आज जब पीछे लौटकर देखती हूँ कि वह क्या था जिसने मेरे जीवन को ढर्रे का नहीं बनने दिया, हर क्षण कुछ न कुछ नया पढ़ने-गढ़ने, गुनने-समझने की तड़प मेरे भीतर से नहीं गई, तो एकाएक कुछ चेहरे स्मृतियों में तैरते हुए मेरी आँखों के आगे आ जाते हैं। उनमें एक चेहरा इतना सुंदर और समझदारी से भरपूर है—खासकर उसकी ज्ञान से चमकती आँखों की सुंदरता ऐसी है कि मैं मानो सब कुछ छोड़, उसी के साथ हो लेना चाहती हूँ।
उस चेहरे में जो सच में एक ‘व्यक्तित्ववान’ चेहरा है, है ही कुछ ऐसी कशिश और आकर्षण कि जब मैं उसके बारे में सोचती हूँ तो कुछ-कुछ समझ में आता है कि किसी स्त्री की सुंदरता क्या होती है और वह कैसे शरीर से ज्यादा मन की चीज है। साथ ही उसमें ऐसी संवेदना और समझदारी भी होती है जो खुद के साथ-साथ औरों को भी मुक्त करती है। या कहिए कि किसी अच्छे काम के लिए प्रेरित करती है।
आपको आश्चर्य होगा, जिस सुंदर चेहरे की मैं यहाँ चर्चा कर रही हूँ, वह मेरी अध्यापिका कृष्णा वर्मा का है, जो तब मुझे अंग्रेजी पढ़ाती थीं जब मैं किशोरावस्था में भावनाओं की दुनिया में धीरे-धीरे कदम रख रही थी और साहित्य से मेरा नया-नया जुड़ाव हुआ था। यों एक नई दुनिया के द्वार मेरे लिए धीरे-धीरे खुल रहे थे।
मैडम कृष्णा वर्मा के पढ़ाने का ढंग एकदम अनौपचारिक था। वे मानो पढ़ाती नहीं थीं, उँगली पकडक़र हमें एक नई दुनिया के द्वार पर ला खड़ा करती थीं। वे पढ़ाते-पढ़ाते इस कदर खो जाती थीं कि हमें इस नई दुनिया के भीतर खुद-ब-खुद यात्रा करनी होती थी उनके शब्दों के सहारे!…और पीरियड खत्म होने के बाद जब हम अपनी इस ठोस यथार्थ की दुनिया में लौटते, तो हमें बहुत कुछ बेमानी और अनपहचाना भी लगता था। कभी-कभी तो समझ में नहीं आता था कि सच क्या है—यह दुनिया या वह दुनिया, जहाँ मैडम कृष्णा वर्मा अपने शब्दों और संवेदनाओं के झूले पर बैठाकर हिलोरें देते हुए, हमें ले जाती थीं।
यही वजह है कि कोई पचपन बरस हो गए, लेकिन न तो मैडम कृष्णा वर्मा मुझे भूलीं और उन उनके द्वारा पढ़ाए गए पाठ। यह अलग बात है कि इस बीच मैंने स्वयं हिंदी साहित्य से एम.ए. करने के बाद डॉक्टरेट किया, खुद भी कुछ बरसों तक प्राध्यापिका रही हूँ और अपने विद्यार्थियों में खासी लोकप्रिय भी रही हूँ। पर सच पूछिए तो पढ़ाने में मेरा आदर्श नौवीं कक्षा की मेरी अंग्रेजी अध्यापिका मैडम कृष्णा वर्मा ही हैं।
क्या मैं कभी भूल सकती हूँ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘द होम कमिंग’! पर उसे मेरे जीवन में एक यादगार अनुभव बनाया था मैडम कृष्णा वर्मा ने ही। यह अनुभव इतना जीवंत और अनोखा था कि आज भी मैं आँखें मूँदूँ, तो हुबहू उसी समय…उसी खूबसूरत कालखंड और परिदृश्य में पहुँच जाती हूँ, जहाँ हमारी नौवीं की अंग्रेजी की अध्यापिका कृष्णा वर्मा हमारी पाठ्य पुस्तक में शामिल यह कहानी पढ़ा रही हैं, एकदम तन्मय होकर। बच्चे भी उतनी ही तन्मयता से सुन रहे हैं। कक्षा में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ है। मानो सभी बच्चों को मैडम कृष्णा वर्मा अपने साथ बहाए लिए जा रही हों और वे भी किसी जादू से बँधे बिल्कुल मूक, जिधर वह मुड़ती हैं, उधर ही मुड़ते जा रहे हैं।
यों तो टैगोर की यह जगविख्यात कहानी किसने न पढ़ी होगी! फिर भी कुछ पंक्तियों में बताना हो, तो यह गाँव से आए एक मासूम से किशोर की कहानी है, जो शहर में अपने मामा के यहाँ पढ़ने के लिए आया है। पर वह यहाँ के वातावरण और जीवन की चाल-ढाल से अपना किसी भी तरह सामंजस्य नहीं बिठा पाता। शहराती जीवन से सामंजस्य बिठाने की उसकी सारी कोशिशें भोंडी साबित होती हैं। और उसकी शहरी नखरीली मामी और उनके बड़े शोख और सिर चढ़े घमंडी बच्चे उसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। वह पढ़ाई में तो लगातार पिछड़ता ही जाता है। साथ ही अपने गाँव-घर से, माँ और भाई-बहनों से बिछुड़े होने का दुख भी उसे बुरी तरह कचोटने लगता है।
अंतत: वह बुरी तरह बीमार पड़ता है। उसकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है, और जब उसके जीवन का अंतिम समय है, उसे लगता है, वह अपार समुद्र में डूबता जा रहा है—और नीचे…और नीचे…और नीचे…!
