Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. जया आनंद की कविताएँ

1 – अंतरिक्ष
एक अंतरिक्ष
मेरे भीतर भी समाया
मन वहॉं चक्कर लगाता
कभी ऊर्ध्व गति
कभी अधोगति
अन्दर बैठे ग्रह नक्षत्रों से
ताल मेल बिठाते- बिठाते
कभी हो जाता हताश
लगता भटकने दिशाहीन
तब मस्तिष्क के संकेतों को चीन्ह
भर उच्छ्वास पा जाता जीवन की लय
और गुंजित होता
सत्यं शिवम् सुंदरम् का अनहद नाद
2 – तुझ संग ऐसी प्रीत निभाई
तुझ संग ऐसी प्रीत निभाई
राधा से मैं हुई कन्हाई
रसमय हुआ था जीवन तुमसे
संगीत फूट रहा था कण-कण से
सहेज लिए ये क्षण मन में
विकल हृदय औ सजल नयन में
तुम्हारी छवि ही थी समाई
आओगे जीवन में मेरे
हर लोगे सब दुःख घनेरे
बहा दोगे संगीत की सरिता
जीवन बनेगा सुन्दर कविता
पर यह सब था स्वप्न सरीखा
..तुम तो थे निमग्न अपनी ही पीड़ा में
बाँध लिए थे बहुतेरे बंधन अपने संग में
नहीं कर सकती कोई तुमसे कामना
बस है मन की यही प्रार्थना
मधुमय पावन हो तुम्हारा जीवन
हर पल हर क्षण हो सुखदाई
तुझ संग ऐसी प्रीत निभाई
राधा से मैं हुई कन्हाई
3 – 
कुछ भी तो भूलता नहीं

कुछ भी तो भूलता नहीँ
बस समय के चक्र में
पीछे छूट जाता है
दब जाता है कहीं
मन के कई परतों के नीचे,
जीवन के कोलाहल से दूर
एकांत के क्षणों में
मन उलीच देता है
जिया हुआ हरेक पल
खिलते हुए दिन
बिसुरी हुई रातें
अलसायी दुपहरी
लरजती शामें
दुःख की गाँठे
सुख के बंधन
रुदन के गीत
जीवन का संगीत। …
कुछ भी तो भूलता नहीं
फिर बोलो कैसे भूलूँ तुम्हें !!
4 – कविताएँ
कविताएँ
मन को करती हैं स्पंदित
रोज की उठापटक में
एक रसता को तोड़ती हुई
संवेदना का करती हैं सिंचन
और जीवन फिर हरा- भरा
नव कोपल सा प्रतीत होता है
लेकिन जब कविताएँ
होती हैं उच्चरित
बहुत ऊँचाई से
क्यों प्रतिध्वनित
होता है मात्र दंभ!!
कवयित्री
डॉ जया आनंद
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3 टिप्पणी

  1. डा जया आनंद जी की सभी कविताएं काफी अच्छी हैं। बहुत बहुत बधाई।

  2. जया जी!

    सर्वप्रथम आपकी प्यारी सी मधुर, मनोहर, मुस्कान के लिए आपको बधाई।
    आपकी कविताओं में भक्ति भावना का अहसास हुआ।

    अंतरिक्ष कविता में एक नई कल्पना दिखाई दी। वैसे भी सारे ग्रह नक्षत्र मनुष्य के जीवन से जुड़े हुए हैं जो जीवन के उतार-चढ़ाव और गति को निर्धारित करते हैं जिसके फल स्वरुप इंसान सुख और दुख में झूलता है।
    और जब परेशान हो जाते हैं तो ईश्वर की शरण में जाता है।

    दूसरी कविता भी कृष्ण-भक्ति भाव से ओतप्रोत है।

    तीसरी कविता वियोग के पलों की यादें हैं। निश्चित रूप से इन्हें भूलना मुश्किल है।

    चौथी कविता कविताएँ शीर्षक से है।
    कविताओं में जीवन के सभी रस समाये हुए हैं।
    नीचे की पंक्ति-
    *लेकिन जब कविताएँ ,*
    *होती हैं उच्चरित,*
    *बहुत ऊँचाई से*
    *क्यों प्रतिध्वनि*
    *होता है मात्र दंभ!*
    इन पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लगा कि शायद यह बड़े कवियों को लक्ष्य करके लिखा गया है।
    जिन्हें अपने लेखन पर अहंकार हो जाता है। और भी अपने से नीचे देखना भूल जाते हैं।

    अच्छी कविताएँ हैं आपकी। बधाईआपको।

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