पहले
अपनी चोंच मे स्याही थामे
कोरे कागज़ पर
कितना कुछ लिख देती थी वो कलम
शब्दों में और शब्दों के बीच मे भी
और काग़ज़ पर समूची बिरादरी से हो जाती थी
दुआ सलाम
और जीभ से गीला कर
सबके संदेश बंद कर दिए जाते थे।
और डाल आते थे उस बड़े से लाल बक्से में
बहुत देर तक बच्चे
निहारते थे उस पेटी को
और
सोचते थे के कैसे
पहुँच जाते है पत्र
दूर… बहुत दूर !
ज़रूर लाल पेटी के नीचे कोई सुरंग होगी
दूर गाँव मे जब
चिट्ठी लेकर डाकिया आता तो
उसके पीछे
सब भागते थे
छेड़ते थे,
मेरी आई है तेरी नहीं
और पूछते थे हाल लिखने वाले का कब आएगा
सात हाथों से गुजर कर पहुँचती थी चिट्ठी
इतना सब कुछ लिए हुए
जिसे युगों युगों तक बाँचा जाता था
जो बांधती थी दोस्तों को और रिश्ते दारों को
..
बदल गई है चिट्ठी
नए ज़माने की हवा उड़ा कर ले गई
और थमा गई है
ये मोबाइल फ़ोन
इसमे आते हैं संदेश
व्हाट्स एप – इनस्टाग्राम
सुबह सवेरे हज़ार दो हज़ार
जिन्हे लाइक किया जाता है
और फिर विसर्जित कर दिया जाता है
बस एक बटन दबा कर
दोस्ती और रिश्तेदारी हो गई हैं कुछ ऐसी
और हम बन कर गए हैं
एक ब्लैक होल!
वाह निखिल जी , एक सच्ची कविता पढ़ने मिली।
पत्र शीर्षकसे मेरी एक कविता ‘अंतर्देशीय पत्र ‘भारत के उच्चायोग लंदन से प्रकाशित पत्रिका (भारत )में प्रकाशित हुई थी 2023 में ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra
वाह निखिल जी , एक सच्ची कविता पढ़ने मिली।
पत्र शीर्षकसे मेरी एक कविता ‘अंतर्देशीय पत्र ‘भारत के उच्चायोग लंदन से प्रकाशित पत्रिका (भारत )में प्रकाशित हुई थी 2023 में ।
साधुवाद
Dr Prabha mishra