Wednesday, February 11, 2026
होमलेखनीलिमा शर्मा की कलम से - एक युग का अवसान: कामिनी कौशल...

नीलिमा शर्मा की कलम से – एक युग का अवसान: कामिनी कौशल अब स्मृतियों में रहेंगी

हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की उजली स्मृतियाँ सहेजे दिग्गज अभिनेत्री कामिनी कौशल ने 14 नवम्बर 2025 को 98 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके जाने के साथ भारतीय फिल्म इतिहास का वह पूरा अध्याय मानो धीमे-धीमे ओझल हो गया, जिसकी छाया में हमारे सिनेमा ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कलात्मक ऊँचाइयों को छुआ था। 24 फरवरी 1927 को लाहौर में उमा कश्यप के रूप में जन्मी कामिनी कौशल उन विरल कलाकारों में थीं जिनकी अभिनय-यात्रा सात दशक से भी अधिक चली और जिनकी उपस्थिति चार पीढ़ियों के दर्शकों के साथ समान आत्मीयता से जुड़ी रही।
कामिनी कौशल की शैक्षिक पृष्ठभूमि भी प्रभावशाली थीl उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया था। उनका फिल्मी सफर 1946 में ख़्वाजा अहमद अब्बास की ऐतिहासिक फिल्म नीचा नगर से आरम्भ हुआ Iवही फिल्म, जो कान (Cannes) फ़िल्मोत्सव में पामे डी’ओर (Gold Palm) जीतने वाली पहली (और दुर्भाग्यवश अब तक एकमात्र) भारतीय फिल्मों में से एक है और जिसने भारतीय सिनेमा को विश्व-पटल पर नई पहचान दिलाई। इस फिल्म ने कामिनी कौशल की सादगी, सहज भावाभिव्यक्ति और स्वाभाविक अभिनय को तत्काल पहचान भी दिलाई।
दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर जैसे दिग्गज सितारों की समकालीन होते हुए भी उन्होंने अपनी अलग और विशिष्ट पहचान कायम की। दो भाई, नदिया के पार, शहीद, जिद्दी, शबनम, परस, नमूना और अरज़ू जैसी फिल्मों में उनकी उपस्थिति उस दौर के सामाजिक और रूमानी सिनेमा की गरिमा और संवेदनशीलता को नई ऊँचाई देती रही। 1954 की उत्कृष्ट कृति बिराज बहू में निभाईlउनकी भूमिका ने उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिलाया,जो उस समय किसी भी अभिनेत्री के लिए सम्मान और चुनौती दोनों का प्रतीक था।
समय बीतने के साथ उन्होंने नायिका की सीमित परिधि से आगे बढ़कर चरित्र और मातृ-भूमिकाओं को भी नई व्याख्या दी। मनोज कुमार की फिल्मों उपकार, पूरब और पश्चिम, शोर, रोटी कपड़ा और मकान, दस नंबरिया और संतोष में उनका संतुलित, दृढ़ और आत्मीय अभिनय दर्शकों के मन में स्थायी रूप से दर्ज है। इसी प्रकार राजेश खन्ना अभिनीत दो रास्ते, प्रेम नगर और महाचोर में माँ-दादी-भाभी के किरदारों में उन्होंने जो गरिमा और गहराई जोड़ी, वह उस दौर के पारिवारिक सिनेमा की भावनात्मक रीढ़ बन गई।
1958 की फिल्म जेलर में उन्होंने जटिल भावभूमि वाला जो चरित्र निभाया, उसे आज भी हिंदी आलोचना में विशेष स्थान प्राप्त है। एक ऐसे समय में, जब महिला पात्रों के अवसर सीमित और दृष्टिकोण संकीर्ण थे, कामिनी कौशल ने यह साबित किया कि स्त्री-चरित्र केवल सौन्दर्य का विस्तार नहीं, बल्कि कथानक का संवेदनशील केन्द्र भी हो सकते हैं।
फिल्मों से बाहर भी उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। दूरदर्शन पर बच्चों के कार्यक्रमों विशेषतः कठपुतली और शैक्षणिक कार्यक्रमों में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। वे बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका “पराग” के लिए कहानियाँ भी लिखती थीं, जिससे उनकी रचनात्मकता का दूसरा आयाम सामने आता है।
सिनेमा के तेज़ी से बदलते परिदृश्य में भी उन्होंने स्वयं को समय से पीछे नहीं होने दिया। वे नई पीढ़ी की फिल्मों में भी उसी आत्मीयता से दिखीं चेन्नई एक्सप्रेस, कबीर सिंह और लाल सिंह चड्ढा जैसी फिल्मों में उनकी उपस्थिति न केवल दर्शकों को चकित करती रही, बल्कि यह भी बताती रही कि सृजनधर्मिता का उत्साह उम्र का मोहताज नहीं होता। 1940 के दशक की नायिका से 2020 के दशक की दादी तक का यह सफर हिन्दी सिनेमा के इतिहास में एक अनोखा उदाहरण है।
उनके निधन पर परिवार ने निजता की अपील की है, परन्तु भारतीय सिनेमा जगत, सहकर्मियों और दर्शकों के हृदयों में उनके प्रति गहरी श्रद्धा उमड़ रही है। कामिनी कौशल वह सेतु थीं जो सिनेमा के सौम्य, शालीन और कलात्मक स्वर्णयुग को आधुनिक युग की नयी तकनीकों और नयी रूचियों से जोड़ता था।
उनका जाना केवल एक महान अभिनेत्री का निधन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा का अवसान है एक ऐसी परंपरा जिसमें कला, अनुशासन, निष्ठा और मानवीय गरिमा अभिनय का आधार हुआ करती थी। कामिनी कौशल का जाना एक युग के सांध्य की तरह हैlधीरे-धीरे विलुप्त होती उस परंपरा का अंतिम उजाला, जिसमें सादगी,शिष्टता और कला के प्रति निर्मल समर्पण ही कलाकार की पहचान हुआ करते थे। वे चली गईं, पर उनका कोमल प्रकाश हिंदी सिनेमा की स्मृति में लंबे समय तक जीवित रहेगा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।उनके योगदान, उनकी कोमल आभा और उनका सहज अभिनय आने वाले अनेक वर्षों तक हिंदी सिनेमा की स्मृतियों में जीवित रहेगा। कामिनी कौशल सदैव आदर के साथ याद की जाएँगी।
RELATED ARTICLES

