शिक्षा जीवन का शाश्वत मूल्य है।मानवीय चेतना जिन दो प्रकार के मूल्य की परिधि में पल्लवित होती है, उनमें कुछ शाश्वत होते हैं और कुछ परिवर्तनशील।शिक्षा को जीवन का शाश्वत मूल्य कहा जा सकता है, क्योंकि कोई भी अज्ञानी या अशिक्षित व्यक्ति अपने जीवन को विकासशील नहीं बना पाता है। ज्ञान की अनिवार्यता हर युग में रही है, इसीलिए शिक्षा को हर युग में मूल्य और महत्व प्राप्त होता रहा है। ज्ञान और आचरण की दृष्टि से बोध और विवेक में जो सामंजस्य कर सके उसे ही सही अर्थों में शिक्षा या विद्या कहते हैं।
वर्तमान में भारत की शिक्षा प्रणाली जिस तरह से पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने लगी है, वह हमारी संस्कृति के अनुरूप नहीं। यही कारण है कि आज बच्चों में संस्कार दिखाई नहीं देते और पाश्चात्य अनुकरण के कारण वे अपने संस्कारों और संस्कृति दोनों से ही विमुख हो रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति को वर्तमान की जरूरत मानकर उसका अंधा अनुकरण कर रहे हैं। स्कूलों की पढ़ाई भी अंग्रेजी शासन के अनुरूप अंग्रेजी माध्यम से हो रही है। अंग्रेजी बोलने में सब अपनी शान समझते हैं और अपने देश की भाषा हिंदी बोलना हीनता का प्रतीक लगता है। ऐसी स्थिति में बहुत आवश्यक है कि हम अपनी जड़ की ओर देखें अपने दर्शन की ओर देखें, जिन्होंने जीवन की स्थापना के लिए नींव का काम किया।
डॉ राधाकृष्णन का कहना है-
“दर्शन यथार्थता के स्वरूप का तार्किक ज्ञान है।”
हिंदू धर्म का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण धर्म-ग्रंथ वेद है,जिसमें उन ऋषियों तथा मनीषियों के ऐसे उद्गार निहित हैं, जिन्होंने ईश्वरीय सत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। वेद शाश्वत माने जाते हैं, क्योंकि वे न केवल श्रेष्ठ काव्यात्मक कृतियाँ हैं, बल्कि स्वयं ऐसा दैवीय सत्य निरूपित करते हैं जो महान ऋषियों ने अपनी उन्नत चेतना के माध्यम से देखा है।
चारों वेद-ऋग्वेद, सामवेद ,यजुर्वेद व अथर्ववेद में एक लाख से अधिक पद हैं।
उपनिषदों में आत्मज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है। इस आत्मज्ञान का ही दूसरा नाम आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता का विकास और उन्नयन दर्शन के द्वारा ही संभव है। विपरीत ज्ञान एवं मिथ्या ज्ञान ,जो मानव को संसार में आसक्त करता है; उसका नि:शेषीकरण दार्शनिक तत्व-ज्ञान के द्वारा ही संभव है। मानव जीवन समस्याओं से कभी खाली नहीं रहता। प्रतिदिन एक समस्या सुलझती है तो दूसरी सामने उपस्थित हो जाती है।इन समस्याओं के बीच मानव की बुद्धि अपने कर्तव्य पथ से विस्तृत होकर भटक जाती है। ऐसी अवस्था में क्या करने योग्य है और क्या नहीं? इसका निर्देश करने वाला विवेक ही तो हमारा दिशा -निर्देशक है। इस विवेक की प्राप्ति दर्शनों के गहन अध्ययन से ही होती है। इस तरह दर्शन संसार में मनुष्य के लिये क्या करने योग्य है व क्या न करने योग्य है इस दिशा में भी संकेत करते हैं।
‘दर्शन’ शब्द संस्कृत के ‘दृश्’ धातु से बना है। ‘दृश्यते यथार्थतत्वमनेन’
अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ तत्व की अनुभूति हो वही दर्शन है। अंग्रेजी के शब्द ‘फिलोसोफी’ का शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान के प्रति अनुराग” है किंतु भारतीय व्याख्या अपने आप में अधिक गहराई लिए हुए है। भारतीय अवधारणा के अनुसार दर्शन का क्षेत्र केवल ज्ञान तक सीमित न रहकर समग्र व्यक्तित्व को अपने आप में समा लेना है। दर्शन केवल ‘चिंतन’ का विषय न होकर ‘अनुभूति’का विषय माना जाता है। दर्शन के द्वारा बौद्धिक तृप्ति का ही आभास न होकर समग्र व्यक्तित्व बदल जाता है। भारतीय दर्शन केवल आत्मज्ञान न होकर आत्मानुभूति हो जाती है।
प्लेटो का कहना है- *”पदार्थों के सनातन स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना ही दर्शन है।”*
किंतु अरस्तु का कहना था- *”दर्शन एक ऐसा विज्ञान है ,जो परम तत्व के यथार्थ स्वरूप की जाँच करता है।”*
अरस्तु का यह भी कहना है कि,*”दर्शन मनुष्य का एक निष्पक्ष बौद्धिक प्रयत्न है, जिसके द्वारा यह विश्व को उसकी संपूर्णता से समझने की चेष्टा करता है। वस्तुतः दर्शन शास्त्र वह विज्ञान है जो सत्य पर विचार करता है।*
ब्राइटमैन के अनुसार-
*”दर्शन की परिभाषा एक ऐसे प्रयास के रूप में दी जा सकती है, जिसके द्वारा संपूर्ण मानव अनुभूतियों के विषय में सत्यता से विचार किया जाता है, अथवा इसके द्वारा हम अपने अनुभवों का वास्तविक सार जानते हैं।*
