बचपन हमारी जीवन यात्रा का सबसे प्यारा, सबसे अनमोल अविस्मरणीय पड़ाव होता है; जहां तमाम कठिनाईयों, संघर्षों और उलझनों से गुजरकर मन कुछ क्षण विश्राम करना चाहता है। बचपन अमीरी-ग़रीबी नहीं देखता, वह ऊंच-नीच नहीं मानता। वह एक अलग ही दुनिया होती है, सपनों की,कल्पनाओं की दुनिया। जहां दुःख का प्रवेश भी नहीं होता। आज अपना बचपन जब भी याद करती हूं तो अपने लोग, खेल-खिलौने, मौसम के त्योहार, अनगढ़ कविताएं, कहानियां बहुत याद आते हैं। इस संस्मरण को लिखते समय उलझन में हूं कि कहां से शुरू करूं? यादों का संसार तो विशाल है, जीवन सागर में अनुभूतियों की सीपी की तरह और तब सबसे पहले बचपन ही याद आता है। उम्र के इस पड़ाव पर जब जीवन की सांझ दस्तक देने लगी है, वो भूले बिसरे पल, सहेलियां खेल-खिलौने, मां-पिताजी और न जाने क्या क्या। बनारस की बेटी हूं, मेरे सपनों के शहर बनारस में बिताए अनगिनत यादों के इस सफ़र में अनुभूतियां भी हैं, हर्ष और विषाद के पल भी हैं, जिन्होंने बहुत कुछ सिखाया है मुझे।
मैं उत्तरप्रदेश के बनारस जिले की एक आम लड़की थी.. स्वतंत्रता सेनानी के परिवार में जन्मी, हिन्दी के प्रोफ़ेसर की बेटी और गृहिणी माँ की लाडली बेटी। मेरे अपने परिवार में लगभग पंद्रह वर्षों बाद किसी संतान का जन्म हुआ था। मेरा जन्म खुशियां लेकर आया था, मेरे माता-पिता के लिए। बाबा ने प्यार से मेरा नाम पद्मा रखा, जो सरस्वती और लक्ष्मी का भी पर्याय है। मेरे परिवार में मां-पिताजी,बाबा और मेरी छोटी बहन सुधा थी। उस समय भाई का जन्म नहीं हुआ था। बाबा ने गांधी जी के आह्वान पर 1942 में अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी।उनहोने आजादी और शहीदों तथा महान नेताओं से जुड़ी अनगिनत कहानियां सुनाई थीं। किस तरह पुलिस से गिरफ्तार होने से बचे थे। कैसे आजादी का जश्न मनाया गया था; हमारे पैतृक गांव गाजीपुर में।ये कहानियों हमें रोमांचित करती थीं। मन में अपने देश, महान नेताओं के प्रति अपार श्रद्धा थी। बाबा की नौकरी छूट जाने पर कुछ परेशानियाँ भी आयीं, लेकिन किसान परिवार के खेतों, फसलों के साथ ने जीवन सरल भी बनाया था। लेकिन परिवार के जीवन-यापन और मेरे चाचाजी, बुआ जी और पिताजी की शिक्षा के लिए बनारस आ गये। मेरे जन्म से पहले का समय सिर्फ़ कहानियों की तरह विगत था। उसकी आंच कभी हम तक नहीं पहुंची। हमने अभावों का समय नहीं देखा था या हमें महसूस ही नहीं कराया गया था। हमने सादगी में भी संतुष्टि के साथ जीना सीखा था। मंहगे खिलौनों, कपड़ों की कभी चाहत नहीं रही थी। मेरा बचपन सपनों की तरह सुंदर, निश्चिंत और कल्पनाशील था। जब बहुत छोटी थी, तब हमलोग बनारस के जैतपुरा मुहल्ले में रहते थे। सुरुज शाह के मकान में तीसरी मंजिल पर। बरामदे से नीचे झांकने पर भी डर लगता था लेकिन वो बरामदा ही हमारे घर में खेल का मैदान था। गुड्डे-गुड़िया के खेल मैंने भी खेले हैं, मेरी मां पुराने कपडों और साड़ियों से बहुत सुंदर