उठ जा! कितना सोएगी… अक्सर ससुराल से विदा हुई बेटियों को मायके में यह उलाहना सुनना पड़ता है। और वह मुस्कुरा कर मिचमिचाती आँखों से कमरे में फैल आई रौशनी को अपनी आँखों में समेट फिर एक बार सो जाती हैं। अक्सर माँए गहने,कपड़ों और लाड़-दुलार के साथ अपना यह गुण भी बेटियों के सामानों के साथ चुपके से बांध देती है। हुई मुद्दत उन्हें नीम बेहोशी नींद की जिसके लिए वह ससुराल में तरसती हैं। वह घर में सबसे पहले जागती हैं और सबके सो जाने के बाद सोती हैं उनके जागने के साथ जागता है तुलसी का चौरा,आंगन की चिड़िया और रसोई के बर्तन… खुद को संवारने से पहले वह संवारती हैं घर को… वह इंतज़ार करती है माँ के फोन का क्योंकि वह भी जाग रही होगी सबके सो जाने के इंतज़ार में… नीम बेहोशी में सोए घर को देख वह निश्चिंत हो सोने जाती है। उनकी नीम बेहोशी टूटने से पहले कल सुबह उसे फिर उठना है क्योंकि उसके उठने के साथ उठते हैं तुलसी का चौरा,आंगन की चिड़िया और रसोई के बर्तन…
2 – माँ! तुम झूठी हो…
माँ! तुम झूठी हो बारह साल के बेटे के मुँह से यह बात सुन वह गुस्सा नहीं मुस्कुराई थी शायद हर माँ इसी तरह मुसकुराती है यह झूठ सच पूछो तो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है शायद अनुवांशिक होता है मेरी माँ भी झूठी थी उनकी माँ भी और शायद उनकी माँ भी इस झूठ बोलने के आरोप को वो पीढ़ियों से सुनती आई है बचपन में मिठाई के बीच कड़वी दवाइयों को छिपा कर खिलाती तो कभी पराठे में भरकर तो कभी नई डिश के नाम पर वह पौष्टिक भोजन खिलाती कभी नाना-नानी के कौर के साथ पूरी थाली खत्म कर जाती तो कभी… एक नई कहानी का वायदा कर आखिरी कौर-आखिरी कौर कह-कह कर पूरी थाली चट कर जाती माँ! तुम झूठी हो उम्र के साथ खत्म होती पिता की भूख का इलाज भी उसके पास था पिता की उन गिनती की दो रोटियों को लोई बढ़ाकर माँ दो रोटियाँ बनाती पिता का वो तिरछी नजर से देखना और फिस्स से माँ का मुस्कुराना और कहना… दो ही तो हैं सचमुच!माँ तुम बहुत झूठी हो।
डॉ. रंजना जायसवाल लाल बाग कॉलोनी छोटी बसही मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश पिन कोड 231001 मोबाइल नंबर- 9415479796 Email address- [email protected]
प्रिया रंजन जी बेहद खूबसूरत निर्मल झरने सी पवित्र कविताएं
नीम नीम बेहोशी कविता का सच, शादी के बाद, स्त्रियों के सुबह जागने पर ही घर में सुबह होती है ,शाम होती है,तुलसी का चोरा,
रसोई के बर्तन ,सभी जगते हैं स्त्री के साथ
बहुत सुंदर प्रिय
मां तुम झूठी हो ,
प्रिय यह कविता नहीं जीवंत मंत्र हैं
जो पीढ़ी दर पीढ़ी मां के द्वारा कहे जाते हैं
इस झूठे पन में मां के अदृश्य प्रेम की कोई कल्पना ,कोई पार नहीं पा सकता
दोनों कविताओं के लिए दिल से धन्यवाद
वात्सल्य रस से ओतप्रोत आपकी कविताओं को पढ़कर बच्चों का बचपन याद आ गया।
बेटियों की नींद स्मृति माताएँ कुछ ज्यादा ही नर्म पड़ जाती हैं और बेटों के प्रति दुलार। बहुत कुछ याद आया हमारा छोटा बेटा अक्सर कहता था कि “माँ! आप सोती नहीं हो क्या ?”
