Wednesday, February 11, 2026
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प्रकाश मनु की कलम से – विद्यानिवास मिश्र : उनकी यादों के साथ जुड़ा है राम का भीगता हुआ मुकुट!

मुझे याद नहीं पड़ता कि पहलेपहल कब पढ़ा था विद्यानिवास जी का अद्भुत लालित्य भरा शब्दचित्र, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है। पर पढ़ते ही मैं उनका मुरीद हो गया था। जैसे रात हो या दिन, सुध-बुध बिसारकर, मैं बस उनका अनुसरण कर रहा होऊँ। उन्हें अपने भीतर-बाहर महसूस कर रहा होऊँ। उन्होंने पता नहीं अचानक मेरे हृदय के किस तार को झंकृत कर दिया था कि उनके शब्द जैसे बाँसुरी बन गए। मेरे राम का मुकुट भीग रहा है पंक्ति इस तरह मेरे होंठों पर आकर चिपक गई थी कि मैं कुछ पढ़ रहा होऊँ, लिख रहा होऊँ या फिर किसी से बात कर रहा होऊँ, अचानक भीतर से एक गहरी सी गूँज उठती थी और फिर हठात मेरे होंठों से निकल पड़ता था, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’ कुछ अजब सी कशिश के साथ। 
कभी-कभी तो हालत यह कि मैं किसी जरूरी काम में व्यस्त हूँ, पर होंठ मेरे अनजाने ही उच्चारने लगते, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’ एक विचित्र दीवानगी, जिससे मैं खुद भी परिचित नहीं था।
यह सब क्या हो रहा है? मैं खुद भी नहीं जानता था। मेरा मन तो रसमुग्ध था, सो कुछ पता न चलता। पर घर हो या दफ्तर, मेरे आसपास मौजूद लोग कई बार मेरे मुँह से इन शब्दों का उच्चार सुन हैरान होते थे, मनु जी, क्या हुआ आपको…?”
दफ्तर यानी हिंदुस्तान टाइम्स। एक अखबारी दफ्तर। वहाँ के फौरी माहौल में ऐसी संवेदना अटपटी लग सकती थी। लगती भी। मेरे साथी लोग चौंकते। सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखने लगते। जैसे किसी अटपट दीवाने को देखा जाता है। प्रश्नांकित चेहरे। सवाल-दर-सवाल!
और मैं कोई जवाब न देकर, हलकी भीनी सी मुसकान के साथ एक बार फिर दोहरा दिया करता था, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!”
मानो बस यही उनके प्रश्न का उत्तर हो। और कहते ही मन मगन हुआ सा, कहीं दूर उड़ जाता। एकाएक किसी गाँव के एक छोटे से मंदिर का चित्र आँखों के आगे उभर आता। मुकुट पहने श्रीरामजी। मुखमंडल पर, आँखों में सस्मित आलोक। सारे वातावरण को और उपस्थित ग्राम्य जनों के सरल हृदय को पवित्र करता हुआ सा। साथ में प्रेमपगी मुसकान लिए जानकी मैया। साथ में लक्ष्मण। श्रीरामचंद्र जी के चेहरे का आलोक पूरे मंदिर को जगर-मगर सा कर रहा है।
और फिर पूजा और आरती के शब्द…! मानो रस की अद्भुत वर्षा हो रही है, और उस रसवर्षा की बूँदें राम जी के मुकुट पर आकर गिरती हैं। गाँव के सब लोग इससे बेखबर मंदिर में पूजा-अर्चना में जुटे हैं। पर तभी पीछे खड़ा एक सीधा-सादा गँवई शख्स बड़े भावविह्वल स्वर में पुकार उठता है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’
स्वर में ऐसी मुग्धता, ऐसा रस, ऐसी पुकार कि पहले तो सबको अजीब लगता है, पर फिर अगले ही पल सभी खुद को उसके प्रभाव की गिरफ्त में पाते हैं। और फिर सबके दिलों से एक साथ ही, एक गहरी गूँज-अनुगूँज उठने लगती है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे राम का मुकुट…!’