कहानी खत्म। मैडम एकदम चुप। कुछ भी टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं, और टेबल के पास ही टाट-पट्टी पर बैठी मैं—टप-टप, टप-टप…लगातार टप-टप, टप-टप बहते आँसुओं से भीगी हुई। यहाँ तक कि आँसू पोंछने का भी होश नहीं। और सामने खुली पड़ी किताब के पन्ने धुँधलाते जा रहे हैं।
मेरे साथ ही कक्षा के और भी कुछ बच्चों का यही हाल था। थोड़ी देर बाद ही घंटी बजी और अंग्रेजी का वह पीरियड खत्म। मैडम ने धीरे से अपना पर्स उठाया और धीमे और बोझिल कदमों से चल दीं।
उनकी चाल में रोज जैसी फुर्ती न थी। आज मानो उनके कदमों को कहानी में उमड़ते दुख ने भारी कर दिया था।
यहाँ इस बात का और जिक्र कर दूँ कि मैडम कृष्णा वर्मा की एक बेटी थी। उस समय तक वह छोटी-सी थी, शायद तीन या चार साल की। नाम था मिनी। उन्होंने जब हमें ‘काबुलीवाला’ कहानी पढ़ाई थी, तब कुछ ऐसा समाँ बाँधा था, मानो कहानी की मिनी में उनकी अपनी बेटी मिनी भी समाहित हो गई हो।
कहानी का अंत बेहद करुण है। जेल से छूटा काबुलीवाला दुल्हन बनी मिनी को देखने की आस लिए उसके दरवाजे पर आता है, तो घर की स्त्रियाँ भले ही उसे अपराधी समझकर भय खाएँ, वह खुद को एक सच्चा इनसान और एक बेटी का ममतालु पिता ही साबित करता है। यह प्रसंग बड़ा मार्मिक है और मैडम कृष्णा वर्मा के पढ़ाने के ढंग ने इसकी करुणा को और अधिक उभार दिया था।
तो ऐसा था उनका पढ़ाने का अंदाज। मनमोहक और अपने साथ-साथ बहा ले जाने वाला।
मैं अपने अनुभव से जानती हूँ कि पढ़ाते समय कहानी के साथ न सिर्फ खुद बहने लगना, बल्कि पूरी क्लास को भी बहा ले जाना, ऐसी सामर्थ्य बिरले अध्यापकों में ही मिलती है और वे हमें जिंदगी भर नहीं भूलते। ऐसे अध्यापक होते वही हैं, जो दुनियादारी से थोड़े ऊपर उठे होते हैं और ज्ञान और संवेदना से जिनका रिश्ता कहीं गहरा होता है। मानो वे ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि हों…या ईश्वर के सर्वाधिक प्रिय पात्र हों! और यह बात केवल उनके पढ़ाने के ढंग में ही नहीं थी, समूचे व्यक्तित्व और स्वभाव में भी देखी जा सकती थी।
*
आज मैडम कृष्णा वर्मा को याद करती हूँ तो लगता है, उनकी यही तो खासियत थी।
मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी बच्ची पर हाथ उठाया हो या ऊँची आवाज में डाँटा हो। पर उनकी शांत, दृढ़ और ठहरी हुई दृष्टि में ही कुछ ऐसा जादू था कि बच्चों के व्यक्तित्व के सारे ऊधमी कोने कछुए की तरह खुद-ब-खुद अंदर सिमट जाते थे। कक्षा में उनके कदम रखते ही एकदम सन्नाटा छा जाता था। जो भी वे पढ़ातीं, इतना लीन होकर पढ़ातीं कि कक्षा में ही वह सब हमारे दिल-दिमाग के भीतर उतर जाता था। निगाह इतनी पैनी कि क्या मजाल, कक्षा में कोई टेस्ट लिया जा रहा हो और बच्चा किसी की नकल कर ले—असंभव, एकदम असंभव!
कभी-कभी सोचती हूँ, भला ऐसी क्या खासियत थी मैडम कृष्णा वर्मा के व्यक्तित्व में कि हम विद्यार्थियों में से कोई उनकी बात की अवमानना करने की बात तो दूर, सोच तक नहीं सकता था। तो लगता है, यह शरीर से ज्यादा मन और बुद्धिमत्ता की सुंदरता थी जिसका जादू समूची कक्षा पर तारी हो जाता था। यह एक समझदार और सुरुचिपूर्ण अध्यापिका की आंतरिक सुंदरता थी, जिसे महसूस तो किया जा सकता है, पर ठीक-ठीक बताया नहीं जा सकता!…
उम्र कोई 27-28 बरस। कद पाँच-सवा पाँच फुट। दुबला-पतला शरीर, लेकिन आकर्षक देह-यष्टि। चेहरे पर अत्यधिक आकर्षण। रंग हलका साँवला, बाल खूब घने और लंबे। लंबी-सी चोटी पीठ पर लटकती रहती, जो उनकी चाल में एक अनोखी लय उत्पन्न कर देती। आँखों में बुद्धिमत्ता की चमक। ये थीं नौंवी कक्षा की हमारी अंग्रेजी अध्यापिका श्रीमती कृष्णा वर्मा, जो उस समय तो मेरे लिए सुरुचि और सुंदरता का सर्वोच्च प्रतिमान थीं, आज भी हैं।
*
