Wednesday, February 11, 2026
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ललन चतुर्वेदी की कविताएँ

1 – हत्यारे
वे वेदनाएं अबूझ रहीं
जो हमारी भाषा में रुपांतरित नहीं हो सकीं
जैसे कुल्हाड़ी के प्रहार से
विदीर्ण होते वृक्ष की कराह
लकड़हारा खुश हुआ अररा कर गिरते हुए पेड़ को देखकर
मिट्टी ने मजबूती से थाम रखा था जिनके जड़ों को
आज वह भी आ गई धरातल पर
सन ग‌ई उन जड़ों के आंसू में
पलंग पर बैठते हुए हमने सदैव आराम महसूस किया
कभी ध्यान ही नहीं आया कि
हम वृक्ष की छाती पर बैठकर बरसों से कर रहे हैं शव -साधना
जो भी आएं हमारे पैरों के तले
हमने सबको रौंधा और खुशियां मनायी
हम करते रहे उन पर अत्याचार
जिनका कोई प्रवक्ता नहीं था
जिनकी कोई जुबान नहीं थी
अपने को सभ्य घोषित करते हुए
हमें नहीं आयी थोड़ी सी भी शर्म
पेड़ अपनी जगह खड़े थे मेरे लिए छतरी लगाए
हमने पत्तों को रोते हुए नहीं सुना
हमने नहीं सुनी असंख्य जीवों की गुहार
जो अपने प्राण की भीख मांग रहे थे
हमें घिन आने लगी है अपनी ताक़त से
केवल इन्सानों की जान लेने वाले ही हत्यारे नहीं होते
अभी असंख्य हत्यारों की शिनाख्त बाकी है।
*****
2 – संसार कृतज्ञता का पाठ याद नहीं करता
कितने लोग अपनी प्यास दबाए बैठे हैं
हलक सूख रहे हैं लेकिन वे पानी के तलबगार नहीं हैं
हां,वे मर जायेंगे मगर तुमसे नहीं मांगेंगे पानी
तुम उन्हें समझते रहो मूर्ख पर वे ज्ञानी हैं
तुम नहीं जानते वे क्यों नहीं मांगते पानी
शायद इसलिए कि उनकी आंखों में अथाह पानी है
वे जानते हैं इस मरूभूमि का यथार्थ
वे बालुका राशि में स्वर्ण के अन्वेषी नहीं हैं
वे बात- बात पर ठुमकने वाले लोग नहीं हैं
वे समझ चुके हैं इस मोहक सफर का सत्य
तुम्हारी कोई सलाह उनका मार्गदर्शन नहीं कर सकती
तुम उन्हें मत समझाओ जंगल में मोर के नाचने की व्यर्थता
वे जानते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता फूल के चमन या वन में खिलने का
वे उत्सव की तैयारी में जीते हैं जीवन
आदि और अंत से परे होता है उनका चिंतन
उन्होंने देखी है जीवन और मृत्यु के बीच एक बारीक सी रेखा
इसीलिए सारे प्रदर्शन उन्हें लगते हैं नश्वर
वे आने वाले के स्वागत में नृत्य नहीं करते
न जाने वाले के लिए पसारते हैं रोदन
कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें चाहे मिले अस्वीकृति या अनुमोदन
वे प्यासे रहकर भी नहीं बहायेंगे आंसू
पर तुम्हारे दंभ पर वे जरूर मौन हंसी हंसेंगे
वे अपने हलक में प्यास और आंखों में पानी सुरक्षित रखेंगे ऊंट की तरह
जिस दिन लोगों की नजरें झुकी रहेंगी
उस दिन भी उनका दीप्त भाल सदैव उन्नत रहेगा
उन्हें मालूम है चाहे सब कुछ लुटा दो
संसार कृतज्ञता का पाठ कभी याद नहीं करता।
*****
3 – सपने
वे रोटियों के लिए आये थे यहाँ
उन्हें रोटियां भी मिलीं
पर वे रोटी खाना भूल गए
वे माँ-बाप के सपने पूरे करने आए थे
सपने पूरे भी हुए
पर वे माँ -बाप को भूल गए
वे सबसे घुलते- मिलते थे
दोस्त उन्हें कहते थे यारों के यार
इस शहर में आते ही
वे प्राइवेसी के हो ग‌ए तलबगार
कल तक उनके पास इफरात समय था
अब फोन उठाने के लिए भी समय नहीं रहा
उनके टाइमलाइन पर अंकित हो गई चेतावनी –
नो कॉल,ओनली मेसेज
वे सोचकर आए थे
कमाकर बड़ा सा घर बनायेंगे
रहेंगे पूरे परिवार साथ – साथ
आज बिना आँगन वाले घर में कैद हैं
वे सोलहवीं मंजिल पर हैं अपने सपना के साथ
उन्हें स्वीकार नहीं है रहना अपनों के साथ।

ललन चतुर्वेदी
हिन्दी अनुभाग,तीसरा तल, सीएसटीआरआई,सेंट्रल सिल्क बोर्ड
बीटीएम लेआउट,मडिवाला,बेंगलूर-560068
मो नं 9431582801
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