गुड़िया बनाती थीं। हम सारी सहेलियाँ दिन भर उनका घर बसाने में व्यस्त रहती थीं। पिताजी के जूते को कार बनाकर उसमें हमारी गुड़िया का परिवार सैर पर निकलता था। हाथ से उसे धकेलते और मुंह से इंजन की आवाज निकालते हुए हम लोग पूरा बरामदा घूमते रहते थे। मुझसे दो साल छोटी मेरी बहन, मेरे खेल की पहली साथी थी। हमारे मकान में सारे किराएदार ही थे- लगभग आठ परिवार। अत: सहेलियां भी कम नहीं थीं। बचपन की दोस्ती देर तक याद रहती है। रागिनी, दुर्गेश, गुड्डी न जाने कहां होंगी सब! हमारी कल्पना की दुनिया, जिनसे आबाद रहती थी। कभी मां की साड़ी पहनकर न जाने कौन-कौन से अनगढ़, अनसुने गीतों पर हम थिरकते और नीचे वाली ललाइन चाची के ढोल पर संगीत के सारे बोलों की आजमाइश करते थे हम लोग। सबसे ज्यादा मजा तो गुड़िया की शादी पर आता, जब एक ज़िम्मेदार मां बनकर हम उनका ब्याह रचाया करते थे। मेरी छोटी सायकिल को गुब्बारों से सजाकर, कागज की रंगबिरंगी झंडियों से चंदोवा बनता और गुड्डे राजा शान से उस पर विराजते। मां अपनी सिलाई मशीन पर उसके लिए कपड़े सिलतीं, मेरी पुरानी फ्राक से काट कर, सलमा-सितारे से दूलहे का मौर बनता। फिर बारात लेकर यह सवारी मेरी सहेली दुर्गेश के घर जाती थी। कोई डालडा के डिब्बों को बजाता तो कोई थाली या बच्चों वाली खंजडी़। बारात गाते-बजाते पहुंच जाती। वहां भी बारातियों का शानदार स्वागत होता। दुर्गेश हमारे मकान-मालिक की छोटी बेटी थी, चंचल और हमेशा कुछ न कुछ नयी शरारत सोचती रहती थी। वो उम्र में कुछ बड़ी थी हम सबसे, इसलिए नेतागिरी उसी की चलती थी। उनके यहां आइसक्रीम की फैक्ट्री थी (एवरेस्ट आइसक्रीम कंपनी)। सभी बारातियों को आइसक्रीम मिलती और उनके संयुक्त परिवार की सारी बहनें मिलकर पूरी-सब्जी, बूंदी बनाती थीं। हम सब खा-पीकर परम संतुष्ट होकर ही लौटते थे। मैं इस टीम में अकेली ब्राह्मण, इसलिए पंडित बनना पड़ता था। पर पंडित बनने के लिए ब्राह्मण होना ही क्यों जरुरी था, यह भी मुझे नहीं पता था। लेकिन जो श्लोक याद थे वो अनगढ़ से और आधे-अधूरे। “कर्पूर गौरं, करुनावतारम्, संसार सारम्,” पता नहीं इन मंत्रों से गुड़िया का कितना कल्याण होता पर शादी ज़रुर हो जाती थी। विदाई में दुर्गेश फूट-फूटकर रोती थी। बार-बार हिदायत देती थी कि, देखो! मेरी गुड़िया गंदी मत करना, संभाल कर रखना”।
जब हम बच्चे थे, तब कोई विशेष दिवस वगैरह नहीं जानते थे। हमारे लिए हर दिन विशेष होता था। आज गौरैया-दिवस है, लेकिन बचपन में हमारे घर की मुंडेर पर आकर बैठने वाली गौरैया की चीं चीं हमें जगाती थी। चावल दाने को बिखेरना और उनको फुदक-फुदक कर खाते हुए देखना; हमारी रोज की आदत बन गई थी। जिस दिन पूरा परिवार साथ खाने बैठता या मानस मंदिर या संकट मोचन घूमने जाता या गंगा घाट पर नाव की सैर पर जाता था वही हमारे लिए परिवार दिवस था। आज जब एक ही घर में अलग-अलग कमरों से फ़ोन कर अपनी बात कहते हैं, तब बचपन के वे प्यारे दिन बहुत याद आते हैं।
