राइजिंग राजस्थान का आयोजन 9, 10, और 11 दिसंबर को हुआ, जिसमें पूरे जयपुर शहर को सजाया गया था। 8 दिसंबर से ही विदेशी प्रतिनिधियों का आना शुरू हो गया था। कार्यक्रम का मुख्य स्थल जेईसीसी, सीतापुरा था, जहाँ 9 दिसंबर को सुबह 9 बजे कार्यक्रम आरंभ होना था। राजस्थान फाउंडेशन की ओर से मुझे भी मेल आया था कि मैं अपना कार्ड और किट कलेक्ट कर लूँ।

8 तारीख की सुबह, मैं कार्ड लेने पहुँची। वहाँ की व्यवस्था देखकर मैं दंग रह गई। बड़े-बड़े बैनर, हर तरफ सफाई, और राजस्थान की सांस्कृतिक झलक को देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने पूरे राजस्थान को कैनवास पर उतार दिया हो। राजस्थान फाउंडेशन और अन्य टीमों ने रंगों के आधार पर कार्ड और किट की व्यवस्था की थी। मुझे नारंगी रंग का कार्ड और एक लैपटॉप बैग मिला और 10 दिसंबर के लिये नीले रंग का जिसे लेकर मैं अगले दिन के कार्यक्रम की उत्सुकता लिए वापस आ गई।
9 दिसंबर सुबह समय से निकलने के बावजूद ट्रैफिक और रास्तों के बंद होने के कारण मैं 9 बजे की बजाय 9:15 पर पहुँची। तब तक कार्यक्रम स्थल के दरवाजे बंद हो चुके थे। पुलिसकर्मी माफी माँगते हुए कह रहे थे कि अगले सेशन तक गेट नहीं खुलेंगे। बाहर करीब 100-150 लोग खड़े थे—कुछ गुस्सा हो रहे थे, कुछ हँसी में बात टाल रहे थे, तो कुछ इसे अपनी गलती मान रहे थे।

अंदर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रीगण मौजूद थे। विदेशी मेहमानों के साथ कार्यक्रम ज़रूर शानदार रहा होगा। लेकिन बाहर खड़े हम लोगों के लिए 11 बजे तक इंतजार ही था। मुझे बहुत तेज प्यास लगने लगी , मैं नाराज़गी जता रही था तभी एक पुलिसकर्मी ने अपनी पानी की बोतल देकर हमारी प्यास बुझाई, जो उस समय किसी वरदान से कम नहीं लगा। थकान और निराशा ने मुझे और कुछ अन्य विदेशी डेलिगेट्स को घर लौटने को मजबूर कर दिया। मन में बस एक ही ख्याल था—
“बड़े बेआबरू होकर निकले राइजिंग राजस्थान के कूचे से…”
शाम को रामबाग पैलेस में डिनर और सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने सोचा, यहाँ भी समय की पाबंदी होगी। समय से पहले पहुँचकर मंच के करीब कुर्सी पर बैठ गई। लेकिन यहाँ भी कार्यक्रम 1 घंटे की देरी से शुरू हुआ। हालांकि, देरी की शिकायत जल्द ही खत्म हो गई जब गायक सोनू निगम ने अपनी जादुई आवाज़ से समा बाँध दिया। एक के बाद एक शानदार गीतों ने सर्दी में भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
इसके बाद, भोजन की व्यवस्था इतनी लाजवाब थी कि सुबह की सारी थकान और गुस्सा भूल गये ।राजस्थान के पारंपरिक और स्वादिष्ट व्यंजनों ने हर किसी का दिल जीत लिया। प्रवासी बंधुओं से मिलकर और हर पल का आनंद लेते हुए, हम सबने अगले दिन फिर मिलने का वादा किया और 11:30 बजे घर लौटे।
हालांकि सुबह के अनुभव में थोड़ी निराशा हुई थी, लेकिन शाम ने उसकी भरपाई कर दी। आयोजन भव्य था और राजस्थान की संस्कृति, आतिथ्य, और गरिमा को पूरे गर्व के साथ प्रस्तुत किया गया। यह अनुभव न भूलने वाला रहा।
दूसरे दिन, यानी 10 दिसंबर, को राजस्थानी प्रवासी कॉन्क्लेव का दिन था। इस बार मैंने समय पर पहुँचने का पक्का इरादा किया और समय से पहुँच गई। वहाँ पुलिसकर्मी बड़ी शिद्दत से अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। हर किसी के चेहरे पर मुस्कान थी, और वे सभी के पास जाकर सहायता की पेशकश कर रहे थे। यह देखकर मुझे पहली बार ऐसा लगा कि पुलिस का अतिथि सत्कार भी इतना अच्छा हो सकता है।
राजस्थान फाउंडेशन की टीम का उत्साह ऐसा लग रहा था जैसे किसी घर में शादी हो, और बारात के स्वागत में कोई कमी न रह जाए। अंदर चाय, कॉफी, और बिस्किट की स्टॉल्स लगी हुई थीं। हल्की सर्दी और सुबह की धूप के बीच लोग गर्म चाय-कॉफी का आनंद लेते हुए आपस में परिचय साझा कर रहे थे।



इंदु जी !राजस्थान हमारे दिल में बसा है। आपकी इस रिपोर्ट को पढ़कर मनपसंद हो गया मानो इसे पढ़ते हुए हम भी वहाँ घूम लिये। वहाँ के आनंद को हमने महसूस किया। शुक्रिया इस महत्वपूर्ण रिपोर्ताज के लिये।