अस्मिता का संघर्ष मुख्यतः स्वाभिमान का संघर्ष है l ‘अस्मि’ अर्थात् ‘मैं हूँ’ l अस्मि की भाववाचक संज्ञा ‘अस्मिता’ है l यह ‘स्वत्व’ का बोध है, आत्म-निर्णय और आत्माभिव्यक्ति का प्रश्न है जो किसी को व्यक्ति बनाता है l दरअसल अस्मिता-विमर्श सत्ता के समीकरण और शक्ति के संतुलन में अपने हिस्से पर दावे की सैद्धांतिकी है l यह स्वत्व का बोध असल में स्त्री-स्वाभिमान के साथ जुड़ा हुआ प्रश्न है l
स्त्री-अस्मिता के साथ ही स्त्री-स्वाधीनता के प्रश्न भी जुड़े हुए हैं l स्वाधीनता के इसी प्रश्न ने स्त्री-मुक्ति के द्वार खोले l स्त्री की यह मुक्ति एकांगी न होकर समष्टिगत है l यह मुक्ति केवल किसी बंधन से मुक्ति नहीं है बल्कि ‘स्व’ के भीतर मौजूद जटिल मनोविकारों एवं ग्रंथियों से भी मुक्ति है l मुक्ति की यह कामना समाज के बनते-बिगड़ते उन मूल्यों से भी है जो कई बार स्त्री के हक़ में कम और विरोध में ज़्यादा खड़ी दिखाई देती हैं l मूल्यों के इस टकराव में साहित्य प्रायः न्याय करने की वकालत करता दिखाई देता हैl
साहित्य अपना हस्तक्षेप प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करता आया है l इस संदर्भ में एक प्रचलित कथन यह भी है कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में जिस समय मृत्युदंड के विधेयक पर विचार किया जा रहा था तो वहां के सदस्यों को दोस्तोयवस्की की ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ने के लिए दी गयी थी ताकि लोग साहित्य के भीतर विद्यमान मानवता और न्याय के संदेश को ग्रहण कर सके और उनका हृदय परिवर्तन हो l
परंतु हृदय का यह परिवर्तन स्त्रियों के पक्ष में कितने प्रतिशत तक मौजूद रहता है, कहना ज़रा कठिन हैl दरअसल स्त्रियों के संदर्भ में बात करना और वह भी बराबरी के लिए ; थोड़ा मुश्किल है हमारे समाज और अन्य समाजों के लिए भी ! जहाँ भी स्त्री अपने अधिकार की बात करती है, उसका संघर्ष वहीं से प्रारंभ हो जाता है और यह संघर्ष वास्तव में अस्मिता का संघर्ष है, ‘स्वत्व’ के बोध का संघर्ष है l अस्मिता की यह लड़ाई केवल भारतीय समुदाय में ही नहीं बल्कि प्रवासी मिट्टी में भी बदस्तूर जारी है, परंतु प्रवास में रहते हुए भी वहां की मिट्टी से मन से न जुड़ पाना भी एक प्रकार की अस्मिता-मूलक लड़ाई है l इसीलिए दिव्या माथुर लिखती हैं कि “विदेश में रोप दिये जाने पर पौधा विदेशी नहीं हो जाता बल्कि एक नये वातावरण में पनपने की वजह से, उसमें अतिरिक्त सहिष्णुता और क्षमता जैसे अनन्य खूबियाँ आ जाती हैं l वह बराबर के अधिकारों के लिए पुरुषों से भी अधिक मेहनत करती हैं पर काम के एवज में उन्हें पुरुषों से कम पैसे मिलते हैं ; उन्हें तमाम और सुविधाओं से वंचित रखा जाता है l”
पुरुष वर्चस्ववादी समाज में स्त्री-अस्मिता के प्रश्न पर बात करना गर्म राख में पैर रखने के समान है l यहाँ स्त्रियों के अधिकार को लेकर गंभीर बातें कम होती हैं l आज भी हमारे समाज में ऐसी मानसिकता के लोग मौजूद हैं जो स्त्रियों को सिर्फ़ चूल्हे-चौके में ही घूँघट काढ़े देखने के पक्ष में हैं l स्त्रियाँ अधिकार की बात करें; ये उन्हें पचता नहीं l
एक लड़की को यह बचपन से ही बता दिया जाता है कि तुम्हारे काम कौन-कौन से हैं, सीमाएं क्या-क्या हैं और घर में तुम्हारी हैसियत क्या है l इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस प्रकार स्त्रियों को सभी अधिकारों से वंचित रखा गया l वैदिक काल को छोड़कर और कहीं भी स्त्रियों को अपने लिए मन कोना नहीं मिला l वैदिक काल में स्त्रियों का समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा थी लेकिन उत्तर वैदिक काल में उनके सम्मान में कमी आई कारण स्त्रियों के हाथ से सारे अधिकार धीरे-धीरे पुरुषों ने छीन लिए l मानव विज्ञान या नृविज्ञान (एन्थ्रोपोलॉजी) में तो इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि किस प्रकार कन्याओं के जन्म होते ही उनकी हत्या कर दी जाती थी और फिर उन्हीं का मांस पकाकर भक्षण किया जाता था l वहीं बालक के जन्म होने पर उन्हें जीवित रखा जाता था ताकि वह बड़े होकर शिकार करके ला सके l शिकार ही उनके जीवन का एकमात्र आधार था l
