तुलसी सी तुम तुम आंगन में जब रहती थीं, हरा-भरा मन आंगन था। लुटिया के गंगा जल सी तुम, भीतर सबकुछ शीतल था। धूप सुगंधित शब्द तुम्हारे, हर पीड़ा हर लेते थे। दीप तुम्हारे ज्ञान कोष का, तम को छू-मंतर करता था। लाल सिंदुर की रेखा सी तुम, भाग्य हमारा बनती थी। परिक्रमा भर ही से तो देखो, हर मुश्किल हल होती थी। तुम थी प्रात प्रभाती अपनी, लोरी थी रजनी वाली। प्राणवायु तुम थी हम सबकी , अब घुटन हर पहर हर क्षण है। जीवन चौरा तुम बिन सूना , तुलसी बन आ जाओ ना। वास्तु दोष मिटा दो सारे, बन आशीष छा जाओ ना।
(2)
“लो संकल्प ज़रुरी है यह” आज लें संकल्प ऐसा, साँस को हम आस देंगे, रोपकर पौधा धरा पर, कुछ तो पावन ही करेंगे। डाल पर कुंजन खिलेगी, मुंडेर पर चिरई मिलेंगी, प्राण वायु फिर शुद्ध होगी, हर मनुज फिर स्वस्थ होगा। हैं करोड़ों हम यहाँ पर , एक – एक करें प्रयास , पर्यावरण रक्षक बनेंगे, न कि देंगे और त्रास।
(3)
तुम जीवन में आते तो, पतझड़ मधुमास मुझे लगता। तुम संग संग मेरे पग धरते, तो ऊसर भी मधुबन लगता। तुम मुस्काते खुशियों में मेरी , तो गरल सुधा रस बन जाता। तुम थाम जो लेते तम में मुझको, हर अंधियारा सूर्य किरन लगता। एक बार सुनो ये विचार करो, मत ऐसा अत्याचार करो, न राम बनो,न मधुसूदन, मन के विश्वास बनो फिर से, आओ न इस ठौर रहो, मैं वही तुम्हारा जोगी मन, हे ईश! तुम्हारा अभिनन्दन। हे ईश ! तुम्हारा अभिनन्दन।।
डॉ गीता द्विवेदी
शिक्षा- एम ए, बी एड , पीएचडी ( अवधी लोकसाहित्य में जातिगत संस्कृति) लखनऊ विश्वविद्यालय
सम्प्रति – विभिन्न प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन |
आपकी पहली कविता स्मृतियों के झरोखे से वियोग की पीड़ा है।
संभवतः यह कविता माँ या माँ के समकक्ष किसी के लिये लिखी गई है।
एक ऐसी स्त्री, जो सारे घर को संभालती है। उसके पवित्र मन और पवित्र कर्म से घर मंदिर बन जाता है और उसके जाने से मानो घर खाली हो जाता है। कविता काफी मार्मिक है।
आपकी दूसरी कविता पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति सचेत करती हैं
साँसों को जीवंत रखने के लिए ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों का रोपण करें तो ऑक्सीजन मिलेगी, वातावरण पवित्र होगा, और जो चिड़ियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो रही है उनको उन्हें ठौर मिलेगा।
आपकी पहली कविता स्मृतियों के झरोखे से वियोग की पीड़ा है।
संभवतः यह कविता माँ या माँ के समकक्ष किसी के लिये लिखी गई है।
एक ऐसी स्त्री, जो सारे घर को संभालती है। उसके पवित्र मन और पवित्र कर्म से घर मंदिर बन जाता है और उसके जाने से मानो घर खाली हो जाता है। कविता काफी मार्मिक है।
आपकी दूसरी कविता पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति सचेत करती हैं
साँसों को जीवंत रखने के लिए ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों का रोपण करें तो ऑक्सीजन मिलेगी, वातावरण पवित्र होगा, और जो चिड़ियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो रही है उनको उन्हें ठौर मिलेगा।
तीसरी कविता प्रार्थना स्वरूप लगी।
तीनों ही अच्छी कविताओं के लिए आपको बधाई।