बनारस की माटी पुण्यभूमि है, जहां दान-स्नान और पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। हर पूर्णिमा, अमावस्या, गंगा दशहरा आदि पर गंगा-स्नान और घाट किनारे बैठे भिक्षुकों को रामदाने के लड्डू दान दिये जाते हैं। गंगाघाट का सुंदर दृश्य मन मोह लेता है। छोटी छोटी छतरियों के नीचे बैठे पंडा जी से तिलक लगवाना बहुत अच्छा लगता था। लौटते समय कचौड़ी, जलेबी का नाश्ता हमारी धार्मिकता का सबसे महत्वपूर्ण अंग होता था। या यूं कहें कि कचौड़ी,जलेबी खाने के लालच में ही गंगा स्नान की ललक होती थी मन में। पंचगंगा घाट हमारे मुहल्ले का सबसे नज़दीकी घाट था। वहीं से शुरु हुई प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद, पद्मश्री स्व. बिस्मिल्लाह खान जी के जन्म दिन की भी, मेरे बचपन की छोटी-छोटी यादें हैं। पंचगंगा घाट पर अक्सर जाना होता था, तब सीढ़ियों से गुज़रते समय एक मकान से शहनाई वादन की मधुर आवाज सुनाई पड़ती थी, हम बच्चे रुक कर सुना करते थे, देख भले ही न पाएं, परंतु न जाने कैसा सम्मोहन था उस शहनाई में जो हमें बरबस खींचता था। तब वो लोकप्रियता के शिखर पर नहीं थे, लेकिन काशी के लिए उनका नाम परिचित नहीं था, और हम बच्चों के लिए तो बिल्कुल ही अनसुना। फिर एक दिन मेरे बाबा (दादाजी) ने बताया कि मेरे चाचाजी के विवाह में उनका ग्रुप आया था, बाद में अपने स्कूल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में ‘नागरी नाटक मंडली’ में उनको पहली बार प्रत्यक्ष बजाते हुए देखा था। हम सब खड़े होकर तालियां बजा रहे थे, उनके सम्मान में।
जब उनको पद्मश्री मिली तो पिताजी ने उनकी चर्चा की और बनारस से जुड़ी यादों को साझा किया था; आज भी उनके जन्मदिन पर वो सारी यादें साकार हो जाती हैं। अब तो पंचगंगा घाट भी नहीं जा पाती हूं, परंतु अपने बचपन में घटी हर घटना बालमन पर अंकित हो जाती हैं, इसलिए यादें हैं तो मेरी अनमोल पूंजी है।
ये अनमोल पल मेरे बचपन के बहुमूल्य मोतियों जैसे मन की मंजूषा में आज भी संरक्षित हैं। जिन्हें मोतियों की तरह मैं अपनी कविताओं में गूंथती रहती हूं-
“याद करें बचपन के दिन, यादें रुलाएं
तुम बिन। गुड़िया की चूनर में रंग नये भर लायें, कागज की नावों को पानी में तैराएं, रिमझिम बरसातों के दिन,याद करें बचपन के दिन।”
हर रक्षाबंधन हम दोनो बहनों को उदास कर जाता था। लेकिन जहां स्नेह के रिश्ते मजबूत हों वहां कोई कमी नहीं लगती। हमारे पड़ोसी और बुआ जी के बच्चों ने इन राखी के रिश्तों को बहुत मजबूत बनाया था।
रक्षाबंधन मेरे जीवन का अविस्मरणीय पर्व रहा है, जब हमारे बालमन में हजारों आंसू बरसते थे। जब भी राखी का त्योहार आता… एक बार फिर इस त्यौहार की यादें पलकें भिंगो जाते हैं और याद आता है- वो छोटा सा भाई जिसको राखी बांधने की कल्पना हमारे सपनों में बरसों से पल रही थी –हम दो बहनों का एकलौता भाई – हमारे जन्म के सात साल बाद आया था, न जाने कितनी प्रार्थनाएं की थीं। हमने माँ बागेश्वरी के मंदिर में, बाबा विश्वनाथ के दरबार में – ‘हमें एक भाई दे दो किसको राखी बांधेंगे- ? हर साल महेंद्र भैया और अपने चचेरे भाइयों को राखी बांधते समय मन में ख़ुशी और स्नेह तो होता था, लेकिन मन की गहराइयों में अपना वो छोटा सा भाई बहुत याद आता, अंततः वो आया, गोल-मटोल सांवला सा कृष्ण कन्हैया, हमने राखी बांधी थी और हम दोनों बहनें नए कपड़े पहन, राजरानी बनी पूरे मोहल्ले में घूमती फिरीं थी, वह हमारा एकमात्र खिलौना बन गया था और राखी हमारा प्रिय त्यौहार; लेकिन जल्दी ही अपने हाथों से उसे सामने बैठकर राखी बांधने का सुख-अपनी गृहस्थी में डूब जाने के बाद एक सपना बन गया है। कोई साल ऐसा नहीं आया। आज तक प्रतीक्षा कर रही हूँ। अब तो बाज़ार से राखी ख़रीद, लिफ़ाफ़े में बंद कर भेज देती हूँ,पर हमारी भावनाएं, स्नेह कागज का संदेश-वाहक नहीं पहुंचा पाता। अपने हाथों से मिठाई बनाकर खिलाना,”रखिया बंधा ले भैया सावन आये, जीय तूँ लाख बरीस रे…” गाते हुए उसे तिलक लगाना -बहुत याद आता है। मायके की देहरी-बरसों दूर हो गई, अब तो वह भी अपने घर-परिवार में व्यस्त है। बेटियों का पिता, बन उनका भविष्य संवारने की चिंता भी होगी,शायद उस बचपन को वह भी याद करता होगा, इस कमी को वह भी महसूस करता होगा, हाँ! ज़रूर करता होगा। बेटियों का मायका माँ के बिना अधूरा होता है, लेकिन भाई उसे सम्पूर्ण करता है। “प्रिय भाई, आज मेरी भेजी हुई राखी बांध, एकबार उस बचपन की राखी को ज़रूर याद करना, जब हम एक साथ मिठाई खाते थे शर्त लगाकर और नेग के पैसों के लिए झगड़ते थे, माँ के पकवानों को भी याद कर लेना, आज भाभी से वही बनवा कर ज़रूर खाना। हमारे बदले, बेटियों को नेग देना, हमारे स्नेह-दुलार-आशीषों के साथ। तुम्हें आज आँचल भर आशीष भेजती हूँ। तुम जियो हजारों साल,” बचपन की ये आशीष कामनाएं हर साल दोहराती हूं।
मेरी बुआ जी, हमारे शहर बनारस में ही रहती थीं। वे हमेशा मेरे पिताजी और बाबूजी [चाचाजी ]को राखी बाँधने आतीं। उम्र के बढ़ते पड़ावों ने भी उनकी बाल-सुलभ उत्सुकता और उल्लास को कभी कम नहीं होने दिया था, दोनों भाइयों की इकलौती छोटी बहन, बड़े प्यार से पहले माथे पर तिलक लगातीं फिर राखी बांधतीं और मिठाई खिलाती थीं; वे गुलाबजामुन जरुर लाती थीं- ”ई बड़का भैया के बहुत पसंद है-।” उस दिन हमारे घर में एक उत्सव मन जाता था। घर में पूरी,सब्जी और सिवईं ज़रुर बनती और विशेष अनुरोध पर बुआ जी पुदीना और खटाई वाली चटनी भी बनाती थीं; जिसका स्वाद आज भी भुलाये नहीं भूलता। पिताजी, बाबूजी, माँ, फूफाजी सभी उस चटनी के दीवाने थे। इस तरह रक्षाबंधन हमारे लिए सबसे बडा उत्सव बन जाता था।