स्त्रियाँ क्योंकि शारीरिक रूप से कमज़ोर समझी जाती थी इसलिए उन्हें पैदा होते ही मार दिया जाता था क्योंकि वे शिकार नहीं कर सकती थीं l इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि सृष्टि को चलायमान रखने वाली उस स्त्री की गाथा वास्तव में कितनी कारुणिक और विद्रूप है l शायद इसीलिए राजेंद्र यादव ने लिखा है “सदियों की गुलामी, सामाजिक स्थिति और असुरक्षा में बने रहने ने, नारी के सारे आत्मविश्वास को छीन लिया है l उसे अपने ‘होने’ और ‘बनने’ की हर स्थिति में पुरुष की स्वीकृति, समर्थन चाहिए l”
राजेंद्र यादव का उक्त कथन हर काल और हर क्षेत्र में प्रासंगिक है, चाहे देसी हो या प्रवासी l अपने देश की मिट्टी में भी स्त्रियों को हर अधिकार से वंचित रखने का षड्यंत्र रचा गया और प्रवासी धरती पर भीl वहां भी उनकी समस्याएं बहुत अधिक भिन्न नहीं हैं l प्रवासी स्त्री रचनाओं के संदर्भ में दिव्या माथुर लिखती हैं “इन लेखिकाओं की कहानियों में औरत के आंसुओं का सैलाब है, जिसमें छिपा उसका दर्द, सिसकियाँ, मजबूरियां व टीसें अंतर्मन पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं l इन्हें पढ़कर मन संवेदना से भर उठता है l”
दिव्या माथुर का यह विश्लेषण तब सच लगता है जब हम ज़किया ज़ुबैरी की कहानी ‘और ब्लॉसम सूख गए’ पढ़ते हैं l इस कहानी की नायिका ‘जीना’ असल जिंदगी में जीना ही भूल जाती है l पति की झिड़कियों ने कब उसे रोबोट की तरह काम करने में निपुण बना दिया था उसे पता ही नहीं चलता l जब देखो भाग-भागकर हर काम को करती रहती है l दरवाज़ा खोलने में थोड़ी देर हो जाए तो पति के ताने सुनने पड़ते थे l उनके कोप-भाजन का शिकार होना पड़ता हर छोटी-छोटी भूल पर जीना को सज़ा मिलती l ऐसे में जीना का एकमात्र सहारा बनते मि. ब्राउन, जिनकी अनपेक्षित मृत्यु हो जाती है कोविड से वो भी छिन जाता है l मि. ब्राउन की मृत्यु यानी हँसते-खिलखिलाते ब्लॉसम (यहाँ जीना के लिए भी) का सूख जाना, जीना के खुश होने का आधार छिन जाना है l
दरअसल ये ब्लॉसम प्रतीक है जीवन के सुख-दुःख का l स्त्रियाँ आज भी खामोश रहकर सबकुछ बर्दाश्त करना जानती हैं l आज भी एक पुरुष के आगे उसकी घिग्घी बंध जाती है l मन का करने के लिए आज भी उसे अपने पति की आज्ञा की ज़रूरत पड़ती है l मानवीय रिश्तों को समझने के लिए उक्त कहानी हमारे समक्ष अनेक परतों को खोलती चली जाती हैं l चाहे वह ब्राउन और उनकी पत्नी का रिश्ता हो या जीना और उसके पति का; दोनों के संबंधों में बहुत कुछ अनकहा और छिपा हुआ रह जाता है पाठकों के आगे l इस कहानी में निरंतर एक तनाव का माहौल बना रहता है जो जीना के प्रति सहानुभूति पैदा करती है l एक स्त्री के मन में इच्छा और कर्म के बीच निरंतर द्वंद्व चलता रहता है l प्रवासी स्त्री साहित्यकारों ने इस द्वंद्व और मानसिक जटिलता को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया है l प्रवासी जीवन की सूक्ष्म से सूक्ष्म जटिलताओं, रिश्तों के उलझते-सुलझते धागों का ताना-बाना इन कहानियों को पढ़ते हुए हम बार-बार महसूस कर सकते हैं l
रिश्तों की उलझनों से भरी एक और कहानी हमें मिलती है उषा राजे सक्सेना की- ‘डायरी के पन्ने से…द रिफ्यूज कलेक्टर’ l इस कहानी में पुरुष का छल, लोभ, चालाकी और स्त्री के प्रति क्रूर-से-क्रूरतम हिंसा को अंजाम देते हुए दिखाया है लेखिका ने l प्रवास में बने रहने के लिए जितने भी तरह के तिकड़म हो सकते हैं, वह सब अपनाता है सुहेल l पहले से ही विवाहित होते हुए भी किसी ग़रीब गाँव की लड़की से इसलिए टेलिफोन पर निकाह कर उसे बुला लेता है ताकि उसे सस्ती नौकरानी मिल सके, उसके और उसकी गोरी बीवी-बच्चे के सारे नखरे उठा सके l रिफ़त के सामने जब यह भेद खुलता है तो वह पागल-सी हो जाती है l वह चीखती-चिल्लाती है, विरोध करती है, पिटती है और अंत में खिड़की से कूदकर नीचे गिर जाती है l वहाँ से वह कैसे मोटर वे ए ट्वेंटी थ्री पर पहुँचती है, उसे नहीं मालूम l कहानी बहुत सारी समस्याओं की ओर संकेत करती है और इन समस्याओं के केंद्र में है स्त्री, उसकी अस्मिता, दांव पर लगा उसका अस्तित्व, अर्थ और प्रवास में बने रहने की मनुष्य की जद्दोजहद l विदेशी मिट्टी पर जमे रहने और पैसे कमाकर झूठी शान को बरकरार रखने की कोशिश में जितने भी अनैतिक कार्य हो सकते हैं वो सब करता है सुहेलl भले ही उसके लिए रिफ़त की हत्या ही क्यों न करनी पड़े l
