तुम बस करो…अनुजीत इकबाल की कविता पढ़ी अच्छी लगी लिखा है
तुम मुझे रूपांतरित करो
जैसे हिमालय करता है
हर अनंत के यात्री को
सहज
अपने मौन के अनुशासन से….
मौन एक अनुशासन है और प्रेम एक बंधन है
दोनों में समानता लगती है कविता में अच्छी है तुलना की है अभिनंदन
तुम बस करो…अनुजीत इकबाल की कविता पढ़ी अच्छी लगी लिखा है
तुम मुझे रूपांतरित करो
जैसे हिमालय करता है
हर अनंत के यात्री को
सहज
अपने मौन के अनुशासन से….
मौन एक अनुशासन है और प्रेम एक बंधन है
दोनों में समानता लगती है कविता में अच्छी है तुलना की है अभिनंदन