राखी के मिले पैसों से हम, सामने वाली आइसक्रीम कम्पनी से आइसक्रीम खरीदते, फिर शाम को रन्नो की माई का आलूचाप, फिर भी कुछ बच जाता तो बैठ कर हिसाब लगते कि किसको कितना पैसा मिला? यादें तो बस उमड़-घुमड़ कर पलकें भिंगोने लगती हैं। आज मायके की देहरी लांघे आठ वर्ष बीत गए…व्यस्तताए इतनी कि अपने विवाह के बाद एक बार भी भाइयों को राखी अपने हाथों से नहीं बाँध सकी, अब तो बाबूजी और पिताजी की कलाइयां, सूनी ही रहेंगी; मेरी मातृवत बुआ जी नहीं रहीं। अब पिताजी को किसी की प्रतीक्षा नहीं होगी ”पुरनी [अन्नपूर्णा ‘ ना आइल अब तक?” हर राखी पर उनकी बाट जोहता उनके मायके का घर, देहरी, सब उदास… मेरे मन का कोना भी उदास है। न माँ रहीं न बुआ जी और न पिताजी। मायके की स्मृतियाँ हमारी साझी होती हैं। मेरी माँ उनके लिए भौजी कम -माँ ही ज्यादा थीं- स्नेह के अनमोल पलों को संजोने-जीवंत रखने वाली, दोनों के मन भी मानो एक अव्यक्त रक्षा सूत्र से बंधे रहते। वे सारी यादें आज विरासत है -धरोहर हैं हमारी। समय का एक लम्बा सफर तय हो गया। हम सब ब्याह कर अपनी-अपनी घर गृहस्थी में मगन हैं। लेकिन आज मेरी बेटियां भी अपने छोटे भाई को -जो बैंगलोर में कार्यरत है- दूरी की वज़ह से राखी नहीं बाँध पातीं तो मन कचोटता है।
अपना बचपन याद आता है जो न जाने कहाँ पीछे छूट गया है। मन के दरवाजों पर दस्तक देती कई स्मृतियां जाग उठी हैं- बचपन का उत्साह, उमंग बीते समय के साथ कहीं खो गया, जिम्मेदारियां बढ़ीं, जिंदगी आगे बढ़ती गई और उसके पीछे दौड़ते हुए हमारे लिए, भाई को अपने हाथों से राखी बांध पाना संभव नहीं, भाई भी व्यस्त अपनी दुनिया में, बहिन आंचल पसारे हज़ारों आशीर्वाद देती है -“जिय तू लाख बरीस”।
स्वतंत्रता दिवस की यादें-
यादों की श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में स्वतंत्रता दिवस की यादें, मन पर दस्तक दे रही हैं। मन चाहता है वापस उन्हीं स्मृतियों के गलियारे में लौट जाएं, जहां स्वतंत्रता दिवस सचमुच हमारे लिए वंदनीय था, एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय त्योहार था, जिसका स्वागत और आदर हम दिल से करते थे। स्वतंत्रता दिवस मेरे बचपन के प्रिय त्योहारो में से एक रहा है। एक सुनहला सपना देखने के बाद होने वाली सुखद भोर की कल्पना आज भी मन को छू लेती है। स्वतंत्रता सेनानी बाबा ने हमें हमेशा इन पर्वों का आदर करना सिखाया था। देशभक्तों की अनगिनत कहानियां सुनाई थीं। हम कभी गांधी जी की मृत्यु तो कभी भगतसिंह की फांसी पर रो पड़ते थे। उस समय हम बच्चों के लिए रात काटनी मुश्किल हो जाती थी। सुबह उठते ही ढेरों काम, तैयारियां,रात भर जागकर रंगीन कागज की बनी झंडियां बनाते और पूरे घर आंगन में फैला कर उन्हें चिपकाया करते थे। सफेद लकदक कपड़े, तिरंगे झंडे, सब देखभाल कर तैयार करते। तब कहीं जाकर रात बारह बजे तक सो पाते थे। जब दादाजी जीवित थे, तब तो सारा मुहल्ला जुट जाता था। दादाजी एक लंबे से बांस में तिरंगा झंडा फहराते, फिर जन-गण-मन गाया जाता और पड़ोसी बाबू नंदन की दुकान से खरीद कर लड्डू बांटे जातें थे। हमारे मकान-मालिक साह जी यह सारी व्यवस्था करते थे। लेकिन अब दादाजी नहीं रहे और मेरे पिताजी का स्थानांतरण नैनीताल हो गया तो सब कुछ छूटता