मैडम कृष्णा वर्मा से जुड़ा एक प्रसंग और याद आता है। शायद दिसंबर के दिन थे। ठिठुरा देने वाली सर्दी। वे साड़ी पर शाल ओढ़कर आतीं। आँखें ज्ञान से दीप्त। वे शायद दूसरी बार माँ बनने जा रही थीं। अपने इस रूप में किसी स्त्री को मातृत्व की गरिमा से इतना आलोकित मैंने आज तक नहीं देखा। वे अपने इस नए रूप में और सुंदर होती जा रही थीं। उनके चेहरे पर हर समय एक आलोक-सा छाया रहता। और पहले जो उनका आतंक था, वह भी कुछ कम हो चला था। वे पहले से ज्यादा कोमल और ज्यादा सहानुभूतिपूर्ण और उदार होती जा रही थीं।
जनवरी में लोहड़ी का त्योहार आया। क्लास मॉनीटर की यह जिम्मेदारी होती कि वह कक्षा को पढ़ाने वाले सभी अध्यापकों से चंदा इकट्ठा करे। उसके साथ तीन-चार लड़कियाँ और भी होती थीं। मैं भी थी। हमने सभी अध्यापिकाओं से पैसे इकट्ठे किए। किसी ने दस दिए, किसी ने इक्कीस और किसी ने इकतीस। सबसे अंत में हम अपनी क्लास टीचर कृष्णा वर्मा के पास गए। हम चारों ने तय कर लिया था कि इस बार मैडम कृष्णा वर्मा से पचास रुपए से कम नहीं लेने हैं।
हम मुसकराते हुए स्टाफ रूप में गए। कृष्णा वर्मा जी वहाँ कॉपियाँ जाँच रही थीं, क्योंकि उनका यह पीरियड फ्री था और हमारा पी.टी. का था, सो हम अपनी पी.टी. मैडम से कहकर आए थे। स्टाफ रूम में दो-एक अध्यापिकाएँ और थीं। हम मैडम के पास गए और बोले, “मैडम, लोहड़ी मनानी है। आप भी कुछ सहयोग करें।”
उन्होंने मुसकराते हुए हमें देखा और बोलीं, “बोलो, कितने दे दूँ?”
“पचास…!” दीपा ने कहा।
“अरे, पचास तो बहुत ज्यादा हैं!”
“नहीं, इस बार आपसे पचास ही लेने हैं, कम नहीं।” हमने आग्रह से भीतरी भाव को छिपाते हुए कहा।
उन्होंने भी हमारे मंतव्य को, शब्दों के पीछे छिपे भाव को हमारी आँखों से पढ़ लिया था। उन्होंने भी बड़े अर्थपूर्ण ढंग से हमें पचास रुपए का नोट पकड़ाते हुए कहा, “चलो, ठीक है। ले जाओ और मूँगफली-रेवड़ियाँ चपरासी से मँगवा लो। फिर सारी क्लास में बराबर-बराबर बाँट लेना।”
यों हमारे पास कुल 140 रुपए इकट्ठे हुए थे। हमने चपरासी मनोहरलाल को पैसे दिए और मूँगफली-रेविडयाँ लाने भेज दिया। वह भी कुछ पाने की उम्मीद में खुशी-खुशी चला गया। उस दिन लोहड़ी के त्योहार की वजह से सारे स्कूल का वातावरण ही उत्सवमय हो रहा था।
स्कूल के मैदान में लोहड़ी जलाई गई, गीत गाए गए और फिर अपनी-अपनी कक्षा के सभी मानीटरों ने मूँगफली-रेवडिय़ाँ बाँटीं। अंजुरी भर-भर रेवडिय़ाँ और मूँगफलियाँ हरेक बच्चे के हिस्से में आईं। सभी लड़कियाँ बड़ी खुश थीं।
लोहड़ी के तीन या चार दिन बाद की बात है। मैडम कृष्णा वर्मा ने, जो कि मुझ पर बहुत विश्वास करती थीं, मुझे स्टॉफ रूम में बुलाया, कापियाँ ले जाने के लिए। मैं स्टॉफ रूम में गई, तो उन्होंने अपनी अलमारी की ओर इशारा करके मुझे चाबी दी। मैंने कॉपियाँ निकाल लीं। उन्होंने चाबी वापस लेते हुए, मुझे समझाने के लहजे में कहा, “देखो सुनीता, मैं कल से लंबी छुट्टी पर जा रही हूँ। फिर हम लोग नई क्लास में मिलेंगे।”
कुछ दिन से अपनी सहज नारी-बुद्धि से हम सबने उनके कहने से पहले ही अनुमान लगा लिया था कि अब वे ज्यादा दिन स्कूल नहीं आ पाएँगी। इसलिए मुझे ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ।
मैडम कृष्णा वर्मा उसी अपनत्व वाले लहजे में कह रही थीं, “मुझे तुम पर सबसे ज्यादा भरोसा है। मुझे लगता है कि मेरे पीछे तुम्हारी क्लास में अब नई टीचर लगना तो मुश्किल है। हाँ, कभी पीरियड लगेगा, कभी नहीं। कोर्स मैंने सारा कंपलीट करा ही दिया है। मेरे बाद क्लास की किसी लडक़ी को इंगलिश में कुछ समझ न आ रहा हो, तो उसे तुम अच्छी तरह समझा देना, खासकर संतोष, सुधा, कैलाश और नीरू को। अगर तुम उनकी थोड़ी-सी भी मदद कर दोगी, तो वे भी नई कक्षा में तुम्हारे साथ आगे बढ़ सकेंगी। वे गरीब हैं और ट्यूशन नहीं रख सकतीं। तो मेरा कहना है कि जब भी ये तुमसे कुछ पूछें, तो अच्छी तरह समझा देना। और खुद तो तुम्हें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। आई होप, यू विल डू योर बेस्ट!…समझ गई ना!”
