Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. शिवानी कोहली की कविताएँ

1 – अब सोना चाहता है…

ख़ौफ, भय, अंधकार है और
प्रभात की चाह है इसके भीतर
परंतु
रात में खो जाने का डर भी
हर एक डर को
नई रौशनी में
तब्दील करना चाहता है
नींद का बहाना करता हुआ
मेरा ‘आशंकित मन’
अब सोना चाहता है।

2 – बीच वाली मंज़िल
मैं हमेशा
बीच वाली मंज़िल पर ही रही हूँ
सबसे ऊपर जाना
प्रतिबंधित था
और घरों की छतें जो लगती थीं
और
मेरा बाकी छतों से बात करना
मुनासिब नहीं समझा जाता था
दायरों की घुट्टी
मुझे पहले ही पिला दी गई थी
ऊपरी मंज़िल कैसी है
मैं कभी देख नहीं पाई
हाँ,
ऊपर जाती हुई सीढ़ियों पर
चुपके से
नज़र दौड़ा लिया करती थी
अंदाज़न
दस-बारह होंगी
चार-पाँच को मापा है मैंने
बस
इतनी ही हिमाकत कर पाई
पतंगों के पेच लड़ते
आसमान में सतरंगी झूला बनते
पक्षियों को दाना चुगते
अपनी उड़ान के करतब दिखाते
काले मेघों को बरसते
मैं कभी देख नहीं पाई
एक दफा
सूरज की सुनेहरी रोशनी
मेरी कोठरी में छुपते-छुपाते आई
रौशनदान से
नीले आकाश को मैंने
तब पहली बार देखा
उस टूटे हुए काँच से
उस घायल काँच की व्यथा
आज भी मेरी देह में
दर्द का काफिला दौड़ा देती है
मैं
भह्भीत, निशब्द
जीवन के पैंतीस वर्ष
बीच वाली मंज़िल पर।
3 – बस स्टॉप पर..
बस स्टॉप पर खड़ी
संगीत की जादुई दुनिया में डूबी
बेख़बर उन नज़रों से
जो मुझे
इस तरह स्कैन कर रहीं थीं
कि मैं
खुद में सिमट कर रह गई
कुछ कहना चाहा
पर कह नहीं पाई
दुपट्टे को शॉल की तरह ओढ़ा मैंने
काँपते हाथों ने
बैग में
कुछ टटोलने का बहाना किया
दाएँ-बाएँ देखते हुए
यह देखना चाहा कि
उसे, मुझे देखते हुए
किसी ने देखा तो नहीं
फिर से हिम्मत जुटाई
इस उम्मीद से कि
अब तो वे नज़रें मुझ पर से
हट चुकी होंगी
पर
बिना किसी शर्म और लिहाज़ के
वे कर रहीं थी
मेरी आबरू का अपहरण
मेरी सादगी को अपने पैरों तले कुचल रही थीं
मैं बेबस, लाचार, सिकुड़ती रही…
और.. सिकुड़ती रही…
बस स्टॉप पर…
4 – कैनवस
कैनवस पर
रंग बिखेरते समय
तुम
मेरी छोटी-सी तस्वीर में
रंग भरना
भूल गए शायद
तभी आज तक
किसी ने
इस चेहरे को जाना नहीं
पहचाना नहीं
पूछा नहीं किसी ने
कौन हो तुम?
रैक में पड़ी किताबों को भी
सालों बाद
पढ़ लिया जाता है
पर
मुझे इतनी नीचे रख दिया गया कि
दबी रही
‘मैं और मेरी आवाज़’
रंगों से पहचान करवाना
तुमने मुनासिब ही नहीं समझा
या फिर
मुमकिन ही नहीं था तुम्हारे लिए
पर
मुझे तो सब रंग अच्छे लगते हैं
सफेद से कुछ यूँ नाता बना दिया तुमने कि
धैर्य की मूरत के नाम से
जानी जाने लगी
अब
मैं खुद में सब रंग भरूँगी
और अपनी तस्वीर पूरी करूँगी
तू भले ही मुझे
रूप बना या कुरूप
अब उसमें रंग मेरे अपने होंगे
तेरे ब्रश और रंगों के बिना
अब मैं इतराऊँगी
अब तेरे रंग नहीं
खुद के रंग बनाऊँगी।
5 – माँ का स्वैटर
माँ को स्वैटर बुनते देख
अक्सर
मैं सोचा करती थी कि
औरत की तकदीर को बुनते समय
खुदा ने
कौन से नंबर की सिलाई का इस्तेमाल किया होगा?
जो
न तो उधेड़ी जा सकती है
और
न ही बुनती ढीली की जा सकती है।

