भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा से होती है। सहस्त्राब्दियों से हमारी शिक्षण प्रणाली में गुरु-शिष्य परंपरा ने न केवल शैक्षणिक ज्ञान बल्कि नैतिकता, आध्यात्मिकता और समाज निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त किया है। आज, जब वैश्विक समाज नैतिक और शैक्षिक संकट का सामना कर रहा है, भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित मूल्यों और सिद्धांतों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। भारत की शिक्षण प्रणाली में शिक्षक की भूमिका को मुख्य माना गया है। शिक्षक का कार्य शिक्षण तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि शिक्षक नैतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता रहा है। वर्तमान परिदृश्य में समाज और राष्ट्र निर्माण की दिशा निर्धारित करने में सबसे अहम भूमिका शिक्षक ही निभा सकते हैं। हम जिस प्रकार के शिक्षक राष्ट्र को सौंप रहे हैं, हमारी आने वाली पीढ़ियों का न केवल भविष्य बल्कि राष्ट्र का समग्र चरित्र भी उसी पर निर्भर करेगा। हमारी समृद्ध ज्ञान की परंपरा और नैतिक मूल्यों की उत्कृष्टता के आधार पर भारत विश्व गुरु की भूमिका निभाता रहा है। आचार्यत्व प्राप्त शिक्षक ही शिष्य के पूर्ण व्यक्तितत्व का विकास, समालोचनात्मक सोच, नैतिकता का समावेश, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों के प्रति लगाव को बढ़ा सकता है। आज हमें जरूरत है कि शिक्षक शिक्षा पर सिंहावलोकन करें, विहंगमावलोकन करें और दूरावलोकन करें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी-2020) में भी शिक्षकों और शिक्षक शिक्षा के मुद्दों और चिंताओं को संबोधित किया गया है। शिक्षण के सभी स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों, उनकी बेहतर सेवा-शर्तों, कॅरियर प्रबंधन, प्रोफेशनल विकास जैसे विषयों पर विशेष बल दिया गया है।
भारत में शिक्षण शिक्षा का अगर हम सिंहावलोकन करते हैं तो देखते हैं कि प्राचीन ज्ञान परंपरा के अनेक उत्कृष्ट तत्त्व थे जो हमारी शिक्षक शिक्षण व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाते थे। शिक्षक शिक्षा की हमारी प्रणाली में ज्ञान परंपरा के आधार रहे गुणों, जैसे- धैर्य, करुणा, विनम्रता और सत्यनिष्ठा इत्यादि का, समावेश था जो गुरु और शिष्य दोनों के आंतरिक परिवर्तन और नैतिक चरित्र को दिशा प्रदान करते थे। साथ ही, नियमित ध्यान, प्रार्थना, समय-प्रबंधन के साथ शिक्षण की व्यवस्था आदि गुरु-शिष्य दोनों के आत्म-अनुशासन के विकास में योगदान देते थे। चौंसठ कलाओं के साथ-साथ दर्शन, विज्ञान, गणित, नाट्यविद्या, ज्योतिषशास्त्र, आयुर्वेदशास्त्र, धर्मशास्त्र जैसे अनेक विषयों के क्षेत्र में शिक्षण की विशेष (specialization) व्यवस्था थी जिसके कारण शिक्षक शैक्षणिक और व्यावहारिक उत्कृष्टता में आगे बढ़ते थे। शैक्षिक विचार-विमर्श (Academic Discourse) और निरंतर सीखते रहने की हमारी परंपरा ने शिक्षक शिक्षा में अतुलनीय योगदान दिया है। उपाख्यानों और उदाहरणों के माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था ने कौशल विकास को बहुत आसान बना दिया था।