मैंने झुकी आँखों से ही गरदन हिला दी। मैं कॉपियाँ लेकर चलने लगी, तो उनके प्रति ऐसा भावना का ज्वार-सा उमड़ा कि मन में इच्छा हुई, उन्हें कह दूँ, ‘मे गॉड ब्लेस यू विद ए सन!’ पर अपनी छोटी उम्र के कारण मुझे लगा कि ऐसा कहना शायद अभद्रता होगी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वे बड़े स्नेह से मेरी ही ओर देख रही थीं। वे कुर्सी से उठीं, मेरे कंधे पर हाथ रखा और समझ गईं कि उनसे बिछोह की बात सोचकर मेरी आँखें पनीली हो आई हैं। उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया और खुद को भी सँभालते हुए कहा, “सुनीता, प्लीज डोंट क्राई, बी ब्रेव, गुड गर्ल!” और यों मैं बोझिल कदमों से कॉपियाँ लेकर कक्षा में आ गई।
मैडम कृष्णा वर्मा के छुट्टी पर जाने के लगभग महीना भर बाद हमें खबर मिली कि उन्हें बेटा हुआ है, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मुझे लगा, जो बात मैं मुँह से नहीं कह पाई थी, वह ईश्वर ने मेरे कहे बिना ही सुन ली।
दसवीं कक्षा में वे फिर से हमें इंगलिश पढ़ाने लगीं और घर से स्कूल आते ही उनकी कक्षा की कुछ इस बेसब्री से मुझे प्रतीक्षा रहती कि लगता, मैं स्कूल में बस उन्हीं की क्लास में पढऩे, उन्हीं को देखने और सुनने आती हूँ। जैसे-जैसे वक्त गुजरा, उनका यह जादुई सम्मोहन कम होने के बजाय बढ़ा ही।
और आज जब उनसे बिछड़े कोई पचपन बरस के करीब गुजर गए हैं और मैं ठीक-ठीक जानती तक नहीं कि वे आज कहाँ होंगी—एक अध्यापक का मेरा आदर्श मैडम कृष्णा वर्मा ही है।
आज जब मैं अपने बच्चों को या जिज्ञासुओं को कुछ बताने लगती हूँ, तो बताते-समझाते हुए पूरी तरह लीन हो जाती हूँ। कुछ लोग कभी-कभी इस बात की तारीफ भी कर देते हैं। तब मैं एकदम चुप हो जाती हूँ या एक वाक्य धीरे से मेरे मुँह से निकलता है, “काश, आप मैडम कृष्णा वर्मा से मिले होते!”
संभवत: आज मैडम कृष्णा वर्मा बूढ़ी हो गई होंगी। पर मुझे जाने क्यों लगता है कि उनकी वे दीप्त आँखें अब भी उतनी ही युवा और उत्सुकता से भरपूर होंगी। यह कल्पना मुझे रोमांचक लगती है। और आज भी उसी सम्मोहन के आलोक-वलय में ले जाती है।
आज जब अखबार और समाचारों के चैनल मनुष्य और मनुष्य के बीच नफरत को जरूरत से ज्यादा उछालने में लगे हैं और हिंसा और अपराध ही आज की दुनिया और समाचार-जगत के केंद्र में छाते जा रहे हैं, तब मैं बड़ी कृतज्ञता के साथ अपनी उस प्रिय अध्यापिका को याद कर लेती हूँ जिसने हमारे भीतर संवेदना की ऐसी लौ जगाई थी, जो तमाम नफरत की आँधियों के बीच कभी बुझी नहीं। इसीलिए यह दुनिया बची हुई है और शायद इसीलिए यह इतनी खूबसूरत भी है।
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डॉ. सुनीता
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09910862380
आपका संस्मरण पढ़ा।
मन द्रवित हो गया। वास्तव में वही शिक्षक सही मायने में शिक्षक कहलाने योग्य है जो अपने शिष्यों का चरित्र गढ़ सकें।अपनी शिक्षिका कृष्णा वर्मा जी का आपने जिस तरह से जिक्र किया है ,हमें भी अपने कुछ शिक्षक और शिक्षिकाओं की इसी तरह से याद आ गई! सौभाग्य से ही इस मामले में हम बहुत भाग्यशाली रहे। विशेष तौर से सुधा अवस्थी जीजी! हमें याद आती हैं।
आपने जिस तरह से कृष्णा वर्मा मैडम का वर्णन किया है कि,
*”उस चेहरे में जो सच में एक ‘व्यक्तित्ववान’ चेहरा है, है ही कुछ ऐसी कशिश और आकर्षण कि जब मैं उसके बारे में सोचती हूँ तो कुछ-कुछ समझ में आता है कि किसी स्त्री की सुंदरता क्या होती है और वह कैसे शरीर से ज्यादा मन की चीज है। साथ ही उसमें ऐसी संवेदना और समझदारी भी होती है जो खुद के साथ-साथ औरों को भी मुक्त करती है। या कहिए कि किसी अच्छे काम के लिए प्रेरित करती है।*
पढ़कर अभिभूत हो गये। अपनी शिक्षकीय अवधि में हमने भी पूरी कोशिश की कि हम भी एक ऐसे शिक्षक की तरह बन सकें जैसे हमें मिले। शिक्षक भी कुम्हार की तरह ही होते हैं जो चरित्र गढ़ने का काम करते हैं।
