जब आज से अट्ठाईस वर्ष पहले अमेरिका की धरती पर आना हुआ तो भिन्न और नए समाज, परिवेश और वातावरण में रहने पर महसूस हुआ कि, खुद को स्थापित करने के लिए और नए समाज का हिस्सा बनने हेतु, हम प्रवासियों को कितनी जद्दोजहद से गुजरना होता है, कम या ज्यादा यह तो आपकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर है। आज तो बहुत सी सुविधाएँ है पर उस जमाने में उतने संसाधन नहीं थे। एक मिट्टी से दूसरी नयी मिट्टी में रोंपने पर तो पौधे भी तकलीफ पाते हैं फिर हम तो संवेदनशील इंसान हैं। अमेरिका आने के बाद नए समाज ने और परिवेश ने अलग किस्म की चुनौतियाँ तो दी, मगर समुंदर लांघ आने के बाद दरिया का डर कहाँ सता पाया। खुद ही एक समाचार-पत्र काफी साल चलाया। उस अनुभव ने यह सिखाया कि, अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है। जब में विदेश आयी तो हिंदी बोलने वालों को ढूँढना पड़ता था। हिन्दी न के बराबर थी, तो लगा कि लेखन के साथ हिंदी को प्रोमोट करने के लिए भी कुछ काम करना है। चूंकि मुझे हिंदी से लगाव था, हिंदी में लिखती रहती हूँ, भारत में सम्पादन भी किया, तो मेरे सम्पादन का अनुभव यहाँ काम आया, इसलिए मैंने यहाँ एक समाचारपत्र निकालना शुरू किया। मेरे पास अनुभव था स्कूल और कॉलेज में पत्रिकाएँ संपादन करती थी। पहले अमेरिका के एक समाचारपत्र में काम किया और बाद में पंद्रह साल तक “यादें” नाम से अपना समाचारपत्र निकाला। कोरोना में समाचारपत्र बंद करना पड़ा, क्योंकि कोरोना में अख़बार निकालना सबसे बड़ी चुनौती पूर्ण काम था। भारत की तरह यहाँ विदेश में अखबार बिकती नहीं है। हिंदी के लिए ग्राहक आज भी नहीं हैं। इसलिए मैंने स्वंय पैसा खर्च करके अखबार निकालना शुरू किया था। यह एक चुनौती भरा कार्य है, खासतौर पर जहां अँग्रेजी का बोलबाला हो। उसके बीच अपनी भाषा की अलख जगाना तो आसान है पर उसे जगाए रखना किसी अग्नि परीक्षा से गुजरने जैसा होता है।
जब कोई लेखक रोज़गार, शिक्षा या अन्य कारणों से अपने देश से बाहर जाकर बसता है, तो उसकी रचनाओं में वहाँ का नया सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और उसके साथ जुड़ा निजी संघर्ष उभर आता है। शुरुवाती दिनों में विदेशी धरती पर रह कर निजी लेखन में, निजी संघर्ष का प्रतिबिम्बन तो अनायास ही आ जाता है, और यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पहचान, भाषा, संस्कृति, अकेलापन, विस्थापन और आत्मसंघर्ष से भी जुड़ा होता है। पहचान का संकट रहता है। नई संस्कृति में अपनी जड़ों और अस्मिता को बचाए रखने की चिंता, संस्कृति-द्वंद्व के दवाब में अपने देश की परंपराएँ बनाम विदेशी समाज की जीवन-शैली को अपनाने का संघर्ष और फिर भावनात्मक अकेलापन, परिवार, मित्रों और मातृभूमि से दूरी का दर्द। भाषायी कठिनाई, अभिव्यक्ति की सीमाएँ और संवाद का सघर्ष। आर्थिक/पेशागत दबाव, स्थिरता पाने की जद्दोजहद। यह संघर्ष अक्सर डायरी, आत्मकथा, संस्मरण, कविता और कहानी के रूप में सामने आता है। लेखक का अनुभव व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक बन जाता है, क्योंकि पाठक उसमें अपना भी संघर्ष देख पाता है। “दो दुनियाओं के बीच” होने का भाव ऐसा लेखन प्रवासी जीवन की मानवीय सच्चाइयों को उजागर करता है, वैश्वीकरण के दौर में पहचान के प्रश्न उठाता है और हिंदी साहित्य को नए अनुभव-क्षेत्र प्रदान करता है। विदेशी धरती पर रचा गया निजी लेखन, लेखक के आंतरिक संघर्ष का दर्पण होता है—जिसमें विस्थापन की पीड़ा, आत्मखोज और नई उम्मीदें एक साथ झलकती हैं। मैंने भी इस किस्म के सरोकार अपने लेखन में उठाएं है, खासतौर पर मेरे लघु कथा संग्रह “धूप की मछलियाँ” में सभी लघुकथाएं विदेशी धरती (अमेरिका) और वहां मिलने वाली सामाजिक और पारिवारिक पीड़ाओं तथा विदेशी धरती पर महिलाओं के संघर्ष पर आधारित है।
अगर साहित्य की धारा की बात करूँ तो, मेरे विचार से प्रवासी साहित्य आधुनिक हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा है। वैश्वीकरण, रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक कारणों से जब लेखक अपने देश से बाहर जाकर बसते हैं, तब उनके अनुभव, संवेदनाएँ और संघर्ष साहित्य में एक नए रूप में अभिव्यक्त होते हैं। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण प्रवासी साहित्य को मुख्यधारा के साहित्य से अलग श्रेणीबद्ध करना आवश्यक प्रतीत होता है:
पहला, प्रवासी साहित्य का अनुभव क्षेत्र अलग होता है। इसमें विस्थापन की पीड़ा, पहचान का संकट, सांस्कृतिक टकराव, भाषा की समस्या और दो संस्कृतियों के बीच जीने की विवशता जैसे विषय प्रमुख होते हैं, जो मुख्यधारा के साहित्य में सीमित रूप में मिलते हैं।
दूसरा, प्रवासी साहित्य में देश और विदेश की द्वंद्वात्मक चेतना दिखाई देती है। लेखक एक ओर अपनी मातृभूमि से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है, वहीं दूसरी ओर नई भूमि की सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं से जूझता है। यह द्वैत मुख्यधारा के साहित्य से इसे अलग पहचान देता है।
तीसरा, प्रवासी साहित्य ने हिंदी साहित्य को वैश्विक विस्तार प्रदान किया है। इसने हिंदी को केवल भारत तक सीमित न रखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई है, जो इसे स्वतंत्र अध्ययन की माँग करता है।
चौथा, यदि प्रवासी साहित्य को अलग श्रेणी नहीं दी जाती, तो उसकी विशिष्ट समस्याएँ और उपलब्धियाँ मुख्यधारा में दबकर रह जाती हैं। अलग श्रेणीबद्ध करने से उसके मूल्यांकन, शोध और आलोचना को उचित दिशा मिलती है। प्रवासी साहित्य और मुख्यधारा का साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। फिर भी, अपने विशिष्ट अनुभव, संवेदना और वैश्विक दृष्टि के कारण प्रवासी साहित्य को अलग श्रेणी में रखना साहित्यिक दृष्टि से उचित और आवश्यक है।
