जागती हूँ मैं,
जब शहर सो जाता है,
लैंप की रौशनी धुंध में घुल जाती है
और पहाड़ों की चोटी पर
चाँद अपना अकेलापन उतारता है।
मुझे पहाड़ पसंद हैं,
उनकी धीरता, गंभीरता
उनकी ख़ामोशियाँ, ऊँचाइयाँ,
जैसे हर चोटी कोई सपना हो
जो अब तक किसी ने पूरा नहीं किया।
जागती हूँ,
कि मुझे रात पसंद है!
उसकी ख़ामोशी, उसकी ठंडी साँसें,
और वो पहाड़, जो अँधेरे में भी
अपनी ऊँचाई नहीं छोड़ते।
जागती हूँ,
कि दिन बहुत शोर करता है
चेहरों पर नक़ाब होते हैं,
ख़ुशियों पर पर्दे।
पर रात?
रात खोल देती है बिन पूछे
दिल की गिरहें सभी।
जागती हूँ,
कि रात की रौशनी में
हर चीज़ सच्ची लगती है—
तुम भी, मैं भी…
और वो मुस्कानें भी,
जो दिन में खो जाती हैं।
जागती हूँ,
क्योंकि ख्वाब आँख बंद करके नहीं,
मन खोलकर देखे जाते हैं—
और मेरी आंखों में
अब भी कुछ पहाड़ बचे हैं,
चढ़ने के लिए।
जागती हूँ,
क्योंकि चाँदनी में कुछ ऐसा है
जो दिल से बातें कर जाती है,
बिना शोर किए।
जैसे कोई पुरानी याद,
धीरे से दस्तक दे।
जागती हूँ,
क्योंकि कभी-कभी,
नींद से भी ज़रूरी होता है
खुद से मिलना।
अच्छी कविता है भावना जी! रात को जागने कारण कभी-कभी जायज रहते हैं।
धन्यवाद नीलिमा जी।
बढ़िया भाव
धन्यवाद प्रगति जी।