आधुनिक युग के महान अंग्रेज विचारक बर्ट्रेंड रसेल ने दर्शन को और अधिक व्यापक रूप में देखा है-
*”दर्शन में हम अपने सामान्य विचारों की संदिग्धता और भ्रामकता की परख करते हैं, उन सब पर विचार एवं अनुसंधान करते हैं, जो हमारे अंतिम प्रश्नों के अंतर प्राप्त करने में भ्रम पैदा करते हैं और अंत में अपने अंतिम प्रश्नों के आलोचनात्मक उत्तर प्राप्त करते हैं।*
हमारे वेद ,उपनिषद और पुराण हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने की बात करते हैं।
*असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमय।*
वैशेषिक दर्शन के शैक्षिक महत्व पर चिंतन करने का विशेष कारण यही है कि ऋषि मुनियों की पावन धरती पर,राम और कृष्ण की जन्मभूमि पर, अपनी सनातन संस्कृति और संस्कारों का पुनरावलोकन करें।
जीवन व जीवन के उस पार भी जिन अनुभवों और अनुभूतियों को हमारे पूर्वज ऋषियों ने महसूस किया और उसी ज्ञान को मनुष्य और मनुष्यता के हित में संरक्षित किया; ज्ञान का वही अपरिमित कोष ही दर्शन है।
दर्शन हमारे जीवन शैली को निरूपित व व्याख्यायित तो करता है, लेकिन हमारी आध्यात्मिक सोच व मान्यताओं को भी वैज्ञानिक संचेतना से जागरूक करता है। जीवन के मूल से जुड़े हुए प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान भी करता है।
दर्शन की 6 शाखाएँ हैं जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है। महर्षि गौतम का “न्याय दर्शन” ,कणाद का “वैशेषिक”, कपिल का “सांख्य” पतंजलि का “योग” जैमिनी का “पूर्व मीमांसा” और बादरायण का “उत्तर मीमांसा अथवा वेदान्त।
ये दर्शन वैदिक दर्शन के नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि यह वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हैं। जो दर्शन वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार करते हैं वे आस्तिक कहलाते हैं और जो स्वीकार नहीं करते हैं उन्हें नास्तिक की संज्ञा दी गई है। किसी भी दर्शन का आस्तिक या नास्तिक होना, परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर न होकर, वेदों की प्रमाणिकता को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर है।
वैशेषिक और न्याय परमात्मा की सत्ता को अनुमान-प्रमाण द्वारा ही स्वीकार करते हैं। साँख्य ईश्वर वादी नहीं है और योग भी वेद से वस्तुत: स्वतंत्र ही है। दोनों मीमांसा शास्त्र अवश्य ही वेद पर स्पष्ट रूप से निर्भर करते हैं। पूर्व मीमांसा में वर्णित देवता का सामान्य विचार वेद मूलक आवश्यक है किंतु उसे परब्रह्म के रूप की चिंता नहीं है। उत्तर- मीमांसा ब्रह्म के अस्तित्व को श्रुति के आधार पर स्वीकार करता है, किंतु उसकी सिद्धि में अनुमान- प्रमाण का भी उपयोग करता है! उसकी सम्मति में उसका साक्षात्कार, ज्ञान व ध्यान द्वारा हो सकता है। इस प्रकार षड्दर्शन का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि छहों दर्शन कुछ मौलिक सिद्धांतों में परस्पर एकमत हैं। ये भारत के वैदिक दर्शन कहे जाते हैं वेद की प्रमाणिकता मानने से इन 6 दर्शनों की दर्शनिकता में कोई विशेष अंतर नहीं आता। वेद की प्रमाणिकता मान्य होने से ध्वनित होता है कि सभी दर्शनों का विकास विचारधारा के एक ही आदिम स्रोत से हुआ है।
न्याय और वैशेषिक दर्शन सामान तंत्र हैं। दोनों का उद्देश्य एक ही है -अर्थात् दुखों की निवृत्ति! और वह यथार्थ तत्व ज्ञान से ही संभव है। समस्त दुखों का मूल कारण अज्ञान ही है।यहाँ दोनों दर्शन एकमत हैं। परंतु कुछ मतभेद भी हैं। जहाँ न्याय दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द; चार को प्रमाण मानता है वही वैशेषिक प्रत्यक्ष और अनुमान, इन दो ही प्रमाणों को स्वतंत्र मानता है और शेष उपमान और शब्द को अनुमान के अंतर्गत ही स्वीकार कर लेता है।
न्याय दर्शन में तर्क से अभिप्राय है- प्रमाणों के अनुसार सत्य का निश्चय करना। प्रमाण ही न्याय का देवता अथवा मुख्य प्रतिपाद्य है। लोक में उसी को तर्क विज्ञान या तर्कशास्त्र भी कहते हैं। जब तक वादी-प्रतिवादी होकर वाद न किया जाए,तब तक सत्य-असत्य का निर्णय नहीं हो सकता। इसीलिए लोकोक्ति बन गई है “वादे वादे जायते तत्वबोध:।”
पाश्चात्य दर्शन में ग्रीक दार्शनिक सुकरात से लेकर आधुनिक दार्शनिक रेनेडेकार्ड, स्पिनोजा,लाईबनितज, जॉन लॉक ,बर्कले, डेविड हियूम, इमैनुअल काण्ट इत्यादि दार्शनिक हैं।
वैशेषिक दर्शन परमाणु वाद पर आधारित है। इसमें आत्मा के अनेक कणों की स्थापना है, और सभी अक्षय हैं; जो सृष्टि के परिवर्तन के साथ भी नष्ट नहीं होते।
*वैशेषिक दर्शन में निहित शैक्षिक विचार*