मेरे लिये प्रवासी साहित्य एक विकास यात्रा है। मैं साहित्य के साथ-साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में जी जान से जुटी हैं, साथ ही अन्य प्रवासी हिन्दी साहित्यकार की भूमिका भी प्रमुख है, जिन्होंने विदेशों में रहते हुए भी अपनी भाषा से जुड़े रहकर हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया, फिर चाहे वो कहानी, कविता, नाटक, नृत्य और पत्र-पत्रिकाएँ हों या हिन्दी को पढ़ाना हो।
हिंदी का प्रवासी साहित्य आज केवल हाशिये की रचना-धारा नहीं रहा, बल्कि वह मुख्यधारा के साहित्य के समानांतर खड़ा एक सशक्त स्वर बन चुका है। यह साहित्य न तो पूरी तरह देश के साहित्य से कटता है और न ही विदेशी साहित्य में विलीन होता है—बल्कि यह दो संस्कृतियों के संगम स्थल पर ठहरता है।
प्रवासी साहित्य का ठहराव अनुभव और संवेदना के स्तर पर है। इसमें विस्थापन, पहचान-संकट, स्मृतियाँ, जड़ें, भाषा और आत्मसंघर्ष जैसे प्रश्न केंद्रीय हैं। ये अनुभव वैश्विक हैं, इसलिए इसका साहित्यिक महत्व सीमित नहीं रह जाता। यह साहित्य संस्कृति के सेतु की भूमिका निभाता है। प्रवासी लेखक अपनी मातृसंस्कृति को नए देश की सामाजिक संरचना के साथ संवाद में लाता है। इस कारण इसका ठहराव किसी एक भूगोल में नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना में होता है।
यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी साहित्य अभी भी पूर्ण स्वीकृति और व्यवस्थित मूल्यांकन की प्रक्रिया में है। कहीं-कहीं आत्मकथात्मकता, nostalgia और सीमित विषय-वृत्त के कारण इसकी रचनाएँ प्रश्नों के घेरे में आती हैं, पर इससे इसकी प्रासंगिकता कम नहीं होती।
आज प्रवासी साहित्य हिंदी साहित्य को नए विषय, नई दृष्टि और नया पाठक वर्ग प्रदान कर रहा है। इसलिए इसका ठहराव न तो परिधि पर है और न ही पूरी तरह केंद्र में—बल्कि यह केंद्र की ओर बढ़ती हुई स्वतंत्र धारा के रूप में स्थापित हो रहा है। हमारा प्रवासी साहित्य उस बिंदु पर ठहरता है जहाँ स्मृति और यथार्थ, देश और विदेश, जड़ें और उड़ान एक-दूसरे से संवाद करते हैं। यह हिंदी साहित्य के विस्तार और वैश्वीकरण का सशक्त प्रमाण है।
भारत में प्रवासी साहित्य के प्रति लेखकों की धारणा समय के साथ नकारात्मक जिज्ञासा से सकारात्मक स्वीकार्यता की ओर बढ़ी है। प्रारंभ में इसे मुख्यधारा से अलग, सीमित और आत्मकेंद्रित मानने की प्रवृत्ति थी, किंतु आज इसकी साहित्यिक प्रासंगिकता को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। पहली धारणा, अनेक लेखक प्रवासी साहित्य को वैश्वीकरण की अनिवार्य साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं। उनके अनुसार प्रवासी अनुभव आधुनिक भारतीय समाज की सच्चाई है, इसलिए उसका साहित्य में आना स्वाभाविक है।
दूसरी धारणा, कुछ लेखकों का मानना है कि प्रवासी साहित्य में स्मृतिलोकेन्द्रितता (nostalgia) और व्यक्तिगत अनुभवों की अधिकता है, जिससे सामाजिक यथार्थ का व्यापक चित्रण कभी-कभी सीमित हो जाता है। यह आलोचनात्मक दृष्टि आज भी मौजूद है।
तीसरी धारणा, नई पीढ़ी के लेखक प्रवासी साहित्य को हिंदी की अंतरराष्ट्रीय पहचान से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए यह साहित्य भाषा की सीमा तोड़कर वैश्विक मंच पर हिंदी की उपस्थिति दर्ज कराता है।
चौथी धारणा, अब यह आम मान्यता बनती जा रही है कि प्रवासी साहित्य को न तो कमतर आँका जाना चाहिए और न ही केवल भौगोलिक आधार पर अलग-थलग किया जाना चाहिए, बल्कि उसकी रचनात्मक गुणवत्ता को ही मूल्यांकन का आधार बनाना चाहिए।
भारत में लेखकों के बीच प्रवासी साहित्य को लेकर एक परिपक्व और संतुलित धारणा विकसित हो रही है। इसे अब हाशिये का साहित्य नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की समृद्ध और अपरिहार्य धारा के रूप में देखा जाने लगा है।
हम प्रवासी साहित्यकार जब भी भारत आते है तो भारत के साहित्य प्रेमी प्रवासी साहित्य को लेकर कई दृष्टिकोणों से हमसे संवाद करते हैं। प्रवासी साहित्य, जो उन लेखकों द्वारा लिखा जाता है जो भारत से बाहर रहते हैं, पर भारतीय साहित्य प्रेमी अक्सर विभिन्न पहलुओं से विचार करते हैं। इस संवाद में कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
प्रवासी साहित्य का एक प्रमुख पहलू भारतीय साहित्य प्रेमियों के बीच पहचान और संस्कृति से जुड़ा होता है। प्रवासी लेखक अपने अनुभवों और भारत से बाहर की ज़िंदगी को अपने लेखन में साझा करते हैं। इसके जरिए वे भारतीय संस्कृति और परंपराओं के साथ अपने रिश्ते को और उन पर हुए प्रभाव को व्यक्त करते हैं। साहित्य प्रेमी यह देखना चाहते हैं कि ये लेखक भारत की संस्कृति को किस तरह से अपने नए देश में बनाए रखते हैं या उसमें बदलाव लाते हैं।
भारत के साहित्य प्रेमी अक्सर प्रवासी साहित्य में पश्चिमी सभ्यता और भारतीय परंपराओं के बीच के संघर्ष को लेकर संवाद करते हैं। प्रवासी लेखक उन दोनों संस्कृतियों के बीच झूलते हुए अपने अनुभवों को व्यक्त करते हैं। भारतीय पाठक इसे एक पुल की तरह देख सकते हैं, जो दोनों संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करता है।
प्रवासी साहित्य में “घर” और “प्रवास” के बीच के अंतर को लेकर बहुत गहरे विचार होते हैं। भारतीय साहित्य प्रेमी यह चर्चा करते हैं कि कैसे प्रवासी लेखक अपने घर की यादों को बनाए रखते हैं, और पश्चिमी समाज में रहने के बावजूद वे भारतीयता को किस तरह जीते हैं। यह सवाल भी उठता है कि क्या प्रवासी लेखक पूरी तरह से “भारत” से कट सकते हैं, या वे हमेशा भारतीयता से जुड़ाव महसूस करते हैं।
