Wednesday, February 11, 2026
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बिमल सहगल का लेख – आओ मिलें मुहावरी-महानुभावों से

हमारे हर दिन के जीवन में अक्सर ऐसे अवसर आते हैं जब हम अपनी बात को साबित करने के लिए कहावतों का हवाला देते हैं।  जीवन में जिन हालातों का हम सामना करते हैं, उनमें से अधिकांश के लिए कहावतें मिल जाती हैं जो हमारी बातचीत को दिलचस्प बना देती हैं और किसी भी मौके से सही तरीके से निपटने के लिए प्रेरणा देती हैं जैसा कि उन ज्ञान के भंडार मुहावरी व्याख्यानों में दिखता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि ज्ञान के ये शब्द कैसे और कहां से आए; और वे लोग कौन थे जिनके इर्दगिर्द हमारी पौराणिक कहावतें बुनी गई हैं?
हम अक्सर अपने आसपास किसी भी ऐसे व्यक्ति, जो आदतन हर जगह देर से पहुंचता हो, उसकी तुलना लेट लतीफ से करते हैं। जो कोई भी इधरउधर बिना वजह कूदताफाँदता रहता है, उसे जंपिंग जैकका नाम दे देते हैं।  हर स्त्रीसंपदा से वंचित, साधारण सी दिखने वाली लड़की को प्लेन जेनके नाम से चिढ़ाते हैं।  और दिमागी  पुर्जों की बाकायदा बंदोबस्ती से बच निकले  बेचारे लोगों को गोबर गणेशकी उपाधि दे मज़ाक उड़ाने से भी नहीं कतराते   कहीं किसी उदारवृती के व्यक्ति को धन्ना सेठ ठहराते हैं तो वहीं किसी हवाई किले बनाने वाले को शेख चिल्ली बुला उसकी खिल्ली भी उड़ाते हैं। कभी देसी टॉम, डिक एंड हैरी यानि ऐरागैरा, नथूखैराजोड़ी के बेचारे नथू और खैरा जैसे फालतू लोगों को उनके इस धरती पर  बेवजह उतर आने के लिए तिरस्कृत भी करते हैं, तो कभी गंगा गए गंगा दास, यमुना गए यमुना दासकहावत के माध्यम से घरेलू पर्यटन के प्रोत्साहन में लोगों को जिधर भी गए वहीं के हो जाने को लिए प्रेरित करते हैंवैसे ही जैसे कि अंग्रेज़ लोग अपने उन भाइयों को नसीहत देते आए हैं जो रोम की यात्रा करना चाहते हैं। जबकि यह अनुमान लगाना मुश्किल होगा कि लतीफ, जैक, जेन, गंगा दास, यमुना दास, गणेश, नथू और खैरा जैसे काल्पनिक पात्रों को उनसे संबंदित प्रचलित कहावतों में सहायक या पूरक भागों के साथ मात्र तुकबंदी के लिए ही उनका अस्तित्व दिया गया है, यह जानना दिलचस्प होगा कि कई ऐसी कहावतों में नामित पात्र हालांकि इतिहास से लिए गए हैं पर असाधारण कार्यों को अंजाम देने से वह पौराणिक अधिक बन गए हैं।
जबकि आधुनिक समाज अधिक से अधिक संवेदनशील होता जा रहा है और असामाजिक पुरुषों के चारों ओर महिलाओं के खिलाफ अपराधों और उनके शील भंग  के किसी दुस्साहस के लिए फंदा कस रहा है, सदियों पहले पीपिंग टॉम को दिव्य न्याय के क्रोध का सामना करना पड़ा था क्योंकि उसने वासना-वशीभूत हो पराई, वस्त्ररहित स्त्री को छुप कर देखने का पाप किया था जब गोडिवा नामक महिला अपने नगर के वासियों को पति लियोफ्रिक द्वारा उन पर लगाए गए भारी करों से बचाने के लिए उसकी चुनौती स्वीकार कर नग्न हो कोवेंट्री की सड़कों पर घुड़सवारी करती निकली थी। पीपिंग टॉम को अपने इस दुस्साहस के लिए अंधा होना पड़ा, जबकि शहर के बाकी लोग बंद दरवाजोंखिड़कियों के पीछे अपने घरों के अंदर सुरक्षित बने  रहे।  सच कहें तो पीपिंग टॉम का किरदार मनघड़न्त ही था जो कि कोवेंट्री के लोगों द्वारा दिखाई गई नैतिक ताकत के विपरीत मानवीय कमजोरी की गलती को शर्मसार करने के लिए मूल किंवदंती के लिए केवल एक कहावती जोड़ ही था। हालाँकि, ‘डाउटिंग थॉमसकी लौकिक प्रसिद्धि का थॉमस वास्तव में यीशु मसीह के शिष्यों के बीच एक बाइबिल चरित्र था,  जिसे प्रभु को अपने पुनरुत्थान के बारे में समझाने के लिए व्यक्तिगत रूप से मिलना पड़ा था। लेकिन अगर आप किसी के गैरमानवीय व्यवहार से परेशान हैं और व्हाट   डिकिन्सकहने का मन करता है, तो आपको संकोच करने की ज़रूरत नहीं है कि यह अपशब्द महान अंग्रेजी लेखक चार्ल्स डिकिन्स को नाराज कर सकता है क्योंकि यह वाला डिकिन्स तो उनसे सदियों पहले खुद शैतान का पर्याय हुआ करता था।