उषा राजे सक्सेना एक प्रतिष्ठित प्रवासी हिंदी लेखिका हैं, जिन्होंने विशेष रूप से ब्रिटेन में रहकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है l उनकी रचनाओं में स्त्री जीवन के विविध पहलुओं का गहन और संवेदनशील चित्रण मिलता है l उन्होंने कहानियाँ ही अधिक लिखी हैं l उनकी इन कहानियों में स्त्री जीवन की जटिलताओं, संघर्षों और आंतरिक ऊर्जा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है लेखिका ने l उषा राजे सक्सेना की कहानियाँ स्त्री के आंतरिक संघर्षों, उनकी आंतरिक ऊर्जा और सकारात्मक सोच को उजागर करती हैं। वे स्त्री जीवन की आपाधापी के बीच पारस्परिक समझ, सौहार्द, मानवता, सदाशयता, प्रेम, स्नेह, सेवा और सहयोग के महत्व को प्रतिपादित करती हैं l
‘प्रवास में’ नामक कहानी-संग्रह की सभी कहानियाँ ब्रिटेन में लिखी गई हैं और उनकी भाव-भूमि, समस्याएँ और परिवेश ब्रिटेन के हैं। संस्कृति समन्वय और स्त्री विमर्श इन कहानियों की अंतरधारा है। ‘वाकिंग पार्टनर’ संग्रह की कहानियाँ स्त्री के अंतरद्वंद्व को ही नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक बेचैनी, संघर्ष और स्त्री-चेतना से हमारा परिचय कराती हैं l ‘वाकिंग पार्टनर’ कहानी में वह लिखती हैं : “उसका खुद का अपना जीवन क्या कुछ कम कॉम्पलिकेटेड है l पूरब और पच्छिम क्या कभी आपस में घुल-मिल सकते हैं? वह जो कुछ मुल्क से लेकर यहाँ आई थी जिसे वह बेहद कीमती समझती थी जाने कब और कैसे इस खूबसूरत शहर के हलचल में खो गए, इधर-उधर हो गए उसे पता भी नहीं चला l”
उषा राजे सक्सेना की रचनाओं में स्त्री जीवन की जटिलताओं, उनकी आंतरिक शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण का सजीव चित्रण मिलता है, जो पाठकों को स्त्री जीवन की गहराइयों में झाँकने का अवसर प्रदान करता है l
दरअसल प्रवासी स्त्री रचनाकारों में अस्मिता का जो संघर्ष है वास्तव में वह संघर्ष कई पड़ावों पर मौजूद संघर्ष हैं l
मसलन : दोहरी पहचान का संघर्ष – प्रवासी स्त्री-रचनाकार को अक्सर अपनी जन्मभूमि की पारंपरिक पहचान और नए देश की आधुनिक संस्कृति के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
संस्कृति और परंपराओं का द्वंद्व – कई बार प्रवास में रह रहीं स्त्री रचनाकारों को अपने परिवार और समुदाय द्वारा थोपे गए सांस्कृतिक मूल्यों के बीच अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने की चुनौती झेलनी पड़ती है।
स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारियाँ – एक नई दुनिया में आर्थिक स्वतंत्रता मिलने के बावजूद, प्रवासी स्त्री पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से मुक्त नहीं हो पाती।
आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा – कई प्रवासी स्त्रियाँ नई जगहों पर रंगभेद, शोषण, भेदभाव और नस्लवाद का शिकार होती हैं।
निजी जीवन और प्रेम संबंध – अलग सामाजिक परिवेश में स्त्रियों के प्रेम, विवाह और यौनिकता के प्रति दृष्टिकोण बदलते हैं, जिससे नए सवाल खड़े होते हैं l
अजनबीपन और अलगाव का संकट – प्रवास का जीवन देखने-सुनने में जितना सुखकर और सब्ज़-बाग़ लगता है असल जीवन में वह उतना ही भयावह और निराश करनेवाला है l
उषा राजे सक्सेना की कहानी ‘ऑन्टोप्रेन्योर’ में इसके कई सुंदर उदाहरण मिलते हैं, जब तिश और रॉन के बीच संवाद चलता है l तिश कहती है : “ ‘जब तुम मुझे इतने दिनों से जानते रहे हो, रो, तो तुमने मुझसे पहचान क्यों नहीं बनाई l’ ‘वाह! तुम्हारा तो बात करने का ढंग ही निराला है l जिसे देखा जाए, उससे पहचान भी बनाया जाए ऐसा कोई रूल तो नहीं है l” अजनबीयत का ये जो तनाव है वह इस कहानी में अंत तक बनी रहती है l
प्रवासी साहित्य हमें एक ऐसी दुनिया का सैर करवाती है जो कई बार हमारे विश्वास के डोर को हिलाकर रख देती है l पढ़ते हुए कई बार कानों पर भरोसा करना भी कठिन हो जाता है l इसी अविश्वास की झलकियाँ हमें ‘सांकल’ कहानी संग्रह में देखने को मिलता है l
इस संग्रह में ज़किया ज़ुबैरी ने स्त्री मन की कशमकश को बारीकी से उकेरा है। इनकी कहानियों में नॉस्टेल्जिया और परिवार के बीच की जटिलताओं का मार्मिक चित्रण मिलता है l ‘सांकल’ के अलावा ‘मारिया’ और ‘लौट आओ तुम’ जैसी कहानियाँ भी इसी थीम पर आधारित हैं। ज़किया जी की ‘दोनों आसमानों के रंग’ नामक कहानी-संग्रह में हमें परायी धरती पर रिश्तों की चुनौतियों का सामना करने वाली स्त्रियों का परिचय मिलता है। इन कहानियों में स्त्री जीवन की विविधताओं और संघर्षों को आत्मसात किया गया है। ज़किया ज़ुबैरी की रचनाओं में प्रवासी स्त्रियों के मानसिक द्वंद्व, सांस्कृतिक पहचान की खोज, पारिवारिक संबंधों की जटिलताएँ, पुरुष सत्ता का दमन-चक्र और आत्मनिर्भरता की चाहत जैसे विषय प्रमुखता से उभरकर आते हैं l उनकी कहानियाँ पाठकों को स्त्री जीवन की गहराइयों में झाँकने का अवसर प्रदान करती हैं।