3 टिप्पणी

  1. बेहद संवेदनशील और जानी मानी कलाकार का स्मृतिशेष भी उतना ही बेहतरीन और समग्र अंदाज़ से लिखा गया है। एनसीईआरटी और सीआईटी तथा दूरदर्शन की राह में कामिनी कौशल जी एक मुलाकात रही।
    शहीद फिल्म की बात होते ही ,वे भावुक हो गईं।
    उन्होंने सरदार भगत सिंह की पूज्य माता जी का उन्हें गले से लगाना अंतर्मन तक भिगो गया था,एक सोलो मुलाकात के दौरान उनकी आँखें छलक गईं थीं
    उनको देखते ही मेरे दिल की बात लबों पर बस यूं ही बेसाख्ता आ गई थी। माँ हो तो आप सरीखी !!!!
    पुरवाई पत्रिका समूह ने उन्हें भावपूर्ण अंदाज़ में याद किया सो पाठकों की ओर से सादर आभार।

  2. आदरणीय नीलिमा जी!

    कामिनी कौशल एक अच्छी कलाकार थीं।
    इतना उनके बारे में नहीं जानते थे जितना आपको पढ़कर जान पाए।
    आपने उनके बारे में विस्तृत जानकारी दी और प्रारंभ से अंत तक की फिल्मी जीवन यात्रा का उतनी ही खूबसूरती के साथ वर्णन किया जितना खूबसूरत जीवन उन्होंने स्वयं जिया होगा।

    कान फ़िल्मोत्सव की gold palm जानकारी हमारे लिये नयी थी।

    पराग के लिये वह लिखा करती थीं यह बात हमारे लिये महत्वपूर्ण रही।

    आपके माध्यम से कामिनी कौशल को और अच्छी तरह जान पाये।

    निश्चित रूप से उनका जाना एक युग का अवसान है।
    इस लेख के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest