द्विवेदी युग के पश्चात ही छायावाद के चार स्तम्भ जयशंकर प्रसाद , सूर्यकांत त्रिपाठी निराला महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत मे प्रमुख निराला जी ही थे।
माँ वीणापाणि के वरद पुत्र निराला जी का जन्म भी उसी दिन ही माता सरस्वती की बसंत पंचमी की तिथि पर हुआ अद्भुत संयोग। बंगाल की उर्वरभूमि मेदिनीपुर जिले के कस्बा महिषादल में हुआ था उनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी उस समय वह वहां पर एक सिपाही के पद पर कार्यरत थे। मूलत:वह उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोटा गांव के रहने वाले थै । निराला जी की शिक्षा दीक्षा महिषादल में ही हुई।
पिताजी की कम आय और संयुक्त परिवार का खर्च के कारण निराला जी का बचपन बहुत अभाव में बीता। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कई बार अपमान भी झेलना पड़ा ।इस सबके बावजूद उन्होंने अपना स्वाभिमान नहीं खोया ।हाई स्कूल तक की शिक्षा के बाद उन्होंने घर पर रहकर ही बंगला हिन्दी और संस्कृत का गहन अध्ययन किया। इसके बाद वह इलाहाबाद आगये नौकरी की तलाश में। यहां पर उन्होंने समन्वय, मतवाला और सुधा पत्रिका का संपादन किया।
जब वे पढ़ रहे थे तभी मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही उनका विवाह हो गया था इनकी पत्नी भी विदुषी और अच्छी संगीत में निपुण थी जिसके कारण निराला जी की भी अभिरुचि गायन के प्रति हुई ।मात्र 22वर्ष की आयु में ही उनका निधन होगया ।जिसका आघात उनके कवि ह।दय कर हुआ और उन्होंने अपनी पत्नी की स्मृति में ही प्रेम गीत लिखा :
बांधों न नाव इस ठांव बंधु
पूछेगा सारा गाँव।
उनकी अपनी बेटी सरोज की जो कि मात्र 19 वर्ष की ही थी उसकी मृत्यु बीमारी मे हुई। आर्थिक तंगी के कारण उसका इलाज न करा सकने का दुख उन्हें अंदर तक झकझोर गया ।सरोज की स्मृति मे वह अपने आपको ही दोष देते हुये कहते है:
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था कुछ भी तेरे हित न कर सका। जाना तो अर्थोगमोपाय पर रहा संकुचित काय लख कर अनर्थ आर्थिक पथ पर झरता रहा मैं स्वार्थ समर।
यह रचना उनके पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति थी जिसने उन्हें बाद मे कालजयी बना दिया।
निराला जी को छायावाद में विद्रोही छाया का सूर्य कहा जाता है। उनकी कविताओं में निराला एक बार फिर गांधी कवि नहीं वरन संपूर्ण सांस्कृतिक चेतना के भूकम्प दिखते थे। परम्पराओं से हट कर उन्होंने साहित्य जगत के लिये एक नई उर्वर भूमि का सृजन किया। इसीलिए छायावादी कवि होकर भी उनकी रचनाओं में रहस्य वाद और अध्यात्म के दर्शन होते हैं। कला पक्ष के स्थान पर उन्होंने भावबोध को प्रधानता दी जिसके कारण प्रगति वाद और नवगीत का जन्म हुआ। छंदमुक्त विधान के कारण ही उन्हें मुक्त छंद का प्रणेता माना जाता है।उनके अंदर अदम्य साहस और,आत्म विश्वास था। देश में स्वतंत्रता के लिये चेतना जागृत करने के लिये ललकारते हुये ओजस्वी स्वर में कहा –
जागो फिर एक बार!
प्यारे जगाते हुये हारे तारे
जागो फिर एक बार।
जागरण का उद्घोष करता उद्बोधन गीत।
वे काव्य में अभिव्यक्ति के नये आयाम खोजते स्वच्छंदतावादी काव्य जगत के विराधाभासों का अद्भुत सामंजस्य थे। जिसके कारण उनकी रचनाओं में रीति रिवाजों, परम्पराओं, अन्याय के साथ अत्याचार और शोषण के विरुद्ध विद्रोह की आग भिक्षुक बादलराग, कुकुरमुत्ता, एवं ‘वह तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ में देखने को मिलती है।
वास्तव में उन्हें आधुनिक युग का एक युगांतकारी कवि माना जाता है। उनकी कविताओं में अद्भुत भावबोध के साथ लय और संगीत देखने को मिलता है। उनकी चारित्रिक विशेषता में वह किसी से डरते नही थे। निर्भीक अवढर दानी जो मिला सब बांट दिया जरूरत मंदों के मसीहा… स्वभाव से मस्तमौला।
उनकी काव्य कला की विशेषता उनका काव्य में चित्रण कौशल था जो उन्हें अन्य से पृथक करता था। अपने सजीव चरित्र चित्रण के कारण ही वह ऐसा चित्र खींच देते थे कि पढ़ने और सुनने वाला भाव बोध के माध्यम से स्वयं ही उसके मर्म को समझ लेता था।
निराला जी के काव्य की विशेषता वह बाह्य जगत के दृश्य को आंतरिक जगत से जोड़ कर उसका वह काव्य मे चित्रण करते जिसके कारण उनके काव्य मे अध्यात्म के दार्शनिक दर्शन होने से वह कभी कभी समझने मे भी जटिल और दुरूह भी हो जाती थी।
*निराला जी का नवगीत मे योगदान*
निराला जी को नवगीत का प्रणेता माना जाता है। उन्होंने अपने गीतों को छायावाद से यथार्थवाद की ओर मोड़कर उन्हें यथार्थ की उर्वर भूमि दी। अभी तक के उपेक्षित दलित और शोषित वर्ग को सामाजिक विषमता और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा कर साहित्य जगत में स्थान दिया। उनकी दलित-संवेदना सामाजिक विषमता और अन्याय के विरुद्ध होने से इसने शोषण मुक्त समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहा। उनके इस विचार ने हिंदी के गीत को नई दिशा देकर प्रगतिशील काव्य सृजन की ओर मोड़ दिया, जिसके कारण काव्य में मानवीय मूल्यों को स्थान मिला। इस तरह प्रगति वाद से गीत आगे बढ़कर प्रयोगवाद के धरातल पर आया। परंतु उसकी साहित्यिक यात्रा अभी जारी थी।
निराला जी की रचना वीणा वादिनी वर दे में उन्होंने कहा –
वर दे, वीणावादिनि वर दे! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे!
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
उनकी इस कविता में अद्भुत लय और संगीत था जो छंद के स्थान पर भावों के आंतरिक प्रवाह में उपजता है। इस तरह छंद मुक्त कविता का विधान आया… जिसने कविता को पिंगल शास्त्र के जटिल बंधनों से मुक्त कर उसे सहज रूप से गति देकर प्रवहमान किया।
नवगीत नव्यता और नवलता के साथ नये प्रतीक गढ़े जाने लगे। आधुनिक कविता इसी छंदमुक्त विधान की देन है ।
इस तरह हम देखते हैं कि निराला जी हिन्दी कविता की नवीन धारा के कवि हैं। वीणापाणि के वरद-हस्त पुत्र होने के कारण संगीत के प्रति विशेष अभिरुचि होने से उनके गीतों में सभी स्वरों का समारोह देखने को मिलता है।
निराला जी के नाम के साथ ‘महाप्राण’ की उपाधि उन्हें किसी संस्था या व्यक्ति ने नहीं वरन उनकी साहित्य जगत में अपनी श्रेष्ठता के कारण मिली। उसका कारण यह भी था कि बसंत ऋतु पर उन दिनों सबसे अधिक रचनायें लिखी जाती थीं। जिसमें सर्वश्रेष्ठ गीत अपने कथ्य, भाषा, शिल्प और भाव-बोध के कारण सबसे अच्छी रचना निराला जी की ही होती थी… जिसमें वे अपने जीवन में अभावों के होते हुये भी उनकी आत्मा में बसंत की महक होने से वह उनकी रचनाओं मे भी परिलक्षित होती थी। इसलिए हिन्दी के साहित्य जगत मे उनकी साहित्यिक गतिविधि और व्यापक विस्तार को देख कर उनके नाम के आगे महाप्राण जोड़कर महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कहा।
इस तरह हम देखते हैं कि निराला जी का व्यक्तित्व संघर्ष-शील होते हुये भी अपने सिद्धांतों पर अटल था जब कि उनके कृतित्व में मुक्त छंद का प्रयोग कर हिन्दी साहित्य में क्रांति लेकर आये जिसने नवगीत को गति दी।