Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. नवीन कुमार जोशी की कविताएँ

स्वयंसेवक
त्याग, समर्पण और यह निष्ठा,
किसी से ना बतलाता है।
भीतर मन मंदिर में राष्ट्र को,
पूजित ही करता जाता है।
तभी तो जग में एक अनोखा,
स्वयंसेवक कहलाता है।
कभी बाढ़ में बने ढाल यह,
दु:ख, दर्दों में बने जाल यह।
विरोधियों की बातें तानों को,
हँसकर तार ही जाता है।
सुकर्मों से बनी राह पर,
सेवक की भांति चलता है।
तभी तो जग में एक अनोखा,
स्वयंसेवक कहलाता है।
स्वयंसेवक एक राष्ट्र मान है,
जिसे कभी ना अभिमान है।
मैं न रहूं, यह राष्ट्र रहे,
यही तो उसका परम ज्ञान है।
ज्ञान बीच इस स्वाभिमान से,
सूरज की भांति तपता है।
तभी तो जग में एक अनोखा,
स्वयंसेवक कहलाता है।
स्वयंसेवक एक आत्म रूप में,
रहता हर इंसान के भीतर।
चिंतन, मनन से जागृत होकर,
राज ह्रदय पर करता है।
राष्ट्र पूजित इस हवन कुंड में,
हर रोज आहुति देता है।
तभी तो जग में एक अनोखा,
स्वयंसेवक कहलाता है।
नजरिया चौंका गया
नजरिया चौंका गया,
दिल पागल बहला गया।
नजरों का नहीं दोष बताना,
चाय-कॉफी संग समय बिताना।
प्रेमी पंछी के पंख लगाकर,
पंछी प्रेमी चहका गया।
नजरिया चौंका गया,
दिल पागल बला गया।
कभी कॉलेज की मध्य सड़क पर,
कभी बस की बगल सीट पर।
नजरों की उन अंतर्चाह से,
बिन बोले हुई बातों का।
ह्रदय भीतर मन मंदिर में,
विराट रूप सा छा गया।
नजरिया चौंका गया,
दिल पागल बला गया।
नजर हुई है प्रेम की भाषा,
करता हूं मैं भी अभिलाषा।
हम तुम साथ रहे जीवन भर,
भविष्य से वर्तमान कहला गया।
नजरिया चौंका गया,
दिल पागल बला गया।
गाँव की लड़की
गाँव की लड़की शहर सड़क पर,
जब हाथ पकड़ कर चलती है।
मानो उसके अंतर् हृदय में,
भावों की नदियाँ बहती है।
हाथ पति का है फिर भी,
लाज शर्म यूं रखती है।
जाने उसको कोई न देखे,
घूंघट को सिर पर ढकती है।
मन भावों के अंतर् वेग में,
वह स्वयं से बाते करती है।
साथ कदम से कदम मिलाकर,
प्रेम उद्घाटित करती है।
गाँव की लड़की शहर सड़क पर,
जब हाथ पकड़ कर चलती है।
मानो उसके अंतर् हृदय में,
भावों की नदियाँ बहती है।
शहर की हर गली में प्रेम
क्योंकि,
शहर की हर गली में प्रेम बसता है,
प्रेमियों का चहुँओर यहीं आलम दिखता है।
कभी कैफे में चाय-कॉफी संग
कभी राह में बीच सडक पर
मोमोज, चाऊमीन खाते-खाते
आपस में बतियां कर
यह अपना रुप दिखाता है।
क्योंकि,
शहर की हर गली में प्रेम बसता है,
प्रेमियों का चहुँओर यहीं आलम दिखता है।
कभी बर्फ के गोले के संग
भांति-भांति ओढ़े जो रंग
रंगो के भीतर अपनों के संग, उत्साह संचार बढ़ाता है
है यह जीवन जगत ही शून्य
वहां सुनने को मिल जाता है।
क्योंकि,
शहर की हर गली में प्रेम बसता है,
प्रेमियों का चहुँओर यहीं आलम दिखता है।
कभी फोटोकॉपी और किताब को
हाथ लिए मिल जाता है
है यह पागल, पर है कर्म निष्ठ
पढ़ाई प्रेम को चित में रख
इज्जत करना भी सिखाता है।
क्योंकि,
शहर की हर गली में प्रेम बसता है,
प्रेमियों का चहुँओर यहीं आलम दिखता है।

डॉ. नवीन कुमार जोशी
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,
महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर
ई-मेल- [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. आपकी कविताएँ अच्छी लगी नवीन जी किंतु पहली कविता स्वयंसेवक अधिक अच्छी लगी। बधाई आपको।

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