तुलसीदास ने सारे जग को सिया-राममय देखा था, इसलिए वे रामचरितमानस में ऐसा काव्य-रस ला पाए, कि वह जन-जन के हृदय का हार बन गया। राम-सीता केवल त्रेता के राम-सीता ही नहीं रहे, लोकचेतना से जुड़कर मानो वे काल की सारी परिधियों से ऊपर उठ जाते हैं, और हर हृदय में समा जाते हैं। भक्ति रस में भीगी जनता की आँखों में समा जाते हैं। भारत की सीधी-सरल जनता की वाणी की अटपट सरलता में समा जाते हैं। और यों हिंदुस्तान के घर-घर, गाँव-गाँव, गली-गली में पहुँचकर एक ऐसी विराट चेतना बन जाते हैं, जिसके कुंदन स्पर्श से मानो हर मानुख पवित्र हो उठता है। 
बाबा तुलसी ने जो महसूस किया था, उसे पंडित जी ने एक बिल्कुल अलहदा ढंग से महसूस किया, और उसे उसी सादगी और सरलता से व्यक्त भी किया, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’
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मैंने कबीर, अशोक के फूल और बाणभट्ट की आत्मकथा वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की तरह ही रसाचार्य पंडित विद्यानिवास मिश्र को भी बहुत पढ़ा है। हिंदी साहित्य में बड़े कद वाले तेजस्वी साहित्यिक के रूप में उनका अपना विशिष्ट अंदाज और व्यक्तित्व मुझे मोहता है। कुछ-कुछ आचार्य हजारीप्रसाद दिवेदी की तरह वे मुझे लगते हैं, जो अपने अगाध ज्ञान और पांडित्य को बड़े सीधे-सरल शब्दों में कह सकते थे। और जब वे कहते, तो गद्य में भी कविता का रस बहने लगता था। इस क्षेत्र में कोई और नहीं है, जो उनसे मुकाबला कर सके या जिनसे उनकी तुलना हो सके। इसलिए मन पर उनकी एक अलग ही छाप है, जिसमें विद्वत्ता के साथ लोक की उपस्थिति बराबर रहती है और लोक से मिलकर उनकी विद्वत्ता की चमक और बढ़ती जाती है। वह रसग्राह्य हो उठती है।
इसी तरह परंपरा की अजस्र धारा के साथ-साथ आधुनिकता का नीर-क्षीर विवक मिलकर उनके यहाँ एक अलग ही भावनात्मक पुल बना देता है, जिसमें शहरों से लेकर दूर-दराज के गाँव-देहात तक फैले हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत का खुला-खिला चेहरा नजर आता है। यह एक ऐसी भारतीय दृष्टि है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी न रहकर, साथ-साथ एक-दूसरे के पूरक और सहधर्मा होकर बहने लगते हैं, और दोनों में एक तरह की आवाजाही भी शुरू हो जाती है।
पर मेरे भीतर की फिर वही भावनात्मक उधेड़बुन। पंडित जी को याद करते ही मुझे सबसे अधिक यह पंक्ति ही क्यों याद आती है कि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है? लगता है, मंदिर में दोनों हाथ जोड़कर पूजा करते हुए अपार भारतीय जनता के बीच ही मेरी भाव-गद्गद माँ भी खड़ी हैं। अपने भोले भाव और जिज्ञासा के साथ। रामरस में भीगती हुई। आँखों में एक बच्चे जैसी अबोधता और रोम-रोम राम में रमा हुआ। राम के आगे खडे होकर न देह का बोध, न मन का। बस, आरती के शब्दों के साथ बही जा रही हैं। आरती के संग-संग बजते छैने की छन-छन के साथ बही जा रही हैं, जिसे कोई साधु बाबा मन मगन होकर बजा रहे हैं।
मेरी भोली और अपढ़ माँ। अपढ़ होने के बावजूद वे इस सारे रसमय वातावरण को इस कदर भीतर तक ग्रहण कर लेती हैं और रामरस में इस कदर बही जा रही हैं, कि मेरे सरीखा पढ़ाकू कुछ न समझकर बस माँ के चेहरे को देखता है, देखता ही जा रहा है। और बाहर ही बाहर टापें खाता है। आश्चर्यचकित सा।…   
राम जी की आरती। उसके शब्द अब दूर-दूर तक हवाओं में गैरिक सुगंध बनकर बिखर रहे हैं। अहा, आरती उस राम की, जो जगती के कण-कण में व्याप्त है। वह जो रोम-रोम में रमने वाला राम है, उसकी भाव-गद्गद स्तुति। पर आरती का कोई विधिवत तरीका नहीं। कुछ-कुछ अटपटा ही कहना चाहिए। पर उस क्षण माँ के आत्मविस्मृत चेहरे पर जो भाव होता था, वह जैसे चुपके से पंडित विद्यानिवास जी की इस पंक्ति में सिमट आया है।
इससे कोटि-कोटि भारतीय जनता से जुड़ने और उसके साथ भावनात्मक रूप से एकलय होने की पंडित जी की भाषा की शक्ति पता चलती है। एक ऐसा रसात्मक क्षण, जब उनकी सारी विद्वत्ता और आचार्यत्व मानो हवा हो जाता है, और वे गाँव-कसबों और देश के कोने-प्रांतरों तक मौजूद निरक्षर या मामूली पढ़ी-लिखी जनता के साथ एकरसता बनाते हुए मानो लोकहृदय के रसज्ञ कवि हो जाते हैं, ठीक बाबा तुलसीदास की तरह। शायद इसीलिए मिश्र जी की यह काव्यात्मक पंक्ति मुझे प्रिय है, कि यहाँ आते-आते उनका आचार्यत्व पानी की तरह पातरा हो जाता है, देश के असंख्य साधारण लोगों की चेतना को अपने साथ समाहित करता हुआ सा।
यों मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, यह शब्द-चित्र मानो एक कुंजी है, जिससे पंडित जी के गद्य की समस्त ऊर्जा और और ताकत को हम थाह सकते हैं। क्यों वे इतने बड़े थे? शायद इसलिए कि वेद और उपनिषदों के ज्ञान के साथ ही किसी कस्बे या गाँव-देहात के आदमी के चेहरे की अटपट सरलता और भोलेपन को भी जोड़कर, वे कोई ऐसी बात कहते थे, जिसमें हर हृदय का स्पंदन सिमटा होता था। लगता है, जैसे पंडित जी के व्यक्तित्व की गूढ़ता और मर्म को मैं इस पंक्ति के सहारे ही समझ पा रहा हूँ। जैसे यह एक कुंजी हो, जिससे उनके महाकार व्यक्तित्व का ताला खुलता है।
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पंडित जी के इस बहुचर्चित निबंध की शुरुआत अचानक होती है, जैसे घर-परिवार के किसी आत्मीय जन से बात कर रहे हों। या घर के आँगन में बैठे किसी अंतेवासी मित्र से बतिया रहे हों। कई दिनों से उनकी तबीयत कुछ ढीली है। मन उदास सा है और कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। ऐसे में दिल का हाल बताते हुए, वे बड़े ही अनौपचारिक लहजे में कहते हैं— 
महीनों से मन बेहद-बेहद उदास है। उदासी की कोई खास वजह नहीं, कुछ तबीयत ढीली, कुछ आसपास के तनाव और कुछ उनसे टूटने का डर, खुले आकाश के नीचे भी खुलकर साँस लेने की जगह की कमी, जिस काम में लगकर मुक्ति पाना चाहता हूँ, उस काम में हजार बाधाएँ। कुल ले-देकर उदासी के लिए इतनी बड़ी चीज नहीं बनती। फिर भी रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों। इसलिए कभी-कभी तो बड़ी-से-बड़ी परेशानी करने वाली बात हो जाती है और कुछ भी परेशानी नहीं होती। उलटे ऐसा लगता है, जो हुआ, एक सहज क्रम में हुआ; न होना ही कुछ अटपटा होता, और कभी-कभी बहुत मामूली-सी बात भी भयंकर चिंता का कारण बन जाती है।
फिर कुछ रुककर वे उस मामूली बात को खोलकर बताते हैं, जिसके कारण वे इतने परेशान हो गए। इसके पीछे उनकी एक बड़ी चिंता थी। केवल उनकी ही नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की। या फिर कहिए, दो पीढ़ियों के बीच के अ-संवाद की। एक विचित्र अंतराल सा है, जो दो पीढ़ियों के बीच बराबर चलता है। इनमें एक पुरानी पीढ़ी है, जो बहुत चिंता करती है। आगत पीढ़ी का जरा सा भी दुख या फिर अनिष्ट का खयाल भी उसे परेशान कर देता है। इस चिंता में उसकी रातों की नींद उड़ जाती है। दूसरी नई पीढ़ी है, जिसके स्वभाव में ही बेफिक्री है। उसे उनका खयाल नहीं आता, जो खाना-पीना भूलकर बेकल से उसके इंतजार में बैठे हैं, और जरा-जरा सी देर में कलप उठते हैं। 
यह एक बड़ी विडंबना है, जो पंडित जी को परेशान किए हुए है और उन्हें जरा भी कल नहीं लेने देती। वे सब कुछ सीधे-सीधे कह डालते हैं—    
अभी दो-तीन रात पहले मेरे एक साथी संगीत का कार्यक्रम सुनने के लिए नौ बजे रात गए। साथ में जाने के लिए मेरे एक चिरंजीव ने और मेरी एक मेहमान, महानगरीय वातावरण में पली कन्या ने अनुमति माँगी। शहरों की आजकल की असुरक्षित स्थिति का ध्यान करके इन दोनों को जाने तो नहीं देना चाहता था, पर लड़कों का मन भी तो रखना होता है, कह दिया, एक-डेढ़ घंटे सुनकर चले आना।
रात के बारह बजे। लोग नहीं लौटे। गृहिणी बहुत उद्विग्न हुईं, झल्लाईं। साथ में गए मित्र पर नाराज होने के लिए संकल्प बोलने लगीं। इतने में जोर की बारिश आ गई। छत से बिस्तर समेटकर कमरे में आया। गृहिणी को समझाया, बारिश थमेगी, आ जाएँगे, संगीत में मन लग जाता है, तो उठने की तबीयत नहीं होती। तुम सोओ, ऐसे बच्चे नहीं हैं। पत्नी किसी तरह शांत होकर सो गईं, पर मैं अकुला उठा। बारिश निकल गई, ये लोग नहीं आए। बरामदे में कुर्सी लगाकर राह जोहने लगा। दूर कोई भी आहट होती, तो उदग्र होकर फाटक की ओर देखने लगता। रह-रहकर बिजली चमक जाती थी और सड़क दिप जाती थी। पर सामने की सड़क पर कोई रिक्शा नहीं, कोई चिरई का पूत नहीं। 
शायद इस बारिश से मन में उपजे भय का ही प्रभाव था कि तभी एकाएक भावुक हृदय पंडित जी के मन में कई दिनों से मन में उमड़ती-घुमड़ती पँक्तिया गूँज गईं—
मोरे राम के भीजे मुकुटवा
लछिमन के पटुकवा,
मोरी सीता के भीजै सेनुरवा
त राम घर लौटहिं।
(मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा, मेरे लखन का पटुका (दुपट्‍टा) भीग रहा होगा, मेरी सीता की माँग का सिंदूर भीग रहा होगा, मेरे राम घर लौट आते।)
और यह कोई मामूली गीत नहीं, क्योंकि इस गीत के साथ पंडित जी की बहुत पुरानी स्मृतियाँ जुड़ी हुई थीं। बचपन की, किशोरावस्था की। तरुणाई की भी। उन दिनों पंडित जी जब कभी किसी दूर शहर में जाते, या फिर उन्हें घर से बाहर जाकर विदेश में रहना होता, तब स्त्रियाँ यही गीत विह्वल होकर गातीं। लौटने पर अकुलाकर कहतीं,मेरे लाल को कैसा वनवास मिला था!’ 
तब पंडित जी को दादी-नानी की इस आकुलता पर किंचित हँसी आती। उसकी भावना वे समझ न पाते। लेकिन गीत का स्वर तो बड़ा मीठा लगता था। वह उनके मन में बस जाता। हाँ, तब उसका दर्द नहीं छूता था। पर वे खुद बड़े हुए, तो ढलती उम्र में अचानक उसका दर्द महसूस होने लगा। बारिश की इस रात में बाहर गए बच्चों की प्रतीक्षा में एकाएक उस गीत का दर्द फिर से उभर आया। पंडित जी विकल होकर सोच रहे थे, आने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की ममता की पीड़ा नहीं समझ पाती और पिछली पीढ़ी अपनी संतान के संभावित संकट की कल्पना मात्र से उद्विग्न हो जाती है। मन में यह प्रतीति ही नहीं होती कि अब संतान समर्थ है, बड़ा-से-बड़ा संकट झेल लेगी। 
प्रतीक्षा की आकुल रात। पंडित जी बार-बार मन को समझाने की कोशिश करते, लड़की समर्थ है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में पढ़ाती है। लड़का भी काफी जिम्मेदार है, तो फिर चिंता की कौन सी बात, जिस पर वे इतने परेशान हो रहे हैं?
हालाँकि लड़की का खयाल आते ही चिंता फिर बढ़ जाती, समय अच्छा नहीं है, लौटते समय कहीं कुछ हो न गया हो? उनके भीतर अनायास अपराधी होने का भाव जाग जाता। सोचते,मुझे रोकना चाहिए था या कोई व्यवस्था करनी चाहिए थी। पराई लड़की घर आई है, कहीं कुछ हो न जाए!
ऐसी चिंता, जो घर के हर बड़े-बुजुर्ग की चिंता है। आज भी।
ऐसे में मिश्र जी का मन फिर गीत की धारा की ओर मुड़ गया। कैसा करुण गीत है। सीधे मन में उतरता जाता है। कौसल्या अपने राम के बारे में सोच रही है। लक्ष्मण और सीता के बारे में सोच रही है, सोच-सोचकर उद्विग्न है। कोई नहीं है, जो उसके मन को जरा धीरज बँधाए। और फिर कोई एक कौसल्या तो नहीं, इस धरती पर लाखों-करोड़ों कौसल्याएँ हैं, जो अपने-अपने राम की प्रतीक्षा में विकल हैं। उद्विग्न होकर यहाँ-वहाँ फिर रही हैं, और उन्हें पल भर को भी कल नहीं है। इन सभी के राम निर्वासित हैं और उनके मुकुट बारिश में भीग रहे हैं। आश्चर्य, वनवास के समय भी मुकुट जरूर राम के सिर पर बँधा हुआ है, और उसी के भीगने की इतनी चिंता भी है।…
पंडित जी देखते हैं, तो फिर-फिर उनका ध्यान राम जी के मुकुट की ओर ही चला जाता है। मुकुट! भला मुकुट ही क्यों? पंडित जी सोचते हैं, और सोचते-सोचते अचानक काशी की रामलीला की ओर निकल जाते हैं— 
क्या बात है कि आज भी काशी की रामलीला आरंभ होने के पूर्व एक निश्चित मुहुर्त में मुकुट की ही पूजा सबसे पहले की जाती है? क्या बात है कि तुलसीदास ने काननको सत अवध समानाकहा और चित्रकूट में ही पहुँचने पर उन्हें कलि की कुटिल कुचालदीख पड़ी? क्या बात है कि आज भी वनवासी धनुर्धर राम ही लोकमानस के राजा राम बने हुए हैं? कहीं-न-कहीं इन सबके बीच एक संगति होनी चाहिए।
और फिर राम के मुकुट की बात चली, तो पंडित जी उसकी व्याख्या करते हुए ऐसे भावमग्न हो गए, कि उनका गद्य यहाँ किसी कविता सरीखा रस-गाछ बन गया, जिसके शब्द-शब्द से रस ढुर रहा है, और लोकमानस की भाव-गंगा मानो उनके हृदय में बहने लगी है—  
अभिषेक की बात चली, मन में अभिषेक हो गया और मन में राम के साथ राम का मुकुट प्रतिष्ठित हो गया। मन में प्रतिष्ठित हुआ, इसलिए राम ने राजकीय वेश में उतारा, राजकीय रथ से उतरे, राजकीय भोग का परिहार किया, पर मुकुट तो लोगों के मन में था, कौसल्या के मातृ-स्नेह में था, वह कैसे उतरता, वह मस्तक पर विराजमान रहा और राम भीगें तो भीगें, मुकुट न भीगने पाए, इसकी चिंता बनी रही। राजा राम के साथ उनके अंगरक्षक लक्ष्मण का कमर-बंद दुपट्‍टा भी (प्रहरी की जागरूकता का उपलक्षण) न भीगने पाए और अखंड सौभाग्यवती सीता की माँग का सिंदूर न भीगने पाए, सीता भले ही भीग जाएँ।…
ऐसी पंक्तियाँ जिन्हें पढ़ते हुए समझ में आता है कि भारत जैसे प्राचीन संस्कृति वाले देश में महाकाव्य सिर्फ लिखे ही नहीं जाते, हर दिल में बसते हैं। जिस हृदय में राम बसे हैं, उसमें पूरा का पूरा एक महाकाव्य भी बसा है। तो फिर पंडित जी के गद्य की पंक्तियों में महाकाव्य का-सा रस-माधुर्य और औदात्य उतर आए, तो भला क्या आश्चर्य!
[4]
यहाँ तक आते-आते मिश्र जी का कालजयी ललित निबंध मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, केवल एक निबंध नहीं रह जाता, बल्कि फैलकर और अनंत विस्तार पाकर पूरा एक महाकाव्य बन जाता है। करुणा रस का समंदर, जिसे पढ़ते-पढ़ते आँखें नम हो जाती हैं, मन कुरलाने लगता है, और मिश्र जी की यह सोच हर मनुष्य के दिल पर दस्तक देती, इस महासृष्टि की अछोर पुकार बन जाती है—
