैचारिकी को उद्धृत करने वाले नामवर सिंह से प्रेरणा ले सकते हैं कि उन्हें संस्कृत काव्य-शास्त्र का सम्यक् बोध था और ग्रहण और त्याग के विवेक से परिस्फूर्त होकर हिन्दी आलोचना को भारतीय परंपरा में रखकर परखने के वे कायल थे और पश्चिमी ज्ञान-परम्परा के उपयोग से आलोचना को आधुनिक संस्कार दिए। बहुत कम लोग जानते होंगे कि अपने जीवन के लगभग अन्तिम समय में नामवर सिंह ने गोस्वामी तुलसीदास जी पर गवेषणात्मक भाषण दिया था और यह मन की कचोट व्यक्त किया कि मैं तुलसी पर बोलने के लिए तरस गया।
अब हम नामवर से मिलने केलिए तरस जाएंगे। नामवर सिंह आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से व्यथित थे कि एक दिन ब्राह्मण-ठाकुरों के बच्चे भीख मांगने लगेंगे। लेकिन वीरेन्द्र यादव आदि के विरोध के बाद उन्होंने अपने विचार वापस ले लिए थे। वैसे नामवर सिंह की आशंका काफी हद तक चरितार्थ होने लगी है। वे एक दृष्टा लेखक थे। और हाँ, बेशक एक साहित्यिक सामंत भी। उन्होंने नयी कविता के प्रतिमान नहीं, कविता के नए प्रतिमान गढ़े और प्रतिमानीकरण के खतरे को महसूस करते हुए समझदारी पूर्वक अवधानता के साथ कविता के पाठ को बेहतर आलोचना-पद्धति के रूप में रेखांकित किया, और यह भी कहा कि आखिर कविता एक गल्पात्मक संरचना है, यथार्थ का हलफ़नामा नहीं। विद्यानिवास मिश्र तो यहाँ तक कहते हैं कि, यदि हमारे भीतर जो कुछ है, उसे बाहर ला दिया जाए तो दिन भर कुत्तों और कौवों को भगाते बीतेगा। नामवर सिंह अपने कथन के लिए खुद को दांव पर लगा सकते थे। नौकरी और मार्क्सवाद में से मार्क्सवादी होना चुना। किन्तु अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल, सन् 2000 ई में आलोचना का प्रवेशांक फासीवादी विशेषांक के रूप में निकाला।
यदि आज वे होते तो इस युग को क्या कहते? वैसे अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे स्थापत्य या आर्किटेक्चर देखने के बहाने मंदिर जाने लगे थे। बाद में रामविलास शर्मा को उन्होंने शव-साधक के रूप में देखा, तो क्या वार्धक्य में सभी प्रगतिशील आलोक स्तम्भ शव-साधक हो जाते हैं? या जीवनानुभवों का सारांश भारतीय दर्शन के सत्य को पा जाना है। आजकल शंभुनाथ भी धर्म के गहन अनुशीलन में प्रवृत्त हुए हैं।
अजित कुमार राय
कन्नौज
काव्य – कृतियाँ —- आस्था अभी शेष है, रथ के धूल भरे पांव
(संपादित) — सर्जना की गंध लिपि
आलोचना कृति —- नई सदी की हिन्दी कविता का दृष्टि बोध।
आलोचना, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, हंस, अक्षरा, साक्षात्कार, साहित्य अमृत, वीणा, पाखी, परिकथा, कथाक्रम, दोआबा, आधुनिक साहित्य, साहित्य भारती, शब्दिता, सम्मेलन पत्रिका (प्रयागराज), समीक्षा, दस्तावेज, नूतन कहानियाँ, निकट, लहक,समय सुरभि अनन्त,समकालीन सोच, अक्षर पर्व, अभिनव इमरोज आदि पत्रिकाओं
तथा जनसंदेश टाइम्स, आज, सहारा समय, दैनिक जागरण आदि समाचार – पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित.
अनेक संकलनों में निबन्ध, कविताएँ और आलोचनाएँ प्रकाशित.
पूर्व प्रधानाचार्य — सुभाष इण्टर कालेज, नेरा, कन्नौज
पता —- विमर्श, विष्णु पुरम् कालोनी, नयी कचहरी रोड,
सरायमीरा, कन्नौज (उत्तर प्रदेश)
पिन —- 209727
मो. — 9839611435
आपका लेख पढ़ा अजित जी! नामवर जी पर!
याद रहेगा कि- *कई बार उनके उदाहरण बहुत लचर भी होते हैं। नामवर सिंह से हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु उन्होंने जो तर्क-प्रणाली और अन्तर्दृष्टि दी है, उसके लिए हिन्दी जगत उनका कृतज्ञ है। कृतज्ञ तो मैं भी हूँ कि उन्होंने ‘आलोचना’ में मुझे छापा था, किन्तु हमारे वैचारिक सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक ही रहे।*
इसे पढ़ने के बाद मन में ख्याल आया कि वह वैचारिक द्वंद्व का कारण क्या रहा होगा? वैसे किसी भी विषय पर सभी लेखक एकमत नहीं हो सकते। सबकी अपनी-अपनी वैचारिकी होती है।
तुलसी वास्तव में एक निर्विकार संत हृदय ऐसे रचनाकार हैं। जिनका जीवन दिखता तो खुली किताब की तरह है लेकिन साधना की गहनता रही।
जीवन के उतार में मन ईश्वर से एकात्म की अपेक्षा में भक्ति की ओर उन्मुख होता है।प्राय: लोगों को इसी समय ईश्वर की याद आती है। कई रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने जीवन की ढलान में ईश्वर की ओर रुख किया। वास्तव में यह अनायास नहीं होता। नामवर जी तुलसी पर लिखवा रही नहीं पाए लेकिन गवेशणात्मक भाषण देकर थोड़ा बहुत संतोष तो महसूस किया होगा।
आपने नामवर जी के लिए बहुत ईमानदार लेख लिखा है। उनकी अच्छाइयों के साथ उनके दोषों पर भी ईमानदारी से लिखा,
और एक नामी शख्सियत के लिए यह कहना सरल नहीं कि-
*दशकों तक हिंदी जगत के अनुशास्ती बने रहे, किंतु कविता सृजन से अपने लेखन की शुरुआत करने वाले नामवर सिंह प्राच्य और पाश्चात्य काव्य-शास्त्र के मर्मज्ञ हो जाने के बाद भी कोई एक भी उल्लेखनीय कविता नहीं लिख सके।*
इस ईमानदार लेखन के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।