मुझे याद नहीं पड़ता कि पहलेपहल कब पढ़ा था विद्यानिवास जी का अद्भुत लालित्य भरा शब्दचित्र, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’। पर पढ़ते ही मैं उनका मुरीद हो गया था। जैसे रात हो या दिन, सुध-बुध बिसारकर, मैं बस उनका अनुसरण कर रहा होऊँ। उन्हें अपने भीतर-बाहर महसूस कर रहा होऊँ। उन्होंने पता नहीं अचानक मेरे हृदय के किस तार को झंकृत कर दिया था कि उनके शब्द जैसे बाँसुरी बन गए। ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ पंक्ति इस तरह मेरे होंठों पर आकर चिपक गई थी कि मैं कुछ पढ़ रहा होऊँ, लिख रहा होऊँ या फिर किसी से बात कर रहा होऊँ, अचानक भीतर से एक गहरी सी गूँज उठती थी और फिर हठात मेरे होंठों से निकल पड़ता था, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’ कुछ अजब सी कशिश के साथ।
कभी-कभी तो हालत यह कि मैं किसी जरूरी काम में व्यस्त हूँ, पर होंठ मेरे अनजाने ही उच्चारने लगते, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’ एक विचित्र दीवानगी, जिससे मैं खुद भी परिचित नहीं था।
यह सब क्या हो रहा है? मैं खुद भी नहीं जानता था। मेरा मन तो रसमुग्ध था, सो कुछ पता न चलता। पर घर हो या दफ्तर, मेरे आसपास मौजूद लोग कई बार मेरे मुँह से इन शब्दों का उच्चार सुन हैरान होते थे, “मनु जी, क्या हुआ आपको…?”
दफ्तर यानी हिंदुस्तान टाइम्स। एक अखबारी दफ्तर। वहाँ के फौरी माहौल में ऐसी संवेदना अटपटी लग सकती थी। लगती भी। मेरे साथी लोग चौंकते। सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखने लगते। जैसे किसी अटपट दीवाने को देखा जाता है। प्रश्नांकित चेहरे। सवाल-दर-सवाल!
और मैं कोई जवाब न देकर, हलकी भीनी सी मुसकान के साथ एक बार फिर दोहरा दिया करता था, “मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!”
मानो बस यही उनके प्रश्न का उत्तर हो। और कहते ही मन मगन हुआ सा, कहीं दूर उड़ जाता। एकाएक किसी गाँव के एक छोटे से मंदिर का चित्र आँखों के आगे उभर आता। मुकुट पहने श्रीरामजी। मुखमंडल पर, आँखों में सस्मित आलोक। सारे वातावरण को और उपस्थित ग्राम्य जनों के सरल हृदय को पवित्र करता हुआ सा। साथ में प्रेमपगी मुसकान लिए जानकी मैया। साथ में लक्ष्मण। श्रीरामचंद्र जी के चेहरे का आलोक पूरे मंदिर को जगर-मगर सा कर रहा है।
और फिर पूजा और आरती के शब्द…! मानो रस की अद्भुत वर्षा हो रही है, और उस रसवर्षा की बूँदें राम जी के मुकुट पर आकर गिरती हैं। गाँव के सब लोग इससे बेखबर मंदिर में पूजा-अर्चना में जुटे हैं। पर तभी पीछे खड़ा एक सीधा-सादा गँवई शख्स बड़े भावविह्वल स्वर में पुकार उठता है, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’
स्वर में ऐसी मुग्धता, ऐसा रस, ऐसी पुकार कि पहले तो सबको अजीब लगता है, पर फिर अगले ही पल सभी खुद को उसके प्रभाव की गिरफ्त में पाते हैं। और फिर सबके दिलों से एक साथ ही, एक गहरी गूँज-अनुगूँज उठने लगती है, ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे राम का मुकुट…!’



शब्दों का अपना स्नेहिल सानिध्य और आज की भाषा में कहें तो अपना नशा।पुरानी पीढ़ियों और आज के समीचीन संदर्भों के बीच सजा सेतु सा महाकुंभ की आरती सा करता है आदरणीय और श्रद्धेय दोनों!प्रकाश मनु जी का यह बृहद आलेख ।
श्रद्धेय पंडित विद्या निवास मिश्र की बरबस याद दिलाता और ललित निबंध विधा की भीनी भीनी या झीनी सी आभास दिलाता यह आलेख और इस में मेरे राम का मुकुट भीग रहा ,जैसे अवधी और भोजपुरी की खिचड़ी को मकर संक्रांति पर पाठकों को परोस कर कह रहा हो कि लो इसे ग्रहण करो और देखो समझो पढ़ो और गुनों इसी भारतीय संस्कृति को और इसके प्रणेता प्रभु श्री राम को।
यह आलेख या इस प्रकार के अमृत का सा स्वाद दिलाने वाले लेख अब बीते जमाने की यादें बनते जा रहे हैं।ऐसे में जब उन सारी यादों को कोई समेट कर एक मध्यम से घट में भर कर रख दे तो सारे दैहिक और मानसिक संताप वेदना ऊहापोह बेचैनी रिक्तता मानों छू मंतर हो जाती हैं और छोड़ जाती है ,पंडित विद्या निवास मिश्र और उनके चितेरे प्रकाश मनु के सारस्वत सानिध्य में ,,,आज के युवाओं को एक आलेख निश्चित रूप से पढ़ना चाहिए।उनके हिसाब से लेख थोड़ा सा दीर्घकाय और कुछ कठिन शब्दों को समाहित करता हुआ अवश्य लगेगा।क्योंकि पढ़ने की प्रवृति अब कम या यों कहें कि ध्यान केंद्रित करने की क्षमता अब उतार पर है,,अतः ऐसे लेख प्रकाश स्तंभ का कार्य कर सकने में पूर्णतया सक्षम हैं।
आभार अग्रज तेजेंद्र शर्मा जी को जिनके सम्पादकीय आलोक में प्रकाश मनु जी का यह प्रकाश स्तंभ हमें पढ़ने को मिला।प्रकाश मनु दीघार्यु हों शतायु हों ताकि हमें इसी प्रकार के भारतीय संस्कृति को समृद्ध करते और बताते आलेख पढ़ने को मिलते रहें।
सादर
मेरा तो रोम -रोम नेह -मोह के इस रस से पढ़कर सरोबार हो गया । कितने स्नेही लोग ,कितना निश्चल लेखन ।
बधाई व साधुवाद
आपने इतने मन से इस संस्मरणात्मक आलेख को पढ़ा, भाई दिलीप जी। और इतने सुंदर स्नेह पड़े शब्दों में अपनी बात कही।कृतज्ञ हूं भाई। इस संस्मरण को लिखते हुए मेरे मन में जो भाव उमग रहे थे, वे ही मानो आपकी इस छोटी सी रसमय टिप्पणी के शब्द-शब्द से चू रहे हैं। मेरे लिए आज भी यह बड़ा आश्चर्य है, कि शब्द किस जादुई ढंग से हमारे भावों को संचारित करते हैं, कि हृदय से हृदय के बीच पुल बन जाता है।
विद्यानिवास मिश्र सरीखे रस-मर्मज्ञ विद्वान से मैंने यह सीखा। और आप सरीखे सहृदयों में इसे साकार होते देखता हूं, तो बड़ी खुशी होती है।
मेरे बहुत-बहुत स्नेहाशीष,
प्रकाश मनु
बहुत-बहुत आभार भाई सूर्यकांत जी। लेख के मर्म को थाह लिया आपने, और इसकी भावुक संवेदना को भी, जिसे विद्यानिवास जी ने ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ ललित निबंध के शब्द-शब्द में पिरो दिया था।
हिंदी के प्रख्यात विद्वान, रस-मर्मज्ञ और ‘संस्कृति पुरुष’ पंडित जी के शताब्दी वर्ष में मैं उनका स्मरण कर रहा था, तो यही भावना मेरे भीतर थर-थर-थर कर रही थी। और मैं देखता हूं, वही भावुक मन की संवेदना आपकी इस सुंदर, भावपूर्ण टिप्पणी से भी झर रही है।
सच पूछिए तो यही भारतीय संस्कृति की उदात्त चेतना है, जो आज भी रामकथा के व्याज से एक अंत: सलिला की तरह हर प्राणी के हृदय में बह रही है।
आपकी इस अद्भुत टिप्पणी से इस शताब्दी वर्ष में पंडित जी को स्मरण करने का मेरा रस-आनंद कई गुना अधिक बढ़ गया।
अलबत्ता, आपने इतने मन से पढ़ा, और इतनी संजीदगी से कहा भी। बहुत अच्छा लग रहा है भाई सूर्यकांत जी। बहुत-बहुत अच्छा लग रहा है।
विनत हूं भाई। और मन और आत्मा से आपके लिए ढेर सारी असीसें निकल रही हैं।
कृतज्ञता सहित,
प्रकाश मनु
आदरणीय प्रकाश मनु जी, जाहिर है कि आदरणीय मिश्र जी का यह वाक्य एक वाक्य ना होकर एक मंत्र सिद्ध हुआ हे, जो आपके मन में गहरा बैठ गया और इसी को लेकर भाव विभोर होकर श्री विद्यापति मिश्र जी का यह दीर्घ आलेख की रचना आपने की ,
जब मैने यह वाक्य पढ़ा की मेरे राम का मुकुट भीग रहा है तब सीधे-सीधे मेरे मातृत्व मन में मां कौशल्या का ध्यान आया की वन गमन के समय भारी वर्षा ऋतु काल है और सिया राम लक्ष्मण तीनों वर्षा से बचने के लिए एक घने वृक्ष के नीचे खड़े हो गए हैं फिर भी घनघोर वर्षा का जल पत्तों से बहकर प्रभु श्री राम के मुकुट को भिगो रहा है और उसकी बूंदें उनके चेहरे पर से फिसल रहे हैं
लेकिन मिश्र जी ने इस वाक्यांश को इस मंत्र को आदि काल से लेकर वर्तमान तक को इस वाक्य में भिगो सा दिया हे
दो पीढ़ियां का अंतराल जहां पुरानी पीढ़ी की आदत आगत की रक्षा, सुरक्षा की चिंता करती है, वही नई पीढ़ी बेफिक्र है, यहां तक विदेश में बसे हुए बच्चे ऐश्वर्य में भीग रहें हैं सहचरी का सेनुर भी भीग रहा हे , वहीं तमाम कौशल्याए बांट हैरती हे मेरे राम कब आयेंगे ,
राम राम वन से आ चुके हैं प्रजा के लांछन की खातिर राम ने सीता को त्याग दिया है वन में भटकती सीता आश्रय की खोज ओर नवजात बच्चों की चिंता में व्याकुल हे ,वहां राम का भी अपने इस मजबूरी वश किए कार्य से उन्हें लग रहा है कि उनका मुकुट भारी हो गया है श्री राम का ऐश्वर्या भीग रहा है कि अधिकारिणी संतान वन में घूम रही उनका जागरण भीग रहा है सहचारिणी का सुहाग भीग रहा है,,,,,,,
यह एक आलेख मात्र नहीं यह अपने आप में पूरा खंड काव्य हे ,मिश्र जी ने इस मंत्र को अन्तर तम तक आत्मसात कर लिया होगा तब चारो ओर मन में यही व्यथा रही होगी
मेरे राम का मुकुट भीग रहा हे।
आदरणीय मनु जी आपका आलेख 4 बार कोई पढ़ ले तो वो भी इस भाव में डूब जाएगा
इस आलेख के बारे में ज्यादा लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा होगा,
दशांश भी नहीं लिख पा रहे
इतनी विचारशीलता इतना धैर्य ,इतना आत्मसात करना हमारे बस में कहां
आदरणीय मनु जी आपको अशेष साधुवाद
प्रिय कुंती जी,
आपने इतना डूबकर यह संस्मरणात्मक लेख पढ़ा, और इतना ही डूबकर अपनी राय भी लिखी, कि सच ही मुझे आपके लिखे में बार-बार माता कौसल्या के दर्शन होते रहे।
भला इतना हृदय-रस और इतनी गहन संवेदना कहां बच रही है, आज की हड़बड़ी वाले जमाने में? पर आपके लिखे में मुझे वही विराट संवेदना दीख पड़ी, जो कभी मां कौसल्या में वन गए अपने लाड़ले बच्चों राम, सीता और लक्ष्मण के लिए उमगी थी, और जो बरसों बरस बाद पंडित विद्यानिवास मिश्र जी के ललित निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ में एक गहरी मर्म पुकार के साथ छलक पड़ी।
तभी तो राम, सीता और लक्ष्मण केवल अवधपुरी के राम, सीता, लक्ष्मण ही नहीं रहे। मां से दूर गए सारे बच्चों में ही राम, लक्ष्मण, सीता की प्रतीति होने लगी, और हर स्त्री में एक कौसल्या मां आकर बैठ गई, जिसके बच्चे परदेस में गए हुए थे, और उसके हृदय में एक मर्म पुकार सी उठती है, कि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे राम का मुकुट…!
प्रिय कुंती जी, आपमें एक सच्चा सर्जक बैठा है, और उतना ही सच्चा और निर्मल मां का हृदय भी, जिसमें करुणा ही करुणा भरी है। इसीलिए इस संस्मरण के मर्म तक आप पहुंच सकीं। और इसके शब्द-शब्द को आपने महसूस किया।
मेरा एक बार फिर बहुत-बहुत आभार, कुंती जी।
स्नेह,
प्रकाश मनु
मेरे राम का मुकुट भींग रहा है
आदरणीय पितृवत प्रकाश मनु सर,
सादर प्रणाम।
न जाने इस एक वाक्य में कौन सी भावना,कैसी संवेदना और मोह के प्रबल बंधन हैं जिनसे मन मुक्त होना ही नहीं चाहता। राम का नाम ही नितांत आत्मीय, हृदय के निकट प्रतीत होता है,जिसकी अनुभूति गूंगे की शर्करा के समान अकल्पनीय, अकथनीय है।अकथ कहानी प्रेम की कछु कहि न जाई।अद्भुत सम्मोहन है ।जब राम भावनात्मक सेतु हैं मन,जीवन के तमाम सूत्रों को जोडने वाले तो उनके.सिर पर विराजित मुकुट का मोह मां कौशल्या के.समान कितना सरल,मार्मिक और भावपूर्ण होगा।आपने आदरणीय स्मृतिशेष विद्या निवास मिश्र जी के इस निबंध को एक नयी उद्भावना ,नये अनुराग में बांध कर अंर्तमन की गहराईयों को छू लिया है जैसे।
राम के वनवास गमन की पीडा को जैसे कौशल्या ने आत्मसात कर अपनी वेदना को आंसुवों में प्रवाहित किया,वैसे ही आपके द्वारा मां की.प्रभु के सामने आंखें बंद कर उस क्षण को.महसूस करवाना कि वे अव्यक्त भाव बोध में डूब कर अश्रुपूरित भावांजलि दे रही हों*मेरे राम का मुकुट भींग रहा हैं”। आपने बहुत ही सुंदर, स्नेहसिक्त समीक्षा की ,जहां पाठक का हृदय भी भींग उठा है उस अमृत-कुम्भ से छलकी बूंदों के.सहज प्रवाह में।आपने लिखा*राम भींगें तो भींगे उनका मुकुट नहीं, सीता भींग भले ही जायें उनका सिंदूर न भींगे।*अद्भुत सम्मोहन में बांध लिया है.इस लोकगीत के भावों ने।
आपकी समीक्षा में अनेक भावों का नंदन कानन भी विलस रहा है,एक मा की प्रतीक्षा है,अवध का स्नेह है,बचपन की व्याकुलता भी है,और घटनाक्रमों की अचानक बदलती जाती परिस्थितियां भी हैं।अभी तो.राम के राज्याभिषेक की तैयारी थी और अभी वन प्रांतर में नंगे पांव चलते राम लक्ष्मण और सीता के सुकोमल चरण । माता की कल्पना में राम का मुकुट अभी भी उनके सिर पर है वर्षा में भींग रहा है,वह छटपटा उठती है*मेरे राम का मुकुट भींग रहा है*।
आपकी लेखनी को शत-शत नमन करती हूं इस सरल,सहज पुण्य सलिल के भाव प्रवाह में बहा ले जाने के लिए। सचमुच एक तंद्रावस्था की स्थिति हो जाती है जब पाठक भी लेखक की भावनाओं के.साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है।आपके इस संस्मरण को एक सम्मोहन में बंध कर ही आद्योपांत पढ गयी हूं।स्तब्ध है मन,शब्द भी मौन हो गए हैं जैसे।लेकिन भावनाएं उमड रही थीं कुछ कहने के लिए। अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया के.रुप में आपको समस्त आदर और आत्मीय स्नेह के.साथ अपना प्रणाम निवेदित करती हूं।सादर प्रणाम। आभार आपने यह अवसर दिया मुझे कुछ व्यक्त कर पाने का।बहुत कुछ कहना है,,लिखना है,अवश्य लिखूंगी,यदि मां भारती ने मुझे इस योग्य माना तो।
आप स्वस्थ व यशस्वी हों,हार्दिक शुभ कामनाएं।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
आदरणीय बाबूजी! आपके संस्मरण का शीर्षक ही प्रभावित करने वाला है। ऐसा माधुर्य है इसमें कि मन ही भीग जाता है।
शीर्षक को पढ़ते हुए मन में कल्पना हुई कि राम का मुकुट क्योंकर भीग रहा होगा?
जो वास्तव में रामभक्त होता है वह इसके माधुर्य में न डूबे ऐसा हो ही नहीं सकता। भारत की संस्कृति में राम मानव की चेतना में समाये हुए हैं। हमारा परिवार भी बचपन से राम के सानिध्य में ही रहा।राम पर विश्वास के हमने कई सफल प्रसंग देखे हैं।
ईश्वर अपने हर रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं देवों के देव महादेव देखते समय इष्ट देव शंकर की भक्ति, रामायण देखते हुए राम और महाभारत देखते हुए कृष्ण; किंतु राम के प्रति अगर सम्मोहन अधिक है,संवेदनाएं अधिक हैं तो उसका कारण यह है कि राम चरित्र है! संस्कार हैं। मर्यादा हैं! राम ने मर्यादाओं की स्थापना की है। अपने जीवन में अपना कर उन्होंने बताया है कि रिश्ते और कर्तव्य कैसा होना चाहिये? *धर्म वास्तव में कर्तव्य ही है* और राम इसे प्रतिस्थापित करते हैं। उन्होंने करके बताया रिश्ता कैसा होना चाहिए? कर्तव्य क्या होने चाहिए?राजा का प्रजा से,भाई का भाई से, छोटे भाई का बड़े भाई से और बड़े भाई का छोटे भाई, माँ का बेटे और बेटे का माँ प्रति,स्वामी का दास के प्रति और दास का स्वामी के प्रति,पुत्र का पिता के प्रति व पिता का पुत्र के प्रति, पति का पत्नी और पत्नी का पति के प्रति मित्र के प्रति…. जितना भी कहा जाए उतना ही काम है।
जब हम यह कहते हैं कि “हमें निज धर्म पर चलना सिखाती रोज रामायण “तो यह स्पष्ट होता है कि धर्म से अर्थ सिर्फ कर्तव्य से है! कृष्ण भी गीता में यही कहते हैं कि धर्म का अर्थ कर्तव्य है। पता नहीं संप्रदाय बीच में कहाँ से आ गया!
आप खुद इतने अधिक संवेदनशील है कि लिखते हुए आपकी भावनाएँ इतनी करुण और द्रवित हो जाती हैं कि पाठक भी उसके साथ बह जाता है। हम अक्सर कहते हैं कि आप अपने दिल को पूरी तरह से कलम के माध्यम से खोल देते हैं। और पाठक आपके शब्दों से हत्प्रभ हो जाता है।
हम बहुत भी याद करें अपना पढ़ा हुआ तो हमें याद नहीं आता कि इतने बड़े-बड़े लेखको की शैली में से किसी में भी इतनी अधिक मर्मस्पर्शि ता कहीं महसूस हुई हो।
शीर्षक को पढ़कर हम असमंजस में रहे क्योंकि वनवास में तो मुकुट था ही नहीं पर जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए वैसे-वैसे संस्मरण खुलता गया।
तुलसी को चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन उनका लेखन हमेशा निर्दोष रहा।
विद्यानिवास मिश्र जी को हमने पढ़ा तो है, लेकिन सच कहें तो इतना लंबा समय हो गया की याद नहीं अब, लेकिन फिर भी आपको पढ़कर उस मर्म को महसूस कर पा रहे हैं।
आपका अध्ययन बहुत गहन है बाबूजी! हम तो उसके सामने एक बिंदु के बराबर भी नहीं हैं। आप जिस पर भी लिखते हैं उसे अमर कर देते हैं । जो भी लिखते हैं ,जितना भी लिखते हैं ,उसमें रम के लिखते हैं। अपने परिवार के प्रति भी आपके मन में उतना ही अपनापन और प्रेम है। माँ से आप बहुत जुड़े हैं जितना हमने आपको पढ़ा है! जैसा कि हर बच्चा ही जुड़ता है किंतु भावनाओं को गहराई तक महसूस, सब नहीं कर पाते।आप राम-रस में भीगते हुए अपनी माँ को महसूस करते हैं।
आपके संस्मरण का तीसरा भाग बहुत महत्वपूर्ण है! यह दो पीढ़ियों के अंतराल परिवर्तित होते हुए सोच की, दृष्टिकोण की लापरवाह दृष्टि है जिससे आज का युवा समझना नहीं चाहता।
घर में सुने हुए लोकगीत को मिश्र जी ने जिस तरह से याद किया है उस तरह से संभवतः कोई भी ना करे।
हम इसको महसूस कर सकते हैं कि जब बच्चे गैर समय घर से बाहर रहते हैं और आने के समय पर नहीं आते हैं विशेष कर रात में तो किस तरह के ख्याल मन में आते हैं और किस तरह से चिंता सताती है; बच्चे कभी नहीं समझ पाएँगे।
इसी तरह रात की ही एक ऐसी ही चिंता को लेकर जब हम अपने पोतों को बार-बार फोन कर रहे थे तो हमारे बेटे ने हमसे कहा कि,” माँ तो आप आखिरी पीढ़ी हो जो युवा बच्चों की इतनी चिंता करती हो। छोटे नहीं हैं, आ जाएँगे। दोनों पोते पहली बार इंदौर से होशंगाबाद अकेले आ रहे थे कार से,पहली बार और वह भी रात को!
