Wednesday, February 11, 2026
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नरेंद्र कौर छाबड़ा की कविता – कितना अच्छा हो!

कितना अच्छा हो
जब उगते सूर्य की नर्म, मुलायम ,गुनगुनी किरणें
मेरी खिड़की के रास्ते भीतर आ
बिस्तर पर लेटे मेरे शरीर को
प्रेम, स्नेह से हौले से स्पर्श करें
हल्के से झकझोरें और कानों में कहें
उठो बच्ची, सवेरा हो गया
दुनिया काम पर लग गई
तुम भी करो शुरू दिनचर्या.
कितना अच्छा हो
जब हम दोनों साथ-साथ जागें
साथ-साथ करें सैर, योग, ध्यान, प्राणायाम
हल्का होने के लिए फिर लें
चाय की चुस्कियां
फिर मसालों की सुगंध से
मैं महका दूं अपनी रसोई
और तुम करने लगो ऑफिस की तैयारी.
कितना अच्छा हो
ऑफिस के काम से
पल भर के लिए फारिग होते ही
तुम फोन करो- कैसी हो ?
क्या कर रही हो ?
स्नेह से पगा यह एक वाक्य ही
मन के भीतर जल तरंग सी
संगीत लहरियां पैदा कर जाए
और रोम रोम आनंद से भर जाए.
कितना अच्छा हो
रात को घर के खुले आंगन में
अपने अपने बिस्तर पर लेटे
चांद तारों की अठखेलियां,
शीतल, मृदुल प्रकाश देख
हम आह्लादित होते रहें
फिर हाथों में हाथ डाल रात भर
इंद्रधनुषी स्वप्निल दुनिया में विचरते रहें
विचरते रहें सवेरा होने तक
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