किसी भी देश की शिक्षा का उस देश की संस्कृति से अटूट सम्बन्ध होता है। देश के सांस्कृतिक वातावरण में ही शिक्षा की पौध पल्लवित होती है। शिक्षा के स्वाभाविक विकास के लिए यह आवश्यक भी है कि वह देश की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से संबद्ध हो। संस्कृति शिक्षा की रूपरेखा बनाती है और शिक्षा उसे गति प्रदान करती है। शिक्षा वह माध्यम है जो संस्कृति को नया मोड़ देकर प्रगतिशील बनाती है व अलंकृत भी करती है। यही वह उपलब्धियाँ हैं,जिससे एक देश दूसरे देश से स्वयं को अधिक समृद्ध समझता है।
शिक्षा एक सापेक्ष साधन है भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन शिक्षा और ज्ञान को ‘प्रकाश’ स्वरूप मानती है व अशिक्षा या अज्ञानता को ‘अंधकार’। इसीलिए भारतीय दर्शन और हमारी संस्कृति; अज्ञानता के अंधेरे से ज्ञान के उजालों की ओर जाने की बात करती है।
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
की बात करती है। शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य की जन्मजात शक्तियों को स्वाभाविक व सामंजस्यपूर्ण उन्नति में योग देती है और उसकी वैयक्तिकता का पूर्ण विकास करती है। उसके व्यवहार, विचार तथा दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन करती है जो- व्यक्ति, समाज, देश और विश्व के लिए हितकर होता है।
फ्राबेल के अनुसार- *”शिक्षा वह प्रक्रिया है जिससे बालक की जन्मजात शक्तियाँ बाहर प्रगट होती हैं।”*
महात्मा गाँधी कहते हैं- *”शिक्षा से मेरा अभिप्राय उन सर्वश्रेष्ठ गुणों का प्रगटीकरण है,जो बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा में विद्यमान है।”*
मनुस्मृति कहती है- *”जन्मना जायते शूद्र:।”*
जन्म से सभी शुद्र होते हैं। शिक्षा के बिना ब्राह्मण भी शूद्र ही हैं। इससे शिक्षा और ज्ञान का महत्व प्रतिपादित होता है।शिक्षा वही है, जो लोगों में संस्कार पैदा करे। यही मानव के सर्वांगीण विकास का साधन है। अतः इसे सदैव जीवन के निकट होना चाहिये।शिक्षा का मूल उद्देश्य सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना या धन कमाना ही न हो, बल्कि सर्वांगीण विकास हो; और इसके लिये जरूरी है कि हमारी जड़ हमारी संस्कृति में हो। और उसकी शाखों का पल्लवन दूर-दूर तक हो। मृत परंपराओं, दकियानूसी व अवैज्ञानिक दृष्टिकोणों का त्याग आवश्यक है; किंतु पुरानेपन के नाम पर प्रत्येक उत्तम वस्तु को भी फेंक देना बुद्धिमानी नहीं होगी।
*”वैशेषिक दर्शन में निहित शैक्षिक विचार”*
वैशेषिक शास्त्र के रचयिता ऋषि कणाद हैं। यह दर्शन उन पदार्थों का विवेचन करता है जिनके मध्य जीवन पल्लवित होता है। आज भौतिक तत्वों की यथावत स्वरूप को जानकर वैज्ञानिक वर्ग ने भौतिक सुख-सुविधाओं के अंबार लगा दिये। अपने काल में कणाद का इसी दिशा में यह अभिनंदनीय प्रयास था।
*वैशेषिक दर्शन में शिक्षा के उद्देश्य*
1-वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण-
परमाणु वाद का समर्थक होने के कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसका मुख्य उद्देश्य है।
2-मानसिक विकास-
इसके अंतर्गत मनस् एवं विचार शक्ति का विकास आता है इसके प्रथम पाँच द्रव्यों में से प्रत्येक में कोई ना कोई विशेष गुण है जो बाह्य इंद्रियों से प्रत्यक्ष होता है। पृथ्वी में गंध, जल में रस, तेज में रूप, वायु में स्पर्श व आकाश में शब्द गुण है, जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान क्रमशः घ्राण, रसना, नेत्र,त्वचा व कान से होता है।
मानस् अर्थात मन भी एक चेतन तत्व है। वह अविनाशी नहीं है।मन स्वयं ज्ञाता नहीं है, वह ज्ञान प्राप्त करने का साधन है;इसीलिए वह भी वैशेषिक दर्शन का विषय है।
3-बौद्धिक विकास-
बुद्धि अर्थात ज्ञान! यह आत्मा का गुण है ।बुद्धि के समुचित विकास से यह अनुभव व स्मृति रूप में जाग्रत होता है।
4-व्यवहारिक ज्ञान का विकास-
यह वह ज्ञान है, जिन्हें हम दैनिक कार्यों में उपयोग में लाते हैं।
5-तत्व ज्ञान का विकास-
मोक्ष प्राप्त करने के लिए तत्वज्ञान का होना आवश्यक है जो मोह से मुक्त करता है।
6-शारीरिक विकास-
इसके अंतर्गत कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का विकास आता है।
7-नैतिक विकास –
इसमें अन्य सामान्य धर्मों के प्रति श्रद्धा , अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, भाव शुद्धि , अक्रोध, शुचिता, पवित्र द्रव्य सेवन, विशिष्ट देव भक्ति, उपवास इत्यादि आते हैं।
*वैशेषिक दर्शन के पाठ्यक्रम*
1-विज्ञान-भौतिक एवं रसायन