जहां, एक और महान अंग्रेजी नाटककार शेक्सपियर ने अपने लोकप्रिय नाटक रोमियो और जूलियट के माध्यम से दुनिया भर के प्रेमियों को अपने काल्पनिक पात्रों की सामान्य पहचान में बांधा है, भारतीय उपमहाद्वीप की  महान  प्रेमी जोड़ियाँ, हीररांझा और सोहनीमहिवाल वास्तव में हाड़मांस और खून से बने थे। संयोग से, हीर जिसे पूर्व की जूलियट माना जाता है, उसे मरने के बाद मेरे दादाजी, लाला पंजू राम सहगल की झंग जिले में उनके स्वामित्व वाले खेत की ज़मीन पर दफनाया गया था, जिसे वह देश के विभाजन पर पाकिस्तान में छोड़ आए थे। रांझा की प्यारी हीर को अब पाकिस्तान में माई हीर के रूप में सम्मानित किया जाता है और उसके  दफन स्थल पर एक मकबरा भी बनाया गया है। इसी तरह, पाकिस्तान के लाहौर में एक और ऐसे व्यक्ति का मकबरा हम सब छोड़ आए हैं जिसकी स्मृति इस कहावत में अमर हैजो सुख छज्जू दे चौबारे, बल्ख बुखारेजिसका अर्थ है कि हम दुनिया भर में कहीं भी चले जाएँ, असली आराम तो केवल अपने घर में ही मिलता है। 
छज्जू भाटिया एक सुनार था जिसका व्यवसाय मुगल बादशाह जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में फलाफूला। उसने अपने आरामदायक जीवन को त्याग दिया और एक भगत या भक्त बन गया।  परोपकारी कामों के लिए हिंदुओं और मुसलमानों दोनों द्वारा उसका अनुसरण किया गया और सम्मान दिया गया। उसने अपना शेष जीवन प्रसिद्ध अनारकली रोड के पास लाहोर में अपने आवास पर ईश्वर के ध्यान में बिताया। किंवदंती है कि 1696 के दौरान छज्जू भगत ध्यान करते हुए अपने कक्ष से गायब हो गया था।  भंगी सरदार के समय में छज्जू के आवास में एक मंदिर और एक सराय का निर्माण किया गया था, जिसे बाद में छज्जू दा चौबारा के नाम से जाना जाने लगा। महाराजा रणजीत सिंह हर  सोमवार को इसका दौरा करते थे और परिसर के विस्तार और रखरखाव के लिए अनुदान और जमीन देते थे और जरूरतमंदों और आगंतुकों को भोजन भी देते थे। यह कहावत खुशी और संतुष्टि की उस भावना से आती है जो छज्जू ने अपने आवास या चौबारे के विनम्र परिवेश में अपने साधारण जीवन से प्राप्त की थी, भले ही एक समय पर शहर के अमीर आदमी होने के कारण वह राजसी विलासिता भी भोग सकता था।
कुछ ऐतिहासिक किरदारों जैसे कि धन्ना सेठ और शेख चिल्ली की सदियाँ बीतने पर  समाज के प्रति असली योगदान को भुलाते हुये उनका नाम किसी और ही प्रसंग में हल्के स्वरूप में जोड़ा जाने लगा है।  धन्ना सेठ कोई अमीर कारोबारी नहीं था बल्कि उसका जन्म 1415 में राजस्थान के टोंक जिले एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।  उसकी कृष्ण भक्ति और साधूसंतों की सेवा के लिए लोग उसका खूब सम्मान करने लगे। जब समाज सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हुये वह मंदिर, धर्मशालाएँ, तालाब, बावड़िओं, कुओं आदि का निर्माण कराने लगा तो लोग उसे धन्ना सेठ बुलाने लगे। मुहावरे के चरितार्थ में अब कोई अगर यूं ही पैसा लुटाने लगे तो उसे धन्ना सेठ की उपाधि दे दी जाती है।  वहीं मुहावरे का शेख चिल्ली वह कहलाता है जो अक्सर हवाई किले बनाता है हालांकि ऐतिहासिक शेख चिल्ली जिसका नाम शायद अब्दुर रहीम या अब्दुल करिमोर अब्दुर रज़ाक था और वो एक सूफी संत था जो सतारवीं सदी  में शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह का आध्यात्मिक गुरु था, उसमे किसी ऐसी प्रवृति का इतिहास में कोई जिक्र नहीं मिलता   राज घराने का सरंक्षण होने के कारण उसके मरने के बाद शाही परिवार ने आज के कुरुषेत्र जिले के थानेसर शहर में उसका शानदार मकबरा बनाया गया जिसे हरियाणा का ताज महल भी कहा जाता है। 
