‘सिंध’ एक ऐसा शब्द है जो केवल कहीं दूर बसा एक भूमि का टुकड़ा नहीं बल्कि यह भारत की आत्मा में बसी ऐसी अन्तर्ध्वनि है जिसकी अनुगूँज सनातन काल से भारत के हर पोर में गुंफित होती रहती है। भारत के राष्ट्रगान में भी आता है ‘सिंध’; पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा। भारत विभाजन के 77 वर्ष बीत जाने के बाद भी हम गा रहे हैं पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा। ऐसा लगता है कि सिंध भारत की आत्मा का ऐसा अविभाज्य अंग है, जिसे अलग किया जाना संभव नहीं है। पर प्रश्न है कि आज के समय में भारत के संदर्भ में इसका क्या महत्व है? ज्यादातर लोग शायद नहीं जानते, सिवा इसके कि सिंध पहले हिंदुस्तान का हिस्सा था और भारत के दुर्भाग्यपूर्ण, हिंसापूरित विभाजन के पश्चात अब पाकिस्तान में है। या कि सिंध के नाम से ही हिन्द और फिर हिंदुस्तान या हिन्दी या इंडिया शब्द का प्रयोग प्रारंभ हुआ। लेकिन हमारा विषय यह नहीं है, बल्कि हमारा विषय इतिहास में घटी घटनाओं और उसमें वर्णित आख्यानों की विवेचना, सत्य की पड़ताल और उससे मिलने वाली सीख है।
इतिहास केवल पूर्व में घटी घटनाओं के बाबत वर्णित कहानियाँ नहीं है बल्कि पूर्व में घटी घटनाएं जिसने तत्कालीन समाज पर एवं बाद के समय में भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप से जो वृहत प्रभाव डाले, जिसने आमजन की ज़िंदगियों को प्रभावित किया, उसके बारे में जानकारी देता है और आगाह भी करता है, ताकि वैसी घटनाओं की पुनरावृति न हो और अगर होने का अंदेशा हो तो इसे रोकने हेतु हमें कैसी सावधानियाँ बरतनी चाहिए।
सिंध का इतिहास भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में हिन्दूकुश या खैबर के दर्रे से जो आक्रमण हुए वे सभी मँगोलों, तुर्कों आदि के द्वारा किए गए, परवर्ती काल में हुए। लेकिन उनके शक्तिशाली होने से पूर्व भारत पर होने वाले ज्यादातर आक्रमण बरास्ता सिंध ही हुए। इतिहास की किताबों में सामान्य रूप से हमें यही पढ़ाया जाता है कि मुहम्मद बिन कासिम पहला अरब आक्रमणकारी था। पाकिस्तान में तो कासिम का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है और उसे पाकिस्तान का पहला नागरिक एवं पाकिस्तान की स्थापना करने वाला बताया जाता है। लेकिन सत्य तो यह है कि कासिम से पूर्व भी सिंध पर कई असफल अरब आक्रमण हो चुके थे।
जैसा इतिहास में वर्णित है कि तत्कालीन समय में अरब में उमैयद वंश के खलीफा का शासन था। इसी वंश के द्वारा नियुक्त सूबेदार (गवर्नर) अल हज्जाज इब्न यूसुफ, जो बगदाद का गवर्नर था ने सिंध पर चढ़ाई करने के लिए कासिम से पूर्व कम से कम दो बार सेनाएं भेजी, जिसे तत्कालीन सिंध के राजा दाहिर ने असफल कर दिया। लेकिन कासिम का आक्रमण सफल हुआ और भारत में इसी के साथ इस्लामिक शासन का प्रारंभ भी हुआ। लेकिन आखिर यह आक्रमण सफल क्यों हुआ यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है।