प्रवासी साहित्य में अक्सर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों का भी गहरा प्रतिबिंब होता है, खासकर उन देशों में जो प्रवासियों की बड़ी संख्या को संजोते हैं। भारतीय साहित्य प्रेमी प्रवासी लेखकों से यह उम्मीद करते हैं कि वे उन मुद्दों को उजागर करें जो समाज के हाशिए पर रहने वाले प्रवासियों को प्रभावित करते हैं, जैसे नस्लवाद, भेदभाव, और उनके अधिकार।
कई भारतीय साहित्य प्रेमी यह सवाल करते हैं कि क्या प्रवासी लेखक अपनी मातृभाषा में लेखन करते हैं या वे अंग्रेज़ी जैसी वैश्विक भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। इस विषय पर अक्सर चर्चा होती है कि प्रवासी साहित्य का वैश्विक प्रभाव उस भाषा की वजह से बढ़ सकता है, लेकिन क्या इसके साथ भारतीय भाषाओं की समृद्धि और साहित्यिक रूपों का नुकसान हो रहा है, यह एक अहम सवाल है।
प्रवासी लेखकों के लेखन में भारतीय समाज और उसकी चुनौतियों का परिष्कृत चित्रण देखा जाता है। यह लेखन भारतीय साहित्य प्रेमियों को एक नए दृष्टिकोण से सोचने पर मजबूर करता है, खासकर जब वे उन मुद्दों पर विचार करते हैं जो प्रवासी अनुभवों से निकलते हैं, जैसे पहचान की समस्या, परिवार का विघटन, और अकेलेपन का अहसास।
कुछ भारतीय साहित्य प्रेमी यह भी महसूस करते हैं कि प्रवासी साहित्य को पूरी तरह से भारतीय साहित्य का हिस्सा माना जाना चाहिए। उनका मानना है कि यह साहित्य भारतीय जीवन की विविधता का एक और आयाम प्रस्तुत करता है और इसे साहित्यिक परंपराओं का विस्तार माना जाना चाहिए।
प्रवासी साहित्य पर शोध भी होता रहा है। भारत में शोधार्थी प्रवासी लेखकों तक पहुंचने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। इस संबंध में शोधार्थियों के लिए कुछ सामान्य तरीके और प्रक्रिया निम्नलिखित हैं:
शोधार्थी पहले प्रवासी लेखकों की कृतियों का गहराई से अध्ययन करते हैं। इन कृतियों में अक्सर लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, सांस्कृतिक धारा और समाजिक-सामाजिक मुद्दे होते हैं। प्रवासी लेखकों की किताबों, निबंधों, कविता संग्रहों, उपन्यासों और कहानी संग्रहों को इकट्ठा करना पहला कदम है।
आजकल बहुत से ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल पुस्तकालय हैं जो प्रवासी लेखकों की कृतियों और उनके बारे में शोध सामग्री उपलब्ध कराते हैं। प्रवासी लेखकों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना और उनसे साक्षात्कार लेना शोध में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। आजकल, लेखक अपनी विचारधारा और लेखन प्रक्रिया को साझा करने के लिए तैयार रहते हैं, खासकर यदि उनका लेखन साहित्यिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है।
सोशल मीडिया (जैसे ट्विटर, लिंक्डइन, फेसबुक) का इस्तेमाल करके लेखकों से संपर्क कर सकते हैं। साहित्यिक आयोजनों, पुस्तक विमोचन, और साहित्यिक सम्मेलन में भी प्रवासी लेखकों से मिल सकते हैं। लेखकों के व्यक्तिगत वेबसाइट या ब्लॉग भी एक अच्छा संपर्क बिंदु हो सकते हैं।
कई प्रवासी लेखक साहित्यिक पत्रिकाओं और जर्नल्स में अपने लेख प्रकाशित करते हैं। शोधार्थी इन पत्रिकाओं और जर्नल्स का अध्ययन करके प्रवासी लेखकों के विचारों, दृष्टिकोणों, और लेखन की प्रवृत्तियों को समझ सकते हैं।
विभिन्न साहित्यिक सम्मेलनों और कार्यशालाओं में प्रवासी लेखक भाग लेते हैं। इनमें से कुछ सम्मेलन विशेष रूप से प्रवासी साहित्य पर केंद्रित होते हैं। शोधार्थी इन आयोजनों में भाग लेकर लेखकों से मिल सकते हैं, उनके साथ चर्चा कर सकते हैं, और उनके विचारों को सीधे तौर पर समझ सकते हैं।
शोधार्थी विभिन्न बड़े-छोटे प्रकाशन संस्थानों से संपर्क कर सकते हैं, जिनके पास प्रवासी लेखकों की पुस्तकों का रिकॉर्ड हो सकता है।
आजकल, बहुत से ऑनलाइन साहित्यिक समुदाय और फोरम्स हैं जहाँ प्रवासी लेखक और साहित्य प्रेमी आपस में विचार साझा करते हैं। शोधार्थी इन फोरम्स का हिस्सा बनकर लेखक से संपर्क कर सकते हैं और उनके लेखन के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रवासी लेखकों पर लिखी गई समीक्षाएँ और आलोचनाएँ भी शोधार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। पुस्तक समीक्षाएँ, आलोचनात्मक लेख, और साक्षात्कार शोधार्थी को लेखक के विचारों और साहित्यिक दृष्टिकोण को समझने में मदद कर सकते हैं।
प्रवासी लेखकों के पास अक्सर अपनी आधिकारिक वेबसाइट होती है, जहाँ वे अपने लेखन, पुरस्कारों, और आगामी कार्यों के बारे में जानकारी देते हैं। इसके अलावा, लेखक के प्रकाशित कार्यों का सूचीकरण भी उनकी वेबसाइट पर मिल सकता है, जो शोध के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
कभी-कभी, प्रवासी लेखकों के बारे में सरकारी रिपोर्ट, सांस्कृतिक आदान-प्रदान से संबंधित दस्तावेज़ या साहित्यिक कार्यक्रमों के रिकॉर्ड में भी जानकारी मिल सकती है। इन दस्तावेजों का अध्ययन करके शोधार्थी एक विस्तृत संदर्भ प्राप्त कर सकते हैं।
यदि शोधार्थी साक्षात्कार करना चाहते हैं, तो उन्हें यह समझने की जरूरत होती है कि प्रवासी लेखक के लिए समय और संदर्भ की स्थिति क्या हो सकती है। कई लेखक इन्विटेशन के आधार पर ही साक्षात्कार देने के लिए तैयार होते हैं, और शोधार्थियों को उनकी कार्यशैली और दृष्टिकोण का आदर करना जरूरी होता है।
कभी-कभी अन्य शोधार्थी जो प्रवासी साहित्य पर काम कर रहे होते हैं, उनके साथ सहयोग करने से भी शोधार्थियों को लेखक तक पहुँचने में मदद मिल सकती है। वे किसी अन्य शोधकर्ता के माध्यम से संपर्क बना सकते हैं या प्रवासी साहित्य पर हो रहे शोध से संबंधित जानकारी पा सकते हैं। भारतीय शोधार्थियों द्वारा प्रवासी साहित्य पर किए गए शोध में, प्रवासी अनुभव को सही तरीके से समझना और उसका न्याय करना एक चुनौती हो सकता है, खासकर जब वे स्वयं प्रवास में नहीं रहे होते हैं। काफी हद तक उस शोधार्थी के दृष्टिकोण, अध्ययन के तरीके और साहित्यिक समझ पर निर्भर करता है।
प्रवासी लेखक अक्सर अपनी कृतियों में जो व्यक्तिगत और भावनात्मक अनुभव साझा करते हैं, उसे पूरी तरह से समझना बिना स्वयं उस स्थिति में रहे हुए कठिन हो सकता है। हालाँकि, एक शोधार्थी साक्षात्कार, ऑनलाइन चर्चा और लेखकों के व्यक्तिगत संस्मरणों का अध्ययन करके इन अनुभवों को समझने की कोशिश कर सकता है। भारत में रहते हुए प्रवासी साहित्य का अध्ययन करना सांस्कृतिक अंतर के कारण थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्रवासी लेखक अपनी कृतियों में पश्चिमी समाज के बारे में बताते हैं, और उन समाजों में उनका अनुभव अलग हो सकता है, जो भारतीय समाज से बहुत अलग होते हैं। भारतीय शोधार्थियों को यह ध्यान रखना पड़ता है कि वे जिस साहित्य पर काम कर रहे हैं, उसमें भारतीय संदर्भ से बाहर के मुद्दे भी हो सकते हैं, जैसे नस्लवाद, प्रवासियों पर उत्पीड़न, या उस देश के समाज की विशेषताएँ।
प्रवासी साहित्य में बहुत से लेखक अपनी मातृभाषा में लिखते हैं, जबकि कई अन्य अंग्रेजी या अन्य भाषाओं का भी उपयोग करते हैं। भारतीय शोधार्थियों को इन विभिन्न भाषाओं और लेखन शैलियों को समझने में कभी-कभी दिक्कत हो सकती है, विशेषकर अगर वे उस भाषा में पारंगत नहीं हैं। हालांकि, अनुवाद और समीक्षा साहित्य का उपयोग करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
हालाँकि, एक भारतीय शोधार्थी द्वारा प्रवासी साहित्य पर शोध करते समय प्रत्यक्ष अनुभव की कमी हो सकती है, लेकिन वास्तविक दूरी कभी-कभी एक विस्तृत और अभूतपूर्व परिप्रेक्ष्य प्रदान कर सकती है। शोधार्थी एक बाहरी दृष्टिकोण से प्रवासी साहित्य को देख सकते हैं और इसके वैश्विक प्रभावों, प्रवास के मनोविज्ञान, और इसकी सापेक्ष सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों को समझने में सक्षम हो सकते हैं। भारतीय शोधार्थी जब यह साहित्य अध्ययन करते हैं, तो वे इसे भारतीय संदर्भ से बाहर निकलकर और एक वैश्विक दृष्टिकोण से देख सकते हैं।
शोधार्थी अगर स्वयं प्रवासी लेखक से साक्षात्कार करने में सक्षम होते हैं, तो यह उनकी समझ को और अधिक गहरा बना सकता है। वे लेखकों से सवाल पूछ सकते हैं कि वे प्रवासियों के जीवन को कैसे समझते हैं, उनके लेखन में किस प्रकार की सांस्कृतिक या राजनीतिक संवेदनाएँ हैं, और उन्होंने जो अनुभव साझा किए हैं, उन्हें वास्तविकता से कितनी हद तक जोड़ा है।
भारतीय शोधार्थी प्रवासी साहित्य का अध्ययन करते समय समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक दृष्टिकोण का सहारा लेकर प्रवासी जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझ सकते हैं। प्रवासी लेखक अक्सर अपने लेखन में ऐतिहासिक घटनाओं, जैसे आधुनिकता, उपनिवेशवाद, आर्थिक उथल-पुथल, और युद्ध के प्रभावों का उल्लेख करते हैं। इन संदर्भों का गहराई से अध्ययन करते हुए, भारतीय शोधार्थी बिना व्यक्तिगत प्रवास अनुभव के भी प्रवासी साहित्य को सही तरीके से समझ सकते हैं।
भारत एक सांस्कृतिक और भाषाई विविधता वाला देश है, और भारतीय शोधार्थी इससे प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि प्रवासी साहित्य में भी सांस्कृतिक भिन्नताएँ, जाति और पहचान के मुद्दे, और वैश्विक समुदायों के बीच की टकराहटें होती हैं। इस दृष्टिकोण से भारतीय शोधार्थी प्रवासी साहित्य को समग्र रूप से समझ सकते हैं और उसे भारतीय साहित्यिक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, भारतीय शोधार्थी प्रवासी साहित्य पर शोध करते समय कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हैं, जैसे प्रत्यक्ष अनुभव की कमी, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ का अंतर, और भाषा के भेद। लेकिन गहन शोध, साक्षात्कार, समीक्षा साहित्य, और वैश्विक दृष्टिकोण अपनाकर वे प्रवासी साहित्य पर न्यायपूर्ण और सटीक शोध कर सकते हैं। उनका अध्ययन जितना गहरा और विविध दृष्टिकोण से होगा, वे उतने ही प्रभावी तरीके से प्रवासी लेखकों और उनके साहित्य को समझने में सक्षम होंगे।
मेरे द्वारा लिखे साहित्य पर भी काफी शोध हुए है और इस दौरान मुझे भी शोधार्थियों के साथ संपर्क बनाएं रखना होता था। मेरे साहित्य पर अब पीएचडी भी हो रही है “डॉ अनिता कपूर के साहित्य में प्रवासी चेतना”।
यह प्रश्न काफी विचारणीय है कि, भारतीय साहित्यकार जो कुछ महीनों या वर्षों के लिए विदेश में रहते हैं और वहां की पृष्ठभूमि को अपने साहित्यिक काम में शामिल करते हैं, उनकी रचनाओं को प्रवासी साहित्य कहा जा सकता है। प्रवासी साहित्य (Diaspora Literature) का मूल अर्थ होता है वह साहित्य जो उन लेखकों द्वारा लिखा जाता है जो अपने देश से बाहर रहते हैं और अपने अनुभवों, संस्कृति, और जीवन की स्थितियों को साझा करते हैं।
प्रवासी साहित्य में लेखक अपने देश की संस्कृति, परंपराओं, और समाज के साथ-साथ विदेश में अपने नए अनुभवों, संघर्षों, पहचान की खोज, और एक नए समाज में समायोजन के विषय पर लिखते हैं। जब भारतीय साहित्यकार विदेश में रहते हुए अपनी रचनाओं में वहां के समाज, संस्कृति, और मानसिकता को शामिल करते हैं, तो उनकी रचनाएँ प्रवासी साहित्य की श्रेणी में आ सकती हैं।
