चिकनी चुपड़ी बात से, डरना बरख़ुरदार।
मक्खन के सँग है दिखा, चाकू भी हर बार।।
क्षमा माँग कर धुल गए, कभी धुले कर जाप।
कभी पाप यूँ भी धुले, यदि मन पश्चाताप।।
बात बहुत ये गूढ़ है, और ज्ञान से युक्त।
एक क्षमा करता मगर, दो–दो होते मुक्त।।
चाकू–ख़ंजर से लगे, कभी किये हैं ख़ून।।
कभी नोच घायल किये, जिह्वा के नाखून।
तन का अपना दायरा, इसकी सीमित चाल।
मन अनन्त विचरण करे, गगन धरा पाताल।
सच कहने में आजकल, जितनी डरे ज़ुबान।
उससे भी ज़्यादा डरे, सच सुनने में कान।।
मकड़ी से कारीगरी, चिड़िया से तरक़ीब।
चीँटी से हम सीखते, श्रम से बने नसीब।।
अहम्–वहम दो दैत्य हैं, इनके दो आहार।
रिश्तों की नीवें प्रथम, दूजा गहरा प्यार।।
सुख मिलता संतोष से, तू अपना मन जीत।
इच्छाएँ होती नहीं, पूरी आशातीत।।
कुछ साँपों की हो गई, जब बाजों सँग डील।
चिंता, भय उनके हुए, ताक़त में तब्दील।।