सोचते-सोचते लगा कि इस देश की ही नहीं, पूरे विश्व की एक कौसल्या है, जो हर बारिश में बिसूर रही है,मोरे राम के भीजे मुकुटवा’ (मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा)। मेरी संतान, ऐश्वर्य की अधिकारिणी संतान वन में घूम रही है। उसका मुकुट, उसका ऐश्वर्य भीग रहा है, मेरे राम कब घर लौटेंगे? मेरे राम के सेवक का दुपट्‍टा भीग रहा है, पहरुए का कमरबंद भीग रहा है, उसका जागरण भीग रहा है, मेरे राम की सहचारिणी सीता का सिंदूर भीग रहा है, उसका अखंड सौभाग्य भीग रहा है, मैं कैसे धीरज धरूँ?” 
फिर राम के राज्याभिषेक का दृश्य उनकी स्मृतियों में उभरता है। सारी अयोध्या आनंदमग्न है। स्वयं महर्षि वसिष्ठ ने गंभीर चिंतन-मनन और शोध करके यह शुभ मुहूर्त निकाला है। अहा, सारे अयोध्यावासियों के हृदय का हार बन चुके राम राजा बनेंगे। अयोध्या की प्रजा का आनंद छलक-छलक पड़ता है। जगह-जगह लोग नाच रहे हैं, गा रहे हैं। आनंद मना रहे हैं। अयोध्या की खुशियों का ठिकाना नहीं। 
पंडित जी यह सारा कुछ देखते हैं, पर औरों की तरह मोद नहीं मना पाते। इसलिए कि आनंद-मोद की इत घड़ियों में भी उनका मन तो आशंकाओं से भरा हुआ है। जैसे धरती की सारी कौसल्याओं का दर्द उनके भीतर समा गया हो। तो भला उन्हें चैन कैसे पड़ सकता है–
जिन लोगों के बीच रहता हूँ, वे सभी मंगल नाना के नाती हैं, वे मुद मंगलमें ही रहना चाहते हैं…पर मैं अशेष मंगलाकांक्षाओं के पीछे से झाँकती हुई दुर्निवार शंकाकुल आँखों में झाँकता हूँ, तो मंगल का सारा उत्साह फीका पड़ जाता है और बंदनवार, बंदनवार न दिखकर बटोरी हुई रस्सी की शक्ल में कुंडली मारे नागिन दिखती है। मंगल-घट औंधाई हुई अधफूटी गगरी दिखता है। उत्सव की रोशनी का तामझाम धुओं की गाँठों का अंबार दिखता है और मंगल-वाद्य डेरा उखाड़ने वाले अंतिम कारबरदार की उसाँस में बजकर एकबारगी बंद हो जाता है।
फिर आगे पंडित जी बाबा तुलसीदास को याद करते हैं। उन्होंने मानस में इस करुण घड़ी का जैसा सजीव चित्रण किया है, वैसा भला कौन कर सकेगा? यहाँ शब्द, शब्द नहीं रह जाते, बल्कि आँसू गिराते अयोध्या के नागरिक बन जाते हैं। वह असहाय प्रजा, जो इस अभागे दुख की घड़ी में मारी-मारी फिरती है, और कोई नहीं जो उनके आँसू पोंछें। अयोध्या जो स्वर्ग से बढ़कर थी, इस समय भीषण लगने लगी है और ऐसी कालरात्रि आई कि लोग एक-दूसरे की शक्ल देखकर डर डाते हैं। राम को वनवास मिला, तो घड़ी भर में सब कुछ बदल गया—
लागति अवध भयावह भारी,
मानहुँ कालराति अँधियारी।
घोर जंतु सम पुर नरनारी,
डरपहिं एकहि एक निहारी।
घर मसान परिजन जनु भूता,
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।
वागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं,
सरित सरोवर देखि न जाहीं।…
मानो करुण रस बहा आता है, और उसकी कोई सीमा ही नहीं। सबकी आँखें एक साथ बरस रही हैं। लोग बस रोए जा रहे हैं, और यहाँ-वहाँ टक्करें खाते फिरते हैं,  किंकर्तव्यविमूढ से।
पंडित जी के शब्द भी यहाँ गहरा उच्छ्वास भरते नजर आते हैं। दिल में जो आशंकाएँ थीं, वे अब साकार हो गई हैं, और फिर ऐसी अँधेरी रात आई कि देखते ही देखते सारे मुद-मंगल गयाब हो गए। जैसे वे वास्तव में थे ही नहीं। बस, मायावी थे, किसी अभागी रात के सपने की तरह। अब तो बस अँधेरा है, एक गहन निस्तब्धता भरी रात का स्याह अँधेरा—
कैसे मंगलमय प्रभात की कल्पना थी और कैसी अँधेरी कालरात्रि आ गई है? एक-दूसरे को देखने से डर लगता है। घर मसान हो गया है, अपने ही लोग भूत-प्रेत बन गए हैं, पेड़ सूख गए हैं, लताएँ कुम्हला गई हैं। नदियों और सरोवरों को देखना भी दुस्सह हो गया है। केवल इसलिए कि जिसका ऐश्वर्य से अभिषेक हो रहा था, वह निर्वासित हो गया। उत्कर्ष की ओर उन्मुख समष्टि का चैतन्य अपने ही घर से बाहर कर दिया गया। उत्कर्ष की, मनुष्य की ऊर्ध्वोन्मुख चेतना की यही कीमत सनातन काल से अदा की जाती रही है।…
और फिर चितन की धारा आगे बढ़ती है, तो एक दूसरी विडंबना सामने आ जाती है। पहले से कई गुना भीषण, जिससे मन में हाहाकार सा मच जाता है। राम तो लंका को जीतकर लौटते हैं, राजा बनते हैं। पर सीता…? माँ जग-जननी सीता तो लौटकर रानी होते ही फिर से राजा राम द्वारा वन में निर्वासित कर दी जाती हैं। आह, रामराज्य का यह कैसा दुर्भाग्य! कैसी क्रूर लीला! 
अचानक पंडित जी को वन में भीषण हिंस्र पशुओं से घिरी हुई सीता की छवि दिखाई देती है। उनके दुख और वेदना का कोई ठिकाना नहीं। इस घोर जंगल में अकेली सीता सोचती हैं, प्रसव की पीड़ा हो रही है, कौन इस वेला में सहारा देगा?…कौन मुझे सँभालेगा, कौन जन्म के गीत गाएगा? कौन…कौन…!”
सीता जी के वनवास के क्षण। इसे पढ़ते हुए भला कौन अपना धीरज सँभाल सकता है? सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। यहाँ तक कि करुणानिधान राम का मुखमंडल एकाएक कठोर सा लगने लगा है। सारे जग की शक्तिरूपा माँ सीता निर्जन वन में चुपचुप विलाप कर रही है। ऐसे में कौन है जो भीतर से तड़प-तड़प न उठेगा। और आँखों के आँसू हैं कि थमते ही नहीं—आह, विधना का यह कैसा विधान! राम और सीता के भाग्य की यह कैसी त्रासदी, जिसके आकुल ताप से वन-प्रांतर की हवाएँ और वनस्पतियाँ भी तप रही हैं। कैसी भीषण बयार चल उठी। किसी की समझ में नहीं आ रहा कि यह हो क्या रहा है—
कोई गीत नहीं गाता। सीता जंगल की सूखी लकड़ी बीनती हैं, जलाकर अँजोर करती हैं और जुड़वाँ बच्चों का मुँह निहारती हैं। दूध की तरह अपमान की ज्वाला में चित्त कूद पड़ने के लिए उफनता है और बच्चों की प्यारी और मासूम सूरत देखते ही उस पर पानी के छीटे पड़ जाते हैं, उफान दब जाता है। पर इस निर्वासन में भी सीता का सौभाग्य अखंडित है, वह राम के मुकुट को तब भी प्रमाणित करता है। मुकुटधारी राम को निर्वासन से भी बड़ी व्यथा देता है और एक बार और अयोध्या जंगल बन जाती है, स्नेह की रसधार रेत बन जाती है, सब कुछ उलट-पलट जाता है।…” 
पंडित जी को यहाँ भवभूति याद आते हैं। वही भवभूति जिन्हें करुण रस का अवतार कहा गया है। उन भवभूति के ही शब्द हैं—दुख और व्यथा के ऐसे अभागे क्षणों में पहचान की बस एक निशानी बच रहती है, दूर उँचे खड़े तटस्थ पहाड़, राजमुकुट में जड़े हीरों की चमक के सैकड़ों शिखर, एकदम कठोर, तीखे और निर्मम!
और फिर सीता के बहते आँसुओं के साथ ही अचानक राम का मुकुट इतना भारी हो उठता है कि राम उस बोझ से कराह उठते हैं। और इस वेदना के चीत्कार में सीता के माथे का सिंदूर और दमक उठता है!…वही सीता जो जग-जननी शक्तिस्वरूपा माँ हैं, और स्वयं राम की भी शक्ति। उनके बिना भला राम का रामत्व कहाँ?
उस रात के जागर में पंडित जी मानो पूरी रामकथा की परिक्रमा कर लेते हैं, और पाठक को उस करुणा का साक्षात् करा देते हैं, जिसके बिना राम और रामकथा का कोई अर्थ नहीं। साथ ही, उस सृजन-भूमि का भी, जहाँ से हर स्त्री-कंठ में करुणा की यह धारा बह आई है, और फिर संतान के जरा से अनिष्ट की आशंका होते ही इस धरती की हर कौसल्या के कंठ से फूट पड़ता है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे लक्ष्मण का पटुका…!” 
[5]
अपने अतिथि जनों के अनिष्ट की कल्पना से आशंकित पंडित जी ने वह पूरी रात जागते हुए कैसे काटी, यह एक अकथनीय कथा है। कुर्सी पर पड़े-पड़े यह सब सोचते-सोचते चार बजने को आए। इतने में दरवाजे पर हलकी-सी दस्तक पड़ी। बच्चे घर लौटकर आ गए थे। इतनी देर हो जाने से किंचित अपराध-बोध से ग्रस्त भी। 
पर पंडित जी उन्हें अपनी पूरी रात की यातना-कथा नहीं बताते। सिर्फ इतना कहते हैं कि तुम लोगों को इसका क्या अंदाज होगा कि हम कितने परेशान रहे हैं!”
बच्चों के आ जाने पर पंडित जी सोए तो, पर नींद भला कहाँ से आती? बिस्तर पर पड़े-पड़े चित्त फिर वहीं लौट गया, और मन रामकथा की करुणा में भीगने लगा। मिश्र जी की भाषा यहाँ किस कदर तरल और पारदर्शी हो जाती है, जरा देखें—
भोजन-दूध धरा रह गया, किसी ने भी छुआ नहीं, मुँह ढाँपकर सोने का बहाना शुरू हुआ, मैं भी स्वस्ति की साँस लेकर बिस्तर पर पड़ा, पर अर्धचेतन अवस्था में फिर जहाँ खोया हुआ था, वहीं लौट गया। अपने लड़के घर लौट आए, बारिश से नहीं संगीत से भीगकर। मेरी दादी-नानी के गीतों के राम, लखन और सीता अभी भी वन-वन भीग रहे हैं। तेज बारिश में पेड़ की छाया और दुखद हो जाती है। पेड़ की हर पत्ती से टप-टप बूँदें पड़ने लगती हैं, तने पर टिकें, तो उसकी हर नस-नस से आप्लावित होकर बारिश पीठ गलाने लगती है। जाने कब से मेरे राम भीग रहे हैं और बादल हैं कि मूसलाधार ढरकाए चले जा रहे हैं।…
ओह, यही तो हैं, जनता के राम! जन-जन के राम, जिनका जीवन खुद एक दारुण त्रासदी है। राजपद और ऐश्वर्य पा लेने पर भी क्या उनके मन के दुख और संताप की कोई सीमा है? सीता का निष्कासन केवल सीता का ही तो निर्वासन नहीं, सीता के साथ-साथ राम का भी दुबारा वनवास है, जिसका दुख वे किसी से कह नहीं पाते। पर अंदर ही अंदर उनका हृदय भीगता है, आँखें भीगती हैं, और वह संताप एक पल के लिए भी उन्हें चैन नहीं लेने देता। 
जनता के मन में तो यही राम बैठे हुए हैं, जिनका मुकुट भीग रहा है, और भोले भाव वाली जनता विकल होकर फिर-फिर पुकार उठती है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे राम…!
आश्चर्य, राजपद वाले ऐश्वर्यशाली और महिमामंडित राम से जनता को वनवासी राम ही ज्यादा भाते हैं, क्योंकि उनसे उनके मन का रिश्ता कहीं अधिक करीब से जुड़ जाता है। महलों का सुख-वैभव छोड़कर राम जब वन में जाते हैं, तो वे जन-जन के राम बन जाते हैं। ऐसे करुणानिधान राम, जो जनता के हृदय का हार हैं। हजारों, लाखों भोले भाव वाले गँवई लोगों के राम। वनवासी और आदिवासियों के राम। लाखों तिरस्कृत शबरियों के राम। और सच ही, महलों नहीं, कुटियों के राम, जो अपने लिए नहीं, प्रजा के दारुण दुख और कष्टों को दूर करने के लिए ही तो इतने दुख उठा रहे हैं।
यही लोक के राम हैं। लोकमंगल, विश्वप्रेम और अनादि करुणा के राम, जो हजारों बरसों से इस महादेश के प्रायः सभी जनपदों और भाषाओं के लोकगीतों में समाए हुए हैं। और हजारों हजार बरसों तक वे इसी तरह लोगों के दिलों में बसे रहेंगे। अकेले नहीं, छोटे भाई लक्ष्मण और सीता जी के साथ वन-वन भटकते हुए राम, जिनका वनवास उन्हें अलौकिक तेज और कीर्ति दे देता है। और वे केवल एक राजकुमार या महाराज दशरथ के बेटे नहीं, इस महान देश के संस्कृति पुरुष बन जाते हैं। एक महान सभ्यता के प्रतीक, जो कल भी भारत की पहचान थे, आज भी। और हमेशा बने रहेंगे। कभी अचानक वे वाल्मीकि के छंदों में एक करुण उद्गार बनकर उतरे थे, फिर सबके देखते ही देखते, वे केवल भारत-भूमि के ही नहीं, विश्व के राम बन गए। हर दुखी, पीड़ित, तिरस्कृत और संतप्त हृदय के राम, जिनका नाम ही दुख के क्षणों में बड़ा हौसला बन जाता है।    
और अब मेरे राम का मुकुट भीग रहा है निबंध का अंतिम हिस्सा, जिससे यह इतना बड़ा अर्थ पा लेता है, कि पंडित जी ने इतना विशाल वाङंमय हमें न दिया होता, सिर्फ और सिर्फ यह एक ही ललित निबंध लिखा होता, तो भी वे इतने ही बड़े कद के जग-विख्यात साहित्यकार होते, जितने आज हैं। क्योंकि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है केवल एक निबंध नहीं, पूरा एक महाकाव्य ही है, जो प्रसाद की कामायनी की तरह ही व्यापक रसानुभूति और ऐसी दिक्कालव्यापी चेतना लिए हुए है, कि पूरी सृष्टि और उसके होने का कारण, उसके सुख-दुख, राग-विराग, आनंद-करुणा और विचित्र कौतुक के साथ इसमें समाया हुआ जान पड़ता है। 
यकीन न हो, तो इस कालजयी रचना की ये आखिरी पंक्तियाँ पढ़ लीजिए— 
और इतने में पूरब से हलकी उजास आती है और शहर के इस शोर-भरे बियाबान में चक्की के स्वर के साथ चढ़ती-उतरती जँतसार गीति हलकी-सी सिहरन पैदा कर जाती है। मोरे राम के भीजै मुकुटवाऔर अमचूर की तरह विश्वविद्यालयीय जीवन की नीरसता में सूखा मन कुछ जरूर ऊपरी सतह पर ही सही भीगता नहीं, तो कुछ नम तो हो ही जाता है, और महीनों की उमड़ी-घुमड़ी उदासी बरसने-बरसने को आ जाती है।…इतनी असंख्य कौसल्याओं के कंठ में बसी हुई जो एक अरूप ध्वनिमयी कौसल्या है, अपनी सृष्टि के संकट में उसके सतत उत्कर्ष के लिए आकुल, उस कौसल्या की ओर, उस मानवीय संवेदना की ओर ही कहीं राह है, घास के नीचे दबी हुई।…
पर पंडित जी को आशंका है कि अगर हमारे समाज में राजनीति का शोर यों ही बढ़ता रहा, जन-समाज भी अपनी महान संस्कृति को भूलकर बाहरी आकर्षण, लालच और दिखावे की भूल-भुलैया में खोया रहा, तो वह राह ढकी ही रह जाएगी। केवल चक्की का स्वर, श्रम का स्वर ढलती रात में, भीगती रात में अनसोए वात्सल्य का स्वर राह तलाशता रहेगा—किस ओर राम मुड़े होंगे, बारिश से बचने के लिए? किस ओर? किस ओर? बता दो सखी।
यहाँ तक आते-आते जिस निर्वेद की अनुभूति होती है, मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने उसे अन्यत्र कहीं महसूस किया हो। एक बड़ी लेखनी का बड़ा प्रसाद क्या होता है, यह जानने के लिए मेरे राम का मुकुट भीग रहा है पढ़िए। एक नहीं, बार-बार पढ़िए, तो समझ में आएगा कि पंडित जी की लेखनी का जादू क्या है, जो स्पर्श से ही हृदय में ऐसी रस-तरंगें पैदा कर देता है कि आप बहुत समय तक उसी में डूबते, उतराते हैं। फिर-फिर उसी रस में मग्न होना चाहते हैं, जिससे मन और आत्मा तक भीगती है। और फिर बहुत समय तक कुछ और पढ़ने का मन नहीं करता।
[6]
पिछले दिनों पंडित जी के इस अद्भुत शब्द-चित्र की चर्चा मैंने उनके एक अंतेवासी सहृदय साहित्यिक से की तो उन्होंने मुसकराते हुए कहा, मनु जी, आपको पता है, इसे लिखे जाने की कहानी?”
न…नहीं तो!” मैंने उत्कट जिज्ञासा भाव से कहा।
तो सुनिए!” वे धीरे से हँसे। एक विदग्ध हँसी, जैसी कि उनकी होती है। और फिर उन्होंने बिल्कुल एकदा नैमिषारण्ये की तर्ज पर वह पूरी कथा सुना दी, जिससे मन आनंदित तो हुआ ही, पर साथ ही पंडित जी के प्रति मेरे मन में आदर कुछ और बढ़ गया।
बरसों पहले की बात है, किसी महत्त्वपूर्ण विचारगोष्ठी में बहुत से मूर्धन्य साहित्यकारों के साथ ही पंडित विद्यानिवास मिश्र भी आमंत्रित थे। उन्हें व्याख्यान देना था। पर उनके बोलने से पहले एक आलोचक-प्रवर जी ने तनिक विनोद किया। कटाक्ष भरे स्वर में उनके मुख से निकला, भई, पंडित जी का क्या बोलना? वे तो चिरा-चिरईनुमा कोई कथा सुना देंगे, जैसा कि आजकल ललित निबंधकार लिखते हैं! उनका विचार से क्या लेना?”