इस प्रकार की रचनाओं में भारतीय समाज और संस्कृति के साथ जुड़ी पहचान की समस्याएँ, विदेश में रहने के दौरान उत्पन्न होने वाली चुनौतियाँ दो संस्कृतियों के बीच संतुलन बनाना, प्रवासी जीवन की मानसिक और सामाजिक कठिनाइयाँ इन सभी मुद्दों को उठाया जा सकता है, जिससे यह साहित्य प्रवासी साहित्य की श्रेणी में आता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर एक भारतीय लेखक जो अमेरिका या यूरोप में रह कर वहां के समाज और अपनी भारतीय जड़ों के बारे में लिखता है, तो उसे प्रवासी साहित्य का हिस्सा माना जा सकता है।
इस प्रकार, विदेश में रहने वाले भारतीय लेखकों की रचनाएँ यदि उनकी पहचान और संस्कृति से संबंधित होती हैं और उसमें विदेशी जीवन के अनुभवों को समाहित किया गया हो, तो उन्हें प्रवासी साहित्य कहा जा सकता है।
विदेशों में रहने वाले भारतीय साहित्यकार अपने लेखन में प्रवासी साहित्य के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव और नए आयाम ला सकते हैं। उनका अनुभव, जो भारतीय संस्कृति और विदेशी समाज के बीच सामंजस्य बनाने के दौरान उत्पन्न होता है, उसे वे अपनी रचनाओं में व्यक्त कर सकते हैं।
विदेशों में रहने वाले भारतीय साहित्यकारों के लेखन में यह दिख सकता है कि वे भारतीयता और पश्चिमी संस्कृति के बीच एक नई पहचान बनाने की कोशिश करते हैं। इससे साहित्य में हाइब्रिड पहचान या अंतर-संस्कृतिक विषयों को प्रमुखता मिलती है।
जब भारतीय लेखक विदेश में रहते हैं, तो वे अक्सर संस्कृतिक टकराव और भाषाई बाधाओं का सामना करते हैं। वे अपनी रचनाओं में इन संघर्षों को व्यक्त कर सकते हैं। जैसे, एक भारतीय लेखक जो पश्चिमी समाज में खुद को एक विदेशी के रूप में देखता है, वह अपने अनुभवों को कहानियों, उपन्यासों या कविताओं के रूप में व्यक्त कर सकता है।
प्रवासी साहित्य में यह सवाल उठता है कि क्या लेखक अब भी अपने देश का हिस्सा हैं या वे पूरी तरह से उस विदेशी समाज में समाहित हो चुके हैं? यह प्रश्न उनके लेखन में गहरे मानसिक और सामाजिक संघर्षों का रूप ले सकता है।
प्रवासी लेखक अपनी मातृभाषा के साथ-साथ विदेशी भाषाओं (जैसे अंग्रेजी) में भी लेखन करते हैं। इससे भाषाई बदलाव होता है और वे भारतीय संस्कृति को विदेशी संदर्भ में व्यक्त करने के लिए नई भाषाओं और शैलियों का इस्तेमाल करते हैं।
उदाहरण के लिए, कुछ लेखक अपनी मूल भाषा में लिखते हुए अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण करते हैं (जिसे हम “हिंग्लिश” कहते हैं), जिससे प्रवासी साहित्य की भाषा अधिक अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक होती है।
प्रवासी साहित्यकार अपने देश के परिप्रेक्ष्य से उबर कर विदेशों के सामाजिक मुद्दों पर भी लिख सकते हैं, जैसे कि नस्लवाद, आर्थिक असमानता, वैश्वीकरण, आत्मनिर्भरता, और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति। इससे प्रवासी साहित्य अधिक समृद्ध और विविध हो सकता है।
विशेष रूप से नई पीढ़ी के भारतीय, जो विदेशों में पैदा होते हैं या पलते-बढ़ते हैं, उनके अनुभव पूरी तरह से भारतीय साहित्य से अलग होते हैं। वे अपनी रचनाओं में अपने देश और विदेशी समाज के प्रति अपनी अनूठी धारणा, संघर्ष और पहचान को व्यक्त करते हैं।
प्रवासी लेखक अक्सर अपनी रचनाओं में नए साहित्यिक शैलियों का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे फ्लैशबैक, नॉन-लिनियर नरेशन, और बहु-आधारित दृष्टिकोण का उपयोग कर सकते हैं, जिससे उनके लेखन में अंतर-समयिक और अंतर-सांस्कृतिक दृष्टिकोणों का मिश्रण हो।
प्रवासी लेखक कई बार अपनी यात्राओं (Physical and emotional journeys) को विशेष रूप से गहराई से व्यक्त करते हैं। यह यात्रा केवल स्थान की नहीं, बल्कि संस्कृतिक और मानसिक स्तर पर भी होती है, जिसमें वे आत्म-पहचान और स्वतंत्रता के बारे में विचार करते हैं।
प्रवासी लेखक अपनी रचनाओं में व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के बीच तनावों को उकेर सकते हैं, जैसे कि घर की यादें, घर की तलाश, या एक नई संस्कृति में स्वीकार्यता की इच्छा। वे विदेशी समाज में रहने की मानसिक स्थिति को अपनी रचनाओं में बखूबी व्यक्त कर सकते हैं, जिससे यह साहित्य अधिक मानवीय और संवेदनशील हो जाता है।
विदेशों में रहने वाले भारतीय साहित्यकार प्रवासी साहित्य में न केवल एक नया दृष्टिकोण लाते हैं, बल्कि वे भारतीय और पश्चिमी समाज के बीच की खाई को पाटने का भी प्रयास करते हैं। उनके अनुभव और विचार साहित्य के रूप में एक अनूठी धारा का निर्माण करते हैं, जो न केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होते हैं। उनकी रचनाओं में नया दृष्टिकोण, नई शैली और गहरी संवेदनशीलता प्रवासी साहित्य को और अधिक समृद्ध और विविध बनाती है।
डॉ अनिता कपूर (कैलिफोर्निया, अमेरिका)
संस्थापक “ग्लोबल हिन्दी ज्योति”, (कैलिफोर्निया, अमेरिका)
अनिता जी
आपका लेख *वक्त ने प्रवासी बना दिया पढ़ा।*
इस बार दीपक गिरकर जी की पुस्तक समीक्षा से कैनेडियन प्रवासी स्टूडेंट्स की पीड़ा महसूस हुई। और आपको पढ़कर कैलिफोर्निया में आपके प्रवास के वक्त का दर्द महसूस हुआ।
प्रवासी जीवन को हम बहुत ज्यादा तेजेन्द्र जी की कहानियों के माध्यम से और थोड़ा बहुत अरुण सब्बरवाल जी को पढ़कर समझ पाए हैं।और लंदन को जान पाए हैं
आज पुरवाई पत्रिका के इस लिंक के माध्यम से कनाडा और कैलिफोर्निया की प्रवास संबंधी परेशानियाँ भी समझ में आईं।
हर देश की संस्कृति व सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ, नियम कानून सब अलग-अलग होते हैं इसलिए अपने देश को छोड़ने के बाद चाहे जहाँ भी, जिस भी देश में जाएँ सबसे पहले इन सब चीजों को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।
तेजेंद्र जी की ढिबरी टाइट कहानी पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा कि सबसे पहले भाषा और कानूनी पेचीदगियों को जानना जरूरी है।
हमें एक बात तो शिद्दत से महसूस हुई कि जैसे हर पौधे की अपनी- अपनी प्रकृति, अपनी मिट्टी,भोगोलिक स्थितियों के अनुरूप आबोहवा इत्यादि जरूरत जरूरी होती है ऐसा न होने पर या तो वह मुरझा जाता है या फिर जीवन के लिये उसे संघर्ष करना पड़ता है। उसे देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रवासी जीवन भी कुछ इसी तरह का लगा।
वैसे तो हर लड़की के लिए उसका जीवन प्रवासी ही है देश नहीं तो क्या हुआ अपना घर अपना शहर तो है जिसे छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है।
लेकिन आपने उस चैलेंज को स्वीकार कर लिया यह बड़ी बात है।
स्वयं को स्थापित करना तो हर व्यक्ति के लिए चेलेंज ही है। पर प्रवास की स्थितियों में यह ज्यादा चैलेंजिंग हो जाता है। यहाँ साहस व संघर्ष के साथ खुद को स्थापित करने के आपके जज्बे को सलामअब जाकर आपकी ‘यादें’और उसका संघर्ष हम सब तक पहुँच पाया।
तेजेन्द्र जी ने एक प्रवासी पत्रिका में प्रवासी साहित्य को तीन भागों में बाँटा है।
1-यहाँ प्रवासी अपने देश व अपनी धरती से जुड़ा रहता है। अपनी भाषा ,संस्कृति और प्रवास का भीगापन, विस्थापन का दुख, आत्म संघर्ष की पीड़ा , अकेलापन ,साहित्य लेखन के प्रथम प्रयासों में दर्ज होता है।
2-जब वहाँ के परिवेश में ढलने लगते हैं, समझने लगते हैं अपने आप को उस माहौल के अनुरूप ढाल लेते हैं तब साहित्य में अपने देश के साथ ही प्रवासी देश भी प्रवेश करता है।
3-तीसरी स्थिति में पूरी तरह से वह देश अपना लिया जाता है हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है और यह प्रेम साहित्य सृजन में पूरी तरह उतर जाता है।
वैश्विक विस्तार की दृष्टि से प्रवासी साहित्य निश्चित रूप से मुख्य धारा के समानांतर ही है।
1986 में ‘नाम’ पिक्चर आई थी। प्रवास का दर्द कैसा होता है बहुत गहराई से इसमें महसूस हुआ था ।पिक्चर देखते हुए शायद सारी पब्लिक ही रो रही थी। उस समय विदेश भारतीयों के लिए संभवतः स्वप्न में भी नहीं हुआ करते थे। महत्वाकांक्षाओं की इतनी दौड़ और चाहत भी नहीं थी,जितनी अब है। पंकज उदास का गाना “चिट्ठी आई है” सबसे मार्मिक पल था। बेहद संवेदनशील पिक्चर थी। उस पिक्चर को देखकर शायद हर माँ ने विचार किया होगा कि अपने बच्चों को विदेश कभी नहीं भेजेगी।
पर आजकल दुनिया बहुत करीब हो गए है।
जितना हम समझ पाए, प्रवास और प्रवासी साहित्य का सबसे प्रबल और महत्व पूर्ण पक्ष संवेदना ही है।संवेदनाएँ सबकी एक सी होती है प्रकार भले ही अलग-अलग हो न।
जहाँ तक विधा का सवाल है, यह लेखक की अपनी शैली और भाव के अनुरूप चयनित होता है!
लेखक इतना तो स्वयं को पहचानता ही है कि वह अपनी बात को किस तरह और किस विधा में कुशलता से कह पाएगा जिससे वह प्रभावशाली बन पाए।
इन सबके बीच अगर कोई बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है तो वह यह कि भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले हिंदी प्रेमी अनन्य साहित्यकारों की वजह से ही आज हिंदी भाषा विश्व में अपने कदम दृढ़ कर पोषित और पल्लवित हो रही है। विदेशों में हिंदी का परचम फहराने में भरतेत्तर साहित्यकारों का अनमोल परिश्रम है।
आपके लिए बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएँ और इस लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।
प्रवासी जीवन को हम बहुत ज्यादा तेजेन्द्र जी की कहानियों के माध्यम से और थोड़ा बहुत अरुण सब्बरवाल जी को पढ़कर समझ पाए हैं।और लंदन को जान पाए हैं
अनिता जी !आपका लेख वक्त ने प्रवासी बना दिया पढ़कर आपके संघर्ष को जाना ।
इस बार दीपक गिरकर जी की पुस्तक समीक्षा से कैनेडियन प्रवासी स्टूडेंट्स की पीड़ा महसूस हुई। और आपको पढ़कर कैलिफोर्निया में आपके प्रवास के वक्त का दर्द महसूस हुआ।
आज पुरवाई पत्रिका के इस लिंक के माध्यम से कनाडा और कैलिफोर्निया की प्रवास संबंधी परेशानियाँ भी समझ में आईं।
हर देश की संस्कृति व सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ, नियम कानून सब अलग-अलग होते हैं इसलिए अपने देश को छोड़ने के बाद चाहे जहाँ भी, जिस भी देश में जाएँ सबसे पहले इन सब चीजों को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।
तेजेंद्र जी की ढिबरी टाइट कहानी पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा कि सबसे पहले भाषा और कानूनी पेचीदगियों को जानना जरूरी है।
हमें एक बात तो शिद्दत से महसूस हुई कि जैसे हर पौधे की अपनी- अपनी प्रकृति, अपनी मिट्टी,भोगोलिक स्थितियों के अनुरूप आबोहवा इत्यादि जरूरत जरूरी होती है ऐसा न होने पर या तो वह मुरझा जाता है या फिर जीवन के लिये उसे संघर्ष करना पड़ता है। उसे देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रवासी जीवन भी कुछ इसी तरह का लगा।
वैसे तो हर लड़की के लिए उसका जीवन प्रवासी ही है देश नहीं तो क्या हुआ अपना घर अपना शहर तो है जिसे छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है।
लेकिन आपने उस चैलेंज को स्वीकार कर लिया यह बड़ी बात है।
स्वयं को स्थापित करना तो हर व्यक्ति के लिए चेलेंज ही है। पर प्रवास की स्थितियों में यह ज्यादा चैलेंजिंग हो जाता है। यहाँ साहस व संघर्ष के साथ खुद को स्थापित करने के आपके जज्बे को सलामअब जाकर आपकी ‘यादें’और उसका संघर्ष हम सब तक पहुँच पाया।
तेजेन्द्र जी ने एक प्रवासी पत्रिका में प्रवासी साहित्य को तीन भागों में बाँटा है।
1-यहाँ प्रवासी अपने देश व अपनी धरती से जुड़ा रहता है। अपनी भाषा ,संस्कृति और प्रवास का भीगापन, विस्थापन का दुख, आत्म संघर्ष की पीड़ा , अकेलापन ,साहित्य लेखन के प्रथम प्रयासों में दर्ज होता है।
