Monday, March 9, 2026
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दीक्षित राज बोहरा की कविता – जिंदगी का सफर

जिंदगी के सफर का यही है पैगाम
ऊपर नीचे होना है मेरा काम
बस ढूंढते अपने मंजिल के रास्ते
और बनाते हुए उसे एक मुकाम, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||1||
इस दुनिया की कुछ अलग ही है पहचान
कहने को तो हम कईयों को जानते हैं
मगर आस पास नहीं होता कोई इंसान
इस सच्चाई को सब मानते हैं और फिर भी, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||2||
इस जिंदगी की कैसी है यह माया
हर तरफ कभी मौन तो कभी आतंक है छाया
चल तो नहीं रहे हैं किसी के भी जुबान
पर बात कईयों से करते हुए, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||3||
सफर में कभी मिलता है अपना
तो कभी हमें मिलता है कोई पराया
और उस मुकाम की घड़ी में खुद को
भूलकर, साथ देते हुए उनका, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||4||
चिंता के साथ साथ दिल में दर्द है
और चेहरे पर ऐसी छाई है मुस्कान
जैसे कि हम खुद के ही हमदर्द है
और बनाके इसी को अपनी पहचान, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||5||
मैं नहीं जानता की यह
अंग्रेजी का लिखा ‘सफर'(SUFFER) है या
हिंदी का लिखा ‘सफर’ है पर मान के
इसे जिंदगी का सफर, हम
बस चले ही जा रहे हैं |
बस चले ही जा रहे हैं ||6||

 

 

दीक्षित राज बोहरा
बैंगलोर
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