‘गहरी-गहरी साँसें’ कहानी में ज़किया जी लिखती हैं ; “ये पुरुष एक पाक पवित्र पत्नी को अपनी जेब में समाज को दिखाने के लिए अपनी इज़्ज़त का प्रतीक बनाकर रखते हैं, और बिस्तर में खेलने का खिलौना बदलते रहते हैं l पुरुषों की दुनिया के कानून भी निराले हैंl पुरुष जब चाहे अपनी पत्नी को ठंडी लाश घोषित करके दूसरी औरतों में गर्मी ढूंढता फिरे l हर औरत को मम्मी की तरह ही घुटना है l” ‘हर औरत को मम्मी की तरह ही घुटना है’ यह कथन यह बताने के लिए काफ़ी है कि स्त्री-देह का आकर्षण और उसका उपभोग इस पुरुष वर्चस्ववादी समाज में कई पीढ़ियों से ऐसा ही रहा है l औरतें चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी और आधुनिक हों, उन्हें इन अपमान भरे व्यवहारों को झेलना ही होगा, उनको सहना ही होगा l मारना होगा उन्हें अपनी इच्छाओं को, घोंटना होगा अपने सपनों का गला l इसी कहानी में ज़किया जी लिखती हैं : “उन सपनों में (पेंटर बनने और डांस प्रैक्टिस करने के लिए स्टूडियो बनाने का सपना) न जाने कहाँ से मेरे बाप ने सेंध लगा ली थी और शामिल हो गए थे मेरी ममी के बुने हुए सपने उधेड़ने में l ऐसा जादू चलाया था कि मेरी सजल सरल सुहानी ममी घूँघट में घुसकर कानपुर आ पहुँचीं l” विवाहोपरांत औरतों के जीवन में लगा ये सेंध धीरे-धीरे दीमक बनकर उसकी क़ाबिलीयत को खोखला करते जाता है, उसकी प्रतिभा को दीमक बनकर चाट जाता है l ऐसा नहीं है कि ये केवल कहानियों में मौजूद हैं बल्कि असल जीवन का भी अनुभव होता है कई बार उन स्त्रियों के, जो प्रतिभासंपन्न होते हुए भी ससुराल जाते ही सब तिलांजलि दे देती हैं या देना पड़ जाता है l
ज़किया जी से इतर यदि सुधा ओंम ढींगरा जी की रचनाओं पर नज़र डाली जाए तो देखेंगे कि सुधा ओम ढींगरा के यहाँ भी स्त्री अस्मिता के प्रश्न मुँह बाए खड़ी है l हालांकि सुधा जी की कहानियों में पुरुष पीड़ा भी देखने को मिल जाती हैं जहाँ एक नहीं कई पुरुष प्रताड़ित होते हैं अपनी ही पत्नियों से, माँ से l सुधा ओम ढींगरा एक प्रतिष्ठित प्रवासी हिंदी लेखिका हैं और इनकी रचनाओं में स्त्री जीवन के विविध पहलुओं का गहन और संवेदनशील चित्रण मिलता है। उनके उपन्यासों में नारी चेतना, संघर्ष, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक द्वंद्व जैसे विषय प्रमुखता से उभरकर आते हैं। उनकी सद्य प्रकाशित कहानी-संग्रह है ‘चलो फिर से शुरु करें’, इस संग्रह की तमाम कहानियाँ (कुल दस) प्रवासी मिट्टी और उसमें रचे-बसे जीवन की जीवंत कहानियाँ हैं l मनुष्य की पहचान के खो जाने और उस पहचान की खोज में भटकता आदमी अंततः अपने आशियाने में लौटना चाहता है, इस बात की तसदीक करती हैं इनकी कहानियाँ l अपने स्व में लौटने की जद्दोजहद ही तो थी जिसने आनंद को नन्दी में परिवर्तित कर दिया था l इस संग्रह की पहली कहानी ‘कभी देर नहीं होती’ एक अलग पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी है l हालांकि इसमें स्त्री का बहुत ही दमनात्मक चरित्र दिखाया गया है लेकिन वह स्त्री क्यों ऐसी हो गयीं, कहानी इस प्रश्न पर भी सोचने के लिए विवश करती है l आनंद की माँ एक स्थान पर कहती हैं : “तुम्हारे बेटे तुमपर गए हैं, घुन्ने चालाकl अपनी मर्जी के करनेवाले l मेरी परवाह कभी तुमने की है जो वे करेंगे l बेटी है जो सिर्फ मुझे समझती हैं l” ये जो टीस है, एक स्त्री के भीतर, वह अपने साथ हुए बहुत से अन्यायों और अवहेलनाओं की ओर संकेत करती है l हाँ यह सच है कि शोषक की भूमिका में कई बार दोनों हो सकते हैं पुरुष भी और स्त्री भी l
इसी संग्रह (चलो फिर से शुरु करें) की एक खूबसूरत कहानी है ‘उदास बेनूर आँखें’ जिसमें स्त्री शोषण के कई आयाम दिखाए गए हैं l चाहे देश हो या विदेश स्त्री-शोषण हर कहीं मौजूद है अलग-अलग रूपों में l ऐसी घटनाएं जहाँ बच्चियों का शारीरिक शोषण होता है, चाहे मंदिर में हो, मदरसे में हो, गिरजाघर में हो या घर में ! हर कहीं उसका दैहिक शोषण होता आया है l इस कहानी की नायिका है शबनम जिसे एक पादरी ने (फादर) अपनी हवस का शिकार बनाया और उसे गिरजाघर के बाहर लॉन में फेंक दिया था l जिस फादर के पास वह इस विश्वास के साथ गई थी कि वह उसे आशीर्वाद देंगे, उसी ने उसकी अस्मिता लूट ली l उसका विश्वास उस दिन के बाद से हिल गया और फादर की धमकी के कारण उसने हमेशा के लिए अपनी जुबान बंद कर ली l अब वह इस बारे में किसी से कोई बात नहीं करना चाहती l अपने मित्र से भी नहीं क्योंकि इस अनिच्छित संबंध ने उसे हमेशा के लिए बीमार कर दिया था l शबनम अब एक ऐसी घातक बीमारी की शिकार हो गई थी, शबनम एच.