2-तात्विक ज्ञान
3-भाषा तार्किक व गणितीय ज्ञान
4-मनोविज्ञान
5-आध्यात्मिक ज्ञान व अन्य सामाजिक विषय-
इसमें शिक्षण के लिये अध्ययन विधियाँ भी वर्णित हैं ।वैशेषिक दर्शन प्रत्यक्ष व अनुमान; दो को ही प्रमाण मानता है अतः अध्ययन की विधियाँ भी मुख्य रूप से प्रत्यक्ष व अनुमान ही होनी चाहिये।
*शिक्षक छात्र सम्बन्ध*
शिक्षा के लिए शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। क्योंकि शिक्षा के द्वारा ज्ञान के संरक्षण का दायित्व भी शिक्षक का ही होता है अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ भावी जीवन में व्यावहारिक और उपयोगी ज्ञान देना शिक्षक का महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है।
विद्यार्थी के लिए भी आवश्यक है वह सुकर्मी, जिज्ञासु, विनयशील ,कर्तव्य परायण, स्वाध्यायी व गुरु का आदर व उनके आदेशों का पालन करने वाला हो।
वैशेषिक दर्शन यह अपेक्षा करता है कि बालक यह अनुभूति करे कि उसके व्यवहार नियन्ता या नियन्त्रण करने वाला वह स्वयं हो। विद्यालय या समझ नहीं।
वैशेषिक प्रमेय पर जोर देता है, जिसका अर्थ है ज्ञान के विषय! विषय महत्वपूर्ण हैं।
*वैशेषिक दर्शन में निहित शैक्षिक विचारों की वर्तमान भारतीय परिपेक्ष में उपयोगिता एवं व्यवहारिकता*
वास्तव में शिक्षा जीवन का शाश्वत मूल्य है।
काण्ट के अनुसार – *”शिक्षा व्यक्ति की उस पूर्णता का विकास है जिस पर वह पहुँच सकता है।”*
शिक्षा विकास की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस संबंध में विवेकानंद कहते हैं-
*”शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की अंतर्निहित क्षमताओं को पूर्ण विकसित करना है।”*
वर्तमान में शिक्षा, शिक्षार्थी और शिक्षक; तीनों जीवन के विकास में किस प्रकार सहायक हों कि प्रेम व सद्भाव विकसित हो; यह शैक्षिक दृष्टिकोण से बहुत आवश्यक है।
अच्छी शिक्षा जितनी आवश्यक है उतना ही उच्च गुण स्वभाव ,कर्म वाले शिक्षक होना भी आवश्यक है। शिक्षा वही श्रेष्ठ है, जिससे आत्मा को गति मिले, मानवता का प्रसार हो व शिक्षार्थी की शारीरिक व मानसिक उन्नति हो।
इसके लिए आवश्यक है कि तार्किक क्षमता का भी विकास किया जाए, और तर्कशास्त्र को भी पाठ्यक्रम में रखा रखा जाए। वैशेषिक इसका समर्थक है।
अरस्तु ने भी मनुष्य को तर्क युक्त प्राणी मानते हुए कहा है- *”कि मनुष्य दृश्य-अदृश्य जगत विषयक विचारों, विश्वासों वा कल्पनाओं का समुदाय है। हम जैसा सोचते हैं, हमारी श्रद्धा, निष्ठा, विश्वास वैसे ही होते हैं। हमारी कार्य प्रणाली और उसके अनुरूप ही हमारी उपलब्धियाँ होती हैं।”*
*निष्कर्ष”*
1.आज भौतिकता अपने चरम सीमा पर पहुँच गई है।लोगों का नैतिक जीवन स्तर गिरता जा रहा है। इस संबंध में दर्शन में आध्यात्मिकता की शिक्षा पर बल दिया गया है दार्शनिक विचारधारा प्राचीन होते हुए भी आधुनिक परिस्थितियों एवं समय के संदर्भ में वर्तमान में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।इसके प्रयोग एवं प्रभाव से मानव जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
2-वैशेषिक दर्शन में ‘सृष्टि’ के स्वरूप की व्याख्या की गई है।
परमाणु से लेकर द्रव्यों के स्थूल रूपों, उनके गुणों एवं कार्यों के सम्बन्धों की समीक्षा करके कणाद ऋषि ने चेतन और अचेतन द्रव्यों की स्थिति का यथार्थ ज्ञान देकर मानव जाति को उपकृत किया है। वैशेषिक दर्शन को यह नाम ‘विशेष’ शब्द के कारण दिया गया है ‘विशेष’ का अर्थ ‘पदार्थ’ है, अतः वैशेषिक दर्शन प्राकृतिक पदार्थ का सूक्ष्म विवेचन करके तत्व ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
वैशेषिक दर्शन में अभाव नाम का कोई पदार्थ नहीं है। आकाश ,वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में प्राकृत नित्य और अचेतन द्रव्य है। इनमें क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध नित्य गुण हैं जो क्रमशः कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका इंद्रियों द्वारा अनुभव किए जाते हैं। काल और देश न दिखाई देने वाले अचेतन द्रव्य हैं जिनमें विभाग की कल्पना हम स्वयं कर लेते हैं। आत्मा और मन चेतन द्रव्य हैं। इनमें आत्मा विभु(सर्वव्यापी, वह जो सब जगह विद्यमान है, सर्वशक्तिमान) और नित्य है, परंतु मन एकदेशीय और अनित्य है।