हमारी ज्ञान परंपरा में शिक्षक का कार्य शिक्षण करने तक सीमित नहीं था बल्कि वह समाज में मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता था। सामाजिक मुद्दों को सुलझाने, शिक्षा को बढ़ावा देने, सामूहिक प्रगति को प्रेरित करने, पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य या सांस्कृतिक संरक्षण जैसी चुनौतियों में आचार्य सामाजिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाया करते थे। समय के अनुरूप प्रौद्योगिकी को अपनाना शिक्षक शिक्षा का अभिन्न अंग रहा है। हमारे यहाँ आचार्य की एक मुख्य विशेषता दूरदर्शी नेतृत्व के निर्माण की भी रहती थी। तभी तो आचार्य चाणक्य ने एक सामान्य शिष्य चन्द्रगुप्त को शिक्षा के माध्यम से एक बड़े सम्राट के रूप में परिवर्तित कर दिया था।
अगर हम आज की शिक्षण व्यवस्था का विहंगमावलोकन करते हैं तो पाते हैं कि आज अनेक चुनौतियाँ हमारे सामने खड़ी नजर आती हैं। उपभोक्तावाद के प्रभाव में नैतिक मूल्यों में गिरावट और सोशल मीडिया अथवा डिजिटल युग में गलत सूचनाओं का प्रवाह तेजी से बढ़ता जा रहा है। आज जरूरत है कि शिक्षक शिक्षा को फिर से हम अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा के उत्तम तरीकों और कौशलों के साथ जोड़ सकें।
अगर हम दूरावलोकन करते हैं तो हमें आचार्यत्व प्राप्त शिक्षक बनाने के लिए अपनी शिक्षक शिक्षा प्रणाली में समयानुकूल समुचित बदलाव करने ही होंगे। आचार्यत्व से तात्पर्य है ऐसा शिक्षक जो निज स्वार्थ को त्याग कर समाज और राष्ट्र के लिए अपने ज्ञान से समकालीन पीढ़ी को शिक्षित करे और राष्ट्र निर्माण में सहयोग करे। आचार्यत्व प्राप्ति के मार्ग हमारी सनातन ज्ञान परंपरा में अनेक बार बताए गये हैं। जो वर्तमान में प्रासंगिक होता है उसे ही आधुनिक कहा जाता है। भले ही हमारी परंपरा में वर्षों पहले आचर्यत्व प्राप्ति के मार्ग बताए गए हों, परंतु यदि आज भी उनकी प्रासंगिकता है तो हमें उन मार्गों को अपनाना चाहिए। शिक्षक ऐसा होना चाहिए जो स्वयं ज्ञान की पूर्णता और व्यापकता को प्राप्त कर शिष्यों में अज्ञानता का नाश कर सके, उनमें ज्ञान का प्रकाश जगा सके, समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने में अपनी भूमिका का सफल निर्वहण कर सके। प्राचीन परंपरा में कहा गया है कि ‘शस्त्राणि अधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः। यस्तु क्रियावान पुरुषः सः विद्वान।’ अर्थात् शास्त्रों का अध्ययन करके भी जो उस ज्ञान को अपने आचरण में नहीं ढालते हैं, शास्त्रानुसार कार्य व्यवहार नहीं करते, वे शास्त्रज्ञ होकर भी मूर्ख ही समझे जाते हैं और जो आचरणयुक्त होते हैं वे ही सफल विद्वान वस्तुतः शिक्षक/ आचार्य की पदवी को प्राप्त करते हैं।
भारत सरकार द्वारा शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् को एक महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है जिसके अंतर्गत एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम, शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक, राष्ट्रीय मेंटरिंग मिशन जैसे विभिन्न राष्ट्रीय अधिदेशों को पूरा करने में यह जुटा हुआ है। एनईपी-2020 में शिक्षकों की भूमिका में एक आदर्श बदलाव की कल्पना की गई है जिसे हम भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों के साथ जोड़कर प्राप्त कर सकते हैं। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान में भी भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में अनेक विषयों का निर्माण किया गया है। इन विषयों का अध्ययन कर विद्यार्थी यदि शिक्षक जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो अवश्य ही एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में अपने को ढाल पाएंगे। अवश्य ही हमारे इन प्रयासों से हम आचार्यत्व की प्राप्ति कर सकेंगे और एनईपी-2020 की मूल भावना का निर्वहण करते हुए, पुनः विश्व गुरु का गौरव हासिल करने में सक्षम होंगे।