आई.वी. पॉजिटिव हो गई थी l “डॉक्टर ने दावे से कहा, वह धर्मगुरु बीमार है l मैं बहुत रोई, चिल्लाई, तड़पी, बलात्कार के साथ उसने मुझे यह बीमारी भी दे दी l” आघात ऐसी ही चीज़ होती है जो हमें भीतर तक तोड़ देती है l शबनम ने धर्मगुरु को गाली देते हुए अपनी माँ को फ़ोन किया और घर में हंगामा हो गया l ये कितने आश्चर्य की बात है हमारे समाज में l माँ को अपनी बेटी की लुटी हुई अस्मिता की रत्ती भर भी चिंता नहीं लेकिन उस धर्मगुरु की चिंता है l असल में लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से समाज (चाहे कहीं का भी हो) में मौजूद अंधविश्वास पर सवालिया निशान लगाया है l देश हो या प्रवासी समाज ; हर कहीं ऐसे कर्मकांडी और पाखंडी दीमक की तरह मौजूद हैं l भारत में तो इसके इतने उदाहरण हैं कि अलग से किसी का नाम लेने की आवश्यकता नहीं l शबनम की सहेली के साथ तो और भी बुरा हुआ l उसका यौन शोषण उसी के सौतेले पिता ने किया था और जब उसने अपनी माँ को यह बात बताई तो उसके मुँह पर चांटे पड़े l सोचने वाली बात है कि स्त्री होकर भी एक स्त्री की पीड़ा को नहीं समझ पाई l कहाँ तो उसे अपनी बेटी का साथ देना चाहिए था और कहाँ उसने अपनी बेटी का ही मुँह बंद करा दिया थप्पड़ मारकर l यह सच है कि अधिकतर मामलों में लड़कियों-बच्चियों का शोषण करने वाले उनके अपने ही परिवार के लोग और रिश्तेदार होते हैं l बाहरी लोगों से, दुनिया से तो हम लड़ लेते हैं लेकिन अपनों से लड़ पाना बहुत कठिन होता है l सच यह भी है कि घर की औरतें ही अपनी बहन बेटियों की रक्षा नहीं कर पातीं बल्कि उलटे उन्हीं को खामोश रहने का पाठ नाना विधि से पढ़ा दिया जाता है l लड़की जात है, लोगों को पता चलेगा तो इज़्ज़त मिट्टी में मिल जायेंगी, कौन ब्याह करेगा, किसको मुँह दिखायेंगे परिवार वाले, इत्यादि l औरतों के लिए हमारा समाज सदा से निर्मम रहा है, इसमें कोई दो मत नहीं l अस्तु ! ये कि शबनम तमाम यंत्रणाओं को सहने के बाद भी खुद की पहचान बनातीं हैं और अपने अस्तित्व को मिटने से बचाती है l
सुधा जी की एक कहानी है ‘कंटीली झाड़ी’ : इस कहानी में लेखिका ने प्रवासी भारतीय स्त्रियों के जीवन, उनकी समस्याओं, संघर्षों और सांस्कृतिक द्वंद्वों को बारीकी से उकेरा है। इस कहानी में एक स्त्री का स्त्री के प्रति विद्वेष की भावना को दिखाया है लेखिका ने , जहाँ अनुभा जैसी लड़कियां भी मौजूद हैं और नेहा जैसी लड़कियाँ भी l पिता के उच्च पद में होने का जो अहंकार है वह यहाँ घातक रूप में दिखाया है सुधा जी ने l डिप्टी कमिश्नर की बेटी अनुभा के संस्कार ऐसे हैं जो उसे सही गलत में फर्क करना नहीं सिखाता l अनुभा का अहं आज के समाज की सच्चाई भी है लेकिन अस्तित्व की लड़ाई वास्तव में नेहा लड़ती है l स्त्री चेतना और आत्मनिर्भरता के मुद्दों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया है सुधा जी ने नेहा के माध्यम से l यह कहानी प्रवासी भारतीय समाज के भीतर फैली भावनात्मक टूटन और सांस्कृतिक असंतुलन को दर्शाता है l कहानी में स्त्री-जीवन के विविध पहलुओं, उसकी पारिवारिक व सामाजिक बंधनों की पड़ताल की गई है l भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियों के बीच के अंतर और टकराव को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है l स्त्री मनोविज्ञान, संबंधों की खोखली वास्तविकता और आत्म-निर्णय की आवश्यकता को भी इसमें उकेरने का प्रयास किया गया है l
रेखा राजवंशी की कहानी ‘गृहस्वामिनी’ स्त्री की आतंरिक और बाह्य दुनिया के विरोधाभास को प्रस्तुत करती है – जहाँ बाहरी रूप से सब कुछ व्यवस्थित और सुंदर दीखता है, लेकिन संघर्ष और आतंरिक उहापोह एक स्त्री के भीतर कहीं न कहीं दबी रह जाती है l बाहर से तो व्यक्ति बहुत व्यवस्थित और एक सफल जीवन जी रहा होता है लेकिन भीतर से भावनात्मक असंतोष और अकेलेपन से जूझ रहा होता है l गृहस्वामिनी के जीवन में रिश्तों की जटिलता, सांस्कृतिक संघर्ष और अस्मिता के प्रश्न बारंबार उठते हैं l यह कहानी यह दर्शाने में सफल है कि कैसे प्रवास के बाद भी कोई व्यक्ति अपनी जड़ों से पूरी तरह से अलग नहीं हो पाता है और दो ध्रुवों के बीच जीने को विवश होता है l प्रवासी जीवन की यह त्रासद स्थिति है कि वह निरंतर अपने समाज में