समवाय(समूह,झुंड,ढेर), कारण और कार्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। कारण के होने पर ही कार्यों की उत्पत्ति पाई जाती है, परंतु कार्य के नष्ट होने पर कारण नष्ट नहीं होता ।गुण द्रव्य के आश्रय में रहते हैं। नित्य द्रव्य में गुण नित्य है और अनित्य द्रव्य में अनित्य। गुण से अनेक गुण की उत्पत्ति नहीं होती। कर्म भी द्रव्य पर आश्रित है। कर्म से कर्म उत्पन्न नहीं होता ।एक कर्म का दूसरा कर्म विरोधी होता है क्योंकि दूसरा कर्म उत्पन्न होने पर पहला कर्म नष्ट हो जाता है।
3-वैशेषिक दर्शन का दृष्टिकोण वैज्ञानिक है इसलिये इसने शिक्षा के विभिन्न पक्षों को प्रभावित किया है। परमाणु वाद का समर्थक होने के कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास वैशेषिक दर्शन की मुख्य विशेषता है।
वैशेषिक दर्शन में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान ,पृथ्वी का गुण, रूप, ऊर्जा, पानी का जमना, गुरुत्वाकर्षण, आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों की विस्तृत जानकारी दी गई है। प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाणों को मनाने के कारण वैशेषिक दर्शन अध्ययन की मुख्य विधियाँ प्रत्यक्ष एवं अनुमान को ही मानता है। इसके अतिरिक्त तर्क एवं वैज्ञानिक विधि को भी महत्वपूर्ण मानता है।
4-शिक्षा द्वारा ज्ञान के संरक्षण और विकास का दायित्व शिक्षक का ही है एवं ज्ञान प्राप्त करके उसका अभ्यास मनन करना शिक्षार्थी का कार्य और धर्म है।अनुशासन का एक ही सबल पक्ष है, और वह है बालकों के व्यक्तित्व का समादर, दमनात्मक अनुशासन का विरोध, शास्त्र अनुशासन में छात्रों को सक्रिय सहयोग तथा बाह्य अनुशासन के स्थान पर आभ्यंतर अनुशासन एवं आत्मानुशासन पर आग्रह।
5-न्याय व्यवस्था के दार्शनिक एवं शैक्षिक विचारों में वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण की स्पष्ट झलक मिलती है। इन विचारों में मनुष्य की मनोवैज्ञानिक वस्तुओं को भी ध्यान में रखा गया है।
*अध्ययन की उपादेयता*
प्राचीन शिक्षा धर्म से प्रेरित थी, इसका प्रमुख कारण प्राचीन भारतीय विचारधारा तथा जीवन दर्शन का पूर्ण रूप से धार्मिक होना था। उस काल में शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने का ही माध्यम नहीं माना जाता था, अपितु शिक्षा मोक्ष प्राप्त करने का भी साधन थी। हमारे धर्म दर्शनों ने न केवल हमें शिक्षा प्रदान करने का कार्य किया, बल्कि हमारे समाज को भी दिशा प्रदान करने का कार्य किया।तत्कालीन समाज की आवश्यकता न केवल बदली, समाज की धारणाओं में भी परिवर्तन आया। प्राचीन भारतीय समाज में जहाँ परंपरागत धारणाओं के अनुरूप समाज का स्वरूप निर्धारित हुआ था ,वहीं आधुनिक भारतीय समाज की धारणा में परिवर्तन आया। यह धारणाएँ व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक आधार पर परिवर्तित होने लगीं। इन आवश्यकताओं को भी पूरा करने का कार्य दर्शन के द्वारा किया गया।
दर्शन के द्वारा जहाँ समाज को शिक्षित करने का कार्य किया जाता है वहीं दर्शनों के द्वारा एक मूल्यवान सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण भी किया जाता है।प्रत्येक समाज तथा उसे समाज में निवास करने वाले व्यक्ति अधिकांशत: उसी सभ्यता एवं संस्कृति को आत्मसात करते हैं जो उनके लिए उपयोगी है।
वर्तमान में जिस तरह देश में शिक्षा का स्तर गिरा है ,जिस तरह यह पश्चात्य शिक्षा- पद्धति एवं संस्कृति का अंधानुकरण कर रही है, संस्कार और नैतिकता का लोप हो रहा है, उसे देखते हुए हमारी शिक्षण पद्धति में परिवर्तन आवश्यक है। हमें इसमें दर्शन को शामिल करना आवश्यक है।
ऐसा माना जाता है की वैशेषिक दर्शन को यूनानी दर्शन से प्रेरणा मिली संभावत: उस काल में जब भारत यूनानी दर्शन के संपर्क में आया. हालांकि दोनों ही परमाणु को अदृश्य इकाई मानते हैं लेकिन उनमे पर्याप्त अन्तर भी मौजूद है. डेमोक्रेटिस के मत से परमाणुओं में परस्पर परिमाण संबंधी भेद तो हैं किन्तु गुणात्मक भेद नहीं. परमाणु अनंत गुणों से सर्वथा रहित और अविभाज्य हैं, किन्तु आकृति, परिमाण, गुरुत्व, स्थिति तथा व्यवस्था के सम्बंध में परस्पर भिन्नता रखते हैं. कणाद के अनुसार परमाणु भिन्न भिन्न आकार के हैं, प्रत्येक अपने आप में विशिष्टता रखता है. परिणाम स्वरुप, पदार्थों में गुणों के कारण जो परस्पर भेद हैं वे यूनानी दृष्टि में न्यून होकर परिमाण संबंधी मदों में परिणित हो जाते हैं जबकि वैशेषिक में इसके विपरीत है. निष्कर्ष य़ह है कि भारतीय दार्शनिक यूनानीओं की तरह य़ह नहीं मानते की गुण परमाणु में अन्तर्निहित नहीं हैं. यूनानी मत में परमाणु गतिमान किन्तु कणाद अनुसार वे निष्क्रिय हैं. डेमोक्रेटिस के अनुसार परमाणुओं से आत्माओं का निर्माण सम्भव किन्तु वैशेषिक आत्मा और परमाणु को भिन्न मानते हैं.