वास्तविक शिक्षक की दैनंन्दिनी में सिर्फ किताबें पढ़ाना ही नहीं होता है,उन किताबों में जो लिखा है उसको जीवन में उतारना भी सिखाना होता है।
आपका सोचना बिल्कुल सही है दीदी! वास्तव में शरीर की सुंदरता उतनी मायने नहीं रखती, व्यक्ति के व्यक्तित्व, सह्रदयता , करुणा और स्नेह के आंतरिक सौंदर्य की खुशबू जब जगत में प्रवाहित होती है तो मलयांचल से प्रवाहित चंदन की खुशबू भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है। संसार उस सौंदर्य के सामने नतमस्तक हो जाता है।उस खुशबू के संसर्ग में आने वाला हर शख़्स प्रभावित होता है, वह भी प्रभावित होते हैं जो उन्हें देख नहीं पाते जिनकी खुशबू उन्हें मदहोश कर रही है। जैसे हम आपको पढ़कर मैडम से प्रभावित हो रहे हैं , उन्हें महसूस कर रहे हैं, उन्हें याद कर रहे हैं।वे जहाँ भी हो भगवान उन्हें सदा सुखी रखें काश कभी आप उनसे मिल पाए और हम भी उनसे मिल पाएँ। रवींद्रनाथ टैगोर की हमने बहुत सी कहानियाँ पढ़ी हैं पर जिस कहानी का आपने जिक्र किया है वह बिल्कुल याद नहीं। क्योंकि जिस तरह से आपने उसका संक्षेप में परिचय दिया। मन बहुत द्रवित हो गया।
एक पल के लिए मन्नू भंडारी की सजा कहानी याद आ गई।
जब उस कहानी को पहली बार हमने क्लास में पढ़ कर सुनाया था तो हम भी रो रहे थे और बच्चे भी।
जीवन के कुछ सच बहुत कड़वे होते हैं। कभी लगता है कि छोटा सा मानव जीवन किसी-किसी के लिये इतना सख़्त क्यों हो जाता है? कहानी तो फिर कहानी ही होती है लेकिन जीवन की सच्चाइयाँ इससे अलग भी नहीं।
काबुलीवाला कहानी भी बहुत संवेदनशील है।
अपनी 9th क्लास का वर्णन करते हुए जहाँ आपने बताया कि प्रैगनेंसी के समय जब आपकी मैडम लंबी छुट्टी लेकर जा रही थीं और आपसे उन्होंने कहा था-
*“मुझे तुम पर सबसे ज्यादा भरोसा है। मुझे लगता है कि मेरे पीछे तुम्हारी क्लास में अब नई टीचर लगना तो मुश्किल है। हाँ, कभी पीरियड लगेगा, कभी नहीं। कोर्स मैंने सारा कंपलीट करा ही दिया है। मेरे बाद क्लास की किसी लडक़ी को इंगलिश में कुछ समझ न आ रहा हो, तो उसे तुम अच्छी तरह समझा देना, खासकर संतोष, सुधा, कैलाश और नीरू को। अगर तुम उनकी थोड़ी-सी भी मदद कर दोगी, तो वे भी नई कक्षा में तुम्हारे साथ आगे बढ़ सकेंगी। वे गरीब हैं और ट्यूशन नहीं रख सकतीं। तो मेरा कहना है कि जब भी ये तुमसे कुछ पूछें, तो अच्छी तरह समझा देना। और खुद तो तुम्हें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। आई होप, यू विल डू योर बेस्ट!…समझ गई ना!”*
यह कथ्य यह समझाता है कि वो अपनी जगह कितनी गंभीर थीं, साथ ही सह्रदय व दयालू भी।
इतनी चिंता कम ही लोग करते हैं और इस तरह कम ही सोचते हैं।
यह संस्मरण याद रहेगा! आपके स्नेह और अपनत्व से पूर्ण मधुर स्मरण में ठहरीं कृष्णा वर्मा मैडम को सादर प्रणाम।
आपके माध्यम से हम एक सद्गुरु से जुड़ पाये। आपका यह संस्मरण हर शिक्षक के लिए एक प्रेरणा स्रोत की तरह रहेगा।
सादर प्रणाम दीदी
आदरणीय सुनीता जी का बहुत सुंदर भावप्रवण संस्मरण मन को उद्वेलित करता है। भावनाओं का सहज सरल प्रवाह अपनी शिक्षिका के प्रति आदर, स्नेह और गर्व-बोध की अप्रतिम भावनएं हृदय को.स्पर्श करती हैं और अपने.साथ साथ बहा ले जाती.हैं ।यह प्रवाह कोई साधारण जलधारा नहीं अपितु स्मृतियों की पावन लहरों संग बहती स्नेह और आत्मीयता की भागीरथी है,जहां मन किसी स्वार्थ, किसी कामना से मुक्त हो सिर्फ स्नेह सहजता है,स्नेह बांटता है। जीवन यात्रा में.हम बहुत कुछ सीखते हैं,समझते हैं,परंतु किसी का.व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली, आत्मीय प्रेरक हो जाता है कि हम उनके शब्दों को अपने आंचल में किसी अमूल्य निधि की तरह संजोए रखना चाहते.हैं।ऐसा ही मोहक विलक्षण व्यक्तित्व था आदरणीय कृष्णा वर्मा का।जिन्हें सुनीता जी कभी भूल नहीं पाई। उनकी कक्षाओं में पढे पाठ,कहानियां उन्हें किसी स्वप्नलोक में ले जातीं अथवा कहानी की दुनिया में उसके पात्रों के साथ बातें करती मानों कहानी की गहराई में उतर कर वे भी उसका एक हिस्सा बन जाती थीं।