सुनकर मिश्र जी ने कुछ नहीं कहा, बस मुसकरा दिए।
और जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो जो अद्भुत व्याख्यान उन्होंने दिया, उसने सबको किस कदर मंत्रमुग्ध कर दिया, उसे बता पाना जैसे शब्दों से परे है। विलक्षण आचार्यत्व और विद्वत्ता का तेज, ज्ञान और चिंतन की अगाध गरिमा, लोक की मार्मिक संवेदना, सब कुछ यहाँ था, मन और आत्मा को झंकृत करता हुआ। पर उसके साथ ही उनके शब्दों में रस की ऐसी सुमधुर नदी बह उठी कि स्वयं वे आलोचक-प्रवर भी उसमें मुग्ध होकर बड़े जा रहे थे। पंडित जी के इस व्याख्यान में लोक और आचार्यत्व, भाव और चिंतन, व्यक्ति और समाज, तथा परंपरा और सांस्कृतिक पुनराख्यान मानो एकरूप हो गए थे। यही व्याख्यान बाद में मेरे राम का मुकुट भीग रहा है शीर्षक से ललित निबंध के रूप में सामने आया।
पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का यही ढंग था। यही उनका कौतुक, यही उनकी कला, यही उनका पांडित्य। वे अजातशत्रु थे, न किसी की बात का बुरा मानते थे, न किसी की निंदा या आलोचना से उग्र होते थे, और न कुछ ऐसा कहते थे जिससे किसी का मन दुखे। पर कोई ललकारे तो उनके मस्तक पर मानो प्राचीन ऋषियों जैसा तेज झलक उठता था। और तब उस अगाध सागर के भीतर से कितनी बड़ी और महाकार ऊर्जा प्रकट होती थी, इसी का तो एक प्रमाण है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’ एक ऐसा शब्द-चित्र जो मेरे मन में पंडित जी के लेखन की सिग्नेचर ट्यून की तरह आकर बैठ गया है। और इसीलिए, पता नहीं यह कैसा सम्मोहन है उनके व्यक्तित्व और लेखन का मेरे मन पर कि उन्हें याद करते ही बरबस मेरे होंठों से निकलता है, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है…!’
आज उन पर कुछ लिखने बैठा हूँ, तो जीवन के उन अव्यक्त अनुभवों की सरणियाँ मानो एक से एक जुड़ रही हैं, और उनके बीच उनका मुसकराता हुआ प्रभामंडल, जो अब तो सारे बंधनों से मुक्त होकर दिगाकाश में और अधिक व्याप गया है।
[7]
अभी तक पंडित जी को उनकी कृतियों से ही जान रहा था, पर फिर एक ऐसा संयोग हुआ कि उन्हें निकट से जानने और मिलने का भी अवसर मिला। और यह प्रसंग पंडित जी द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका साहित्य अमृत से जुड़ा है, जिसे उन्होंने अनावश्यक वाद-विवादों से परे, साहित्य-रस की एक सुंदर, पठनीय पत्रिका बनाकर एक रचनात्मक ऊँचाई तक पहुँचाया था।
कुछ बरस पहले जब मैंने साहित्य अमृत के संपादन का दायित्व सँभाला, तब पत्रिका के स्वरूप को कुछ अधिक रचनात्मक बनाने की बात मेरे मन में आई। तब भी मेरे आदर्श थे, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित सरस्वती, प्रेमचंद के समय का हंस, सत्यार्थी जी के दौर का आजकल, और पंडित विद्यानिवास मिश्र जी के समय का साहित्य अमृत। उसे आम पाठकों के करीब लाने के लिए रचनात्मक ऊँचाई के साथ-साथ जिस सुरुचि और व्यापकता की दरकार थी, उसके लिए मेरी दृष्टि बार-बार इन्हीं पत्रिकाओं पर जा टिकती थी, और उसके लिए मैंने दिन-रात श्रम किया तो नतीजा भी देखने को मिला। असंख्य पाठकों के पत्र मिलते थे, जिन्होंने पत्रिका के नए रूप और कलेवर को पसंद किया। बहुत लेखकों और पाठकों का प्यार मुझे मिला। पर मैं स्वयं दृष्टि हासिल करने के लिए साहित्य अमृत के पुराने अंकों को उलट-पुलटकर देखा करता था, जिसमें एक गहरा-गहरा सा सांद्र साहित्य रस था। अनावश्यक वाद-विवाद नहीं। और यही उसकी एक अलग पहचान भी थी। मैंने बेशक इससे बहुत कुछ सीखा।
यहाँ इस बात का जिक्र शायद गैर-मौजूँ न होगा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र ने अपने द्वारा संपादित साहित्य अमृत के अंकों में मुझे बहुत प्रेम से छापा। मेरी बहुत सी प्रिय कहानियाँ और लेख जो बाद में काफी चर्चित हुए, पहलेपहले पंडित जी दारा संपादित साहित्य अमृत में ही छपे थे। साहित्य अमृत के साथ मेरा एक अलग सा भावनात्मक जुड़ाव हो गया था, तो इसके पीछे पंडित जी की संपादकीय दृष्टि ही थी जो रचना को सर्वोपरि मानती थी।
हाँ, जिस प्रसंग की यहाँ विशेष रूप से चर्चा कर रहा हूँ, वह पंडित जी के संपादन में निकले साहित्य अमृत के बृहत् व्यंग्य विशेषांक से जुड़ा है। व्यंग्य पर केंद्रित साहित्य अमृत के इस बृहत् विशेषांक में उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी चरण से लेकर मौजूदा दौर तक व्यंग्य की विकास-यात्रा पर लिखा गया मेरा लंबा लेख, जो शायद पत्रिका के अठारह-बीस पृष्ठों तक फैला था, अविकल रूप से छपा। पत्रिका के एक अंक में इतना बड़ा लेख दे पाना उन्हीं के जिगरे का काम था। यह दीगर बात है कि उस पर मेरी मेहनत भी बहुत हुई थी, और कोई महीने भर तक सारे काम-काज छोड़कर मैं उसमें आपादमस्तक डूबा रहा था। 
पर उस लेख की भी एक अंतर्कथा है। मेरे पास कुमुद शर्मा जी का फोन आया था, जो तब साहित्य अमृत की सहायक संपादक थीं। उन्होंने इस बृहत विशेषांक के लिए व्यंग्य पर लेख लिखने का आग्रह किया तो मैंने उनसे पूछा था, आपको कितना बड़ा लेख चाहिए? साथ ही मैंने उन्हें बताया कि मेरा मन व्यंग्य की समग्र विकास-यात्रा पर लिखने का है, जिसमें कुछ अधिक विस्तार चाहिए।
आप जैसा मन हो, लिखिए मनु जी। कुमुद जी ने कहा, हमारे लिए तो यह खुशी की बात है। विशेषांक में प्रमुख रूप से बस आपका ही लेख हम दे रहे हैं। तो लेख चाहे जितना लंबा हो, हम छापेंगे।
यह मेरे आगे कुछ नया करने की चुनौती थी। अभी तक कहानी और उपन्यास पर तो मैंने लंबे लेख लिखे थे और उनकी जबरदस्त चर्चा हुई थी। पर व्यंग्य पर लिखने का यह पहला अवसर था। मैंने नए-पुराने व्यंग्यकारों के कोई पचास-साठ व्यंग्य–संग्रह इकट्ठे किए। फिर कोई महीने भर का समय लगाकर एक लंबा लेख लिखा। उस समय तक कंप्यूटर की सुविधा मेरे पास न थी। मैं पहले हाथ से लिखता था, फिर उसे सुधारकर दूसरा प्रारूप तैयार करता। और फिर तीसरा अंतिम प्रारूप पत्नी सुनीता जी तैयार कर देतीं, जिनका सुलेख बहुत अच्छा था। यों अंततः हाथ से लिखे कोई पचास-साठ पृष्ठों में फैला लेख तैयार हुआ, जिसमें मैंने भारतेंदु काल और द्विवेदी युग के दिग्गज साहित्यकारों से लेकर वर्तमान दौर के नवोदित लेखकों तक के व्यंग्य लेखन पर बहुत मन से चर्चा की थी। साथ ही मैंने उसमें प्रेमचंद, निराला, देवेंद्र सत्यार्थी, रामदरश मिश्र सरीखे साहित्य महारथियों को भी शामिल किया था, जो मूलतः तो व्यंग्य लेखक न थे, पर जिनके लेखन में व्यंग्य की चपल धार और बाँकपन बीच-बीच में चमक जाता है, जिससे व्यंग्य लेखन को एक सार्थक दिशा मिली। 
लेख में मैंने यह भी स्पष्ट किया कि पराधीनता के काल में व्यंग्य अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ एक तेज औजार की तरह था, और वही बाद में सत्ता और व्यवस्था के प्रति तीखे आक्रोश में बदलकर जनता के विरोध का एक अचूक हथियार बन गया। पर कोई व्यंग्य प्रभावी और पुरअसर तभी होता है, जब उसके पीछे भाषा की असाधारण शक्ति और एक बड़ा विजन हो, और साथ ही, उसकी धार संयत हो।
उस दीर्घ आलेख को मैंने साहित्य अमृत के पते पर भेजा तो तीन-चार दिन बाद ही मेरे पास कुमुद जी का फोन आया, मनु जी, आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है। पंडित जी ने उसे देख लिया है और बहुत पसंद किया है। पर पृष्ठों की कुछ सीमा है, इसलिए हम लोग चाहते हैं कि आप इसे कुछ संक्षिप्त कर दें। लेख का आधा भाग जो दिवंगत साहित्यकारों पर है, वह तो ठीक है, पर बाद का जो भाग है, उसे आप तीन-चार पृष्ठों में समेट दें।
सुनकर मैं हक्का-बक्का! यह कैसे हो सकता है? इससे तो लेख की लय-गति और पूरा आस्वाद ही बिगड़ जाएगा। सहज गति से चलता आया लेख अंत में आते-आते एकदम हड़बड़िया हो जाएगा। भला मैं यह कैसे स्वीकार कर सकता था? आखिर तो मैंने उसे रक्त और पसीने से लिखा था, और उसमें अपना सारा हृदय उड़ेल दिया था!
मैंने कहा, पर कुमुद जी, पहले तो आपने कहा था कि मनु जी, विस्तार की आप चिंता न करें, क्योंकि हम एक ही लेख दे रहे हैं। लिहाजा पूरे लेख में व्यंग्य की इतिहासपरक विकास-यात्रा है। अब जैसा आप कह रही हैं, वैसा करने पर तो लेख का मिजाज और संतुलन दोनों ही गड़बड़ा जाएँगे।
यह तो ठीक है मनु जी, पर पंडित जी का आग्रह है, आप ऐसा कर दें…!” कुमुद जी का आग्रह।
मुझे धक्का सा लगा। जैसे मेरे इतने लंबे श्रम और अध्यवसाय पर पानी फेर दिया गया हो। आखिर मुझे कहना ही पड़ा, नहीं कुमुद जी, यह नहीं हो सकता। ऐसा मैं नहीं कर पाऊँगा। खंडित लेख छपे, यह मुझे स्वीकार्य नहीं।…आप कृपया इस लेख को रहने ही दें, मैं इसे कहीं और भेज दूँगा।
पर अगले दिन फिर कुमुद जी का फोन। अनुरोध भी। उन्होंने कहा, “मनु जी, आप अंतिम रूप से बता दें कि आप पंडित जी के कहे अनुसार संक्षिप्त कर सकेंगे या नहीं, क्योंकि अब ज्यादा समय हमारे पास नहीं है।
इस पर मेरा वही जवाब, कुमुद जी, आप कृपया मेरे लेख को वापस कर दीजिए। वह आपके यहाँ छपे, इसकी अब जरा भी इच्छा मेरे मन में नहीं रही।
मैंने समझ लिया कि इतने दिनों की अथक मेहनत से लिखे गए लेख का छपना अब असंभव ही है। और मैं मन ही मन विचार कर रहा था कि यह लेख वापस आएगा तो उसे कहाँ भेजा जाए, जहाँ मेरे श्रम का सम्मान हो और पाठकों को वह अविकल रूप में पढ़ने को मिल जाए।
वह दिन मेरे जीवन के सबसे दुख भरे दिनों में से था, जब पूरे दिन मैं बड़ी असहज मनःस्थिति में रहा, और भीतर ही भीतर झुँझलाता रहा।
पर आश्चर्य, अगले दिन इस दुखद प्रसंग का बड़ा सुखद समारोप हुआ। सुबह करीब दस-ग्यारह बजे मेरे पास प्रभात जी का फोन आया। उन्होंने कहा, मनु जी, आपका लेख हम छाप रहे हैं। हमने विचार किया है कि इस विशषांक की जो पृष्ठ-सीमा हमने सोची थी, उसमें आठ पृष्ठ और बढ़ा दिए जाएँ। आपका लेख जस का तस हम छापेंगे, उसमें से एक शब्द भी नहीं कटेगा।
धन्यवाद, प्रभात जी…!” कहते हुए मेरा स्वर थरथरा रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि प्रभात जी ने जो कहा है, वह केवल उन्होंने नहीं कहा, इसके पीछे पंडित विद्यानिवास मिश्र जी का धीरोदात्त व्यक्तित्व है, जो एक युवतर लेखक के आत्माभिमान को आहत नहीं करना चाहता था। इसलिए उन्होंने मुझ जैसे खुद्दार लेखक की जिद ही नहीं, एक किस्म की बेअदबी को भी क्षमा कर दिया था। कल्पना में पंडित जी का सदाशयता से भरा चेहरा मुसकराता हुआ चेहरा मुझे नजर आया और मैंने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।
[8]
अंततः पत्रिका का वह व्यंग्य विशेषांक छपकर आया, तो उस लेख की कितनी चर्चा हुई और मेरे पास कितने लोगों के फोन आए, याद करता हूँ तो मन भीगने लगता है। बहुत से लोगों का कहना था, मनु जी, व्यंग्य पर ऐसा कोई लेख हमने नहीं देखा, जिसमें भारतेंदु काल से लेकर वर्तमान तक व्यंग्य की अबाध धारा और निरंतरता को सामने उपस्थित कर दिया गया हो। उसके सामने जो खतरे हैं, उनकी भी चर्चा की गई हो, और कोई भी महत्त्वपूर्ण व्यंग्य लेखक छूटा न हो। यहाँ तक कि हिंदी के कई बड़े और बहुचर्चित व्यंग्यकारों ने मुझे बधाई दी। 
मेरे जीवन का यह विरल अनुभव था।
फिर पुस्तक मेले में कुमुद जी से भेंट हुई तो उन्होंने कहा, मनु जी, पंडित जी आपसे मिलना चाहते हैं।
कहाँ हैं वे…?” मैंने एक प्रसन्न आवेग से भरकर कहा।
आइए, मैं आपको ले चलती हूँ। कुमुद जी ने कहा और वे मुझे प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर ले आईं।
पंडित जी प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर थे। बहुत प्रेम से मिले, पर इस प्रसंग की चर्चा न उन्होंने की और न मैंने। हाँ, मैंने साहित्य अमृत की एक बड़ी खासियत की चर्चा की, कि उसने बाकी पत्रिकाओं से अलग राह लेते हुए रचना को केंद्र में रखा है। बोझिल किस्म की बौद्धिक बहसों को नहीं। उन्होंने मुसकराते हुए मेरी बात सुनी और बड़े प्रेम से आशीर्वाद दिया।
बाद में मैंने स्वयं साहित्य अमृत के संपादन का दायित्व सँभाला, तो पंडित जी की वह छवि एकाएक मेरे मन में कौंध उठी। उनके जन्मदिन पर कुछ विशेष सामग्री देने की बात मन में थी। प्रभात जी ने पूछा, क्या देंगे मनु जी?”
मेरा उत्तर था, “प्रभात जी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है शीर्षक से उनका जो ललित निबंध है, वह कहीं से खोजिए। मैं उसी को छापना चाहता हूँ, जिससे उन्हें अपनी तरह से ट्रिब्यूट दे सकूँ।
प्रभात जी ने कोशिश की। कुछ प्राध्यापक मित्रों से मैंने भी आग्रह किया, पंडित जी का वह लेख पत्रिका में मैं छापना चाहता हूँ। वह अगर पुस्तकालय में कहीं नजर आए तो कृपया मुझे उपलब्ध करा दें।
आखिर वह लेख मिला और उसी को मैंने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में उसके महत्त्व की चर्चा के साथ, बड़े सम्मान से छापा।
हालाँकि मन में एक भावनात्मक उत्फुरण पैदा करने वाला वह अद्भुत निबंध जब बरसों बाद फिर से मेरी आँखों के सामने था, तो उसे पढ़ते हुए पता नहीं क्यों, मेरी आँखों से गंगायमुना की धाराएँ बह रही थीं। हृदय आवेग में बहा जाता था, और मेरे आँसू रुक नहीं रहे थे।…शायद उसके पीछे उस महामनीषी के बड़प्पन की वे स्मृतियाँ हों, जिन्होंने मेरे मन को एक निर्मल उजास से भर दिया था।
आज उनका बड़प्पन याद आता है, खुद झुककर भी एक अनाम लेखक के आत्माभिमान को बचा लेने की उनकी सदाशयता याद आती है, अगाध पांडित्य के साथ ही किसी उदार क्षमा-मूर्ति जैसा उनका अजातशत्रु व्यक्तित्व याद आता है तो मेरा माथा खुद ही झुकने लगता है। और तब समझ में आता है कि पंडित विद्यानिवास मिश्र में वह क्या है, जो उन्हें हिंदी के एक विराट गौरव शिखर सदृश बनाता है। एक बड़ा शख्स और बड़ा साहित्यकार, जो सचमुच हिंदी और भारतीय संस्कृति के स्वाभिमान का मूर्तिमंत प्रतीक बन गया।
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327
ईमेल – [email protected]
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8 टिप्पणी