आधुनिक विज्ञान में परमाणु ‘इलेक्ट्रॉनो’ की संहति है और वे विद्युत अणु से अपना स्वरुप पाते हैं. वे सौरमंडल का लघु रूप है जिसमें एक नाभिक रूपी सूर्य के विद्युत अणु गुरुत्व नियमों के अनुरूप चक्कर लगाते हैं.
वैशेषिक मत में कर्म-: कणाद के अनुसार कर्म वह है जो एक ही द्रव्य में रहता है, गुणों से रहित है तथा संयोग और विभाग का सीधा तथा तात्कालिक कारण है. कर्म की गति पांच हैं-
ऊर्ध्व, अधो,संकोच, विस्तार और सामान्य गति.
कर्म अपने सभी रूपों में अस्थायी है और आधारभूत द्रव्य के परिवर्ति संयोग और विनाश के साथ समाप्त हो जाता है. आकाश, काल, देश तथा आत्मा यद्यपि द्रव्य हैं तथापि अमूर्त होने के कारण कर्म से रहित हैं.
वैशेषिक मत में नीति शास्त्र-: ऐसे कर्म जो ऐन्द्रिय जीवन के कारण हैं, अनैच्छिक या सहज है और वे कर्म जो इच्छा अथवा द्वेषपूर्वक किए जाते हैं स्वेच्छा कृत हैं. पहले का लक्ष्य शारीरिक जबकि दूसरे का हित प्राप्ति है.
वैशेषिक दर्शन अनुसार ऐसे कर्तव्य जो सब कालों तथा देशों में लागू हैं.
1.श्रद्धा
2.अहिंसा
3.प्राणीमात्र के प्रति दया
4.सत्य भाषण
5.अस्तेय
6.ब्रह्मचर्य
7.मन की शुद्धता
8.क्रोध का वर्जन
9.अभिषेचन
10.शुद्धिकारक द्रव्य प्रयोग
11.विशिष्ट देवता भक्ति
12.उपवास
13.अप्रमाद
वैशेषिक मत में ईश्वर-: कणाद वेदों को ईश्वर प्रदत्त न मानकर ऋषियों द्वारा रचित मानते हैं. प्रशस्तपाद भी ईश्वर को प्रधानता नहीं देते यद्यपि अपने ग्रंथ पदार्थ धर्म संग्रह में वह पहले श्लोक में ईश्वर को जगत का कारण बताते हैं. वेदांत सूत्र में शंकराचार्य वैशेषिक मत को अनीश्वरवादी बताते हैं.
विरोधी सम्प्रदायों की आलोचना ने वैशेषिक मत के असंतोषजनक स्वरूप को खोल दिया. करोड़ों बुद्धि रहित परमाणु इस जगत की नानाविधता में अद्भुत एकत्व नहीं उत्पन्न कर सकते. वे एकत्र होकर विचार करने में असमर्थ और एक आत्मिक शासन की सामन्य योजना को कार्यान्वित करने में भी असमर्थ हैं. वैशेषिक जो तर्कशील थे केवल आकस्मिकता की कल्पना को नहीं अपना सकते थे.वे शीघ्र समझ गए भले परमाणु निर्विकार और नित्य क्यूँ न हों, किसी प्रयोजन के नहीं जब तक उनकी क्रियाओं का नियंत्रण किसी अधिष्ठाता मस्तिष्क द्वारा न हो.