2-जब वहाँ के परिवेश में ढलने लगते हैं, समझने लगते हैं अपने आप को उस माहौल के अनुरूप ढाल लेते हैं तब साहित्य में अपने देश के साथ ही प्रवासी देश भी प्रवेश करता है।
3-तीसरी स्थिति में पूरी तरह से वह देश अपना लिया जाता है हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है और यह प्रेम साहित्य सृजन में पूरी तरह उतर जाता है।
वैश्विक विस्तार की दृष्टि से प्रवासी साहित्य निश्चित रूप से मुख्य धारा के समानांतर ही है।
1986 में ‘नाम’ पिक्चर आई थी। प्रवास का दर्द कैसा होता है बहुत गहराई से इसमें महसूस हुआ था ।पिक्चर देखते हुए शायद सारी पब्लिक ही रो रही थी। उस समय विदेश भारतीयों के लिए संभवतः स्वप्न में भी नहीं हुआ करते थे। महत्वाकांक्षाओं की इतनी दौड़ और चाहत भी नहीं थी,जितनी अब है। पंकज उदास का गाना “चिट्ठी आई है” सबसे मार्मिक पल था। बेहद संवेदनशील पिक्चर थी। उस पिक्चर को देखकर शायद हर माँ ने विचार किया होगा कि अपने बच्चों को विदेश कभी नहीं भेजेगी।
पर आजकल दुनिया बहुत करीब हो गए है।
जितना हम समझ पाए, प्रवास और प्रवासी साहित्य का सबसे प्रबल और महत्व पूर्ण पक्ष संवेदना ही है।संवेदनाएँ सबकी एक सी होती है प्रकार भले ही अलग-अलग हो न।
जहाँ तक विधा का सवाल है, यह लेखक की अपनी शैली और भाव के अनुरूप चयनित होता है!
लेखक इतना तो स्वयं को पहचानता ही है कि वह अपनी बात को किस तरह और किस विधा में कुशलता से कह पाएगा जिससे वह प्रभावशाली बन पाए।
इन सबके बीच अगर कोई बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है तो वह यह कि भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले हिंदी प्रेमी अनन्य साहित्यकारों की वजह से ही आज हिंदी भाषा विश्व में अपने कदम दृढ़ कर पोषित और पल्लवित हो रही है। विदेशों में हिंदी का परचम फहराने में भरतेत्तर साहित्यकारों का अनमोल परिश्रम है।
आपके लिए बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएँ और इस लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।
बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता सुंदर आलेख।
अनिता जी
आपका लेख *वक्त ने प्रवासी बना दिया पढ़ा।*
इस बार दीपक गिरकर जी की पुस्तक समीक्षा से कैनेडियन प्रवासी स्टूडेंट्स की पीड़ा महसूस हुई। और आपको पढ़कर कैलिफोर्निया में आपके प्रवास के वक्त का दर्द महसूस हुआ।
प्रवासी जीवन को हम बहुत ज्यादा तेजेन्द्र जी की कहानियों के माध्यम से और थोड़ा बहुत अरुण सब्बरवाल जी को पढ़कर समझ पाए हैं।और लंदन को जान पाए हैं
आज पुरवाई पत्रिका के इस लिंक के माध्यम से कनाडा और कैलिफोर्निया की प्रवास संबंधी परेशानियाँ भी समझ में आईं।
हर देश की संस्कृति व सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ, नियम कानून सब अलग-अलग होते हैं इसलिए अपने देश को छोड़ने के बाद चाहे जहाँ भी, जिस भी देश में जाएँ सबसे पहले इन सब चीजों को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।
तेजेंद्र जी की ढिबरी टाइट कहानी पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा कि सबसे पहले भाषा और कानूनी पेचीदगियों को जानना जरूरी है।
हमें एक बात तो शिद्दत से महसूस हुई कि जैसे हर पौधे की अपनी- अपनी प्रकृति, अपनी मिट्टी,भोगोलिक स्थितियों के अनुरूप आबोहवा इत्यादि जरूरत जरूरी होती है ऐसा न होने पर या तो वह मुरझा जाता है या फिर जीवन के लिये उसे संघर्ष करना पड़ता है। उसे देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रवासी जीवन भी कुछ इसी तरह का लगा।
वैसे तो हर लड़की के लिए उसका जीवन प्रवासी ही है देश नहीं तो क्या हुआ अपना घर अपना शहर तो है जिसे छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है।
लेकिन आपने उस चैलेंज को स्वीकार कर लिया यह बड़ी बात है।
स्वयं को स्थापित करना तो हर व्यक्ति के लिए चेलेंज ही है। पर प्रवास की स्थितियों में यह ज्यादा चैलेंजिंग हो जाता है। यहाँ साहस व संघर्ष के साथ खुद को स्थापित करने के आपके जज्बे को सलामअब जाकर आपकी ‘यादें’और उसका संघर्ष हम सब तक पहुँच पाया।
तेजेन्द्र जी ने एक प्रवासी पत्रिका में प्रवासी साहित्य को तीन भागों में बाँटा है।
1-यहाँ प्रवासी अपने देश व अपनी धरती से जुड़ा रहता है। अपनी भाषा ,संस्कृति और प्रवास का भीगापन, विस्थापन का दुख, आत्म संघर्ष की पीड़ा , अकेलापन ,साहित्य लेखन के प्रथम प्रयासों में दर्ज होता है।
2-जब वहाँ के परिवेश में ढलने लगते हैं, समझने लगते हैं अपने आप को उस माहौल के अनुरूप ढाल लेते हैं तब साहित्य में अपने देश के साथ ही प्रवासी देश भी प्रवेश करता है।
3-तीसरी स्थिति में पूरी तरह से वह देश अपना लिया जाता है हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है और यह प्रेम साहित्य सृजन में पूरी तरह उतर जाता है।
वैश्विक विस्तार की दृष्टि से प्रवासी साहित्य निश्चित रूप से मुख्य धारा के समानांतर ही है।
1986 में ‘नाम’ पिक्चर आई थी। प्रवास का दर्द कैसा होता है बहुत गहराई से इसमें महसूस हुआ था ।पिक्चर देखते हुए शायद सारी पब्लिक ही रो रही थी। उस समय विदेश भारतीयों के लिए संभवतः स्वप्न में भी नहीं हुआ करते थे। महत्वाकांक्षाओं की इतनी दौड़ और चाहत भी नहीं थी,जितनी अब है। पंकज उदास का गाना “चिट्ठी आई है” सबसे मार्मिक पल था। बेहद संवेदनशील पिक्चर थी। उस पिक्चर को देखकर शायद हर माँ ने विचार किया होगा कि अपने बच्चों को विदेश कभी नहीं भेजेगी।
पर आजकल दुनिया बहुत करीब हो गए है।
जितना हम समझ पाए, प्रवास और प्रवासी साहित्य का सबसे प्रबल और महत्व पूर्ण पक्ष संवेदना ही है।संवेदनाएँ सबकी एक सी होती है प्रकार भले ही अलग-अलग हो न।
जहाँ तक विधा का सवाल है, यह लेखक की अपनी शैली और भाव के अनुरूप चयनित होता है!