सिंध पर कासिम का आक्रमण 711 ईस्वी में हुआ। दाहिर के शासन और कासिम के आक्रमण के संबंध में हमें ‘चचनामा’ नामक किताब से जानकारियाँ मिलती है, जिसकी रचना तेरहवीं शताब्दी में अली इब्ने हमीद इब्ने अबू बकर कूफी के द्वारा फारसी में की गई। कुछ लोग इसे मूल रूप से अरबी की रचना बताते हैं, जिसे कूफी ने फारसी में अनुवादित किया लेकिन ज्यादातर लोग इसे फारसी में लिखी गई मूल रचना ही मानते हैं। ‘चचनामा’ में जो ‘चच’ शब्द है वह दाहिर के पिता का नाम है।
दाहिर के पिता ‘चच’ एक ब्राह्मण व्यक्ति थे। उनके राजा बनने के पूर्व सिंध के राजा बौद्ध पंथ को मानने वाले थे। 60 वर्ष के अल्पकाल में सिंध ने तीन तरह की राजसत्ताएँ देखी; बौद्ध, ब्राह्मण और अरब -मुस्लिम। सिंध पर पहले राय वंश के सहर्ष नामक राजा का शासन था, जो बौद्ध थे। एक आक्रमण के दौरान उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र साहसी द्वितीय राजा बने, जो 626 से 652 तक राजा रहे। इसके पश्चात सिंध में ब्राह्मण राजवंश की स्थापना हुई, जो 711 में कासिम के आने तक रही। 642 ईस्वी में चीनी यात्री हुएन सांग ने लिखा है कि सिंध में बड़ी संख्या में बौद्ध स्तूप थे। वहाँ सैकड़ों संघाराम थे, जिसमें हजारों बौद्ध भिक्षुक रहा करते थे। ब्रिटिश इतिहासकार जॉन के लिखता है कि सिंध में बौद्ध धर्म प्रमुख धर्म था एवं यहाँ हिन्दू भी बड़ी संख्या में थे।
चच साहसी-द्वितीय का विश्वासी मंत्री था, जिससे साहसी द्वितीय की रानी सुहंदी प्रेम करती थी। साहसी द्वितीय और सुहंदी के कोई पुत्र नहीं होने सुहंदी को डर था कि साहसी द्वितीय के बाद सत्ता उसके रिश्तेदारों के हाथों में चली जाएगी और वे उसके साथ अच्छा सुलूक नहीं करेंगे। इस कारण से राजा के बीमार पड़ने पर उसने चच को उपराजा घोषित कर दिया एवं साहसी के वफ़ादारों को मरवा डाला। बाद में राजा की मृत्यु के पश्चात उसने चच से विवाह कर लिया और इस तरह से सिंध में चच वंश की स्थापना हुई।
यह तो बात हुई सिंध में चच वंश की स्थापना की। आगे चलकर चच एक कुशल प्रशासक साबित हुआ, जिसने सिंध में प्रजा के हित में अनेक कार्य किए एवं सिंध की सीमा का विस्तार उसने कश्मीर से लेकर पंजाब के बहावलपुर तक किया। चच की मृत्यु के पश्चात उसका छोटा बेटा दाहिर राजा बना, जिसका जिक्र हमें सिंध के इतिहास के संदर्भ में मिलता है।
दाहिर भी अपने पिता की तरह एक कुशल प्रशासक एवं योद्धा था तथा जैसा ऊपर कहा गया है कि उसने दो बार हज्जाज के द्वारा किए गए अरब आक्रमण को कासिम से पूर्व विफल कर दिया। प्रश्न उठता है कि फिर कासिम से दाहिर क्यों हारा? यही प्रश्न है, जो आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण है और वर्तमान भारत की परिस्थितियों में उन वजहों का विश्लेषण और उससे सीख लेना बहुत जरूरी हो जाता है।