ज्ञानवर्धक, महत्वपूर्ण आलेख। शिक्षा का उद्देश्य ही समाज को ज्ञान के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोड़ना है। अपनी जड़ों से जुड़े बिना हम वटवृक्ष तो बन नहीं सकते । आप बहुत सुंदर लिखती हैं। साधुवाद
नीलिमा करैया जी का शोधालेख ‘ज्ञान परंपरा में वैशेषिक दर्शन का शैक्षिक महत्व’ शैक्षिक उन्नयन पर बल देता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था प्राचीन दार्शनिक मत पर आधारित हो जिसमें ज्ञान के साथ-साथ, नैतिक मूल्य, कर्तव्य,दया और परोपकार जैसे जीवन मूल्य निहित हों। जिससे मानव अपने जीवन को ऊंचा उठाया जा सके।
हमारा प्राचीन शिक्षा पद्धति इसी पर केंद्रित थी। उस समय अनेक दार्शनिक मत प्रचलित थे पर शिक्षा वैशेषिक दर्शन के अनुसार दी जाती थी। इस दर्शन की विशेषता यह थी कि यह वैज्ञानिक और तर्क संगत था।
आपने इस शोधालेख में भारतीय दर्शन एवं पाश्चात्य दार्शनिकों के मतों को कोट करके इसे प्रामाणिक बना दिया है। शोधार्थी इस लेख से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
इस शोधालेख में विभिन्न दर्शन और दार्शनिकों के बीच संस्कृति शब्द या सांस्कृतिक पृष्टभूमि नमक की तरह प्रयोग हुआ है पर स्वाद वैसा ही है । अगर ये नहीं आता तो वैसा ही होता -“लवन बिना बहु बिंजन जैसे।”
दर्शन और संस्कृति में एक अंतर है कि दर्शन विज्ञान की तरह अंतिम सत्य है, जब तक कोई उससे बड़ा सत्य सामने न आ जाए। संस्कृति कभी अंतिम सत्य होती ही नहीं है। भारतीय संस्कृति के संबंध में कहा गया है कि – ” भारतीय संस्कृति सदा गतिशीला वर्तते।”
संस्कृति हमेशा बदलती रहती है और उसमें बहुत धीरे-धीरे बदलाव होता है। दो हजार साल पहले की संस्कृति और आज की भारतीय संस्कृति में बहुत अंतर आ चुका है। संस्कृति खून में होती है और दर्शन दिमाग में।
आपका आलेख बहुत ही ज्ञानवर्धक है। लेख में आपका परिश्रम झलकता है।
लेख की प्रस्तावना में सामंजस्यता की कमी खलती है। जहां अंग्रेजी भाषा और उसके माध्यम के लिए नकारात्मक भाव है वहीं लेख को पाश्चात्य दार्शनिकों के मतों से पुख्ता भी किया गया है।
आप लेख लिखें या समीक्षा उसमें आपकी गहन दृष्टि झलकती है। इस लेख में भी गहराई है जो आपके लेखन कौशल की गवाही दे रही है।
ऐसा माना जाता है की वैशेषिक दर्शन को यूनानी दर्शन से प्रेरणा मिली संभावत: उस काल में जब भारत यूनानी दर्शन के संपर्क में आया. हालांकि दोनों ही परमाणु को अदृश्य इकाई मानते हैं लेकिन उनमे पर्याप्त अन्तर भी मौजूद है. डेमोक्रेटिस के मत से परमाणुओं में परस्पर परिमाण संबंधी भेद तो हैं किन्तु गुणात्मक भेद नहीं. परमाणु अनंत गुणों से सर्वथा रहित और अविभाज्य हैं, किन्तु आकृति, परिमाण, गुरुत्व, स्थिति तथा व्यवस्था के सम्बंध में परस्पर भिन्नता रखते हैं. कणाद के अनुसार परमाणु भिन्न भिन्न आकार के हैं, प्रत्येक अपने आप में विशिष्टता रखता है. परिणाम स्वरुप, पदार्थों में गुणों के कारण जो परस्पर भेद हैं वे यूनानी दृष्टि में न्यून होकर परिमाण संबंधी मदों में परिणित हो जाते हैं जबकि वैशेषिक में इसके विपरीत है. निष्कर्ष य़ह है कि भारतीय दार्शनिक यूनानीओं की तरह य़ह नहीं मानते की गुण परमाणु में अन्तर्निहित नहीं हैं. यूनानी मत में परमाणु गतिमान किन्तु कणाद अनुसार वे निष्क्रिय हैं. डेमोक्रेटिस के अनुसार परमाणुओं से आत्माओं का निर्माण सम्भव किन्तु वैशेषिक आत्मा और परमाणु को भिन्न मानते हैं.
आधुनिक विज्ञान में परमाणु ‘इलेक्ट्रॉनो’ की संहति है और वे विद्युत अणु से अपना स्वरुप पाते हैं. वे सौरमंडल का लघु रूप है जिसमें एक नाभिक रूपी सूर्य के विद्युत अणु गुरुत्व नियमों के अनुरूप चक्कर लगाते हैं.
वैशेषिक मत में कर्म-: कणाद के अनुसार कर्म वह है जो एक ही द्रव्य में रहता है, गुणों से रहित है तथा संयोग और विभाग का सीधा तथा तात्कालिक कारण है. कर्म की गति पांच हैं-
ऊर्ध्व, अधो,संकोच, विस्तार और सामान्य गति.
कर्म अपने सभी रूपों में अस्थायी है और आधारभूत द्रव्य के परिवर्ति संयोग और विनाश के साथ समाप्त हो जाता है. आकाश, काल, देश तथा आत्मा यद्यपि द्रव्य हैं तथापि अमूर्त होने के कारण कर्म से रहित हैं.