जान पड़ा था। कुछ दिनों तक बीती यादों का सफ़र बहुत कुछ याद दिलाता रहता, दादाजी की याद आती, पर धीरे-धीरे हम स्कूल के कार्यक्रमों में बढ़ चढकर भाग लेने लगे। सहगान, नृत्य, कविताएं सुनाकर सबकी तारीफ़ मिलती तो मन गर्व से भर जाता था; उस समय हमारा बचपन सामाजिक, राजनीतिक छल-छंदों, और दांव-पेंच की बातों को नहीं समझ पाता था, बस यह हमारा देश है, गांधी, नेहरू, सुभाष, भगतसिंह सभी अपने हैं। उनका आदर सम्मान भी था मन में।
वर्षों बीत गए, उम्र के अनेक पड़ावों से गुज़र कर, उच्च शिक्षा के गलियारों को पार करते हुए, फिर कभी बचपन जैसे स्वतंत्रता दिवस नहीं मना पाए हम…सब कुछ यादों में कैद है। एक नई सुबह-जागृति की, विश्वास की,एकता व गर्व-बोध से भरे गणतंत्र की, –हाथों में तिरंगे झंडे उठाये हजारों बच्चों की एक सम्मिलित आवाज “भारत माता की जय” !, “पंद्रह अगस्त अमर रहे !’ ‘युवा उमंग और जोश भरे स्वर —”आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक, करो, ये धरती है बलिदान की”। बचपन में राष्ट्रीय उत्सव की यह तस्वीर मेरे सपनो में कैद है, पर समय के बदलते परिदृश्य में यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। अपने प्रिय कवि नीरज की जो पंक्तियाँ मुझे अतयंत प्रिय थीं –”सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ाये नीर, मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर, तुझको या तेरे नदीश गिरी-वन को नमन करूँ, किसको नमन करूँ मैं भारत किसको नमन करूँ-” पंक्तियों को कभी शान से गुनगुनाते गर्व का अनुभव होता था। परन्तु अब उमंग-उत्साह की हिलोरें पहले जैसी नहीं रहीं, युवा मन में। देशभक्ति व देश के प्रति समर्पण-बोध आज भी है, भारत माँ आज भी वंदनीया है, परन्तु आज जन-मन की भावनाएं कहीं आहत हो गईं हैं। आज बहुत याद करतीं हूं वह बचपन की पवित्र भावना,जब हम पूरे मन से ‘भारत माता अमर रहे’ , ‘हिन्दुस्तान जिंदाबाद’, के नारे लगाया करते थे। आज तो हम सबके लिए स्वतंत्रता-दिवस मात्र एक छुट्टी का दिन है, पूरे दिन आराम करना है, मनपसंद चीजें खाने का दिन है, बहुत हुआ तो टीवी पर प्रधानमंत्री जी को झंडा फहराते देख लेते हैं, “जन-गण-मन” गीत खड़े होकर गा लेते हैं, बस यही भावना शेष रह गई है आज की पीढ़ी और परिवेश में। ईश्वर से प्रार्थना है और मेरा मन आज भी यही चाहता है कि कब वो दिन आए जब हम अपने राष्ट्रीय त्योहारों को भी उतनी ही धूमधाम से मनाते, जैसे होली या दीवाली। देशभक्ति के गीत फिर फिज़ाओं में गूंजते,काश! ऐसे ही हो, ’जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम!!’
वर्षों बीत गए -अपनों का संग साथ छूटता गया -वहाँ जाकर अकेलेपन की पीड़ा से जूझना बड़ा कठिन होता है। लेकिन मेरे मन में बसा बनारस आज भी जिंदा है, वहीं खड़ा है,समय के उस छूट गए मोड़ पर। मैं खड़ी हूं उस पल के इन्तजार में,जब वह मेरी ऊंगली पकड़ मेरे अंतर्मन की दुनिया में ले जाएगा। इंतजार अब भी है!!