लेखक इतना तो स्वयं को पहचानता ही है कि वह अपनी बात को किस तरह और किस विधा में कुशलता से कह पाएगा जिससे वह प्रभावशाली बन पाए।
इन सबके बीच अगर कोई बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है तो वह यह कि भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले हिंदी प्रेमी अनन्य साहित्यकारों की वजह से ही आज हिंदी भाषा विश्व में अपने कदम दृढ़ कर पोषित और पल्लवित हो रही है। विदेशों में हिंदी का परचम फहराने में भरतेत्तर साहित्यकारों का अनमोल परिश्रम है।
आपके लिए बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएँ और इस लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।
प्रवासी जीवन को हम बहुत ज्यादा तेजेन्द्र जी की कहानियों के माध्यम से और थोड़ा बहुत अरुण सब्बरवाल जी को पढ़कर समझ पाए हैं।और लंदन को जान पाए हैं
अनिता जी !आपका लेख वक्त ने प्रवासी बना दिया पढ़कर आपके संघर्ष को जाना ।
इस बार दीपक गिरकर जी की पुस्तक समीक्षा से कैनेडियन प्रवासी स्टूडेंट्स की पीड़ा महसूस हुई। और आपको पढ़कर कैलिफोर्निया में आपके प्रवास के वक्त का दर्द महसूस हुआ।
आज पुरवाई पत्रिका के इस लिंक के माध्यम से कनाडा और कैलिफोर्निया की प्रवास संबंधी परेशानियाँ भी समझ में आईं।
हर देश की संस्कृति व सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ, नियम कानून सब अलग-अलग होते हैं इसलिए अपने देश को छोड़ने के बाद चाहे जहाँ भी, जिस भी देश में जाएँ सबसे पहले इन सब चीजों को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।
तेजेंद्र जी की ढिबरी टाइट कहानी पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा कि सबसे पहले भाषा और कानूनी पेचीदगियों को जानना जरूरी है।
हमें एक बात तो शिद्दत से महसूस हुई कि जैसे हर पौधे की अपनी- अपनी प्रकृति, अपनी मिट्टी,भोगोलिक स्थितियों के अनुरूप आबोहवा इत्यादि जरूरत जरूरी होती है ऐसा न होने पर या तो वह मुरझा जाता है या फिर जीवन के लिये उसे संघर्ष करना पड़ता है। उसे देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है।
प्रवासी जीवन भी कुछ इसी तरह का लगा।
वैसे तो हर लड़की के लिए उसका जीवन प्रवासी ही है देश नहीं तो क्या हुआ अपना घर अपना शहर तो है जिसे छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है।
लेकिन आपने उस चैलेंज को स्वीकार कर लिया यह बड़ी बात है।
स्वयं को स्थापित करना तो हर व्यक्ति के लिए चेलेंज ही है। पर प्रवास की स्थितियों में यह ज्यादा चैलेंजिंग हो जाता है। यहाँ साहस व संघर्ष के साथ खुद को स्थापित करने के आपके जज्बे को सलामअब जाकर आपकी ‘यादें’और उसका संघर्ष हम सब तक पहुँच पाया।
तेजेन्द्र जी ने एक प्रवासी पत्रिका में प्रवासी साहित्य को तीन भागों में बाँटा है।
1-यहाँ प्रवासी अपने देश व अपनी धरती से जुड़ा रहता है। अपनी भाषा ,संस्कृति और प्रवास का भीगापन, विस्थापन का दुख, आत्म संघर्ष की पीड़ा , अकेलापन ,साहित्य लेखन के प्रथम प्रयासों में दर्ज होता है।
2-जब वहाँ के परिवेश में ढलने लगते हैं, समझने लगते हैं अपने आप को उस माहौल के अनुरूप ढाल लेते हैं तब साहित्य में अपने देश के साथ ही प्रवासी देश भी प्रवेश करता है।
3-तीसरी स्थिति में पूरी तरह से वह देश अपना लिया जाता है हम उसके हो जाते हैं और वह हमारा हो जाता है और यह प्रेम साहित्य सृजन में पूरी तरह उतर जाता है।
वैश्विक विस्तार की दृष्टि से प्रवासी साहित्य निश्चित रूप से मुख्य धारा के समानांतर ही है।
1986 में ‘नाम’ पिक्चर आई थी। प्रवास का दर्द कैसा होता है बहुत गहराई से इसमें महसूस हुआ था ।पिक्चर देखते हुए शायद सारी पब्लिक ही रो रही थी। उस समय विदेश भारतीयों के लिए संभवतः स्वप्न में भी नहीं हुआ करते थे। महत्वाकांक्षाओं की इतनी दौड़ और चाहत भी नहीं थी,जितनी अब है। पंकज उदास का गाना “चिट्ठी आई है” सबसे मार्मिक पल था। बेहद संवेदनशील पिक्चर थी। उस पिक्चर को देखकर शायद हर माँ ने विचार किया होगा कि अपने बच्चों को विदेश कभी नहीं भेजेगी।
पर आजकल दुनिया बहुत करीब हो गए है।
जितना हम समझ पाए, प्रवास और प्रवासी साहित्य का सबसे प्रबल और महत्व पूर्ण पक्ष संवेदना ही है।संवेदनाएँ सबकी एक सी होती है प्रकार भले ही अलग-अलग हो न।
जहाँ तक विधा का सवाल है, यह लेखक की अपनी शैली और भाव के अनुरूप चयनित होता है!
लेखक इतना तो स्वयं को पहचानता ही है कि वह अपनी बात को किस तरह और किस विधा में कुशलता से कह पाएगा जिससे वह प्रभावशाली बन पाए।
इन सबके बीच अगर कोई बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है तो वह यह कि भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले हिंदी प्रेमी अनन्य साहित्यकारों की वजह से ही आज हिंदी भाषा विश्व में अपने कदम दृढ़ कर पोषित और पल्लवित हो रही है। विदेशों में हिंदी का परचम फहराने में भरतेत्तर साहित्यकारों का अनमोल परिश्रम है।
आपके लिए बहुत-बहुत सारी शुभकामनाएँ और इस लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।