समायोजित होने के लिए संघर्ष करते हैं लेकिन उनकी पहचान सदैव अधूरी-सी रह जाती हैं l यह कहानी एक ऐसी स्त्री की मनोदशा को दर्शाती है जो घर की स्वामिनी होते हुए भी खुद को पराया महसूस करती है l वह घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाती है लेकिन उसके विचारों और निर्णयों को कोई अहमियत नहीं दी जाती l उसका मानसिक संघर्ष यह बताता है कि स्त्री को सिर्फ एक गृहिणी के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में भी सम्मान मिलना चाहिए l यह कहानी हमें यह भी बताती है कि स्त्री को केवल एक भूमिका तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसे अपनी पहचान बनाने का पूरा अधिकार है l
‘बंद दरवाजे’ भी रेखा राजवंशी की बेहतरीन कहानी है जो भावनात्मक द्वंद्व की कहानी है l इस कहानी में एक स्त्री के जीवन में जो द्वंद्व है उसका सटीक चित्रण किया गया है l स्त्री जो हमेशा अपनी खुशियों को कुर्बान कर दूसरों की खुशियों को तबज्जो देती आई है उसी स्त्री को अंत में यह भी एहसास होता है कि अब तक उसने खुद की इच्छाओं का केवल गला ही घोंटा है और अब उसकी इच्छाएं भी मायने रखती हैं l बंद दरवाजे वास्तव में उसको ये अनुभव कराती हैं कि तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है इस घर में l पराये-पन का व्यवहार उसे भीतर तक सालता रहता है l कितनी विडंबना है कि एक स्त्री को अपने ही घर अपनी पहचान और अपनी अस्मिता को बचाये रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है l एक स्त्री के नहीं वरन तमाम ऐसी स्त्रियों की मानसिक और भावनात्मक संघर्ष की गाथा है यह कहानी l सामाजिक और पारिवारिक दवाबों के बीच पेंडुलम की तरह चलता रहता है उनका जीवन l
कनाडा में रहने वाली भारतीय मूल की प्रसिद्ध लेखिका हंसा दीप की कहानियाँ भी प्रवासी जीवन की कथाओं को बहुत संवेदना के साथ व्यक्त करती हैं l उनका नवीन कथा-संग्रह है ‘टूटी पेंसिल’ l इस संग्रह की समस्त कहानियाँ मानव जीवन के कई रेशों को खोलती हैं l यहाँ भी वही चुनौतियाँ हैं – अकेलापन, अजनबीपन, घुटन, संत्रास और बहुत कुछ न कर पाने की बेचैनी l
उनकी एक कहानी है ‘शून्य के भीतर’l इस कहानी की कौमुदी भी अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मूक जानवरों- बिल्ली, रेकून, पपी और गिलहरी के साथ अपने नये परिवार का गठन करती है l कौमुदी का यह अकेलापन उनके अपने ही भाई-बहनों की दी हुई है l इनकी कहानियों में भी लोकप्रिय रंगभेद, नस्लभेद और जातिभेद के दंश मौजूद हैं l इस संग्रह में भी भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों का टकराव दिखता है l भारतीय पारंपरिक मूल्यों और पश्चिमी आधुनिकता के बीच तालमेल बिठाने की कठिनाई इस संग्रह में स्पष्टतः लक्षित होता है l पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहनों और बच्चों के बीच के जटिल और तनाव-ग्रस्त संबंध, भावनात्मक दूरियाँ तथा सामाजिक दबाव इस संग्रह के महत्वपूर्ण विषय हैं l प्रवासी स्त्री रचनाकारों की रचनाओं में एक विषय बहुत सामान्य है और वह है वर्तमान समय का यथार्थ जो मनुष्य के जीवन का अकेलापन और आत्मसंघर्ष को समभाव भूमि पर दर्ज करता है l प्रवासी जीवन में भौतिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक स्तर पर अकेलापन, असंतोष और मानसिक संघर्ष इन लेखिकाओं की कहानियों की मूल संवेदनाएँ हैं l
हंसा दीप की एक अन्य मार्मिक कहानी है ‘भिड़ंत’ l यह कहानी कैंसर से पीड़ित एक माँ की कहानी है जिसे उनकी बेटी बचा लेती हैं l जीवन को बचाने की चुनौतियों और उनके मानसिक संघर्षों को दिखाती है ये कहानी । मृत्यु को हराकर एक बेटी किस तरह अपनी कैंसर से पीड़ित माँ को बचा लाती है यह जानना इस कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष है l
हंसा दीप की कहानियों में स्त्री जीवन की जटिलताओं, उनकी मानसिकता, सामाजिक बंधनों और आत्मनिर्भरता की खोज का सजीव चित्रण मिलता है l उनकी रचनाएँ पाठकों को स्त्री जीवन की गहराइयों में झाँकने का अवसर प्रदान करती हैं l इसी तरह की एक कहानी है ‘फ़ालतू कोना’ l इस कहानी में रिश्तों के टूटन को दिखाया गया है, जिसका मूल कारण है शक l यही वजह है कि रिश्तों के दरकने में देर नहीं लगती l शक के कारण कहानी में एक तनाव का परिवेश हमेशा व्याप्त रहता है l सच ही तो है हर स्त्री अपने सपनों को जीना चाहती हैं लेकिन कहाँ जी पाती हैं ! अधूरी ख्वाहिशों की तरह अधूरे रह जाते हैं उनके सपने, उनकी इच्छाएं, चाहतें और अभिलाषाएं l भेंट चढ़ जाती हैं उनके सपनों की पोटली उस परिवार नामक संस्था के हवन कुण्ड में, जहाँ सब कुछ मुखिया के हाथ में सौंप दिया जाता है l इस कहानी में दांपत्य जीवन को केवल एक सामाजिक अनुबंध के रूप में नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और मानसिक संतोष की खोज के रूप में चित्रित किया गया है l यह स्थिति केवल प्रवासी स्त्री के जीवन की नहीं है बल्कि भारत की मिट्टी में भी मौजूद हैं l
