संहिताएँ प्राचीन भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग हैं, जिनमें धार्मिक, सामाजिक, और नैतिक आचरण के नियमों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। यद्यपि इनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक निर्देश देना है, फिर भी इनमें निहित व्यंग्यात्मक तत्व समाज की विसंगतियों और धार्मिक आडंबरों पर एक सूक्ष्म प्रहार करते हैं। संहिताओं में व्यंग्य का प्रयोग हमें यह दिखाता है कि प्राचीन काल में भी समाज सुधार और धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता थी। इस प्रकार, संहिताएँ न केवल धार्मिक साहित्य हैं, बल्कि वे समाज की वास्तविकताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं।
प्राचीन ग्रंथों में “संहिताएँ” भारतीय संस्कृति और वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण अंश हैं। संहिताएँ मुख्यतः वैदिक ऋचाओं और मंत्रों का संग्रह होती हैं, जिनमें धर्म, कर्मकांड, और जीवन के विभिन्न पहलुओं से संबंधित निर्देश दिए गए हैं।
प्राचीन भारतीय साहित्य में कई महत्वपूर्ण संहिताएँ (Samhitas) हैं, जो मुख्य रूप से वैदिक मंत्रों, ऋचाओं, और धार्मिक अनुष्ठानों का संग्रह हैं। ये संहिताएँ वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण अंग हैं और उन्हें चार वेदों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है। यहाँ प्रमुख संहिताओं की सूची दी गई है:
ऋग्वेद (Rigveda) संहिता:
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ऋग्वेद संहिता – यह संहिता सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण है, जिसमें 10 मंडलों में विभाजित 1028 ऋचाएँ (हाइम्स) शामिल हैं। यह संहिता देवताओं की स्तुतियों, यज्ञों, और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन करती है।
यजुर्वेद (Yajurveda) संहिता:
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शुक्ल यजुर्वेद संहिता (White Yajurveda)
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वाजसनेयी संहिता – इसमें यज्ञ से संबंधित मंत्र और अनुष्ठानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
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कृष्ण यजुर्वेद संहिता (Black Yajurveda)
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तैत्तिरीय संहिता – यह कृष्ण यजुर्वेद का हिस्सा है, जिसमें अनुष्ठानों और यज्ञों के साथ-साथ मंत्र भी शामिल हैं।
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मैत्रायणी संहिता – यह यजुर्वेद की एक अन्य शाखा है, जिसमें यज्ञों के मंत्र और विधियाँ शामिल हैं।
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कठ संहिता – यह भी यजुर्वेद की एक शाखा है, जिसमें विभिन्न यज्ञों के नियम और मंत्र दिए गए हैं।
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कपिष्ठल-कठ संहिता – यह कठ संहिता का ही एक भाग है, जिसमें कुछ अलग-अलग मंत्र और विधियाँ शामिल हैं।
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सामवेद (Samaveda) संहिता:
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सामवेद संहिता – यह संहिता मुख्यतः संगीत और गायन के लिए उपयोग किए जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। इसमें ऋग्वेद की कई ऋचाओं को संगीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे यज्ञों और अनुष्ठानों में गाया जाता था।
अथर्ववेद (Atharvaveda) संहिता:
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अथर्ववेद संहिता – यह संहिता मुख्यतः तांत्रिक विधियों, मंत्रों, और चिकित्सा से संबंधित मंत्रों का संग्रह है। इसमें रोगों के उपचार, जादू-टोना, और भूत-प्रेत से बचाव के मंत्र भी शामिल हैं।
महाभारत के अंतर्गत:
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नारायण संहिता – नारायण संहिता विष्णु उपासना से संबंधित है और इसमें विष्णु से संबंधित विभिन्न मंत्र और विधियाँ दी गई हैं।
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आदित्य संहिता – यह सूर्य उपासना से संबंधित एक संहिता है, जिसमें सूर्य देवता की पूजा के लिए मंत्र और विधियाँ शामिल हैं।
तंत्र और आगम साहित्य में:
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रुद्र संहिता – यह शिव पुराण का एक हिस्सा है और इसमें भगवान शिव की महिमा और पूजा विधियों का वर्णन है।
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शिव संहिता – यह तंत्र साहित्य का हिस्सा है, जिसमें योग, तंत्र और शिवोपासना से संबंधित विधियों का वर्णन किया गया है।
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काली संहिता – यह तांत्रिक साहित्य का हिस्सा है, जिसमें देवी काली की उपासना, तंत्र मंत्र, और अनुष्ठानों का वर्णन है।
ये संहिताएँ वैदिक और बाद में विकसित तांत्रिक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और धार्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं।
संहिताओं का मुख्य उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक निर्देश प्रदान करना है, फिर भी इनमें व्यंग्य के तत्व भी देखने को मिलते हैं। यह व्यंग्य विशेष रूप से समाज की विसंगतियों, धार्मिक आडंबरों, और सामाजिक व्यवस्थाओं पर कटाक्ष के रूप में प्रकट होता है।
संहिताओं में व्यंग्य का प्रयोग
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विधान और कर्मकांडों की विडंबना:
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संहिताओं में वर्णित कई धार्मिक विधानों और कर्मकांडों में व्यंग्य का एक सूक्ष्म रूप मिलता है। उदाहरण के लिए, यज्ञों और अनुष्ठानों के अत्यधिक जटिल और कठिन नियमों का वर्णन इस प्रकार से किया गया है कि उनमें निहित विडंबना स्पष्ट होती है। कुछ कर्मकांड इतने जटिल हैं कि साधारण मनुष्य के लिए उनका पालन असंभव प्रतीत होता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे नियम समाज में धार्मिक आडंबरों और अंधविश्वासों पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी हो सकते हैं।
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समाज के विभिन्न वर्गों पर कटाक्ष:
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संहिताओं में समाज के विभिन्न वर्गों, विशेष रूप से ब्राह्मणों और क्षत्रियों के अधिकारों और कर्तव्यों का वर्णन करते समय, व्यंग्यात्मक तत्व भी देखने को मिलते हैं। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों और उनके कर्तव्यों के पालन में जो विरोधाभास है, वह एक प्रकार से सामाजिक व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है। इन वर्गों के कर्तव्यों के नाम पर जो आडंबर किए जाते थे, उन पर संहिताओं में सूक्ष्म कटाक्ष किया गया है।
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धार्मिक आडंबरों पर प्रहार:
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संहिताओं में धार्मिक आडंबरों और अंधविश्वासों पर भी व्यंग्य मिलता है। कुछ अनुष्ठानों और यज्ञों का वर्णन इस प्रकार से किया गया है कि वे पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या वास्तव में ये अनुष्ठान समाज के हित में हैं, या वे केवल धार्मिक आडंबर हैं। इस प्रकार, संहिताओं में व्यंग्य का प्रयोग उन धार्मिक कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए किया गया है, जो समाज के विकास में बाधक थीं।
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अतिरंजना के माध्यम से व्यंग्य:
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संहिताओं में कई स्थानों पर अतिरंजना का प्रयोग देखने को मिलता है, जिसमें विभिन्न कर्मकांडों और धार्मिक विधानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस अतिरंजना के माध्यम से संहिताएँ धार्मिक आडंबरों और अनावश्यक कर्मकांडों पर एक प्रकार का व्यंग्य करती हैं। अतिरंजना के इस प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि लेखक उन धार्मिक आडंबरों की अनावश्यकता को उजागर करना चाहता था।
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