Wednesday, February 11, 2026
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तरुण कुमार की कलम से – ब्रिटेन के प्रवासी हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत

श्रद्धा सुमन : तरुण कुमार

मित्रों, पुरवाई पत्रिका की संपादक मंडल की सदस्य एवं ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य की एक प्रेरणा स्रोत आदरणीय जय वर्मा जी का निधन 22 अप्रैल 2025 को हो गया। यह प्रवासी हिन्दी साहित्य जगत के लिये एक बड़ी क्षति है। जया जी का स्नेहिल व्यक्तित्व हम सब को उनकी याद दिलाता रहेगा। लंदन के भारतीय उच्चायोग में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी के रूप में कार्य कर चुके श्री तरुण कुमार ने जय वर्मा जी के सम्मान में एक भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। कथा यूके एवं पुरवाई परिवार उनकी सेवाओं को सदा याद करेगा।

​ब्रिटेन में हिंदी भाषा की समर्पित सेविका और साहित्य की प्रतिष्ठित रचनाकार जय वर्मा का 22 अप्रैल 2025 को निधन हो गया। उनका जन्म मार्च 1950 में मवाना, मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे एक समर्पित हिंदी सेवी, कवयित्री, लेखिका और भारतीय भाषा और संस्कृति की प्रतिबद्ध प्रचारक थीं। 

​ब्रिटेन के प्रवासी हिंदी साहित्य का इतिहास जब कभी लिखा जाएगा उसमें जय वर्मा की हिंदी सेवा और हिंदी साहित्त्य लेखन पर एक अलग अध्याय अवश्य होगा। उनकी असमय मृत्यु के साथ ही इंग्लैंड के नॉटिंघम शहर में भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य की इस प्रतिमूर्ति का मुस्कुराता चेहरा अतीत का हिस्सा बन गया है। 
जया जी के असमय निधन की खबर न केवल उनके परिजनों बल्कि उन्हें जानने वाले सभी लोगों के लिए अत्यंत पीड़ादायी है। मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो पा रहा है कि वो अब हमारे बीच नहीं हैं। 18 अप्रैल  2025 को ही उनसे लंबी बातचीत हुई थी और उन्होंने बताया था कि उनके 40 संस्मरणों का एक संकलन प्रकाशन के लिए तैयार है और शीघ्र ही वह उसे प्रकाशन के लिए भेजेंगी। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था।
पिछले वर्ष अक्तूबर माह में जब वो भारत आईं थी उन्होंने मुझसे गैरसैंण महाविद्य़ालय , चमोली में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में भाग लेने का आग्रह किया जिसे मैं मना नहीं कर सका। सम्मेलन के उपरांत उन्होंने कहा, हम बद्रीनाथ धाम चलते हैं। और फिर क्या दूर्गम पर्वत श्रृंखलाओं से होते हुए हिमालय में 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम की अविस्मरणीय यात्रा की। वह हर पल को भरपूर जीना जानती थी। तभी तो वह कहती थीं, “बस यही एक पल तो अपना है, इसे जी लेने दो।“ 

उनके निधन से व्यक्तिगत रुप से मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने कोई अपना सगा खो दिया हो। और यह अहसास केवल मेरे साथ नहीं है। मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जिनके साथ उनके आत्मीय संबंध थे, और वे सब भी ऐसा ही महसूस कर रहे होंगे। उनके व्यक्तित्व में ऐसा चुंबकीय गुण था कि वो जिससे भी मिलती थीं उसे अपना बना लेती थीं। उनके सौम्य , सरल,स्नेहिल और सहृदय व्यक्तित्व में एक अलग आकर्षण था। हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहने वाली जया जी जीवंतता और जिजीविषा से लबरेज़ थीं। वो साहित्य, संस्कृति और समाज की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहती थीं। भारत का शायद ही कोई ऐसा बड़ा साहित्यकार जो लंदन आया हो, उसने जया जी के आतिथ्य का आस्वाद ना लिया हो।
जया जी का रचना संसार काफ़ी व्यापक है। एक ओर जहाँ उन्होंने अपने ब्रिटेन प्रवास के आरम्भ के दिनों में ब्रिटेन में भारतीय बच्चों के हिंदी शिक्षण के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए; बच्चों के हिंदी शिक्षण के लिए 35  से ज़्यादा पुस्तकें तैयार की , वहीं बाद के दिनों में साहित्य की कई विधाओं में लेखन भी किया। उनकी प्रमुख कृतियों में कहानी संग्रह “सात कदम “,  काव्य संग्रह “ सहयात्री हैं हम”, और “ रिश्ते”, निबंध संग्रह “ सीमा पार से” संपादन – “ ब्रिटेन की प्रतिनिधि कहानियाँ“ जैसी पुस्तकें शामिल हैं। इन कृतियों में उन्होंने प्रवासी जीवन के द्वंद्व, अपनों से दूर होने का दर्द और पश्चिमी दुनिया में भारतीयों की स्थिति को बड़े ही प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया। उनकी रचनाएं प्रवासी भारतीयों की पहचान और उनके सांस्कृतिक द्वंद्व को सामने लाती हैं, साथ ही यह बताती हैं कि विदेश में रहकर भी अपनी जड़ों से जुड़ना कितना महत्वपूर्ण है।

जय वर्मा का साहित्यिक अवदान न केवल हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि उनका साहित्य भारतीय और ब्रिटिश साहित्य के बीच पुल का कार्य करता रहा। वे प्रवासी लेखकों के उस समूह का हिस्सा थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि से दूर रहते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति और विचारधारा को जीवित रखा।
उन्होंने अपनी लेखनी में भारतीय समाज, संस्कृति और प्रवासी जीवन की जटिलताओं को बड़े ही संवेदनशील और सटीक रूप में उकेरा। उनके लेखन में न केवल साहित्यिकता थी, बल्कि एक गहरी सोच और मानवीय दृष्टिकोण भी था, जो पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता था। जय वर्मा की लेखनी में उनकी गहरी समझ, मानवता के प्रति उनका आदर और भारतीय समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता झलकती है।उनका साहित्य न केवल भारतीय प्रवासियों के अनुभवों को समर्पित था, बल्कि यह उन सभी को प्रेरणा देने का काम करता था जो अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहते हुए नई दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं।
उनके निधन से हिंदी साहित्य को एक गहरी क्षति हुई है। लेकिन उनका साहित्य हमेशा हमारे बीच जीवित रहेगा, और उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बनी रहेगी। जय वर्मा की रचनाओं में जीवित उनका साहित्यिक योगदान हमेशा याद रखा जाएगा और उनकी विरासत लेखकों और पाठकों की पीढ़ियों को प्रेरित और प्रभावित करती रहेगी। 
तरुण कुमार
उपनिदेशक (राजभाषा)
सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली
पूर्व अताशे (हिंदी संस्कृति)
भारत का उच्चायोग, लंदन
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