  1. शब्दों का अपना स्नेहिल सानिध्य और आज की भाषा में कहें तो अपना नशा।पुरानी पीढ़ियों और आज के समीचीन संदर्भों के बीच सजा सेतु सा महाकुंभ की आरती सा करता है आदरणीय और श्रद्धेय दोनों!प्रकाश मनु जी का यह बृहद आलेख ।
    श्रद्धेय पंडित विद्या निवास मिश्र की बरबस याद दिलाता और ललित निबंध विधा की भीनी भीनी या झीनी सी आभास दिलाता यह आलेख और इस में मेरे राम का मुकुट भीग रहा ,जैसे अवधी और भोजपुरी की खिचड़ी को मकर संक्रांति पर पाठकों को परोस कर कह रहा हो कि लो इसे ग्रहण करो और देखो समझो पढ़ो और गुनों इसी भारतीय संस्कृति को और इसके प्रणेता प्रभु श्री राम को।
    यह आलेख या इस प्रकार के अमृत का सा स्वाद दिलाने वाले लेख अब बीते जमाने की यादें बनते जा रहे हैं।ऐसे में जब उन सारी यादों को कोई समेट कर एक मध्यम से घट में भर कर रख दे तो सारे दैहिक और मानसिक संताप वेदना ऊहापोह बेचैनी रिक्तता मानों छू मंतर हो जाती हैं और छोड़ जाती है ,पंडित विद्या निवास मिश्र और उनके चितेरे प्रकाश मनु के सारस्वत सानिध्य में ,,,आज के युवाओं को एक आलेख निश्चित रूप से पढ़ना चाहिए।उनके हिसाब से लेख थोड़ा सा दीर्घकाय और कुछ कठिन शब्दों को समाहित करता हुआ अवश्य लगेगा।क्योंकि पढ़ने की प्रवृति अब कम या यों कहें कि ध्यान केंद्रित करने की क्षमता अब उतार पर है,,अतः ऐसे लेख प्रकाश स्तंभ का कार्य कर सकने में पूर्णतया सक्षम हैं।
    आभार अग्रज तेजेंद्र शर्मा जी को जिनके सम्पादकीय आलोक में प्रकाश मनु जी का यह प्रकाश स्तंभ हमें पढ़ने को मिला।प्रकाश मनु दीघार्यु हों शतायु हों ताकि हमें इसी प्रकार के भारतीय संस्कृति को समृद्ध करते और बताते आलेख पढ़ने को मिलते रहें।
    सादर