वैशेषिक मत में नीति शास्त्र-: ऐसे कर्म जो ऐन्द्रिय जीवन के कारण हैं, अनैच्छिक या सहज है और वे कर्म जो इच्छा अथवा द्वेषपूर्वक किए जाते हैं स्वेच्छा कृत हैं. पहले का लक्ष्य शारीरिक जबकि दूसरे का हित प्राप्ति है.
वैशेषिक दर्शन अनुसार ऐसे कर्तव्य जो सब कालों तथा देशों में लागू हैं.
1.श्रद्धा
2.अहिंसा
3.प्राणीमात्र के प्रति दया
4.सत्य भाषण
5.अस्तेय
6.ब्रह्मचर्य
7.मन की शुद्धता
8.क्रोध का वर्जन
9.अभिषेचन
10.शुद्धिकारक द्रव्य प्रयोग
11.विशिष्ट देवता भक्ति
12.उपवास
13.अप्रमाद
वैशेषिक मत में ईश्वर-: कणाद वेदों को ईश्वर प्रदत्त न मानकर ऋषियों द्वारा रचित मानते हैं. प्रशस्तपाद भी ईश्वर को प्रधानता नहीं देते यद्यपि अपने ग्रंथ पदार्थ धर्म संग्रह में वह पहले श्लोक में ईश्वर को जगत का कारण बताते हैं. वेदांत सूत्र में शंकराचार्य वैशेषिक मत को अनीश्वरवादी बताते हैं.
विरोधी सम्प्रदायों की आलोचना ने वैशेषिक मत के असंतोषजनक स्वरूप को खोल दिया. करोड़ों बुद्धि रहित परमाणु इस जगत की नानाविधता में अद्भुत एकत्व नहीं उत्पन्न कर सकते. वे एकत्र होकर विचार करने में असमर्थ और एक आत्मिक शासन की सामन्य योजना को कार्यान्वित करने में भी असमर्थ हैं. वैशेषिक जो तर्कशील थे केवल आकस्मिकता की कल्पना को नहीं अपना सकते थे.वे शीघ्र समझ गए भले परमाणु निर्विकार और नित्य क्यूँ न हों, किसी प्रयोजन के नहीं जब तक उनकी क्रियाओं का नियंत्रण किसी अधिष्ठाता मस्तिष्क द्वारा न हो.
ज्ञानवर्धक, महत्वपूर्ण आलेख। शिक्षा का उद्देश्य ही समाज को ज्ञान के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोड़ना है। अपनी जड़ों से जुड़े बिना हम वटवृक्ष तो बन नहीं सकते । आप बहुत सुंदर लिखती हैं। साधुवाद
नीलिमा करैया जी का शोधालेख ‘ज्ञान परंपरा में वैशेषिक दर्शन का शैक्षिक महत्व’ शैक्षिक उन्नयन पर बल देता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था प्राचीन दार्शनिक मत पर आधारित हो जिसमें ज्ञान के साथ-साथ, नैतिक मूल्य, कर्तव्य,दया और परोपकार जैसे जीवन मूल्य निहित हों। जिससे मानव अपने जीवन को ऊंचा उठाया जा सके।
हमारा प्राचीन शिक्षा पद्धति इसी पर केंद्रित थी। उस समय अनेक दार्शनिक मत प्रचलित थे पर शिक्षा वैशेषिक दर्शन के अनुसार दी जाती थी। इस दर्शन की विशेषता यह थी कि यह वैज्ञानिक और तर्क संगत था।
आपने इस शोधालेख में भारतीय दर्शन एवं पाश्चात्य दार्शनिकों के मतों को कोट करके इसे प्रामाणिक बना दिया है। शोधार्थी इस लेख से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
इस शोधालेख में विभिन्न दर्शन और दार्शनिकों के बीच संस्कृति शब्द या सांस्कृतिक पृष्टभूमि नमक की तरह प्रयोग हुआ है पर स्वाद वैसा ही है । अगर ये नहीं आता तो वैसा ही होता -“लवन बिना बहु बिंजन जैसे।”
दर्शन और संस्कृति में एक अंतर है कि दर्शन विज्ञान की तरह अंतिम सत्य है, जब तक कोई उससे बड़ा सत्य सामने न आ जाए। संस्कृति कभी अंतिम सत्य होती ही नहीं है। भारतीय संस्कृति के संबंध में कहा गया है कि – ” भारतीय संस्कृति सदा गतिशीला वर्तते।”
संस्कृति हमेशा बदलती रहती है और उसमें बहुत धीरे-धीरे बदलाव होता है। दो हजार साल पहले की संस्कृति और आज की भारतीय संस्कृति में बहुत अंतर आ चुका है। संस्कृति खून में होती है और दर्शन दिमाग में।
आपका आलेख बहुत ही ज्ञानवर्धक है। लेख में आपका परिश्रम झलकता है।
लेख की प्रस्तावना में सामंजस्यता की कमी खलती है। जहां अंग्रेजी भाषा और उसके माध्यम के लिए नकारात्मक भाव है वहीं लेख को पाश्चात्य दार्शनिकों के मतों से पुख्ता भी किया गया है।
आप लेख लिखें या समीक्षा उसमें आपकी गहन दृष्टि झलकती है। इस लेख में भी गहराई है जो आपके लेखन कौशल की गवाही दे रही है।
ज्ञानवर्धक आलेख. आपके अनथक शोध के लिए साधुवाद. सही कहते हैं There is a difference in being educated and learned.