रात को निकले ही क्यों यह चिंता खाए जा रही थी। जाम था तो दूसरे रास्ते पर निकल गए। 2:00 रात को जब घर पहुँचे तब चैन पड़ी। और कोई भी आए, जब तक सफर पूरा नहीं हो जाता, तब तक बार-बार फोन ना करें तो हमें भी चैन नहीं पड़ती। और ये लोग समझते ही नहीं, फटाक से कह देते हैं कि इतनी चिंता क्यों करती हो?
यह दो पीढ़ी का अंतर शायद सभी भोग रहे हैं। बच्चे समझते ही नहीं और ना ही समझना चाहते हैं।यहाँ हमें मिश्र जी की पीड़ा बिल्कुल अपनी पीड़ा की तरह लगी।
और सच में ऐसे समय में भगवान ही याद आते हैं। एक अटूट विश्वास!!!!! जहाँ जाकर आस्था विश्राम पाती है।
आज भी एक ऐसी ही रात है और हम इंतजार में हैं।
यहाँ आकर ही यह बात समझ में आती है कि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है यह एक लोकगीत की पंक्ति है।
आपकी पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें भी याद आया वह प्रसंग; जब हनुमान जी अंगूठी लेकर सीता जी के पास पहुँचते हैं और सीता जी पूछती हैं-
“तुमने कहाँ पाई महावीर हो,
मुँदरिया ये रघुवर वीर की?
कौन के पुत्र कौन के सेवक कौन के रहत हजूर हो …
हनुमान जी –
अंजनी के पुत्र
राम के सेवक लछमन रहत हजूर हो मुंदरिया…
सीता माँ-
कौन के सत से सागर उतरे
कौन के कारण आए हो?मुंद्रिका….
हनुमान जी-राम जी के सत से सागर उतरे
माता के कारण आए हों….
सीता जी-
इतनी बात सुनी सीता माता
नैनन नीर भर आए हों…
हनुमान जी –
इतना सोच करो मत माता
राम सहित दल आए हों…..
हनुमान जी सफाई देते हैं-
रावन मारि अबहिं लै जावौं राम हुकम नहीं पाएँ हौं।
तुलसीदास आस रघुवर की
हरि चरनन बलिहारी हौं।
लोकगीतों का माधुर्य रस के झरनों की तरह बहता और भिगोता है। काशी की रामलीला के बारे में पढ़कर अच्छा लगा कि पहले मुकुट की पूजा होती है।
जच्चा के गीत भी बहुत मार्मिक हैं।
राम जन्म का उद्देश्य ही वनवासी राम के मात्र 14 साल के कार्यकाल में ही संपन्न होता है।
निर्वाचन तो कई बड़े-बड़े राजाओं का हुआ, चाहे कारण जो भी रहा हो, लेकिन वे याद नहीं ! राम सबके प्राण थे। वरना राजा नल- दमयंती की कहानी भी बड़ी दुखदाई है। पर उस कहानी को कोई नहीं जानता
राम का वनवास इस बात का द्योतक है कि राजा जब सिंहासन से उतर के प्रजा के बीच में जाएगा तभी वह प्रजा के दुख को समझ पाएगा। और फिर जगह कल्याण जी तभी संभव है।
आपका यह पूरा संस्मरण हमने दो बार पढ़ा। आपके माध्यम से हम आदरणीय मिश्रा जी को जितना जानते थे उससे कहीं ज्यादा जान पाए उनके जीवन के उस भावनात्मक पहलू को समझ पाए। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका बाबूजी !
आप जिसकी भी बारे में लिखते हैं वह पाठक के चित्त में रम जाता है।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का। तहेदिल से शुक्रिया।
और पुरवाई का हाथ जोड़ के आभार