    • आपने इतने मन से इस संस्मरणात्मक आलेख को पढ़ा, भाई दिलीप जी। और इतने सुंदर स्नेह पड़े शब्दों में अपनी बात कही।‌कृतज्ञ हूं भाई। इस संस्मरण को लिखते हुए मेरे मन में जो भाव‌ उमग रहे थे, वे ही मानो आपकी इस छोटी सी रसमय टिप्पणी के शब्द-शब्द से चू रहे हैं। मेरे लिए आज भी यह बड़ा आश्चर्य है, कि शब्द किस जादुई ढंग से‌ हमारे भावों को संचारित करते हैं, कि हृदय से हृदय के बीच पुल बन जाता है।

      विद्यानिवास मिश्र सरीखे रस-मर्मज्ञ विद्वान से मैंने यह सीखा। और आप सरीखे सहृदयों में इसे साकार होते देखता हूं, तो बड़ी खुशी होती है।

      मेरे बहुत-बहुत स्नेहाशीष,
      प्रकाश मनु

  2. बहुत-बहुत आभार भाई सूर्यकांत जी। लेख के मर्म को‌ थाह लिया आपने, और इसकी भावुक संवेदना को भी, जिसे विद्यानिवास जी ने ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ ललित निबंध के शब्द-शब्द में पिरो दिया था।