बेहद खूबसूरत अंदाज़ ए बयां।
ऐसा लगा कि हम आपके साथ आपके संस्मरण को जी रहे हैं।पहले कभी दृश्य श्रव्य का मिश्रण रचनाओं में पढ़ने और गुनने को मिलता था।
आज पुनः उसका आस्वादन मन को विभोर कर गया।
बधाई स्वीकारें।
सादर धन्यवाद सर, हृदय से बहुत बहुत आभार आपकी उत्साहवर्धन करती.शुभकामनाओं कै लिए। अपना स्नेह बनाए रखे।एक बार पुन: सप्रणाम धन्यवाद।
पद्मा मिश्र
पद्मा मिश्रा जी ने *बचपन की यादें* संस्मरण को बहुत डूबकर लिखा है। गुड्डे-गुड़ियों वाला बचपन, एक भाई की कल्पना वाला बचपन , गदबदा सा प्यारा भाई जिसकी कलाई में राखी बांधी जा सके। उसके आने के पूर्व कितनी मिन्नतें,कितनी प्रार्थनाएं जो बाद में फलीभूत हुईं। बेटी के लिए, बहन के लिए ये उल्लास की चिंताएं भी कम आनंददायक नहीं होती है। आगत भविष्य के सुनहरे सपनों में खोए रहना भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पद्मा जी इस संस्मरण का वो हिस्सा मेरे हृदय को छू गया,जब बुआ जी आपकी मां को ही मां मानकर मायके को आजीवन मायका बनाए रखने में कामयाब रही। माता-पिता की उम्र की एक सीमा होती है। भाभी यदि मां के किरदार में आ जाए तो मायका मायका बना रहता है।
वैसे किसी के भी संस्मरण पूरी तरह से मेरे जीवन से मैच नहीं करते हैं। जिनके करते भी होंगे तो वे आपकी तरह संस्मरण के माध्यम से व्यक्त नहीं कर पाते होंगे। मेरी मां भी अपनी तीनों ननदों को बेटी ही मानती रही हैं और बुआ लोग उन्हें मां मानती रही। जबकि मेरी दादी उस समय जीवित भी थीं। फिर भी मेरी तीनों बुआ का उनसे लगाव था।
पद्मा जी, इस संस्मरण को अपने भाई को जरूर भेजिएगा। पढ़कर उन्हें वे पल याद आ जाएंगे। वे उन पलों को अपने परिवार से साझा जरूर करेंगे।
बढ़िया संस्मरण के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
बहुत खूबसूरत संस्मरण है आपका पद्मा जी। गुड़िया का विवाह, भाई के लिए ईश्वर से प्रार्थना फिर उमंग से रक्षा बंधन का त्यौहार सभी प्रसंग अच्छे लगे। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
https://www.thepurvai.com/memoir-by-padma-mishra/
पद्मा जी!
आपका पूरा संस्मरण पढ़ते हुए हम भी अपने बचपन में सैर करने लगे! हम अधिक समय अपने माता-पिता के साथ नहीं रहे। सिर्फ 6 साल तक ही रहे लेकिन वह समय भी याद आता है ।ऐसा लगता है जैसे उस समय सभी जगह का माहौल इतना ही अधिक प्रेम और अपनत्व भरा और रिश्तों के मामले में संवेदनशील था।बाई थोड़ी बहुत घर के लायक सिलाई करती थीं इसलिए नए कपड़ों से गुड्डा, गुड़िया बनाती थीं। लगभग डेड़ बीते लंबा गुड्डा और उससे थोड़ी छोटी गुड़िया। बाई नाप कर काटती थी। मशीन में सीती थीं और उसमें रुई भर देती थीं। फिर उसके लिए कपड़े सीतीं थी हाथ से मोतियों के जेवर बनातीं। आंगन में मंडप बनता था लगभग 1 मी लंबा और उससे थोड़ा कम चौड़ा हमारी दो मारवाड़ी सहेली थीं शारदा और पुष्पा। अक्ति जिसे अक्षय त्रतिया कहते हैं,के दिन शादी करते थे ।बाई मंत्र बोलती थीं और बताती जाती थीं, ऐसा करो, ऐसा करो। कपड़ों से और पत्तों से मंडप सजाया जाता था। और सब जो बनाना रहता था वह बाई ही बनती थीं। हम दोनों बहनों के लिये भी बाई ने लहंगा ब्लाउज सिलाथा। हमसे पहले एक भाई शांत हो गया था और बाद में एक बहन तो हम बहुत लाड़ के रहे ,फिर हमारे बाद वाली बहन ज्योत्सना हमसे 3 साल छोटी थी ।बाई नियमों की बड़ी पाबंद थीं। हम लोगों का टाइम टेबल बना हुआ था कितने बजे उठना है उठकर फिर सारे दिन के जो कार्यक्रम थे वह कागज में लिखकर दीवार पर चिपका रहता।