जब अरबों ने देखा कि सिंध एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य है, जिसे बल से से हराना संभव नहीं है, तब उन्होंने छल का सहारा लिया। हज्जाज ने सिंध में अपने गुप्तचर भेजे और यहाँ की जनता की कमजोरी का पता लगाने के लिए कहा। इसके बाद वहाँ आए गुप्तचरों ने जो काम किया वह जानना बहुत दिलचस्प है और उसे आज के संदर्भ में देखना बहुत महत्वपूर्ण है।
अरबों ने धर्म के आधार पर सिंध के लोगों में भेद पैदा किया। उन्होंने बौद्धों के मन में यह बात सफलतापूर्वक भर दी कि एक ब्राह्मण ने बौद्ध राजवंश को गलत तरीके से हड़प लिया है, जो बौद्धों के लिए उचित नहीं है। धीरे-धीरे बौद्ध जनता इस नेरटिव का शिकार हुई और वे मन ही मन दाहिर के विरुद्ध हो गए।
लेकिन अरब यहीं नहीं रुके। उन्होंने हिंदुओं को भी दाहिर के विरुद्ध कर दिया। वो कैसे? उन्होंने यह बात फैला दी कि दाहिर ने अपनी सौतेली बहन से शादी कर ली। ब्राह्मणों ने इस बात को धीरे-धीरे सही मान लिया और वे दाहिर से बुरी तरह नाराज हो गए। एक हिन्दू के लिए अपनी सौतेली बहन से शादी कर लेना बहुत बड़ा पाप था, जिसे हिन्दू समाज स्वीकार नहीं कर सकता था। जब सिंध की जनता दाहिर के विरुद्ध हो गई तो अरबों के लिए सिंध पर आक्रमण कर दाहिर को हराना बहुत आसान हो गया। और फिर कासिम के नेतृत्व में दाहिर को अरबों ने हराया और आगे की कहानी जैसा चचनामा बताती है कि दाहिर की दो बेटियों को हज्जाज के पास भेज दिया गया, जहाँ उसने हज्जाज को कहा कि वे लोग उसके लायक नहीं हैं क्योंकि वे कासिम के द्वारा अपवित्र की जा चुकी है। जिसपर क्रोधित होकर हज्जाज कासिम की हत्या करने और उसे बैल के खाल में भर कर लाने का आदेश दिया। और एक बहुत ही प्रभावशाली विजय के कुछ ही समय उपरांत कासिम मौत के घाट उतार दिया गया।
इसी संदर्भ में एक और प्रश्न जो उठता है वह यह कि जब सिंध में बौद्ध मतावलंबियों की बड़ी संख्या थी तो वे सारे बौद्ध कहाँ गायब हो गए? कहाँ चले गए सारे बौद्ध स्तूप? कहाँ चले गए सभी संघाराम वहाँ तो कोई पुष्यमित्र सुंग भी नहीं था। यह देखना दिलचस्प है कि सिंध में विशेषकर अमरकोट, जिसे आजकल उमरकोट कहा जाता है के आसपास हिंदुओं की संख्या अभी भी बची है पर बौद्धों का क्या हुआ?


बेहद रोचक लेख है आपका नीरज जी! यह हमने पूरा पढ़ा।
पहले भी पढ़ लिया था लेकिन लिख नहीं पाए थे।
आपके इस लेख का दूसरा पैराग्राफ बहुत महत्वपूर्ण है। निश्चित रूप से अगर हम वर्तमान को बेहतर बनाना चाहते हैं तो हमें अतीत पर दृष्टि जरूर रखनी चाहिये। उस समय जो भूल हुई हैं उनके प्रति सावधानी बरतना जरूरी रहता है ताकि हम अच्छे वर्तमान का निर्माण कर सके।आज के शासक स्वयं को देखते हैं वर्तमान को नहीं। नहीं उन्हें अपनी जनता की चिन्ता है।
इस लेख को पढ़कर एक बात समझ में आई कि फूट डालो, राज करो की नीति सिर्फ अंग्रेजों की नहीं रही यह मुगलों की भी रही।
सारे बौद्ध कहाँ गए यह बात निश्चित रूप से विचारणीय है।
बेहतरीन लेख के लिए शुक्रिया आपका!