    हिंदी के प्रख्यात विद्वान, रस-मर्मज्ञ और ‘संस्कृति पुरुष’ पंडित जी के शताब्दी वर्ष में मैं उनका स्मरण कर रहा था, तो यही भावना मेरे भीतर थर-थर-थर कर रही थी। और मैं देखता हूं, वही भावुक मन की संवेदना आपकी इस सुंदर, भावपूर्ण टिप्पणी से भी झर रही है।

    सच पूछिए तो यही भारतीय संस्कृति की उदात्त चेतना है, जो आज भी रामकथा के व्याज से एक अंत: सलिला की तरह हर प्राणी के हृदय में बह रही है।

    आपकी इस अद्भुत टिप्पणी से इस शताब्दी वर्ष में पंडित जी को स्मरण करने का मेरा रस-आनंद कई गुना अधिक बढ़ गया।

    अलबत्ता, आपने इतने मन से पढ़ा, और इतनी संजीदगी से कहा भी। बहुत अच्छा लग रहा है भाई सूर्यकांत जी। बहुत-बहुत अच्छा लग रहा है।

    विनत हूं भाई। और‌ मन और आत्मा से आपके लिए ढेर सारी असीसें निकल रही हैं।

    कृतज्ञता सहित,
    प्रकाश मनु

  3. आदरणीय प्रकाश मनु जी, जाहिर है कि आदरणीय मिश्र जी का यह वाक्य एक वाक्य ना होकर एक मंत्र सिद्ध हुआ हे, जो आपके मन में गहरा बैठ गया और इसी को लेकर भाव विभोर होकर श्री विद्यापति मिश्र जी का यह दीर्घ आलेख की रचना आपने की ,
    जब मैने यह वाक्य पढ़ा की मेरे राम का मुकुट भीग रहा है तब सीधे-सीधे मेरे मातृत्व मन में मां कौशल्या का ध्यान आया की वन गमन के समय भारी वर्षा ऋतु काल है और सिया राम लक्ष्मण तीनों वर्षा से बचने के लिए एक घने वृक्ष के नीचे खड़े हो गए हैं फिर भी घनघोर वर्षा का जल पत्तों से बहकर प्रभु श्री राम के मुकुट को भिगो रहा है और उसकी बूंदें उनके चेहरे पर से फिसल रहे हैं

    लेकिन मिश्र जी ने इस वाक्यांश को इस मंत्र को आदि काल से लेकर वर्तमान तक को इस वाक्य में भिगो सा दिया हे
    दो पीढ़ियां का अंतराल जहां पुरानी पीढ़ी की आदत आगत की रक्षा, सुरक्षा की चिंता करती है, वही नई पीढ़ी बेफिक्र है, यहां तक विदेश में बसे हुए बच्चे ऐश्वर्य में भीग रहें हैं सहचरी का सेनुर भी भीग रहा हे , वहीं तमाम कौशल्याए बांट हैरती हे मेरे राम कब आयेंगे ,

    राम राम वन से आ चुके हैं प्रजा के लांछन की खातिर राम ने सीता को त्याग दिया है वन में भटकती सीता आश्रय की खोज ओर नवजात बच्चों की चिंता में व्याकुल हे ,वहां राम का भी अपने इस मजबूरी वश किए कार्य से उन्हें लग रहा है कि उनका मुकुट भारी हो गया है श्री राम का ऐश्वर्या भीग रहा है कि अधिकारिणी संतान वन में घूम रही उनका जागरण भीग रहा है सहचारिणी का सुहाग भीग रहा है,,,,,,,

    यह एक आलेख मात्र नहीं यह अपने आप में पूरा खंड काव्य हे ,मिश्र जी ने इस मंत्र को अन्तर तम तक आत्मसात कर लिया होगा तब चारो ओर मन में यही व्यथा रही होगी
    मेरे राम का मुकुट भीग रहा हे।

    आदरणीय मनु जी आपका आलेख 4 बार कोई पढ़ ले तो वो भी इस भाव में डूब जाएगा
    इस आलेख के बारे में ज्यादा लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा होगा,
    दशांश भी नहीं लिख पा रहे
    इतनी विचारशीलता इतना धैर्य ,इतना आत्मसात करना हमारे बस में कहां
    आदरणीय मनु जी आपको अशेष साधुवाद

    • प्रिय कुंती जी,
      आपने इतना डूबकर यह संस्मरणात्मक लेख पढ़ा, और इतना ही डूबकर अपनी राय भी लिखी, कि सच ही मुझे आपके लिखे में बार-बार माता कौसल्या के दर्शन होते रहे।

      भला इतना हृदय-रस और इतनी गहन संवेदना कहां बच रही है, आज की हड़बड़ी वाले जमाने में? पर आपके लिखे में मुझे वही विराट संवेदना दीख पड़ी, जो कभी मां कौसल्या में वन गए अपने लाड़ले बच्चों राम, सीता और लक्ष्मण के लिए उमगी थी, और जो बरसों बरस बाद पंडित विद्यानिवास मिश्र जी के ललित निबंध ‘मेरे राम‌ का मुकुट भीग रहा है’ में एक गहरी मर्म पुकार के साथ छलक पड़ी।

      तभी तो राम, सीता और लक्ष्मण केवल अवधपुरी के राम, सीता, लक्ष्मण ही नहीं रहे। मां से दूर गए सारे बच्चों में ही राम, लक्ष्मण, सीता की प्रतीति होने लगी, और‌ हर स्त्री में एक कौसल्या मां आकर बैठ गई, जिसके बच्चे परदेस में गए हुए थे, और उसके हृदय में एक मर्म पुकार सी उठती है, कि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, मेरे राम का मुकुट…!

      प्रिय कुंती जी, आपमें एक सच्चा सर्जक बैठा है, और उतना ही सच्चा और निर्मल मां का हृदय भी, जिसमें करुणा ही करुणा भरी है। इसीलिए इस संस्मरण के मर्म तक आप पहुंच सकीं। और इसके शब्द-शब्द को आपने महसूस किया।