सुनीता जी स्वयं एक हिन्दी शिक्षका थीं और लोकप्रिय भी परंतु कृष्णा वर्मा के कहे शब्द शब्द उनके अंतर्मन में इस तरह अंकित हो गये जिसकी सुगंध ज्ञान के असीम स्रोतों को आजीवन सुगंधित करती रही।नौंवी कक्षा की कच्ची उम्र में जो ज्ञान जो सीख मिलती है वह जीवन के कोरे स्लेट पर लिखी इबारत की तरह कभी नहीं मिटती।लेखिका रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी द होम कमिंग को याद करती हैं कि किस तरह कृष्णा वर्मा ने उस कहानी के कथ्य को उनके जीवन में एक यादगार अनुभव बनाया था। यही कहानी ,कहानीकार और वक्ता की सफलता है कि कहाणी पाठक के जीवन के आस पास घटित होती किसी घटना का पुनरावलोकन जान पडे।मुझे भी आज अपनी अध्यापिकाएं याद आती हैं,उनकी सोच पाठन शैली,उनका व्यक्तित्व किसी चलचित्र की तरह आंखो के सामने उतर आता है। जैसा कि लेखिका सुनीता जी स्वयं लिखती हैं-*क्या मैं कभी भूल सकती हूँ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुरआज भी मैं आँखें मूँदूँ, तो हुबहू उसी समय…उसी खूबसूरत कालखंड और परिदृश्य में पहुँच जाती हूँ, जहाँ हमारी नौवीं की अंग्रेजी की अध्यापिका कृष्णा वर्मा हमारी पाठ्य पुस्तक में शामिल यह कहानी पढ़ा रही हैं, एकदम तन्मय होकर। बच्चे भी उतनी ही तन्मयता से सुन रहे हैं। कक्षा में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ है ।** यह कहानी अत्यंत मार्मिक व संवेदनशील है,एक बच्चा जो शहर में अपने मामा के यहाँ पढ़ने के लिए आया है। पर वह यहाँ के वातावरण और जीवन की चाल-ढाल से अपना किसी भी तरह सामंजस्य नहीं बिठा पाता। शहराती जीवन से सामंजस्य बिठाने की उसकी सारी कोशिशें गलत साबित होती हैं। और उसकी शहरी नखरीली मामी और उनके बड़े शोख और सिर चढ़े घमंडी बच्चे उसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। वह पढ़ाई में तो लगातार पिछड़ता ही जाता है। साथ ही अपने गाँव-घर से, माँ और भाई-बहनों से बिछुड़े होने का दुख भी उसे बुरी तरह कचोटने लगता है।अंतत वह बीमार पडता है ,,वहीं उसका अंत भी*। काबुबीवाला कहानी की मिनी में अपनी बेटी को याद कर करणा और ममत्व के भाव में.डूब जाना और यही भावबोब कहानी के पाठन को सजीव और सरस, संवेदित करता है।बहुत सुंदर संस्मरण, जिसे पढने के बाद मैं कुछ देर शांत रहकर न जाने कौन सी दुनिया में विचर रही थी,अपना बचपन, अपनी कल्पना की दुनियां ,कहानियां,बहुत याद आयीं थीं तो मैं समझ सकती हूं कि आदरणीय सुनीता जी किस भाव प्रवाह में बहती हुई लेखन कर रहीं होंगी।उनका मन यादों के गलियारे में आंसुवों में अवगाहन करता होगा। उनके संस्मरण के आखिरी शब्द हमेशा के लिए भन पर प्रभाव छोडते हैं,प्रेरक हैं और प्रिय भी।बहुत बहुत बधाई और मेरी ढेर सारी स्नेहिल शुभ कामनाएं,मंगलकामनाए। आप सृजन करती रहें,लिखती रहें,,हमारे लिए,,हमारी प्रेरणा बनकर
सादर सस्नेह प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
आ. एवं स्नेही सुनीता जी !
सादर प्रणाम
आपके संस्मरण ने बहुत से ऐसे अध्यापकों तक पहुँचा दिया जिन्होंने हमें कलम पकड़ने से लेकर विचारों की प्रस्तुत करने का सलीका बिना किसी विशेष यत्न के ही सिख दिया |
की दशकों के बाद भी जैसे ही आँखें बंद करते हैं,उनके सजीव चित्र आखों में उतर आते हैं |महसूस होता है मानो कल की ही बात हो |सच तो यह है कि जब अध्यापक/अध्यापिका अपने छात्र/छात्राओं के मन में इतने गहरे पैठ जाते हैं तब वे ताउम्र के लिए मन में अपना आसन ग्रहण कर लेते हैं |आपकी वर्मा मैडम को शत शत प्रणाम जिन्होंने आपकी पीढ़ी के मन में तो शिक्षा के प्रति जिज्ञासा व आदर का भाव गहराई से डाल ही है |आपके माध्यम से आगे की पीढ़ी को भी सार्थक संदेश दिया है |
सुनगर,सार्थक संस्मरण के लिए आपको हृदय से साधुबाद तथा आपको सादर नमन व साधुवाद
सादर
आदरणीय सुनीता दीदी!