डॉ. शिवानी कोहली
ईमेल [email protected]
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3 टिप्पणी

  1. शिवानी जी!
    आपकी कविताएँ पढ़ीं।
    इस तरह की कविताएं हमें चिंतित कर देती हैं कवि के प्रति।
    1-
    *अब सोना चाह तयता है….*
    सुख और दुख की तरह अंधकार और प्रकाश का क्रम है इसी तरह भय और अभय की स्थिति है।
    वैसे नींद बहाना नहीं है भय से बचने का! भय की विशेषता है कि वह नींद उड़ा देता है। हजार कोशिशों के बावजूद नींद नहीं आती है भय में।
    हम ऐसा सोचते हैं। एक बार विचार कीजिएगा।
    2-
    *बीच वाली मंजिल*
    आपकी इस कविता ने सोचने पर मजबूर किया। यह कविता सच्ची लगी।ऐसा होना पूरी तरह संभावित है।
    स्त्रियों के जीवन में सीमाओं की परिधि आज भी देखने को मिल जाएगी। इस कविता ने द्रवित किया। स्त्रियों के लिए गुलामी का यह प्रकार आज भी काबिज है।
    अगर 35 वर्षों में नीले आकाश को पहली बार देखने की बात की जाए, इसका अर्थ यह है कि माता-पिता के यहाँ पर रहते हुए भी जीवन कैद में रहा। कविता में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह विवाह के बाद की स्थिति है।
    इस दृष्टि से विचार करें तो यह कविता बेहद संवेदनशील है। कविता ने एहसास दिलाया कि यह कलयुग है!यहाँ माता-पिता भी कुछ भी कर सकते हैं बेटी के साथ। कविता ने हमें द्रवित किया। बेहद मार्मिक लगी।

    3-
    *बस स्टॉप पर*
    सीधी और सरल लड़कियों या महिलाओं के लिए बस स्टॉप पर खड़े होना वाकई तकलीफ देह है।आज की दुनिया ऐसे लोगों के लिये नहीं।
    4-
    *कैनवस*
    यह कविता हौसले की कविता है जिसकी जरूरत है बस स्टॉप पर भी महसूस हुई।
    प्रतीकात्मकता में कैनवस और रंग का बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है। रंग मानव जीवन में भी खुशियों के प्रतीक हैं। जीवन में रंग हैं तो खुशियाँ हैं।
    पितृसत्तात्मकता का वर्चस्व स्त्रियों के जीवन को अंधेरे से बाहर लाना सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता।
    सफेद रंग वैधव्य का परिचायक है।
    कविता संदेश देती है कि जीना है तो अपनी खुशी से जिया जाए। यह आत्मविश्वास जब मन में आता है तभी कुछ करने की हिम्मत आती है।
    यह आत्मविश्वास की कविता है। अज्ञानता के अंधकार से जागृति के प्रकाश की ओर जाने की तरह!

    5-
    *माँ का स्वैटर*
    यह तो बहुत ही मार्मिक कविता रही।
    न जाने किस नंबर की सिलाई का उपयोग किया होगा!

    कैनवस के उत्तरार्ध को छोड़ दें तो सभी कविताएँ मजबूरी के मलवे में दबी स्त्री की प्रतिबंधित दमित इच्छाओं की आपबीती सी लगी।
    इन संवेदनशील कविताओं के लिये बधाई आपको।
    प्रस्तुति के लिये नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

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