बाई सब कुछ उसी के हिसाब से करती थीं सुबह उठते से ही सूर्य भगवान को प्रणाम करके मंजन करना दूध पीना याद है हम बहुत छोटे थे तब भी हमें काफी कुछ याद है। उड़ीसा का बॉर्डर बरगढ़ और एमपी का बॉर्डर सरायपाली यह दो गाँव हमारा आना -जाना रहा।बाई को कई बार हमें ढूँढना पड़ता था कि हम किस घर में हैं पूरा गाँव अपना घर था, अपने ही रिश्तेदार। सारे गांँव को हमारी फिक्र रहती थी और सब की नजर हम पर रहती थी कि हमें कुछ हो ना जाए। हाई स्कूल वाले कोई टीचर रहते तो हमें अपने साथ स्कूल ले जाते और सारे स्कूल में हमारी मस्ती चलती। जिसके घर सो जाते वही घर छोड़ जाता था। याद है कि हमें सारा गांँव खिलाता था कभी-कभी सुलाने के लिए बाई को ढूँढना पड़ता था कि हम किसके घर में हैं सारा मोहल्ला हमारा घर था। पिताजी ने एक लाल साइकिल दिलाई थी पूरे गाँव में सिर्फ हमारे पास साइकिल थी और शाम के समय हम पूरे गाँव में साइकिल से घूमा करते थे हमें किसी ने साइकिल नहीं चलना सिखाई हमने खुद सीखी पहले पैडल मारना सीखा एक ही पैर से ,जब बैलेंस जम गया तो सीढ़ियों पर खड़े होकर सीट पर बैठ जाते थे । सीढ़ियों पर आकर ही उतरते थे। बारिश में कागज की नाव हमने भी खूब चलाई। बरगढ़ और सरायपाली की यादें आज भी ध्यान में हैं। उसके बाद तो फिर बाहर निकल गए 1 साल चाँपा 2 साल नागपुर 10 साल वनस्थली और 18 साल में फर्स्ट ईयर पढ़ते हुए शादी हो गई। और स्वच्छंद जिंदगी मर्यादाओं की बंधनों में बंध गई । शेष पूरी पढ़ाई शादी के बाद।लेकिन परिवार में सिखाए गए सारे संस्कार जीवन में ऐसे रच बस गए कि आज भी भुलाए नहीं भूलते।
हम भी पाँच बहने थे और भाई नहीं था हम पाँचवी में गए थे जब भाई हुआ था।अपनी शादी के बाद ही हमने उसको पहली बार राखी बांधी। उसके बाद फिर कई साल राखी लिफाफे में ही भेजी।
सच में बचपन की बात ही अनोखी रहती है सबसे अलग कोई चिंता नहीं *”बचपन हर गम से बेगाना होता है*
*ये दौलत भी ले लो,*
*ये शोहरत भी ले लो*
*भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी*
*मगर मुझको लौटा दो*
*बचपन का सावन*
*वह कागज की कश्ति*
*वो बारिश का पानी* बहुत याद आता है।
नर्मदा नदी का किनारा शादी के बाद मिला। यहाँ के घाट बहुत सुंदर हैं। घर के किसी त्योहार की हमें याद ही नहीं रथ यात्रा। सब हॉस्टल में पढ़ते हुए निकल गए। शादी के बाद ही जाना।
पद्मा जी! आपके साथ-साथ हम भी अपने बचपन में घूम लिये।
पहले के लोगों के दिलों में सभी के लिए बहुत प्यार रहता था। अपने पराए जैसी कोई बात ही नहीं थी। सारे घर अपने होते थे, सारी बस्ती अपनी होती थी। लुकाछिपी खेलते कहीं भी चले जाओ। किसी के भी घर छुप जाओ। सारा गाँव अपना था और अपन गाँव के। जाति और धर्म से कोई नाता ही नहीं था।निजाम भाई, रिजवी चाचा जी,डॉ बुआ जी। कोई भी रिश्ते ना होते हुए न जाने कितने रिश्ते थे। अपना दुख सबका दुख था और सबका दुख अपना दुख। सच में वह समय बहुत याद आ गया बचपन बहुत याद आ गया।
इस सुखद एहसास और मधुर यादों की पोटली से अपनी खुशियों को देखने और टटोलने की खुशी आपको भी मुबारक और हम सबको भी। गाँव आज भी है, पर वे लोग नहीं जिनसे यादें जुड़ी हैं। शुक्रियाआपका ,दिल से शुक्रिया पद्मा जी!
आपकी टिप्पणी पढ़ने की उत्कंठा सबसे ज्यादा होती है। नीलिमा मैम आप बहुत दिल से दिखते हैं।सहज सरल आत्मिक।
लिखते*
मैंने बनारस नहीं देखा आपके संस्मरण ने बनारस का जो चित्र मानस पटल पर उकेरा है उससे उत्कंठा और बढ़ गयी है। बहुत ही बेहतरीन लिखा है आदरणीय आपने। हार्दिक बधाई, आपकी लेखनी को सलाम।