मानसिक और भावनात्मक संतोष की खोज कहानी ‘एक मर्द एक औरत’ में भी लक्षित होती है l महत्वपूर्ण यह है कि इस कहानी में एक ओर समाज की दूषित मानसिकता को दिखाती हैं तो दूसरी ओर रिश्तों में पवित्रता और विश्वास को पोषित करती है l पुरुष की प्रताड़ना और उनका सर्वेसर्वा बनने का अहंकार वास्तव में स्त्री की अस्मिता को कुचलकर रख देती हैं l अपनी खोती हुई पहचान के लिए स्त्रियों को बहुत संघर्ष करना पड़ता है l उसकी प्रतिभा को नष्ट करने का हर संभव प्रयास इस पितृसत्तात्मक समाज में की जाती है l इसका एक उदाहरण कल्पना मनोरमा के सद्य प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘एक दिन का सफ़र’ में देख सकते हैं l इस संग्रह की एक कहानी है ‘स्त्रियाँ धूमकेतु नहीं होतीं’ l इस कहानी की जो नायिका है वह अधेड़ उम्र की महिला है और एक हाउस वाइफ होती हैं लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस होता है कि उनका जीवन व्यर्थ जा रहा है, वह कुछ कर नहीं पा रही हैं, सारा वक्त घर-गृहस्थी सँभालने में खप जा रहा है l तभी उन्हें लगता है कि क्यों न अपनी पढ़ाई को फिर से शुरु करें l इसके लिए वह अपने पति से इजाजत मांगती हैं लेकिन नायिका का यह प्रस्ताव पति के लिए हँसी का विषय बन जाता है l वह उन्हें बूढ़ी कहकर अपमानित करते रहते हैं और उसके मनोबल को हर बार तार-तार कर देते हैं परंतु नायिका रुकती नहीं विद्रोह करके अपने मुकाम को फिर से हासिल कर लेती हैं l नेपथ्य में ऐसी अनेक कहानियाँ हमें मिल जाती हैं जो स्त्री-अस्मिता की पड़ताल करती हैं l
‘सिरहाने का जंगल’ कहानी में एक स्त्री के छले जाने की भी दर्दनाक कथा है जो मन को हताश करता है l इस कहानी में एक वृद्धा स्त्री की नियति को बड़ी ही संजीदगी से उजागर किया गया है l माता-पिता के संबंध-विच्छेद किस प्रकार बच्चों के जीवन को नष्ट करते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत करती है यह कहानी l इस कहानी को पढ़ते हुए मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘आपका बंटी’ की याद आना स्वाभाविक है l इस कहानी का कलेवर बिलकुल जुदा है l हंसा दीप के कथा-साहित्य में स्त्री के कई रूप में दिखाई देते हैं l उनकी कहानियों में मानव-मूल्यों को बचाए रखने की पुरजोर कोशिश दिखाई देती हैं l हंसा जी ने अपने अनुभवों के आधार पर आधुनिक नारी की सामाजिक नियति और मानसिकता को बड़ी गहराई से उभारा है l
मिट्टी कहीं की भी हो स्त्रियों की समस्याओं का स्वरूप काल-दीर्घा होती हैं l यह ज़रूरी नहीं कि भारत में ही स्त्रियों ने नानाविध अपमान और शोषण झेले हों l उनके शोषण और ज़िल्लत का कैनवस बहुत वृहत् हैं l स्त्रियों ने परिवार नामक संस्था को निर्मित करने, उसे सहेजने, संवारने और ताउम्र उस परिवार की धुरी को सुंदर बनाये रखने की पुरजोर कोशिश की है l इस कोशिश में वह कई बार गिरी-उठी और संभली भी है लेकिन हर बार निर्णय उसके हक़ में नहीं होते l जलना-तपना, पिटना और परित्यक्त किए जाने की पीड़ा को सहना पड़ता है l स्त्री कितनी भी गुणी हों, क़ाबिल हों, बुद्धिमान हों परंतु पुरुषों के अधीन रहना उसकी नियति है l इसीलिए तुलसीदास ने कहा है :
“कत विधि सृजि नारी जग माहि
पराधीन सपनेहु सुख नाहि l”
ज़किया ज़ुबैरी अपनी एक कहानी ‘ज़हर’ में स्त्री पात्र सीमा के मुँह से कहलवाती हैं : “ आखिर मैं कब तक ऐसे डर-डरकर जीवन बिताती रहूंगी l भला ये भी कोई जीवन है? डर-डरकर जीना और एक दिन चुपके से मर जाना…! नहीं, मैं ऐसे नहीं जीना चाहती l” क्या यह सच नहीं कि स्त्रियों को कभी अपने मन का जीवन नहीं मिला और न ही मन मुताबिक़ जीवन चुनने का अवसर मिला? जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके जीवन को नियंत्रित करनेवाला कोई न कोई रहा ही है l कभी पिता, कभी भाई, कभी माँ-बहनें, पति और कभी-कभी प्रकृति भी l स्त्री हो; तुम्हें ऐसे रहना है, वैसे रहना है, तुम्हें