ये ख़्वाहिश,
कि आंख खुले,
और तुम महसूस हो
शायद ना पूरी हो सके…
मगर क़ब्र पर आकर
एक बार सुबह-सवेरे
नूर से पहले
चुपके से
क़ब्र को मेरी
‘तुम’
चूम लेना
माथा टिकाना
पर
आंसू ना बहाना…
कर्ब ना मुझे
महसूस होने देना
अपनी प्यारी
सी
हंसी, हंसते हुए
लौट जाना
और
फिर कभी ना वापस आना।
हमारी कब्रों के
निशानात
मिटा दिए जाते हैं
कि प्यार
करने वालों के आंसू
रायेगां ना जाएं।।
(कर्ब – बेचैन, ग़मगीन) (रायेगां – बेकार)


यह कविता बिछड़ने के बाद की अंतिम आकांक्षा को बड़े शांत और मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।
इसमें प्रेम, विरह और आत्मीय स्पर्श की इच्छा बेहद कोमल भाषा में उभरती है। कविता लिखने वाली मृत्यु के बाद भी अपने प्रिय के स्नेह को महसूस करने की लालसारखती है।
कविता का स्वर दर्द से भरा है, पर उसमें एक गहरी मुस्कुराती हुई स्वीकृति भी है।
अंत में यह रचना बताती है कि प्यार मिटता नहीं,बस यादों में बस जाता है। अच्छी कविता l स्वागत कविता का l
जकिया जी
नमस्कार
आपकी कविता प्रेम का सूक्ष्म स्पर्श है।
कवि मन की बेहतरीन और संवेदनशील अभिव्यक्ति है ।
साधुवाद पुरवाई में प्रकाशन हेतु
Dr Prabha mishra
https://www.thepurvai.com/poem-of-zakia-zubairi/
आदरणीया ज़किया दीदी!
सबसे पहले आपकी प्यारी सी मनमोहिनी आकर्षक मुस्कान के लिए आपको बधाई।
आपको कविता में पहली बार पढ़ा।
समझ ही नहीं आ रहा क्या कहें कविता के लिये।
मृत्यु जीवन का कटु सत्य है। और उतना ही कीमती है जीवन में स्थित प्रेम! इंसान भले ही स्वयं की मृत्यु से न घबराते हों लेकिन प्रेम का वियोग तकलीफ देता है।
कवि-मन तसल्ली दे रहा है अपने प्रेम को हँसते हुए लौटने के लिये।
पर दीदी! प्रेम की इस प्रकृति का निर्वाह करना प्रेम के लिए सरल नहीं होता। आँसू खुशी में तो मुश्किल से निकलते ही हैं लेकिन दर्द में तो बिना बुलाए ही बरस पड़ते हैं।
आँसुओं का परिचय दर्द की भाषा से ज्यादा है।
वह तो बस राधा की ही अनन्य ताकत थी जो कृष्ण के वियोग में उसने एक भी आँसू नहीं बहाकर कृष्ण के वचन को निभाया।
पर प्रेम इंसानो के लिये
संयम की परीक्षा है, फिर रिश्ता चाहे जो भी हो। फिर अपनी प्रिय का रिश्ता तो महत्वपूर्ण है।
आप हम सबके लिए आदर्श और प्रेरणा हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सदा स्वस्थ रहें और हम सब यूँ ही आपकी मनमोहक मुस्कान और आपकी स्नेह की छाया तले निर्विघ्न रहें।
कविता के लिए तो आपको बहुत-बहुत बधाई।
समूह की प्यारी सी दीदी को पढ़वाने के लिये तेजेन्द्र जी एवं पुरवाई के संपादकीय मंडल का तहेदिल से शुक्रिया!
वाह क्या खूब बंया किया है,
मौत के बाद का किस्सा
कुछ अपने हिस्से का
कुछ गैरों के हिस्से का।
कभी मुहब्बत थी
तो तुम्हें दिल में रख लिया
अब कब्र हैं
सो सब्र कर लिया।
आपकी रचना को देख चंद सतरें
दिल से लब तक आईं और बयां
भी हुईं।
बस यूं
सूर्यकांत शर्मा
वाह प्रिय जकिया दी हृदयस्पर्शी कविता
जिन्हें प्यार करता है यह दिल कभी नहीं देख पाएगा उनके आंखों में आंसू ,इसीलिए फना होने के पहले ही कह देते हैं, हमारी कब्र पर आना मगर आंसू ना बहाना क्योंकि रूह तो रहेगी जिस्म ना होगा, हम तुम्हें छूकर कह न सकेंगे,रूह तड़पती है रो ओ मत
प्यारी सी हंसी बिखेरते हुए वापस चले जाओ
बहुत सुंदर हकीकत बयां करता सच्चा प्रेम भरे दिल की आवाज
को कवयित्री प्रिय जकिया जी ने बहुत खूब उकेरा
नमस्ते जकिया जी, बहुत ही मासूम और पाकीजा सी ख़्वाहिश है इस कविता में जो दिल को आहिस्ता से छूकर आंखों को पुरनम कर देती हैं।