धीरे-धीरे होता है सब
जैसे-
दीमक कुतरते हैं दीवारें
सब रेत गारा ईंट को
ढहा देते हैं।
कठफोड़ा चोंच के वार से
खोखर बना देता है
जमे हुए दरख़्त के
फैले हुए तने।
बहुत सावधानी से
शब्द उतरते हैं
सम्बन्धों की बिसात पर।
अट्टहास लगा
कटु मुस्कान से
चलते हैं चाल!
धीरे-धीरे होता है सब…
2) गोमुख
किसने कहा-
चट्टानें,
अडिग-अटल
निश्चल खड़ी रहती हैं।
तुमने देखी नहीं-
इसके भीतर ही भीतर
खोखली हुई गुफा
जो बर्फ़ जमी माघ की रातों में ठिठुरती हुई
अपनी कोठरी में रोती है।
तभी तो,
इसकी देहली से
अनन्त जलधाराएँ बहती हैं।
किसने कहा…
3) चाह…
जैसे उगती है धरती
आदमी के भीतर
उगते हैं रिश्ते !
कहीं महक उठे
जैसे गुलाब जल छिड़का हो
कहीं कैक्टस की बाड़
छूते ही हाथ लहुलूहान।
मैं बिलकुल निर्लिप्त होना चाहती हूँ!
4) मध्यान्तर के बाद
पत्थरों को संवेदना देती है
उनकी दरारों में दबी मिट्टी
जहाँ उग आती है दूब
चट्टानों के अस्तित्व को ललकारती।
बिलकुल कोमल और हरी
सिर उठाये खड़ी रहती है
एकदम निडर।
कड़वे दायरों के बीच
खुद खोजने पड़ते हैं चश्मे-
मीठे पानी के।
उघाड़ना पड़ता है
उन दरवाज़ों को
जो सदियों से बन्द हैं।
खिड़की से बाहर हाथ फैला-
देह सेंकने को,
उतारनी पड़ती है
हथेली पर धूप।
अपने आप कुछ नहीं होता।
5) शब्द-आन्दोलन
आज एक अच्छी खबर आई है-
सुना है-
शब्दों ने आन्दोलन कर दिया
‘आप कुछ भी अर्थ लगाते हैं हमारे!
हम हल्के-फुल्के
उड़ते हैं कहीं भी
बैठ जाते हैं
पेड़ की फुनगी पर
कोयल के गले में उतर जाते हैं
तार के साथ-
सुर मिला बजने लगते हैं।
कोई हल्के से छुए…
तो आँखों से टपक पड़ते हैं।
आप हमें पकड़
एक जगह बिठा
जड़ बना देते हैं!
भरी-भरकम
गूढ़ रहस्य-सा।
और हमारे मायने ही
बिलकुल गलत लगाते हैं’
सुना है-
आज शब्दों ने आन्दोलन कर दिया।
6) धरती
मैंने भागती रेल से
धरती देखी
मुझे बिलकुल आदमी-सी लगी।
कहीं विराट
कहीं धँसी हुई
कहीं भरे हुए रंग
कहीं सपाट पड़ा बंजर।
चेहरे की किसी लकीर में
हरा और पीलापन
और कहीं सूखा दरख़ता दर्द
कहीं टीलों पर पाँव रख
आसमान छूती
और कहीं घाटियों में गिर
अपनी पहचान खोती ।
मैंने भागती रेल…
चित्रा देसाई
दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए.(राजनीति शास्त्र),एल.एल.बी.करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में वकालत।
मुंबई विश्वविद्यालय से आल्टरनेटिव डिस्प्युट रिजोल्यूशन। एस.एन.डी.टी.विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज और अन्य कई विभागों में गेस्ट फैकल्टी से जुड़ी रही।
‘टाइम्स फाउंडेशन’ और ‘महाराष्ट्र लीगल सर्विस अथॉरिटी’ के साथ लीगल लिटरेसी अभियान से जुड़ी।
अपने क्षेत्र में मैंग्रोव्स, झील संरक्षण और अन्य पर्यावरण मुद्दों में सक्रिय योगदान।
पूर्व सदस्य–
राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार निर्णायक मंडल
केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाण बोर्ड
राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय सलाहकार समिति
विदेश मंत्रालय हिन्दी सलाहकार समिति
दो कविता- संग्रह प्रकाशित
‘सरसो से अमलतास’ और ‘दरारों में उगी दूब’।
‘सरसों से अमलतास’ के लिए अनेक पुरस्कारों के साथ ‘महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार’।
साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी साहित्य उत्सव तथा सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी
मनुष्य और प्रकृति के बीच एक तादात्म्य स्थापित करती, जीवन के गूढ़ सत्य को सहज सरल बानी में खोलती, हौले से भीतर की ओर एक पगडंडी बनाती उतर जाती हैं चित्रा की रचनाएं।
और पाठक हर एक भाव की ऊष्मा को महसूसता चलता है।
बहुत सुंदर रचनाएँ चित्रा, बधाई…
मुझे चित्र जी की कविताएँ बहुत पसंद हैं । आभार इन्हें पढ़वाने के लिए
मनुष्य और प्रकृति के बीच एक तादात्म्य स्थापित करती, जीवन के गूढ़ सत्य को सहज सरल बानी में खोलती, हौले से भीतर की ओर एक पगडंडी बनाती उतर जाती हैं चित्रा की रचनाएं।
और पाठक हर एक भाव की ऊष्मा को महसूसता चलता है।
बहुत सुंदर रचनाएँ चित्रा, बधाई…