एक और कहावत है कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली‘, जो एक दुर्भाग्यपूर्ण और विडंबनापूर्ण अतीत की याद दिलाती है। बारहवीं शताब्दी की शुरुआत में राजा भोज पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र में एक पहाड़ी पर पन्हाला के किले का निर्माण करवा रहे थे। जब निर्माण के दौरान दीवारें लगातार गिरती रहीं, राजा के ज्योतिषी ने पहाड़ के देवताओं को खुश करने के लिए अपने नवजात शिशु के साथ एक महिला की बलि देने का उपाय बताया। पेशे से तेली या तेल विक्रेता गंगू की पत्नी जक्कूबाई उस समय अकेली थीं जिसने तब बच्चे को जन्म दिया था। मजबूरन, गंगू तेली ने यह बलिदान दिया। इस बात की गवाही देता किले के अंदर जक्कूबाई और उसके नवजात बच्चे का मकबरा आज भी मौजूद है। कहावत का महत्व उन दोनों के बीच के आर्थिक और सामाजिक विशाल अंतर को याद दिलाने के लिए है क्योंकि गंगू तेली ने तब मन में अहंकार की भावना को पाला था कि यह वही अकेला था जो राजा भोज को उसकी परेशानी से बचाने की ताकत रखता था।
आपको बताता चलूँ कि यह सब जानकारी जुटाने के बाद अब यह पता लगाने के लिए शोध कार्य में गंभीरता से जुटा हूं कि आखिर यह पौराणिक नर्तकी राधा कौन थी, जो अपने अंगों को अदाओं से हिलाकर तभी प्रसन्न हो सकती थी अगर कोई उसके भारी प्रदर्शन शुल्क के रूप में पूरे नौ मन तेल की व्यवस्था करे। हालांकि मेरी अभी तक की शोध के अनुसार तो राधा  को नाचगाने की कला से कुछ लेनादेना था और ही वह अपने जीवन काल में कभी नाची भी होगी वरना  ऐसी चुनौती भरी कहावत ना नौ मन तेल होगा; ना राधा नाचेगी’  बनती ही क्योंकि आजकल के आसमान छूते तेल के दामों के चलते उन दिनों भी हर हाल में सिर्फ किसी को नाचते हुए  देखने के लिए नौ मन तेल की व्यवस्था करना असंभव नहीं तो असंगत तो जरूर रहा होगा। 
बिमल सहगल
बिमल सहगल
नवंबर 1954 में दिल्ली में जन्मे बिमल सहगल, आई एफ एस (सेवानिवृत्त) ने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स के साथ स्नातक होने के बाद, वह विदेश मंत्रालय में मुख्यालय और विदेशों में स्तिथ विभिन्न भारतीय राजदूतवासों में एक राजनयिक के रूप में सेवा करने के लिए शामिल हो गए। ओमान में भारत के उप राजदूत के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने जुलाई, 2021 तक विदेश मंत्रालय को परामर्श सेवाएं प्रदान करना जारी रखा। कॉलेज के दिनों से ही लेखन के प्रति रुझान होने से, उन्होंने 1973-74 में छात्र संवाददाता के रूप में दिल्ली प्रेस ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन्स में शामिल होकर ‘मुक्ता’ नामक पत्रिका में 'विश्वविद्यालयों के प्रांगण से' कॉलम के लिए रिपोर्टिंग की। अखबारों और पत्रिकाओं के साथ लगभग 50 वर्षों के जुड़ाव के साथ, उन्होंने भारत और विदेशों में प्रमुख प्रकाशन गृहों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भारत व विदेशों में उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। अंत में, 2014-17 के दौरान ओमान ऑब्जर्वर अखबार के लिए एक साप्ताहिक कॉलम लिखा। संपर्क - [email protected]
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7 टिप्पणी