आपका संस्मरण पढ़ा।
मन द्रवित हो गया। वास्तव में वही शिक्षक सही मायने में शिक्षक कहलाने योग्य है जो अपने शिष्यों का चरित्र गढ़ सकें।अपनी शिक्षिका कृष्णा वर्मा जी का आपने जिस तरह से जिक्र किया है ,हमें भी अपने कुछ शिक्षक और शिक्षिकाओं की इसी तरह से याद आ गई! सौभाग्य से ही इस मामले में हम बहुत भाग्यशाली रहे। विशेष तौर से सुधा अवस्थी जीजी! हमें याद आती हैं।
आपने जिस तरह से कृष्णा वर्मा मैडम का वर्णन किया है कि,
*”उस चेहरे में जो सच में एक ‘व्यक्तित्ववान’ चेहरा है, है ही कुछ ऐसी कशिश और आकर्षण कि जब मैं उसके बारे में सोचती हूँ तो कुछ-कुछ समझ में आता है कि किसी स्त्री की सुंदरता क्या होती है और वह कैसे शरीर से ज्यादा मन की चीज है। साथ ही उसमें ऐसी संवेदना और समझदारी भी होती है जो खुद के साथ-साथ औरों को भी मुक्त करती है। या कहिए कि किसी अच्छे काम के लिए प्रेरित करती है।*
पढ़कर अभिभूत हो गये। अपनी शिक्षकीय अवधि में हमने भी पूरी कोशिश की कि हम भी एक ऐसे शिक्षक की तरह बन सकें जैसे हमें मिले। शिक्षक भी कुम्हार की तरह ही होते हैं जो चरित्र गढ़ने का काम करते हैं।
वास्तविक शिक्षक की दैनंन्दिनी में सिर्फ किताबें पढ़ाना ही नहीं होता है,उन किताबों में जो लिखा है उसको जीवन में उतारना भी सिखाना होता है।
आपका सोचना बिल्कुल सही है दीदी! वास्तव में शरीर की सुंदरता उतनी मायने नहीं रखती, व्यक्ति के व्यक्तित्व, सह्रदयता , करुणा और स्नेह के आंतरिक सौंदर्य की खुशबू जब जगत में प्रवाहित होती है तो मलयांचल से प्रवाहित चंदन की खुशबू भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है। संसार उस सौंदर्य के सामने नतमस्तक हो जाता है।उस खुशबू के संसर्ग में आने वाला हर शख़्स प्रभावित होता है, वह भी प्रभावित होते हैं जो उन्हें देख नहीं पाते जिनकी खुशबू उन्हें मदहोश कर रही है। जैसे हम आपको पढ़कर मैडम से प्रभावित हो रहे हैं , उन्हें महसूस कर रहे हैं, उन्हें याद कर रहे हैं।वे जहाँ भी हो भगवान उन्हें सदा सुखी रखें काश कभी आप उनसे मिल पाए और हम भी उनसे मिल पाएँ। रवींद्रनाथ टैगोर की हमने बहुत सी कहानियाँ पढ़ी हैं पर जिस कहानी का आपने जिक्र किया है वह बिल्कुल याद नहीं। क्योंकि जिस तरह से आपने उसका संक्षेप में परिचय दिया। मन बहुत द्रवित हो गया।
एक पल के लिए मन्नू भंडारी की सजा कहानी याद आ गई।
जब उस कहानी को पहली बार हमने क्लास में पढ़ कर सुनाया था तो हम भी रो रहे थे और बच्चे भी।
जीवन के कुछ सच बहुत कड़वे होते हैं। कभी लगता है कि छोटा सा मानव जीवन किसी-किसी के लिये इतना सख़्त क्यों हो जाता है? कहानी तो फिर कहानी ही होती है लेकिन जीवन की सच्चाइयाँ इससे अलग भी नहीं।
काबुलीवाला कहानी भी बहुत संवेदनशील है।
अपनी 9th क्लास का वर्णन करते हुए जहाँ आपने बताया कि प्रैगनेंसी के समय जब आपकी मैडम लंबी छुट्टी लेकर जा रही थीं और आपसे उन्होंने कहा था-
*“मुझे तुम पर सबसे ज्यादा भरोसा है। मुझे लगता है कि मेरे पीछे तुम्हारी क्लास में अब नई टीचर लगना तो मुश्किल है। हाँ, कभी पीरियड लगेगा, कभी नहीं। कोर्स मैंने सारा कंपलीट करा ही दिया है। मेरे बाद क्लास की किसी लडक़ी को इंगलिश में कुछ समझ न आ रहा हो, तो उसे तुम अच्छी तरह समझा देना, खासकर संतोष, सुधा, कैलाश और नीरू को। अगर तुम उनकी थोड़ी-सी भी मदद कर दोगी, तो वे भी नई कक्षा में तुम्हारे साथ आगे बढ़ सकेंगी। वे गरीब हैं और ट्यूशन नहीं रख सकतीं। तो मेरा कहना है कि जब भी ये तुमसे कुछ पूछें, तो अच्छी तरह समझा देना। और खुद तो तुम्हें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं। आई होप, यू विल डू योर बेस्ट!…समझ गई ना!”*
यह कथ्य यह समझाता है कि वो अपनी जगह कितनी गंभीर थीं, साथ ही सह्रदय व दयालू भी।
इतनी चिंता कम ही लोग करते हैं और इस तरह कम ही सोचते हैं।
यह संस्मरण याद रहेगा! आपके स्नेह और अपनत्व से पूर्ण मधुर स्मरण में ठहरीं कृष्णा वर्मा मैडम को सादर प्रणाम।
आपके माध्यम से हम एक सद्गुरु से जुड़ पाये। आपका यह संस्मरण हर शिक्षक के लिए एक प्रेरणा स्रोत की तरह रहेगा।
सादर प्रणाम दीदी