      मेरा एक बार फिर बहुत-बहुत आभार, कुंती जी।

      स्नेह,
      प्रकाश मनु

  4. मेरे राम का मुकुट भींग रहा है
    आदरणीय पितृवत प्रकाश मनु सर,
    सादर प्रणाम।
    न जाने इस एक वाक्य में कौन सी भावना,कैसी संवेदना और मोह के प्रबल बंधन हैं जिनसे मन मुक्त होना ही नहीं चाहता। राम का नाम ही नितांत आत्मीय, हृदय के निकट प्रतीत होता है,जिसकी अनुभूति गूंगे की शर्करा के समान अकल्पनीय, अकथनीय है।अकथ कहानी प्रेम की कछु कहि न जाई।अद्भुत सम्मोहन है ।जब राम भावनात्मक सेतु हैं मन,जीवन के तमाम सूत्रों को जोडने वाले तो उनके.सिर पर विराजित मुकुट का मोह मां कौशल्या के.समान कितना सरल,मार्मिक और भावपूर्ण होगा।आपने आदरणीय स्मृतिशेष विद्या निवास मिश्र जी के इस निबंध को एक नयी उद्भावना ,नये अनुराग में बांध कर अंर्तमन की गहराईयों को छू लिया है जैसे।
    राम के वनवास गमन की पीडा को जैसे कौशल्या ने आत्मसात कर अपनी वेदना को आंसुवों में प्रवाहित किया,वैसे ही आपके द्वारा मां की.प्रभु के सामने आंखें बंद कर उस क्षण को.महसूस करवाना कि वे अव्यक्त भाव बोध में डूब कर अश्रुपूरित भावांजलि दे रही हों*मेरे राम का मुकुट भींग रहा हैं”। आपने बहुत ही सुंदर, स्नेहसिक्त समीक्षा की ,जहां पाठक का हृदय भी भींग उठा है उस अमृत-कुम्भ से छलकी बूंदों के.सहज प्रवाह में।आपने लिखा*राम भींगें तो भींगे उनका मुकुट नहीं, सीता भींग भले ही जायें उनका सिंदूर न भींगे।*अद्भुत सम्मोहन में बांध लिया है.इस लोकगीत के भावों ने।
    आपकी समीक्षा में अनेक भावों का नंदन कानन भी विलस रहा है,एक मा की प्रतीक्षा है,अवध का स्नेह है,बचपन की व्याकुलता भी है,और घटनाक्रमों की अचानक बदलती जाती परिस्थितियां भी हैं।अभी तो.राम के राज्याभिषेक की तैयारी थी और अभी वन प्रांतर में नंगे पांव चलते राम लक्ष्मण और सीता के सुकोमल चरण । माता की कल्पना में राम का मुकुट अभी भी उनके सिर पर है वर्षा में भींग रहा है,वह छटपटा उठती है*मेरे राम का मुकुट भींग रहा है*।
    आपकी लेखनी को शत-शत नमन करती हूं इस सरल,सहज पुण्य सलिल के भाव प्रवाह में बहा ले जाने के लिए। सचमुच एक तंद्रावस्था की स्थिति हो जाती है जब पाठक भी लेखक की भावनाओं के.साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है।आपके इस संस्मरण को एक सम्मोहन में बंध कर ही आद्योपांत पढ गयी हूं।स्तब्ध है मन,शब्द भी मौन हो गए हैं जैसे।लेकिन भावनाएं उमड रही थीं कुछ कहने के लिए। अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया के.रुप में आपको समस्त आदर और आत्मीय स्नेह के.साथ अपना प्रणाम निवेदित करती हूं।सादर प्रणाम। आभार आपने यह अवसर दिया मुझे कुछ व्यक्त कर पाने का।बहुत कुछ कहना है,,लिखना है,अवश्य लिखूंगी,यदि मां भारती ने मुझे इस योग्य माना तो।
    आप स्वस्थ व यशस्वी हों,हार्दिक शुभ कामनाएं।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  5. आदरणीय बाबूजी! आपके संस्मरण का शीर्षक ही प्रभावित करने वाला है। ऐसा माधुर्य है इसमें कि मन ही भीग जाता है।
    शीर्षक को पढ़ते हुए मन में कल्पना हुई कि राम का मुकुट क्योंकर भीग रहा होगा?
    जो वास्तव में रामभक्त होता है वह इसके माधुर्य में न डूबे ऐसा हो ही नहीं सकता। भारत की संस्कृति में राम मानव की चेतना में समाये हुए हैं। हमारा परिवार भी बचपन से राम के सानिध्य में ही रहा।राम पर विश्वास के हमने कई सफल प्रसंग देखे हैं।
    ईश्वर अपने हर रूप में अपना प्रभाव छोड़ते हैं देवों के देव महादेव देखते समय इष्ट देव शंकर की भक्ति, रामायण देखते हुए राम और महाभारत देखते हुए कृष्ण; किंतु राम के प्रति अगर सम्मोहन अधिक है,संवेदनाएं अधिक हैं तो उसका कारण यह है कि राम चरित्र है! संस्कार हैं। मर्यादा हैं! राम ने मर्यादाओं की स्थापना की है। अपने जीवन में अपना कर उन्होंने बताया है कि रिश्ते और कर्तव्य कैसा होना चाहिये? *धर्म वास्तव में कर्तव्य ही है* और राम इसे प्रतिस्थापित करते हैं। उन्होंने करके बताया रिश्ता कैसा होना चाहिए? कर्तव्य क्या होने चाहिए?राजा का प्रजा से,भाई का भाई से, छोटे भाई का बड़े भाई से और बड़े भाई का छोटे भाई, माँ का बेटे और बेटे का माँ प्रति,स्वामी का दास के प्रति और दास का स्वामी के प्रति,पुत्र का पिता के प्रति व पिता का पुत्र के प्रति, पति का पत्नी और पत्नी का पति के प्रति मित्र के प्रति…. जितना भी कहा जाए उतना ही काम है।
    जब हम यह कहते हैं कि “हमें निज धर्म पर चलना सिखाती रोज रामायण “तो यह स्पष्ट होता है कि धर्म से अर्थ सिर्फ कर्तव्य से है! कृष्ण भी गीता में यही कहते हैं कि धर्म का अर्थ कर्तव्य है। पता नहीं संप्रदाय बीच में कहाँ से आ गया!
    आप खुद इतने अधिक संवेदनशील है कि लिखते हुए आपकी भावनाएँ इतनी करुण और द्रवित हो जाती हैं कि पाठक भी उसके साथ बह जाता है। हम अक्सर कहते हैं कि आप अपने दिल को पूरी तरह से कलम के माध्यम से खोल देते हैं। और पाठक आपके शब्दों से हत्प्रभ हो जाता है।
    हम बहुत भी याद करें अपना पढ़ा हुआ तो हमें याद नहीं आता कि इतने बड़े-बड़े लेखको की शैली में से किसी में भी इतनी अधिक मर्मस्पर्शि ता कहीं महसूस हुई हो।
    शीर्षक को पढ़कर हम असमंजस में रहे क्योंकि वनवास में तो मुकुट था ही नहीं पर जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए वैसे-वैसे संस्मरण खुलता गया।

    तुलसी को चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन उनका लेखन हमेशा निर्दोष रहा।
    विद्यानिवास मिश्र जी को हमने पढ़ा तो है, लेकिन सच कहें तो इतना लंबा समय हो गया की याद नहीं अब, लेकिन फिर भी आपको पढ़कर उस मर्म को महसूस कर पा रहे हैं।
    आपका अध्ययन बहुत गहन है बाबूजी! हम तो उसके सामने एक बिंदु के बराबर भी नहीं हैं। आप जिस पर भी लिखते हैं उसे अमर कर देते हैं । जो भी लिखते हैं ,जितना भी लिखते हैं ,उसमें रम के लिखते हैं। अपने परिवार के प्रति भी आपके मन में उतना ही अपनापन और प्रेम है। माँ से आप बहुत जुड़े हैं जितना हमने आपको पढ़ा है! जैसा कि हर बच्चा ही जुड़ता है किंतु भावनाओं को गहराई तक महसूस, सब नहीं कर पाते।आप राम-रस में भीगते हुए अपनी माँ को महसूस करते हैं।
    आपके संस्मरण का तीसरा भाग बहुत महत्वपूर्ण है! यह दो पीढ़ियों के अंतराल परिवर्तित होते हुए सोच की, दृष्टिकोण की लापरवाह दृष्टि है जिससे आज का युवा समझना नहीं चाहता।

    घर में सुने हुए लोकगीत को मिश्र जी ने जिस तरह से याद किया है उस तरह से संभवतः कोई भी ना करे।
    हम इसको महसूस कर सकते हैं कि जब बच्चे गैर समय घर से बाहर रहते हैं और आने के समय पर नहीं आते हैं विशेष कर रात में तो किस तरह के ख्याल मन में आते हैं और किस तरह से चिंता सताती है; बच्चे कभी नहीं समझ पाएँगे।
    इसी तरह रात की ही एक ऐसी ही चिंता को लेकर जब हम अपने पोतों को बार-बार फोन कर रहे थे तो हमारे बेटे ने हमसे कहा कि,” माँ तो आप आखिरी पीढ़ी हो जो युवा बच्चों की इतनी चिंता करती हो। छोटे नहीं हैं, आ जाएँगे। दोनों पोते पहली बार इंदौर से होशंगाबाद अकेले आ रहे थे कार से,पहली बार और वह भी रात को!
    रात को निकले ही क्यों यह चिंता खाए जा रही थी। जाम था तो दूसरे रास्ते पर निकल गए। 2:00 रात को जब घर पहुँचे तब चैन पड़ी। और कोई भी आए, जब तक सफर पूरा नहीं हो जाता, तब तक बार-बार फोन ना करें तो हमें भी चैन नहीं पड़ती। और ये लोग समझते ही नहीं, फटाक से कह देते हैं कि इतनी चिंता क्यों करती हो?
    यह दो पीढ़ी का अंतर शायद सभी भोग रहे हैं। बच्चे समझते ही नहीं और ना ही समझना चाहते हैं।यहाँ हमें मिश्र जी की पीड़ा बिल्कुल अपनी पीड़ा की तरह लगी।
    और सच में ऐसे समय में भगवान ही याद आते हैं। एक अटूट विश्वास!!!!! जहाँ जाकर आस्था विश्राम पाती है।
    आज भी एक ऐसी ही रात है और हम इंतजार में हैं।

    यहाँ आकर ही यह बात समझ में आती है कि मेरे राम का मुकुट भीग रहा है यह एक लोकगीत की पंक्ति है।
    आपकी पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें भी याद आया वह प्रसंग; जब हनुमान जी अंगूठी लेकर सीता जी के पास पहुँचते हैं और सीता जी पूछती हैं-
    “तुमने कहाँ पाई महावीर हो,
    मुँदरिया ये रघुवर वीर की?
    कौन के पुत्र कौन के सेवक कौन के रहत हजूर हो …
    हनुमान जी –
    अंजनी के पुत्र
    राम के सेवक लछमन रहत हजूर हो मुंदरिया…
    सीता माँ-
    कौन के सत से सागर उतरे
    कौन के कारण आए हो?मुंद्रिका….
    हनुमान जी-राम जी के सत से सागर उतरे
    माता के कारण आए हों….
    सीता जी-
    इतनी बात सुनी सीता माता
    नैनन नीर भर आए हों…
    हनुमान जी –
    इतना सोच करो मत माता
    राम सहित दल आए हों…..
    हनुमान जी सफाई देते हैं-
    रावन मारि अबहिं लै जावौं राम हुकम नहीं पाएँ हौं।
    तुलसीदास आस रघुवर की
    हरि चरनन बलिहारी हौं।
    लोकगीतों का माधुर्य रस के झरनों की तरह बहता और भिगोता है। काशी की रामलीला के बारे में पढ़कर अच्छा लगा कि पहले मुकुट की पूजा होती है।
    जच्चा के गीत भी बहुत मार्मिक हैं।
    राम जन्म का उद्देश्य ही वनवासी राम के मात्र 14 साल के कार्यकाल में ही संपन्न होता है।
    निर्वाचन तो कई बड़े-बड़े राजाओं का हुआ, चाहे कारण जो भी रहा हो, लेकिन वे याद नहीं ! राम सबके प्राण थे। वरना राजा नल- दमयंती की कहानी भी बड़ी दुखदाई है। पर उस कहानी को कोई नहीं जानता
    राम का वनवास इस बात का द्योतक है कि राजा जब सिंहासन से उतर के प्रजा के बीच में जाएगा तभी वह प्रजा के दुख को समझ पाएगा। और फिर जगह कल्याण जी तभी संभव है।
    आपका यह पूरा संस्मरण हमने दो बार पढ़ा। आपके माध्यम से हम आदरणीय मिश्रा जी को जितना जानते थे उससे कहीं ज्यादा जान पाए उनके जीवन के उस भावनात्मक पहलू को समझ पाए। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका बाबूजी !
    आप जिसकी भी बारे में लिखते हैं वह पाठक के चित्त में रम जाता है।
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का। तहेदिल से शुक्रिया।
    और पुरवाई का हाथ जोड़ के आभार

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