  1. बिमल सहगल जी का लेख और शोधकार्य ‘आओ मिले मुहावरी महानुभावों से’ मुहावरों के उद्गम और प्रचलन को काफी सुरुचिपूर्ण, ज्ञानवर्धक बनाता और विषय के अनछुए पहलुओं से पाठक का परिचय एवं ध्यान आकर्षित कराता हैं। निसंदेह हम सब अपने दैनिक जीवन और साधारण बोल-चाल में ना जाने कितने ही मुहावरों का अनायास ही प्रयोग करते हैं बगैर ये जाने कि आखिर ये कहावतें और लोकोतियां आखिर प्रचलन में आई कहाँ से? कितने ही मुहावरें हमने अपने बुजुर्गों और अपने आसपास के परिवेश से सुनकर प्रयोग में लाए । इस बात से पूर्णत:अनभिज्ञ कि आखिर ये कहावतें क्यों बनी?
    विषय की जड़ तक जाकर उनके उद्गम को प्रचलन को उजागर करता बिमल सहगल जी का ये शोधकार्य काफी प्रशंसनीय और सराहनीय हैं। उनके इस अप्रत्याशित सफल अन्वेषण को अनंत साधुवाद।
    आधुनिक समाज में प्रचलित अनेक

  2. अद्भुत अनुसंधान और मनोरंजक लेख है । लेकिन ये प्रयास चलते रहे तो अच्छा है क्योंकी ऐसा और भी बहुत कुछ जाने की इच्छा बढ़ जाती है ये पढ़ने के बाद

  3. बेहतरीन सार्थक और रोचक जानकारी से सराबोर करता एक शानदार आलेख।
    आज के युवाओं को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि पढ़ने का आनंद क्या होता है,तभी जान पाएंगे।

  4. आपको अक्सर पुरवाई में पढ़ते रहते हैं।
    इस बार आपके शीर्षक ने ज्यादा आकर्षित किया,*”आओ मिलें मुहावरी- महानुभावों से”* और जब लेख पढ़ा तो लगा कि अगर यह पढ़ने से छूट जाता तो बहुत कीमती कुछ से वंचित रह जाते।

  5. मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियाँ सिर्फ भाषा के सौंदर्य को ही नहीं बढ़ातीं, बल्कि बहुत बड़े कथ्य या भाव को कम शब्दों में बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त ही नहीं करतीं, दिलचस्प भी बना देती हैं, जैसा कि आपने लिखा भी है।

