1 – बारिश
पहली बारिश हुई
अंतर्मन में झनझनाहट हुई,
विचार बाहर निकलकर भीगने लगे
फटी कथरी की तरह
विचार, कविता बुनने के लिए
दौड़ने लगे,
कविता सिर्फ शब्दों की तहकीकात नहीं करती
कविता गुर्राती है व्यवस्था पर
विचारों की झनझनाहट में,
जैसे सदियों से रोंदी हुई घास की तरह
बोथरापन आ गया
बाहर देखती हूं तो
पहली बारिश
युवती की तरह,
सुंदरता से आवेशित है
पर मैं अंधी गुफाओं में
विचारों को अंकित कर रही
रहस्यमयी बारिश की तरह,
और एक दिन गुर्राती हुई
कविता झपट पड़ती है सब पर,
घनघोर बारिश की तरह।
2 – बसंत
हर साल बसंत होता है
हल्की फुल्की बारिश आती है,
प्रेमिका जब आती है
तो मौसम और भी हरा हो जाता है ।
देती है वह हौंसला
मेरे गीतों को,
मैं रहा था तड़प
मेरी वेदना तप रही थी ।
उससे मिलता है
मेरी वेदना को इत्मीनान,
मैं परेशान हुआ की
मौसम मदहोश हुआ
वह मेरे सपनों को
बुनती नजर आती है,
और मैं तनाव में
सूर्य की आखिरी किरण को
देखता हुआ ।
जो मेरी उम्मीदों को
और अधिक तीव्र कर देती है,
मैं गर्व से उसको बुलाता हूं
दूर से हाथ हिलाता हूं ।
वह मुझे एक जीवन के बदले
दूसरा देती है,
मैं अपनी कविता के शब्दों को
और उसको प्रेम से सहलाता हूं।
3 – जीवनसाथी
काश ! होते तुम उस समय भी
जब माँ मुझे घंटो घंटो
पुस्तक लेकर बैठाती थी,
मैं किताबों की दुनिया में
ढूंढती उस दुनिया को,
जो मुझे आनंद से सरोबार कर दे
मेरे जीवन को रोशनी से भर दे
काश ! होते तुम उस समय
जब मैं मंदिर में भगवान के सामने
एक भोला मासूम चेहरा लिए बैठती,
माँ मेरे दोनों जोड़े हुए हाथों को
ठीक मुद्रा में करवाती
हां ! तुम होते उस समय
जब मैं छोटी सी स्कर्ट पहनकर विद्यालय जाती,
मां मेरी दो चोटियां बनाती
और मैं उनको वापस बिगाड़ देती
तब मैं तुमसे मिलती
तो तुम देखते
मेरा जुनून पढ़ने का,
प्यार किताबों से,
पागलपन उस पढ़ाई के कमरे का,
भूत सवार जीवन को संवारने का
काश ! तुम मिलते
मुझसे उस समय।