मर्यादों में रहना चाहिए, स्वच्छंदता स्त्रियों के लिए ठीक नहीं, और भी न जाने क्या-क्या! फिर भी उसे जीना होगा, हर परिस्थिति में, हर हाल में, सभी शर्तों को पूरा करते हुए l सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्त्रियाँ न जाने कितना कुछ सहती आई हैं l ज़किया जी लिखती हैं : “ममी के जीवन का तो अर्थ ही इंतजार है l वो आज भी अच्छे समय के इंतजार में हैं l मेरी भोली-भाली मासूमियत से भरपूर माँ, म, माँ! ये पुरुष एक पाक पवित्र पत्नी को अपनी जेब में समाज को दिखाने के लिए अपनी इज़्ज़त का प्रतीक बनाकर रखते हैं और बिस्तर में खेलने का खिलौना बदलते रहते हैं l”
स्त्रियों का हर रूप मौजूद है ज़किया जी की कहानियों में l दोनों आसमानों के रंग’ में संकलित कहानियाँ हैं – परायी धरती पर मुरझाते रिश्तों की और स्त्री-विरोधी परंपराओं में जकड़ी अपनी ज़मीन पर मुरझाने पर मजबूर कर दी गई उम्मीदों की l इसी संग्रह की एक कहानी है ‘दस्तक’ l इस कहानी में पाकिस्तान के कुछ पिछड़े इलाकों में आज भी ‘वानी’ जैसी लड़कियों के साथ होने वाली भयावह घटनाएँ प्रचलित हैं l रोंगटे खड़े कर देने वाली ये घटनाएं अकेले वानी के साथ ही घटित नहीं होती, उसके जैसी और लड़कियों के साथ भी होती है l ज़किया ज़ुबैरी ने इस कहानी में मुस्लिम समाज और उस समाज की स्त्रियों की दयनीय-चिंतनीय दशाओं को उकेरा है l मुस्लिम समाज में औरतों के जीवन में जो घुटन और दमन है उसकी पोल खोलती है कहानी l स्त्रियाँ सवाल नहीं कर सकतीं, उनके रोने की आवाज़ पुरुषों को नहीं सुनाई देना चाहिए l अशिक्षा के साथ-साथ पति को परमेश्वर मान लेने का भाव उन्हें और दोयम दर्जे तक पहुँचा देती है l ज़किया जी लिखती हैं : “औरतें कब तक जानवरों की तरह हंकाई जाती रहेंगी l कब तक मर्दों के पैरों की जूतियाँ बनी रहेंगी l कब तक पैदा होने से पहले मार डाली जायेंगी l” इसके आगे की पंक्तियाँ आज भी हमारे समाज का कटु सत्य है : “और हाँ l सुनो l इन लड़कियों को स्कूल से दूर ही रखना l पढ़-लिखकर ही हर बात में मीन-मेख निकालना आ जाता है l सवाल उठने लगते हैं l जवाब माँगा जाता है l औरतों को मना है मर्दों से सवाल करना l पति तो परमात्मा होता है l परमेश्वर होता है, वो जवाब नहीं देता, उससे जवाब-तलब करना भी पाप है l”
पितृसत्ता का इससे घातक चेहरा और कुछ नहीं हो सकता l सच में यह एक व्यवस्था ही है, सत्ता के समीकरण का l ये समीकरण एक षड्यंत्र के तहत इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रखकर बनाये गए होते हैं l उक्त कथन को पढ़ते हुए कुछ सभ्यताओं ( मसलन रोमन इत्यादि ) में प्रचलित वे जुमले याद आये जहाँ स्त्रियों को शैतान का खाला और नरक का द्वार कहा गया है l वैसे स्त्रियों को प्रगति मार्ग में बाधक मानने का चलन अमूमन सभी जगह मौजूद रहे हैं l चाहे थेरीगाथा हो, मध्यकाल हो, बौद्ध जातक कथाएँ हों या फिर इस्लाम धर्म हो; हर कहीं की मिट्टी ने उसके हिस्से में केवल और केवल दुःख का रेत भरा है l स्त्री जननी है, मातृ-मना है, सृष्टि की रचयिता है, इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी उसकी इतनी हीन दशा है कि सोचकर भी आश्चर्य होता है l पुरुषों की कुंठाओं के तुष्टीकरण के लिए हर बार बलि स्त्री की अस्मिताओं को मिटाकर ही देनी पड़ी है l
सन्दर्भ-ग्रन्थ
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https://perspective-jdmc.in/migrant-hindi-woman/
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राजे उषा सक्सेना, ‘प्रवासी कथाकार श्रृंखला’, प्रलेक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 702, जे/50, एवेन्यू-जे, ग्लोबल सिटी, विरार (वेस्ट),ठाणे, महाराष्ट्र – 401303, पहला पेपर बैक संस्करण : 2022 : पृष्ठ : 24
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ज़ुबैरी ज़किया, ‘दोनों आसमानों के रंग’, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, पहला संस्करण : 2023 ; पृष्ठ : 51-52
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ज़ुबैरी ज़किया, ‘दोनों आसमानों के रंग’, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., बी-1, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, पहला संस्करण : 2023 : पृष्ठ : 38
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वही, पृष्ठ : 50-51
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वही, पृष्ठ : 118 – 119
