धरती पर सृष्टि द्वारा
प्राणी जगत के सुचारु चलन में
प्रकृति-निर्धारित एक खाद्य-श्रृंखला रहती है।
जंगल में बहुधा जमीनी स्तर पर
अचल, असहाय वर्ग से वनस्पति ही
इसमें सब से निचली पायदान पर रहती है।
और फिर क्रमवार,
सूक्ष्म प्राणियों के पेट से शुरू हो,
जाल बुनती मकड़ियों;
जीब लपलपाते गिरगिटों;
झपटते चील-कव्वों;
मुंह फाड़ते भेड़ियों-लकड़बग्घों
से ऊपर उठ
गाय-भैंस जैसे विशालकाय शाकाहारियों
को फलांगने के बाद
सीधा जंगल के राजा बाघ के
पैने पंजों की पकड़ से गुजर
उसके खूंखार जबड़ों में जा फँसती है।
सभ्य मानव समाज में भी यह श्रृंखला,
समांतर रूप में,
निर्बल, निरीह प्रजा से चल
स्वंय-सेवी पदाधिकारियों ;
ठग दलालों; दबंग दारोगाओं;
निरकुंश बाहुबलियों से गुजर कर
जा रुकती है आखिर में –
अवसरवादी नेताओं-राजनीतिज्ञों के मुंह में,
उनकी लपकती जुबान पर-
जिससे वह कुतरते हैं
समाज की सामंजस्यपूर्ण सरंचना,
चाट खाते हैं उसके विश्वास को
और निगल लेते हैं उसकी सम्पदा
अपना विशाल पेट भरते-भरते।
आदरणीय विमल सहगल जी!
आपकी कविता पढ़ी। आक्रोश के आह्वान का स्वर है इसमें। वर्तमान का कड़वा सच! बेहद सामयिक सृजन।
बहुत गहरा अर्थ लिये हुए है आपकी यह कविता सर जी! प्रगतिवाद का सा आभास हुआ। इस समय तो जनता ही दलित और शोषित महसूस हो रही है।
खाद्य श्रृंखला के माध्यम से छोटी वनस्पति और मकड़ी के जालों से शुरू होकर बड़े जानवरों से होती हुई बाघ के जबड़ों तक पहुँची।
इस प्रतीकात्मकता के द्वारा, इसी के समानांतर आपने निर्बल और निरीह प्रजा को घरेलू, पालतू निरीह शाकाहारी पशुओं को बाघ के जबड़े तक पहुँचाकर उनके बरक्स क्रमश: स्वयं सेवी पदाधिकारी, ठग दलालों ,दबंग दरोगाओं, निरंकुश बाहुबलियों, की क्रमबद्धता में अंत में नेताओं और राजनीतिज्ञों को बाघ के मुख का रूपक देते हुए स्थिति की सच्चाई को बताने की कोशिश की है। जिनके द्वारा समाज की सामंजस्य पूर्ण संरचना नष्ट हो रही है ।जनता का विश्वास खत्म हो रहा है ।उनका सारा धन राजनेताओं के पेट में समा रहा है। सब समझ रहे हैं सर जी! लेकिन बस वही नहीं समझ पा रहे जिन्हें समझने की सबसे अधिक जरूरत है!
बहुत दिनों के बाद एक क्रांतिकारी सी कविता पढ़ने को मिली। बहुत अच्छा लगा। इस बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।