आदरणीय सुनीता जी का बहुत सुंदर भावप्रवण संस्मरण मन को उद्वेलित करता है। भावनाओं का सहज सरल प्रवाह अपनी शिक्षिका के प्रति आदर, स्नेह और गर्व-बोध की अप्रतिम भावनएं हृदय को.स्पर्श करती हैं और अपने.साथ साथ बहा ले जाती.हैं ।यह प्रवाह कोई साधारण जलधारा नहीं अपितु स्मृतियों की पावन लहरों संग बहती स्नेह और आत्मीयता की भागीरथी है,जहां मन किसी स्वार्थ, किसी कामना से मुक्त हो सिर्फ स्नेह सहजता है,स्नेह बांटता है। जीवन यात्रा में.हम बहुत कुछ सीखते हैं,समझते हैं,परंतु किसी का.व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली, आत्मीय प्रेरक हो जाता है कि हम उनके शब्दों को अपने आंचल में किसी अमूल्य निधि की तरह संजोए रखना चाहते.हैं।ऐसा ही मोहक विलक्षण व्यक्तित्व था आदरणीय कृष्णा वर्मा का।जिन्हें सुनीता जी कभी भूल नहीं पाई। उनकी कक्षाओं में पढे पाठ,कहानियां उन्हें किसी स्वप्नलोक में ले जातीं अथवा कहानी की दुनिया में उसके पात्रों के साथ बातें करती मानों कहानी की गहराई में उतर कर वे भी उसका एक हिस्सा बन जाती थीं।सुनीता जी स्वयं एक हिन्दी शिक्षका थीं और लोकप्रिय भी परंतु कृष्णा वर्मा के कहे शब्द शब्द उनके अंतर्मन में इस तरह अंकित हो गये जिसकी सुगंध ज्ञान के असीम स्रोतों को आजीवन सुगंधित करती रही।नौंवी कक्षा की कच्ची उम्र में जो ज्ञान जो सीख मिलती है वह जीवन के कोरे स्लेट पर लिखी इबारत की तरह कभी नहीं मिटती।लेखिका रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी द होम कमिंग को याद करती हैं कि किस तरह कृष्णा वर्मा ने उस कहानी के कथ्य को उनके जीवन में एक यादगार अनुभव बनाया था। यही कहानी ,कहानीकार और वक्ता की सफलता है कि कहाणी पाठक के जीवन के आस पास घटित होती किसी घटना का पुनरावलोकन जान पडे।मुझे भी आज अपनी अध्यापिकाएं याद आती हैं,उनकी सोच पाठन शैली,उनका व्यक्तित्व किसी चलचित्र की तरह आंखो के सामने उतर आता है। जैसा कि लेखिका सुनीता जी स्वयं लिखती हैं-*क्या मैं कभी भूल सकती हूँ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुरआज भी मैं आँखें मूँदूँ, तो हुबहू उसी समय…उसी खूबसूरत कालखंड और परिदृश्य में पहुँच जाती हूँ, जहाँ हमारी नौवीं की अंग्रेजी की अध्यापिका कृष्णा वर्मा हमारी पाठ्य पुस्तक में शामिल यह कहानी पढ़ा रही हैं, एकदम तन्मय होकर। बच्चे भी उतनी ही तन्मयता से सुन रहे हैं। कक्षा में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ है ।** यह कहानी अत्यंत मार्मिक व संवेदनशील है,एक बच्चा जो शहर में अपने मामा के यहाँ पढ़ने के लिए आया है। पर वह यहाँ के वातावरण और जीवन की चाल-ढाल से अपना किसी भी तरह सामंजस्य नहीं बिठा पाता। शहराती जीवन से सामंजस्य बिठाने की उसकी सारी कोशिशें गलत साबित होती हैं। और उसकी शहरी नखरीली मामी और उनके बड़े शोख और सिर चढ़े घमंडी बच्चे उसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। वह पढ़ाई में तो लगातार पिछड़ता ही जाता है। साथ ही अपने गाँव-घर से, माँ और भाई-बहनों से बिछुड़े होने का दुख भी उसे बुरी तरह कचोटने लगता है।अंतत वह बीमार पडता है ,,वहीं उसका अंत भी*। काबुबीवाला कहानी की मिनी में अपनी बेटी को याद कर करणा और ममत्व के भाव में.डूब जाना और यही भावबोब कहानी के पाठन को सजीव और सरस, संवेदित करता है।बहुत सुंदर संस्मरण, जिसे पढने के बाद मैं कुछ देर शांत रहकर न जाने कौन सी दुनिया में विचर रही थी,अपना बचपन, अपनी कल्पना की दुनियां ,कहानियां,बहुत याद आयीं थीं तो मैं समझ सकती हूं कि आदरणीय सुनीता जी किस भाव प्रवाह में बहती हुई लेखन कर रहीं होंगी।उनका मन यादों के गलियारे में आंसुवों में अवगाहन करता होगा। उनके संस्मरण के आखिरी शब्द हमेशा के लिए भन पर प्रभाव छोडते हैं,प्रेरक हैं और प्रिय भी।बहुत बहुत बधाई और मेरी ढेर सारी स्नेहिल शुभ कामनाएं,मंगलकामनाए। आप सृजन करती रहें,लिखती रहें,,हमारे लिए,,हमारी प्रेरणा बनकर
सादर सस्नेह प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
आ. एवं स्नेही सुनीता जी !
सादर प्रणाम
आपके संस्मरण ने बहुत से ऐसे अध्यापकों तक पहुँचा दिया जिन्होंने हमें कलम पकड़ने से लेकर विचारों की प्रस्तुत करने का सलीका बिना किसी विशेष यत्न के ही सिख दिया |
की दशकों के बाद भी जैसे ही आँखें बंद करते हैं,उनके सजीव चित्र आखों में उतर आते हैं |महसूस होता है मानो कल की ही बात हो |सच तो यह है कि जब अध्यापक/अध्यापिका अपने छात्र/छात्राओं के मन में इतने गहरे पैठ जाते हैं तब वे ताउम्र के लिए मन में अपना आसन ग्रहण कर लेते हैं |आपकी वर्मा मैडम को शत शत प्रणाम जिन्होंने आपकी पीढ़ी के मन में तो शिक्षा के प्रति जिज्ञासा व आदर का भाव गहराई से डाल ही है |आपके माध्यम से आगे की पीढ़ी को भी सार्थक संदेश दिया है |
सुनगर,सार्थक संस्मरण के लिए आपको हृदय से साधुबाद तथा आपको सादर नमन व साधुवाद
सादर