वह बहुत जल्दी सोता था और बहुत जल्दी उठ जाता था लेकिन उसके बावजूद हमें जागते हुए पाता था।
बच्चों को खिलाने के लिये भी बहुत झूठ बोलने पड़ते हैं। कितने बहाने बनाने पड़ते हैं। सबके नाम के अलग-अलग कौर कि अगर तुम नहीं खाओगे तो दादाजी भूखे रह जाएँगे, पापा भूखे रह जाएँगे।
वाकई माएँ बहुत झूठ बोलती हैं बच्चों से और बच्चों के लिये।
पर बच्चे बड़े होने के बाद समझ पाए इस महत्व को।
आपकी कविताएँ कई वर्ष पीछे ले गईं।
माँ की एक ही परिभाषा है, एक ही अर्थ है और हर बच्चे के लिये हर माँ एक जैसी होती है।
माँ के आँचल और पिता का साया ; जितना जीवन आनंद से जिया जाता है बस इसी छाया में जिया जाता और कहीं नहीं।
बेटी हो या बेटा माँ के लिए दोनों ही बराबर होते हैं।
हर बेटी अपनी माँ की परछाई ही तो होती है।
वात्सल्य रस से भरी हुई।
मध्यम वर्ग के लोग और उनसे नीचे के स्तर के चाहे जितने भी वर्ग होते हैं, महिलाओं का जीवन लगभग इसी क्रम में चलता है।
बहरहाल बहुत ही प्यारी कविताओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
प्रिया रंजन जी बेहद खूबसूरत निर्मल झरने सी पवित्र कविताएं
नीम नीम बेहोशी कविता का सच, शादी के बाद, स्त्रियों के सुबह जागने पर ही घर में सुबह होती है ,शाम होती है,तुलसी का चोरा,
रसोई के बर्तन ,सभी जगते हैं स्त्री के साथ
बहुत सुंदर प्रिय
मां तुम झूठी हो ,
प्रिय यह कविता नहीं जीवंत मंत्र हैं
जो पीढ़ी दर पीढ़ी मां के द्वारा कहे जाते हैं
इस झूठे पन में मां के अदृश्य प्रेम की कोई कल्पना ,कोई पार नहीं पा सकता
दोनों कविताओं के लिए दिल से धन्यवाद
रंजना जी!
वात्सल्य रस से ओतप्रोत आपकी कविताओं को पढ़कर बच्चों का बचपन याद आ गया।
बेटियों की नींद स्मृति माताएँ कुछ ज्यादा ही नर्म पड़ जाती हैं और बेटों के प्रति दुलार। बहुत कुछ याद आया हमारा छोटा बेटा अक्सर कहता था कि “माँ! आप सोती नहीं हो क्या ?”
वह बहुत जल्दी सोता था और बहुत जल्दी उठ जाता था लेकिन उसके बावजूद हमें जागते हुए पाता था।
बच्चों को खिलाने के लिये भी बहुत झूठ बोलने पड़ते हैं। कितने बहाने बनाने पड़ते हैं। सबके नाम के अलग-अलग कौर कि अगर तुम नहीं खाओगे तो दादाजी भूखे रह जाएँगे, पापा भूखे रह जाएँगे।
वाकई माएँ बहुत झूठ बोलती हैं बच्चों से और बच्चों के लिये।
पर बच्चे बड़े होने के बाद समझ पाए इस महत्व को।
आपकी कविताएँ कई वर्ष पीछे ले गईं।
माँ की एक ही परिभाषा है, एक ही अर्थ है और हर बच्चे के लिये हर माँ एक जैसी होती है।
माँ के आँचल और पिता का साया ; जितना जीवन आनंद से जिया जाता है बस इसी छाया में जिया जाता और कहीं नहीं।
बेटी हो या बेटा माँ के लिए दोनों ही बराबर होते हैं।
हर बेटी अपनी माँ की परछाई ही तो होती है।
वात्सल्य रस से भरी हुई।
मध्यम वर्ग के लोग और उनसे नीचे के स्तर के चाहे जितने भी वर्ग होते हैं, महिलाओं का जीवन लगभग इसी क्रम में चलता है।
बहरहाल बहुत ही प्यारी कविताओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।