Wednesday, February 11, 2026
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अंजू शर्मा की कविता – सुनो माँ

 1.
सुनो माँ  – एक 
विस्मृति की ओट में खो गये 
दो स्नेह भरे हाथों की छुअन में  
बदल गई हो तुम 
अबकी आना तो चेहरा भी साथ लेकर आना 
दुनिया भर के विष ने सोख लिया है 
वह स्नेह-कलश 
जो तुम सौंप गई थी मुझ अबोध को 
अबकी बार उसे अपनी ममता से 
लबालब भरके जाना
माँ
सुनो माँ  – दो 
जीवन भर दोहराती रही 
मैं उस सबक को 
जो तुमसे मिला ही नहीं
अबकी आना तो सबक लिखे पन्नों से 
भर जाना मेरी डायरी 
मैं हर ठोकर में 
तुम्हारी किसी नसीहत को 
कोसना चाहती हूँ माँ 
सुनो माँ – तीन 
अच्छे को अच्छा और 
बुरे को बुरा समझना सीखने में 
मैंने गंवा दिया एक पूरा जीवन 
अबकी बार आना 
तो मुझे अच्छे को बुरा और 
और बुरे को अच्छा समझने पर 
खूब डांट लगाना 
मैं समझदारी के बोझ को टांग देने के लिए 
सदा एक खूंटी की तलाश में रही
तुम वो खूंटी बन जाना माँ 
4.
सुनो माँ – चार
 
तुम्हारे झुर्रियों भरे चेहरे को 
सहलाने की चाह में 
मैं बूढ़ी होती जा रही हूँ माँ 
अबकी आना तो 
उम्र के सफ़े के कोरेपन की 
साज संभाल करना 
उसके नवीनीकरण की फ़िक्र में 
खर्च करना कुछ वक़्त  
उम्र के राशन कार्ड पर 
गिनती के बस चंद साल 
मत लाना माँ 
सुनो माँ  – पाँच 
मैंने विरासत में तुमसे पाया है 
अपना स्नेहिल और 
घुलमिल जाने वाला स्वभाव
सुनती आई कि इतने स्नेह भरी थीं तुम
कि तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आता था 
जाने आंचल के ठोक से 
कितनी बार बांधे होंगे तुमने 
क्रोध भरे पल
अबकी आना तो ऐसे बन्धनों से 
मुक्त होकर आना माँ 
तुम्हारी लोरी से ज्यादा मैं तुम्हारी डांट 
से सिहरना चाहती हूँ 
6.
सुनो माँ – छह 
वूली की उस चटख गुलाबी साड़ी 
में मैं नथुना भर तलाशती थी तुम्हारी गंध 
अधबनी कलाकृतियों में गढ़ती रही 
तुम्हारा धुंधला चेहरा 
रेशम के उस अधकढ़े रुमाल में लगी 
छोड़ गई थीं तुम एक जंग लगी सुई 
वो सुई मेरे कलेजे में धंस गई है माँ 
अबकी आना तो निकाल फेंकना उसे 
मेरे हाथ भरे हैं तुम्हारी छोड़ी 
अनपढ़ी किताबों से 
7.
सुनो माँ – सात 
अनपढ़ी किताबें,
अधूरी कलाकृतियाँ,
अधूरा बना एक बैग
और अधूरी पेंटिंग
अधूरेपन की बासी गंध
से सना है तुम्हारा संदूक 
जिसे सब देखकर आगे बढ़ गये 
एक मैं हूँ जो देर तक 
उसमें सूंघती रही 
अधूरे रिश्ते, 
अधूरे सपने
अधूरी ममता और 
अधूरी उम्र
पीछे छूट गये विदा में हिलते नन्हे हाथ
शिकायत करते हैं
तुम्हें ठीक से विदा कहना भी नहीं आया माँ
8.
सुनो माँ – आठ 
जिनकी माँएं होती हैं जिद्दा जाते हैं 
वे बच्चे 
ठुनकते हैं छोटी छोटी बातों पर 
रूस कर लौटते हुए जमीन पर 
धुल धूसरित हो जाते हैं दिन में चार बार 
मेरे शफ्फाक कपड़ों पर 
धूल का एक भी कण नहीं 
मैं एक धूल भरी फ्रॉक में एक दोपहर 
तुमसे पिटना चाहती हूँ माँ
अपने कोसने मेरी ज़िद के लिए 
बचाकर रखना 
9.
सुनो माँ – नौ
मेरे चेहरे को मिला तुम्हारा चेहरा
देह को तुम्हारी इकहरी देह 
स्वभाव को मिली एकान्तप्रियता 
और मन को मिली 
तुम्हारी अवसाद भरी चुप्पी 
मैं मन को खोलने की जुगत में
बिताती रही दिन महीने साल 
अपनी बेटियों को बचाते हुए उस जुगत से 
मैं मरने से पहले खोल देना चाहती हूँ वह ताला
मन के ताले पर लगी चाबी को 
कहाँ छुपाया तुमने माँ 
10.
सुनो माँ – दस  
मैंने माँ की मृत्यु के भय से कांपते 
एक पुरुष को देखा है माँ 
देवता बनकर स्मृतियों में टंगी 
एक शास्वत तस्वीर सी  
तुम मेरे लिए अमर बन कर रही हो 
जीवन में एक बार 
तुम्हें खो देने के भय से  
थर-थर काँपना चाहती हूँ मैं
अबकी मृत्यु को सात तालों की 
काल कोठरी में 
बंद करके आना माँ 

अंजू शर्मा
संपर्क – [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. माँ के लिए चाहे जितना भी लिखा जाए अंजू जी! कम ही होता है।
    बेहद मार्मिक कविताएँ हैं माँ पर। कुछ शिकायतें कुछ उलाहना, कुछ चाहतें।
    बधाई आपको।

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