    इस क्षेत्र में सबसे पहले दूरदर्शन ने पहल की थी। शृंखलाबाद तरीके से मुहावरों के पीछे की कहानियों को सुनाया गया था।
    उसके बाद आज दूसरी बार आपको पढ़कर काफी कुछ जान पाए।
    धन्ना सेठ, शेखचिल्ली, कहाँ राजा भोज ,कहाँ गंगू तेली से जुड़ी कहानियों को पढ़ा और समृद्ध हुए।
    पीपिंग टॉम की कहानी पहली बार जानी।
    दिव्य न्याय की जानकारी ने आश्चर्यचकित किया। ऐसा लगा कि काश आज के समय में उसकी व्यवस्था हो पाती।
    डाउटिंग थॉमस के बारे में जाना, व्हाट द डिकिन्स के बारे में जाना।
    हीर-रांझा और सोहनी महिवाल के बारे में जाना।
    यह जानना तो वाकई दिलचस्प रहा कि
    ”हीर” जिसे पूर्व की जूलियट माना जाता है, उसे मरने के बाद आपके दादाजी, लाला पंजू राम सहगल की झंग जिले में उनके स्वामित्व वाले खेत की ज़मीन पर दफनाया गया था, जिसे वह देश के विभाजन पर पाकिस्तान में छोड़ आए थे। हीर को अब पाकिस्तान में माई हीर के नाम से सम्मानित किया जाता है।

    पाकिस्तान के लाहौर में एक स्मृति और जिसकी कहावत है– *‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, न बल्ख न बुखारे‘* जिसका अर्थ है कि हम दुनिया भर में कहीं भी चले जाएँ, असली आराम तो केवल अपने घर में ही मिलता है।
    जानना भी काफी दिलचस्प लगा।

    इस बार आपके इस लेख ने काफी प्रभावित किया ।हम चाहेंगे कि समूह के सभी लोग इस लेख को पढ़ें।
    इतनी महत्वपूर्ण जानकारी के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया ।
    अब हमें इंतजार रहेगा इस जानकारी के लिए कि,”न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।”
    इसके पीछे की कहानी क्या है?
    आपका यह शोध कार्य काफी सार्थक रह!
    बहुत-बहुत बधाई सर आपको।
    हम आपके इस लेख को अपने उन साहित्यिक मित्रों से शेअर करेंगे जो हिंदी के प्रति ज्यादा जागरूक हैं और रुचि रखते हैं।
    एक बात और…. राजस्थान के टोंक जिले से हमारा काफी लगाव है!!
    इस प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का दिल से शुक्रिया।
    पुरवाई की संपादकीय टीम के भी हम दिल से शुक्रगुजार हैं इस चयन के लिये।

  6. वाक्पटुता के सारगर्भित साधन और सहायक मुहावरे सामयिक बोलचाल की भाषा से प्रायः लुप्त ही हुए जा रहे हैं। जहां पुरानी पीढ़ियों के लोग उनका भरपूर इस्तेमाल करते थे, आज की माडर्न पीढ़ी इनके स्तोत्र को तो छोड़ें उनके अस्तित्व से भी अनभिज्ञ ही रहते हैं। आलेख का अभिप्राय मनोरंजक शैली में मुहावरों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा पाठकों तक पहुंचा उन्हें इनके उपयोग द्वारा इन्हें जीवित रखने का प्रयास है।
    मेरा आभार सर्वश्री नरेश कुमार निर्वाण, शैलेन्द्र गोयल, सूर्यकांत शर्मा और श्रीमती नीलिमा करैया सहित समस्त पाठकों को और संपादकीय मंडल को जो इस प्रयत्न में जुड़े और अपनी प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित किया।

    बिमल सहगल

  7. वाक्पटुता के सारगर्भित साधन और सहायक मुहावरे सामयिक बोलचाल की भाषा से प्रायः लुप्त ही हुए जा रहे हैं। जहां पुरानी पीढ़ियों के लोग उनका भरपूर इस्तेमाल करते थे, आज की माडर्न पीढ़ी इनके स्तोत्र को तो छोड़ें उनके अस्तित्व से भी अनभिज्ञ ही रहते हैं। आलेख का अभिप्राय मनोरंजक शैली में मुहावरों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा पाठकों तक पहुंचा उन्हें इनके उपयोग द्वारा इन्हें जीवित रखने का प्रयास है।
    मेरा आभार सर्वश्री नरेश कुमार निर्वाण, शैलेन्द्र गोयल, सूर्यकांत शर्मा और श्रीमती नीलिमा करैया सहित समस्त पाठकों को और संपादकीय मंडल को जो इस प्रयत्न में जुड़े और अपनी प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित किया।

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